बृहदारण्यक उपनिषद्

बृहदारण्यक उपनिषद्
शुक्ल यजुर्वेद · उपनिषद्
वन में रचा गया विशाल पाठ, और उसकी वे मुलाक़ातें जिनमें पहली बार कहा गया, “मैं ही ब्रह्म हूँ।”

आज से कोई ढाई-तीन हज़ार बरस पहले के उत्तर भारत की एक तस्वीर मन में लाइए। उन दिनों जीवन और मौत के गहरे-से-गहरे सवाल किताबों में नहीं सुलझते थे, खुली सभाओं में और वन की कुटियों में सुलझते थे। राजा अपने दरबार में ज्ञान की होड़ कराते, बड़े-बड़े पंडित आमने-सामने बैठकर एक-दूसरे को परखते, और जो सबको निरुत्तर कर देता, इनाम उसी का होता। ऐसी ही होड़ों का नायक था याज्ञवल्क्य, अपने ज़माने का एक बेहद निडर दिमाग़, जो भरी सभा को अकेले चुप करा देता था।

ग्रंथ का नाम ही उसका मिज़ाज बता देता है। “बृहत्” यानी विशाल, “आरण्यक” यानी वन का पाठ, यानी वन में रचा गया विशाल ग्रंथ, जो पुराने शतपथ-ब्राह्मण के आख़िरी हिस्से से निकला है। तीन काण्डों में बँटा हुआ। पर यह उपनिषद् यह नहीं पूछता कि सृष्टि कैसे बनी। यह पूछता है कि जब सब कुछ छिन जाए, तब क्या बचता है। जो देख रहा है, सुन रहा है, सोच रहा है, वह कौन है। इसी खोज में यहाँ पहली बार वह वाक्य कहा गया जिसे आगे पूरी वेदान्त-परम्परा दोहराती रही, “अहं ब्रह्मास्मि”, मैं ही ब्रह्म हूँ। साथ ही वह तरीक़ा भी, “नेति, नेति”, यह भी नहीं, यह भी नहीं।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

याज्ञवल्क्य: उस युग के प्रकांड ऋषि, राजा जनक के दरबारी-दार्शनिक, और शुक्ल-यजुर्वेद की परम्परा के प्रवर्तक। बहस में किसी से नहीं हारते।

जनक: मिथिला (विदेह) के राजा, जो राजपाट के साथ-साथ ब्रह्म-विद्या के दीवाने थे, और इन्हीं सवालों पर सभाएँ कराते थे।

मैत्रेयी: याज्ञवल्क्य की पत्नी और ब्रह्मवादिनी (ब्रह्म की खोज में लगी स्त्री)। उनकी दूसरी पत्नी कात्यायनी घर-संसार में रमी एक साधारण गृहिणी थीं।

गार्गी वाचक्नवी: जनक की सभा की अकेली विदुषी, जिसके सवालों से बड़े-बड़े विद्वान कतराते थे।

उद्दालक आरुणि और शाकल्य: सभा के दो और प्रकांड आचार्य, जिन्होंने याज्ञवल्क्य को घेरा।

प्रजापति: सृष्टि के रचयिता, जिन्होंने देवता, मनुष्य और असुर, तीनों को एक ही अक्षर से सिखाया।

मधु काण्ड · अध्याय एक और दो

सृष्टि से पहले, और पहला शब्द “मैं हूँ”

पूरे बृहदारण्यक के पहले अध्याय में जो चौथा खंड आता है, स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार वही इस अध्याय का प्राण है। इसे पुरुषविध-ब्राह्मण (पुरुष के रूप में सृष्टि का वर्णन) कहते हैं, और यह उपनिषद् यहाँ सृष्टि की पूरी गाथा कहता है, ऊपर के परम सत्य से लेकर नीचे के क्षुद्र-से-क्षुद्र जीव तक। स्वामी जी कहते हैं कि यह केवल किसी बाहरी जगत् की कहानी नहीं, यह हम सबकी कहानी है, क्योंकि “आप”, “हम” और हर प्राणी इसी सृष्टि में सम्मिलित हैं।

तो प्रश्न यह कि आरम्भ में, जब कुछ भी न था, तब क्या था? तब न जगत् था, न कोई व्यक्ति, न कोई हलचल। फिर भी, स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं, “कुछ” तो था। वह “कुछ” था आत्मा (सबका अपना मूल स्वरूप), केवल शुद्ध होना (सत्, यानी मात्र अस्तित्व)। वही अकेला था, और उसके सिवा किसी और की कल्पना तक सम्भव न थी। यही वह सत्य है जिसे आगे यह उपनिषद् “सत्यस्य सत्यम्” (सत्य का भी सत्य) कहकर पुकारता है।

पर स्वामी जी एक नाज़ुक बात की ओर इशारा करते हैं। यह शुद्ध “होना” इतना निराकार है कि उसे सोचने बैठिए तो वह “कुछ नहीं” जैसा जान पड़ता है। सृष्टि के कारण को समझने के लिए मन को कोई पकड़ चाहिए, इसलिए उपनिषद् उसे “पुरुषविध” कहता है, यानी उस परम कारण को एक “व्यक्ति” के समान मान लिया जाता है। हम ईश्वर को परम पुरुष (सर्वोच्च व्यक्ति) इसीलिए मानते हैं, स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं, क्योंकि मनुष्य के मन के पास मनुष्यता से ऊँची कोई और जीती-जागती पकड़ ही नहीं। इसलिए हमारे मन का जो गहरे-से-गहरा रूप है, उसी का अनन्त विस्तार उस कारण के रूप में मान लिया जाता है।

The primordial cosmic Purusha awakening alone in a luminous void before creation, a radiant golden anthropomorphic figure with eyes just opening, the first word 'I AM' glowing around him, classical Indian temple-mural style.

अब वह परम पुरुष अपने प्रति जागा। पर किसका बोध हुआ उसे? केवल अपना ही, क्योंकि उसके बाहर तो कुछ था ही नहीं। स्वामी जी कहते हैं, वह न पुरुष था न स्त्री, उसे अपने सिवा किसी की ख़बर न थी, क्योंकि “किसी और” का कोई ठिकाना ही न था। और जागते ही उसने पहली बात जानी, “मैं हूँ” (अहम् अस्मि)। यही पहली चेतना थी, न “आप हैं”, न “वह है”, न “यह है”। यह वह आदिम “मैं” था, स्वामी कृष्णानन्द बताते हैं, देह से बँधे अहंकार वाला छोटा “मैं” नहीं; यह तो शुद्ध, सर्वव्यापी “मैं” था। और यही शाश्वत “मैं” आगे चलकर हर छोटे-छोटे जीव के भीतर “मैं” बनकर झलकता है।

इसीलिए, स्वामी जी कहते हैं, आज भी किसी द्वार पर दस्तक हो और भीतर से पूछा जाए “कौन है?”, तो उत्तर आता है, “मैं हूँ”। नाम बाद में आता है, पहले तो बस “मैं”। यह जो हर व्यक्ति अपने को “मैं” कहकर पकड़ता है, यह उसी मूल “मैं” की गूँज है। और देखिए, हमें इस “मैं” से जितना प्रेम है उतना किसी और से नहीं; बाक़ी सब चीज़ें भी इसी “मैं” की रक्षा के लिए, इसी की ख़ातिर प्यारी लगती हैं। जिस दिन यह “मैं” जाता है, सब कुछ साथ ही चला जाता है। इसी कारण “अहम्” (मैं) ही ईश्वर का असली नाम है, स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं, क्योंकि ईश्वर तो शुद्ध आत्म-चेतना ही है। यही “मैं हूँ” आगे “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ब्रह्म हूँ) की जड़ बनता है।

अब वह “पुरुष” क्यों कहलाया? स्वामी जी इस शब्द का मर्म खोलते हैं। पुरुष वह है जिसने बाहरीपन (बाहर किसी “दूसरे” के होने) के पाप को जला डाला। यहाँ जिस बुराई की बात है वही अकेली असली बुराई है, और वह है बाहरीपन। जब कोई “दूसरा” बाहर होता ही नहीं, तब डर भी नहीं, बुराई भी नहीं; सारा डर और सारा खिंचाव इसी बाहरीपन की सन्तान है। जो उस “दूसरे” को सच मान बैठता है, उसी में सम्पर्क की चाह जागती है, और चाह में ही शक्ति रिसती रहती है। पर वह परम पुरुष अकेला अपने में पूर्ण था, इसलिए कुछ बाहर न रहा कि उससे शक्ति बहे। स्वामी कृष्णानन्द आश्वासन देते हैं कि “जो ऐसा जानता है” (य एवं वेद), वह भी ऐसा ही हो सकता है। ऐसे पुरुष के सामने कोई टिक नहीं सकता, कोई होड़ नहीं कर सकता; वह अजेय हो जाता है, स्वयं शक्ति का रूप, क्योंकि उसकी शक्ति बाहरी सम्पर्क में चुकती ही नहीं।

सार: सृष्टि से पहले केवल शुद्ध “होना” था, और जागते ही उसने एक बात जानी, “मैं हूँ”। आप जिसे रोज़ “मैं” कहकर पकड़ते हैं, वह उसी आदिम “मैं” की झलक है। सारा डर, सारी चाह उस “दूसरे” से आती है जिसे हमने बाहर रच लिया; जो भीतर अपनी पूर्णता में लौट आता है, उससे न कोई होड़ कर सकता है, न उसकी शक्ति कभी चुकती है।

इन्द्रियों की होड़, और “असतो मा” की पुकार

सृष्टि की पूरी कथा कह चुकने के बाद बृहदारण्यक उपनिषद् अब एक कहानी के बहाने एक गहरी बात खोलता है। प्रजापति (सृष्टि के रचयिता) की दो तरह की संतानें आपस में भिड़ी हुई हैं, एक ओर देवता और दूसरी ओर असुर। आचार्य शंकर (प्रकांड वेदान्ती भाष्यकार) बताते हैं कि देवता हमेशा गिनती में कम होते हैं और असुर अधिक, यानी अपनी सहज वृत्तियों के पीछे भागने वाले अधिक होते हैं और उन्हें थामने वाले कम। देवताओं ने सोचा कि असुरों को परास्त करने के लिए वे उद्गीथ (सामवेद का एक मंत्र-गान) का सहारा लेंगे, और इस गान की शक्ति से ही असुरों को जीत लेंगे।

स्वामी कृष्णानन्द यहाँ एक बारीक बात कहते हैं। यह देवता और असुर कोई बाहर के प्राणी नहीं, हमारे ही भीतर की दो प्रवृत्तियाँ हैं। जो शक्ति सब कुछ जोड़कर एक करती है, वह देवता है, और जो शक्ति तोड़कर बिखेरती है, वह असुर है। और इन्द्रियों के देवता हमारे शरीर में अलग-अलग बैठे हैं, आँख का देवता सूर्य, नाक के अश्विनीकुमार, कान की दिशाएँ, जीभ का वरुण, त्वचा का वायु, मन का चन्द्रमा। स्वामी जी कहते हैं कि उद्गीथ का यह गान मुँह से की गई कोई रट नहीं, यह तो अपने भीतर की इन्द्रिय-शक्ति को बाहर की विराट शक्ति के साथ एक सुर में मिला देना है। यह मेल न हो, तो मंत्र काम ही नहीं करता।

देवताओं ने पहले वाणी से कहा, “आप हमारे लिए उद्गीथ गाइए।” वाणी उठ खड़ी हुई और गाने लगी। पर असुर ताड़ गए, उन्होंने वाणी पर पाप (विकार) का प्रहार कर दिया। तभी से वाणी अच्छा भी बोलती है और बुरा भी, हित की बात भी कहती है और चोट पहुँचाने वाली भी। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार वाणी की यही बुरा बोल सकने की ताक़त असुरों के उस घाव का निशान है। फिर बारी-बारी आँख ने गाया, और असुरों ने उसे भी बेध दिया, इसीलिए वही आँख सही भी देखती है और ग़लत भी, एक ही चीज़ को ठीक तौर पर और बिगड़े तौर पर, दोनों तरह देख लेती है। कान आया, उसे भी विकार लग गया, इसीलिए कान एक खुला दरवाज़ा है जिसमें भला-बुरा सब घुस आता है। जीभ, नाक, और अन्त में मन तक, हर एक गाने उठा और हर एक को असुरों ने भेद दिया। देवता हार के कगार पर आ गए।

The dark asuras hurling themselves against the serene central life-breath (Mukhya Prana) personified as a steady glowing figure, shattering like a dry clay clod smashing on hard rock and scattering to dust in all directions.

आख़िर में देवताओं ने भीतर की उस एक जोड़ने वाली शक्ति से कहा, मुख्य प्राण (केंद्रीय साँस, वह जीवन-ऊर्जा जो पूरे शरीर में फैली है) से, “आप ही गाइए।” प्राण ने गाना शुरू किया। असुर उस पर भी झपटे, पर इस बार कुछ और ही हुआ। उपनिषद् कहता है कि जैसे सूखी मिट्टी का ढेला किसी कठोर चट्टान से टकराकर ख़ुद ही चूर-चूर हो जाता है, चट्टान को कुछ नहीं होता, वैसे ही असुर प्राण से टकराकर बिखर गए और चारों दिशाओं में उड़ गए। देवता फिर से अपने असली पद पर लौट आए। स्वामी जी समझाते हैं कि प्राण किसी एक इन्द्रिय का नहीं, वह तो वह अकेली शक्ति है जो पूरे तंत्र में बहती है, जिसके बिना न आँख देख सकती है, न कान सुन सकता है। हर इन्द्रिय अपने ही विषय की ओर भागती है, इसीलिए हर इन्द्रिय बिखेरने वाली है, और इसीलिए असुर उसे पकड़ लेते हैं। प्राण किसी विषय की ओर नहीं भागता, वह तो जोड़ता है, इसीलिए विकार उसे छू भी नहीं पाता।

स्वामी कृष्णानन्द इसी बिंदु को और गहरा करते हैं। यह प्राण असल में सूत्रात्मा (वह सूत्र जिसमें सारी सृष्टि मनके की तरह पिरोई है) है, जिसे हिरण्यगर्भ (समूची सृष्टि की पहली समष्टि-चेतना) भी कहते हैं, और यह हमारे भीतर बैठी आत्म-शक्ति का ही सीधा रूप है। हमारा शरीर तो असंख्य अलग-अलग कोशिकाओं और अंगों से बना है, फिर भी हमें अपने भीतर एक अखंड पूरेपन का एहसास होता है। स्वामी जी कहते हैं कि यह एकता का एहसास इसी प्राण की देन है, और आख़िर में आत्मा की ही देन है। हम जो भीतर से कमज़ोर अनुभव करते हैं, उसकी जड़ यही है कि अहंकार के मारे हमने “मेरा प्राण, मेरा मन, मेरी इन्द्रियाँ” कहकर अपने आपको उस सर्वव्यापी विराट प्राण से काट लिया है, जैसे कोई दीवार खड़ी कर ली हो। यह दीवार गिरते ही वही ऊर्जा जो हर जगह बह रही है, हममें भी बहने लगती है।

A seeker rising from shadow toward radiant dawn light, hands joined in prayer, the senses-deities (sun for eye, moon for mind) reconnecting to a single cosmic light overhead, illuminated-manuscript devotional style.

तो इलाज क्या है? स्वामी जी कहते हैं, इन्द्रियों को विषयों की ओर भागने से रोककर उनके अपने स्रोत की ओर लौटा देना। आँख को वापस सूर्य से जोड़ देना, हर देवता को विराट के एक अंग के रूप में देख लेना, जैसे छोटे-से बल्ब का तार दूर बैठे बिजलीघर से जुड़ जाए और रोशनी अपने आप आ जाए। और इसकी पराकाष्ठा यह दृष्टि है कि सामने जो दिखता है वह असल में कोई “वस्तु” है ही नहीं, क्योंकि अपनी जगह से तो वह भी एक विषयी (अपने आपको जानने वाला) ही है। हर कण में, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म कण तक में अपने होने का यह भाव बैठा है, इसलिए सच में कहीं कोई पराई वस्तु है ही नहीं, हर ओर बस एक ही चेतना है। इसी मोड़ पर इस ब्राह्मण की वह विश्वविख्यात प्रार्थना उठती है, असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय (मुझे असत् से सत् की ओर ले चलिए, अँधेरे से उजाले की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर)। यह उसी यात्रा की पुकार है, बिखराव से एकता की ओर, इन्द्रियों की होड़ से उस केंद्र की ओर जिसे कोई विकार छू नहीं सकता।

सार: इन्द्रियाँ हारती हैं क्योंकि हर एक अपने विषय की ओर भागकर हमें बिखेरती है, और बिखराव पर ही विकार पकड़ बनाता है। जो भीतर का केंद्र सब को जोड़ता है, वह प्राण, अछूता रहता है। साधना यही है कि भागती इन्द्रियों को अपने स्रोत की ओर मोड़ दिया जाए, और तब “असतो मा सद्गमय” कोई रट नहीं, उसी लौटने की सहज पुकार बन जाती है।

मधु-विद्या: हर चीज़ किसी और की मिठास है

इस विद्या के पीछे एक अनोखी कथा है, और स्वामी कृष्णानन्द इसे यहीं से शुरू करते हैं। मधु-विद्या (वह गुप्त ज्ञान जो बताता है कि हर चीज़ हर दूसरी की मिठास है) इतनी गोपनीय थी कि देवराज इन्द्र चाहते थे कि वह केवल उन्हीं के पास रहे, किसी और तक न पहुँचे। उन्होंने अपने गुरु दधीचि, अर्थात् दध्यङ् आथर्वण ऋषि (अथर्ववेद की परम्परा के एक तपस्वी आचार्य) से कह रखा था, “यदि आपने यह किसी और को सिखाया, तो हम आपका सिर काट देंगे।” ऐसा विचित्र शिष्य था, और गुरु चुप रह गए।

The twin Ashvini-Kumara physicians fitting a white horse's head onto the seated sage Dadhyan (Dadhichi) while his true human head rests safely aside, the horse-mouth about to speak the secret Madhu-vidya, jewel-toned classical painting.

फिर अश्विनीकुमार, स्वर्ग के जुड़वाँ देव-वैद्य (देवताओं के चिकित्सक), इस विद्या के अभिलाषी होकर आए और बोले, “हमें मधु-विद्या सिखा दीजिए।” ऋषि ने कहा, “जानते हैं इसमें क्या ख़तरा है? इन्द्र ने धमकी दे रखी है कि सिखाते ही मेरा सिर चला जाएगा।” अश्विनीकुमारों ने एक चतुर युक्ति निकाली, “आप चिंता न कीजिए। पहले हम आपका असली सिर निकालकर सुरक्षित रख देंगे, उसकी जगह घोड़े का सिर जोड़ देंगे। आप उसी घोड़े के मुँह से यह विद्या कह दीजिए। इन्द्र क्रोध में जो सिर काटेंगे, वह घोड़े का होगा। बाद में हम आपका अपना सिर वापस जोड़ देंगे।” और ठीक वैसा ही हुआ। घोड़े के मुख से मधु-विद्या प्रकट हुई, इन्द्र ने वही अश्व-सिर काट दिया, और अश्विनीकुमारों ने ऋषि का असली सिर लौटाकर उन्हें पूर्ण कर दिया।

कथा चाहे जो हो, स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि इसका सार एक भव्य घोषणा है: हर चीज़ हर दूसरी से जैविक रूप से जुड़ी है। यह जुड़ाव बनावटी नहीं, जीवित और सावयव (शरीर के अंगों जैसा परस्पर गुँथा हुआ) है। जब हम किसी एक वस्तु को छूते हैं, उसी क्षण सबको छू लेते हैं। मेज़ छूने वाला सूर्य को भी छू रहा होता है। एक को जान लेना सबको जान लेना है। इसी रहस्य पर इन्द्र इतने मुग्ध थे कि उसे अपने तक रोक रखना चाहते थे।

उपनिषद् का पहला वाक्य है, “यह पृथ्वी सब प्राणियों का मधु (शहद) है, और सब प्राणी पृथ्वी के मधु हैं।” स्वामी जी इसे यूँ खोलते हैं: जैसे हम शहद को चूसकर, चाटकर, भोगकर अपने भीतर समा लेते हैं, वैसे ही प्राणी पृथ्वी को अपने भीतर सोख लेते हैं, और पृथ्वी भी हर प्राणी को अपने में समा लेती है। यह दो तरफ़ा रसपान है। यहाँ पृथ्वी से अर्थ इस मिट्टी की गेंद भर नहीं, पूरी भौतिक सृष्टि है। ऐसे ही जल, अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्र, सब महाभूत (पाँच मूल तत्व) हमारे भीतर अपने-अपने प्रतिरूप रखते हैं। हमारे शरीर की ठोसता वही पृथ्वी है, हमारी आँख में वही सूर्य देखता है, हमारी साँस वही ब्रह्मांडीय वायु है।

पर असली बात इससे आगे है। इन दोनों छोरों, बाहर के विराट और भीतर के व्यक्ति, के बीच एक तीसरा, श्रेष्ठ तत्व बैठा है: तेजोमय अमृतमय पुरुष (वह प्रकाशमय अमर चेतना जो हर पिंड को जिलाती है)। सूर्य में बैठा वह अमृत-पुरुष और आँख में बैठा वह अमृत-पुरुष, स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं, अलग नहीं। दोनों को जोड़ने वाली वही एक चेतना है। और तब उपनिषद् कहता है, “अयम् एव स यो’यम् आत्मा, इदं ब्रह्म, इदं सर्वम्” (यही वह आत्मा है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है)। यह आत्मा न मेरी है न आपकी; यह सब प्राणियों की आत्मा है। स्वामी जी और भी पैना करके कहते हैं, यह वह आत्मा है जो स्वयं सब प्राणी ही है। विराट इस व्यक्ति पर पलता है और व्यक्ति विराट पर, ठीक माँ और बच्चे की तरह एक-दूसरे को खिलाते हुए।

स्वामी जी एक चक्र का चित्र देते हैं: जैसे पहिए की धुरी (नाभि) में सारी तीलियाँ जुड़ी रहती हैं, वैसे ही सब प्राणी, सब देव, सब लोक, सब प्राण इसी एक आत्मा में टिके हैं। और फिर वह वचन आता है जिसे स्वामी कृष्णानन्द बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं, “रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव” (हर रूप में वह उसी का अनुरूप बनकर प्रकट हुआ)। पक्षी के साँचे में ढले तो पक्षी दिखे, मनुष्य के साँचे में ढले तो मनुष्य। पर इतनी विचित्रता रची क्यों? उपनिषद् का उत्तर है, “तद् अस्य रूपं प्रतिचक्षणाय” (यह रूप उसी को पहचानने के लिए है)। स्वामी जी ज़ोर देते हैं कि भगवान ने यह जगत बेकार नहीं रचा; हर रूप उसकी उपस्थिति का संकेत है, ताकि हम हर सीमित आकृति में से उस एक को पहचान लें। हमारी मुश्किल यही है कि हम एक रूप देखकर उसे बाक़ी रूपों से जोड़ नहीं पाते, और इसी अलगाव के कारण दुख में पड़ते हैं। जो उसकी आँखों से देखे, उसे न कोई विरोध दिखता है न कोई गुत्थी, केवल एक अखंड परस्पर-जुड़ाव।

सार: हर चीज़ किसी और की मधु है, उसे चूसती भी है और उसकी मधु बनती भी है, क्योंकि भीतर-बाहर एक ही तेजोमय अमृत-पुरुष बैठा है। रूपों की यह सारी विविधता किसी और के लिए नहीं रची गई; वह इसलिए है कि उस एक को हर रूप में पहचाना जाए। जिस दिन एक को छूते ही सब छू जाए, उस दिन न कोई विरोध बचता है, न कोई अकेलापन।

गहरी नींद में हम कहाँ चले जाते हैं

दृश्य काशी के राजदरबार का है। दृप्तबालाकि गार्ग्य, गर्ग वंश में जन्मा एक प्रकांड पंडित, अपनी विद्या पर इतना मुग्ध है कि उसके नाम के आगे ही “दृप्त” (घमंडी) जुड़ गया है। वह काशीराज अजातशत्रु के पास आकर बड़े गर्व से कहता है, “हम आपको ब्रह्म (वह परम सत्य जो सबके पीछे है) सिखाएँगे।” राजा भलमनसाहत से प्रसन्न हो उठता है, “कैसी कृपा है आपकी! आइए, हम भी राजा जनक की तरह आपको हज़ार गायें भेंट करें।” पर इस विनम्रता के नीचे एक बात छिपी है, जिसे गार्ग्य अभी नहीं जानता, कि शिष्य बनने जो स्वयं आया है, वही गुरु बनकर खड़ा है।

गार्ग्य एक-एक करके ब्रह्म की परिभाषाएँ देता है। “हम सूर्य में बसने वाले पुरुष को ब्रह्म मानकर उपासना करते हैं।” अजातशत्रु रोक देता है, “मुझसे ऐसे मत कहिए।” फिर चंद्रमा, बिजली, आकाश, वायु, अग्नि, जल, दर्पण में दिखता प्रतिबिंब, और पीछे से आती पदचाप की ध्वनि, हर बार गार्ग्य किसी एक रूप पर उँगली रखता है, और हर बार राजा उसे लौटा देता है। स्वामी कृष्णानन्द इस पूरे क्रम को “ब्रह्म की क्रमिक परिभाषा” कहते हैं, और इसका मर्म यह बताते हैं कि गार्ग्य हर बार किसी विशेष रूप (सीमित, ढला हुआ आकार) को पकड़ बैठता है, जबकि अजातशत्रु हर विशेष के पीछे की उस सामान्य सत्ता की ओर इशारा करता है जो उस रूप को संभव बनाती है। दर्पण की उपासना मत कीजिए, उस “प्रतिबिंबित करने की क्षमता” की कीजिए जो प्रतिबिंब से पहले है; सूर्य के आकार की नहीं, उस तेज की जो हर चमक का स्रोत है। स्वामी जी के शब्दों में, “हमेशा पीछे वाले की ओर जाइए, कारण की ओर, कार्य की ओर नहीं।”

नौ बार हारकर गार्ग्य चुप पड़ जाता है और कहता है, “अब हम आपका शिष्य बनकर आपके पास आते हैं।” अजातशत्रु झिझकता है, क्योंकि परम्परा उलटी हो रही है, ब्राह्मण क्षत्रिय से विद्या सीखने आया है। फिर वह गार्ग्य का हाथ पकड़कर एक गहरी नींद में सोए हुए आदमी के पास ले जाता है। राजा उस सोते हुए मनुष्य को उन्हीं नामों से पुकारता है जिनकी गार्ग्य उपासना करता था, “हे श्वेत-वस्त्रधारी, हे सोम-राजा, उठिए।” आदमी नहीं जागता। फिर राजा उसे हाथ से झकझोरता है, और वह तुरन्त जाग जाता है।

अब अजातशत्रु असली प्रश्न रखता है, “गार्ग्य, यह विज्ञानमय पुरुष (बुद्धि से बना जानने वाला व्यक्ति, जो मनुष्य की परम सम्पदा है) जब सो रहा था, तब कहाँ था? और जागने पर यह कहाँ से लौट आया?” गार्ग्य के पास कोई उत्तर नहीं। तब राजा स्वयं बताता है कि सोते समय यह चेतना प्राण, वाणी, आँख, कान और मन, इन सब बाहरी द्वारों से अपनी शक्ति समेट लेती है और हृदय के भीतर के उस आकाश (अन्तर्हृदय आकाश, हृदय में स्थित चेतना का खुला अवकाश) में लौटकर विश्राम करती है। बाहर से लगता है मानो जीवन ही चला गया हो, पर असल में वह कहीं खोई नहीं, अपने मूल घर में सिमट गई है।

स्वामी कृष्णानन्द इसी बिंदु पर पूरे प्रसंग का सार खोलते हैं। उनके अनुसार जागते समय हमारी चेतना हज़ार चिंगारियों की तरह बिखरी रहती है, जिस वस्तु को हम जानते हैं उसी में हमारा “मैं” फैल जाता है, इसलिए जागने की दशा में अपने असली स्वरूप को पकड़ना कठिन है। पर गहरी सुषुप्ति (स्वप्नरहित गहरी नींद) में मन पुरीतत् नामक हृदय-केंद्र में लौट जाता है, बहत्तर हज़ार हिता-नाड़ियों से अपनी डोर खींच लेता है, और तब राजा हो या भिखारी, बच्चा हो या प्रकांड पंडित, सबकी नींद एक-सी हो जाती है। स्वामी जी कहते हैं कि इसी से सिद्ध होता है कि आत्मा एक ही है; हम सब सोते समय चेतना के एक ही महासागर में लौट जाते हैं, और जागते ही फिर अपनी-अपनी अलग-अलग लहरें बन जाते हैं। यही कारण है कि अजातशत्रु ने सिखाने के लिए जागते आदमी को नहीं, सोते आदमी को चुना।

पर एक पेच है, जिस पर स्वामी जी विशेष बल देते हैं। सुषुप्ति में हम अपने स्रोत में तो लौटते हैं, पर वहाँ सचेत नहीं रहते; इसलिए “मूर्खों की तरह जाते हैं और मूर्खों की तरह लौट आते हैं,” मानो कुछ हुआ ही न हो। यदि हम नींद में भी जाग्रत रह पाते, तो एक ही झटके में उस सार्वभौम सत्ता का बोध हो जाता जो सबका स्वरूप है। अंत में अजातशत्रु मकड़ी और चिंगारियों का उदाहरण देता है, जैसे मकड़ी अपने ही भीतर से जाला निकालती है और चिंगारियाँ अग्नि से फूटती हैं, वैसे ही सारे प्राण, सारे लोक, सारे देवता उसी एक आत्मा से प्रकट होते हैं। वही “सत्य का सत्य” (सत्यस्य सत्यम्) है, उस पीछे की सत्ता जिसके सामने जगत की हर सत्ता उधार की लगती है।

सार: हर परिभाषा किसी रूप को पकड़ती है, पर ब्रह्म हर रूप के पीछे की वह सत्ता है जो रूप को संभव बनाती है। गहरी नींद इसका जीता-जागता प्रमाण है, चेतना वहाँ कहीं मिटती नहीं, बस अपने स्रोत में, हृदय के भीतर के आकाश में लौट जाती है, और सुबह उसी द्वार से फिर बाहर आ जाती है। जिस घर में हम रोज़ बिना जाने लौटते हैं, जाग्रत रहकर उसी को पहचान लेना ही ज्ञान है।

मैत्रेयी से संवाद: जो अमर न करे, उसका मैं क्या करूँ

याज्ञवल्क्य अब जीवन के उस मोड़ पर हैं जहाँ गृहस्थी छोड़कर वन की राह पकड़नी है। इसे परम्परा में संन्यास कहते हैं, यानी सब कुछ पीछे छोड़कर निकल जाना। जाने से पहले, रिवाज़ के मुताबिक़, वे अपनी जमा-पूँजी अपनी दोनों पत्नियों में बाँट देना चाहते हैं। बड़ी पत्नी कात्यायनी एक साधारण गृहिणी हैं, जिनका मन घर-संसार में रमा है। दूसरी, मैत्रेयी, ब्रह्मवादिनी हैं, यानी वह स्त्री जिसका मन धन-घर में नहीं, ब्रह्म की खोज में लगा रहता है।

Maitreyi, seated before the renouncing sage Yajnavalkya amid divided heaps of wealth, refusing the riches and earnestly asking for the knowledge of immortality, a quiet hermitage-courtyard scene in warm classical-Indian palette.

बँटवारे की बात सुनकर मैत्रेयी ठहर जाती हैं, और एक सीधा सवाल रखती हैं, “अगर यह सारी धरती धन से भर जाए और पूरी मेरी हो जाए, तो क्या मैं उससे अमर हो जाऊँगी?” याज्ञवल्क्य का उत्तर दो-टूक है, “नहीं। साधन-सम्पन्न लोगों जैसा सुख-सुविधा का जीवन भले मिल जाए, पर धन से अमरता की कोई आशा नहीं।” मैत्रेयी का जवाब इस पूरे उपनिषद् की पहली चिंगारी है, “जो मुझे अमर न करे, उसे लेकर मैं क्या करूँ? आप जो जानते हैं, बस वही मुझे कह दीजिए।”

स्वामी कृष्णानन्द इस संवाद को नश्वर और शाश्वत के रिश्ते की बातचीत मानते हैं, यानी जो मिटता है और जो कभी नहीं मिटता, इन दोनों के बीच की। उनके अनुसार यहाँ “धन” का मतलब सिर्फ़ पैसा नहीं है, हर वह चीज़ है जो हमें कुछ देती हुई जान पड़ती है, सुख, मान, हैसियत, रिश्ते। ये सब समय के घेरे में हैं, और जो समय के घेरे में है, वह एक दिन छूट ही जाता है।

फिर वे एक गहरी बात खोलते हैं। हम जिस चीज़ से प्रेम करते दिखते हैं, असल में प्रेम उस पूर्णता से होता है जिसका वह चीज़ वादा करती जान पड़ती है। यह सारा संसार अनगिनत अधूरेपनों से भरा है, और हर अधूरा अपने जैसे किसी दूसरे टुकड़े की ओर खिंचता है, ताकि कुछ देर को भरा-भरा लगे। उसी खिंचाव को हम प्रेम का नाम दे देते हैं। पर भरेपन का यह एहसास उधार का होता है, और उधार की चीज़ एक दिन लौटानी पड़ती है। याज्ञवल्क्य का सूत्र यही है, जिसे भी आप अपने से अलग, कोई “दूसरा” मानकर पकड़ेंगे, वह एक दिन छोड़कर चला जाएगा, और जाते-जाते दुख दे जाएगा, क्योंकि वह कभी सचमुच आपका था ही नहीं।

तो अमर फिर क्या है? वही, जो आपसे अलग नहीं, जिसे किसी रिश्ते या समझौते से बाहर से जोड़ा नहीं गया, यानी आत्मा। याज्ञवल्क्य का प्रसिद्ध वाक्य है, “पति प्रिय होता है, पर पति की ख़ातिर नहीं, आत्मा की ख़ातिर। पत्नी, संतान, धन, देवता, यह सब प्रिय है, पर अपने-अपने लिए नहीं, उस आत्मा के लिए जो इन सबके भीतर से झाँक रही है।” और वे इसे पाने की एक पूरी विधि भी देते हैं, आत्मा को पहले सुनिए (श्रवण), फिर उस पर बार-बार ठहरकर सोचिए (मनन), फिर उसी में डूबे रहिए (निदिध्यासन)। “आत्मा को जान लिया, तो सब जान लिया”, क्योंकि वही तो सबके भीतर बैठी है।

आख़िर में मैत्रेयी एक उलझन रखती हैं, “आप कहते हैं यह आत्मा शुद्ध चेतना है, ज्ञान का समुद्र। और फिर कहते हैं कि उस हाल में वह कुछ नहीं जानती। यह कैसे हो सकता है?” याज्ञवल्क्य समझाते हैं कि उलझन उनके “जानने” की समझ में है। हमारा हर जानना दो का खेल है, एक जानने वाला, और एक जानी जाने वाली चीज़। पर आत्मा में दूसरा कोई है ही नहीं, इसलिए वहाँ “जानना” नाम की कोई अलग क्रिया बचती ही नहीं, सिर्फ़ जानने वाला रह जाता है। इसी वजह से उसके बारे में बस इतना कहा जा सकता है, “नेति, नेति”, यह भी नहीं, यह भी नहीं। जिस भी चीज़ की ओर उँगली उठेगी, वह “चीज़” होगी, और आत्मा कोई चीज़ नहीं। वह तो देखने वाला ख़ुद है, जिसे आप कभी देख नहीं सकते, क्योंकि देखना उसी से शुरू होता है।

सार: जिसे हम प्रेम कहते हैं, वह असल में पूर्णता की भूख है, जिसे हम चीज़ों में ढूँढ़ते रहते हैं। चीज़ें उधार की पूर्णता देती हैं, और एक दिन लौटा ले जाती हैं। जो पूर्णता उधार की नहीं, वह आप ख़ुद हैं, वही देखने वाला जिसे आप कभी देख नहीं सकते, क्योंकि देखना उसी से शुरू होता है।

मुनि काण्ड · अध्याय तीन और चार

जनक की सभा, और मौत पर आर्तभाग का सवाल

अब बृहदारण्यक हमें विदेह देश के राजमहल में ले आता है, राजा जनक की सभा में। स्वामी कृष्णानन्द एक बात पहले ही साफ़ कर देते हैं, “जनक” किसी एक आदमी का नाम नहीं, यह एक पदवी है, जैसे “कलेक्टर” किसी का नाम न होकर एक ओहदा है। पुराणों के अनुसार ऐसे चौंसठ जनक हुए, और हरेक आत्मज्ञानी (आत्मा को जानने वाला) था। इन्हीं में से एक आगे चलकर सीता के पिता हुए। यहाँ जिस जनक की बात है, वह जानना चाहते हैं कि उनके राज्य में ब्रह्म (वह एक परम सत्य जिससे सब कुछ है) को गहरे-से-गहरे जानने वाला कौन है। हज़ारों विद्वान आते हैं, पर पहचान कैसे हो?

King Janaka's grand assembly with a thousand fat cows whose horns are tied with ten gold coins each, the sage Yajnavalkya calmly directing his pupil to drive the herd home as stunned scholars look on, opulent durbar painting.

जनक एक तरकीब निकालते हैं। वह बहुत-दक्षिणा वाला एक बड़ा यज्ञ (हवन और दान का अनुष्ठान) रचाते हैं, जहाँ खुले हाथ दान बँटता है। फिर हज़ार गायें मँगाते हैं, मोटी-तगड़ी, दूध देती हुई, और हरेक के दोनों सींगों पर दस-दस सोने की मुहरें बँधवा देते हैं। सभा के बीच घोषणा होती है, “आप विद्वानों में जो ब्रह्म को गहरे जानता हो, वह उठे और इन गायों को हाँक ले जाए।” अब भला कौन खड़ा होकर कहे कि “मैं ही श्रेष्ठ हूँ”? बड़ा नाज़ुक मौक़ा था, सब चुप रह गए।

तभी सभा में बैठे महान आचार्य याज्ञवल्क्य ने बिना कुछ दावा किए अपने एक ब्रह्मचारी शिष्य सामश्रवा को बुलाकर कहा, “बेटा, इन गायों को हमारे घर हाँक ले चलो।” सभा सन्न रह गई। ब्राह्मण भड़क उठे, “यह आदमी कौन होता है जो अपने को सबमें श्रेष्ठ समझ ले? इसने भरी सभा में हमारा अपमान किया है।” जनक के मुख्य होता (ऋग्वेद के मंत्र पढ़ने वाला प्रधान पुरोहित) अश्वल ने मोर्चा सँभाला और ललकारा, “याज्ञवल्क्य, तो क्या आप हम सबमें ब्रह्म को गहरे जानने वाले हैं?” याज्ञवल्क्य ने विनम्रता से उत्तर दिया, “जो सचमुच श्रेष्ठ ज्ञानी हो, उसे हमारा नमस्कार। हम तो बस गायों के अभिलाषी (गोकाम, गायों की चाह रखने वाले) हैं, इसीलिए हाँक ले चले।” और इसके साथ ही अश्वल के प्रश्नों की झड़ी लग गई।

अश्वल का पहला सवाल मौत पर ही था, “जब यह सब कुछ मृत्यु की पकड़ में है, यज्ञ करने वाला उस मौत के पार कैसे जाए?” स्वामी कृष्णानन्द इस उत्तर को बहुत गहरा मानते हैं। उनके अनुसार याज्ञवल्क्य की बात का मर्म यह है कि जब तक आदमी अपने को एक अलग-थलग व्यक्ति समझता रहेगा, तब तक मौत से छूट नहीं सकता। स्वामी जी कहते हैं, मौत असल में सत्य के नियम की लगाई हुई एक कड़ी तपस्या है। हम सब अड़ियल हैं, अपनी अलग हस्ती जताते हैं, हर बात में अपने “मैं” को आगे रखते हैं; इसी बेमेलपन की सज़ा का नाम जन्म और मृत्यु है। इसीलिए, उनके अनुसार, केवल हवन की लकड़ी और घी से काम न चलेगा; यज्ञ के साथ-साथ भीतर एक ध्यान भी चलना चाहिए, जिसमें होता अपने को अग्नि से, अध्वर्यु (यजुर्वेद के मंत्रों से कर्म कराने वाला पुरोहित) अपने को सूर्य से, और हरेक पुरोहित अपने को उस ब्रह्मांडीय देवता से एक कर ले। तभी अलगाव टूटता है और मौत की पकड़ ढीली पड़ती है।

अश्वल के थक जाने पर जरत्कारु के वंशज ऋषि आर्तभाग उठ खड़े होते हैं, “याज्ञवल्क्य, हमारा भी सवाल है, क्योंकि आप हमारी गायें हाँक ले गए।” वह पूछते हैं, ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने? स्वामी कृष्णानन्द समझाते हैं, ग्रह (पकड़ने वाला) यानी इन्द्रियाँ, और अतिग्रह (पकड़ने वाले को भी पकड़ लेने वाला) यानी उनके विषय। आँख रूप को पकड़ती है, पर रूप भी आँख को पकड़ लेता है; दोनों दो पहलवानों की तरह एक-दूसरे को जकड़े रहते हैं, और इसी रगड़ में दोनों एक दिन एक-दूसरे को मार डालते हैं। फिर आर्तभाग पूछते हैं, सब कुछ तो मौत का भोजन है, पर मौत किसका भोजन है? याज्ञवल्क्य का उत्तर, जैसे आग सबको खा जाती है पर पानी आग को बुझा देता है, वैसे ही मौत को निगल जाने वाला केवल परम सत्ता (वह परमतत्त्व जिसे ब्रह्म कहते हैं) है। उसी का सहारा लिए बिना जन्म-मरण से छुटकारा नहीं।

अब आर्तभाग का असली, चुभता हुआ सवाल आता है, “जब आदमी मरता है, तब उसकी सारी चीज़ें अपने-अपने स्रोत को लौट जाती हैं, वाणी अग्नि में, प्राण वायु में, आँख सूर्य में, मन चन्द्रमा में, देह पृथ्वी में; तो फिर वह आदमी रहता कहाँ है, और दुबारा जन्म किस चीज़ से लेता है?” याज्ञवल्क्य यहाँ रुक जाते हैं। वह आर्तभाग का हाथ पकड़कर एक कोने में ले जाते हैं और कहते हैं, “यह बात भरी सभा में नहीं, यह केवल हम दोनों जानें।” स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि उन्होंने यह छिपाकर इसलिए कहा क्योंकि इसका मर्म आम लोग ग़लत समझ लेते। दोनों के बीच जो निचोड़ निकला वह था, कर्म। मरने पर जो छूटता नहीं, वह है आदमी का नाम और उसका कर्म। स्वामी जी ज़ोर देकर कहते हैं कि यहाँ “कर्म” का अर्थ हर छोटी-मोटी हरकत नहीं होता; इसका असली मतलब है पूरे व्यक्तित्व की वह गहरी, टिकी हुई वृत्ति जो भीतर बीज की तरह पड़ी रहती है। और उसी पर अगला जन्म तय होता है, “अच्छे कर्म से आदमी अच्छा होता है, बुरे कर्म से बुरा।” इतना सुनकर आर्तभाग शान्त हो गए।

सार: मौत सब कुछ बहा ले जाती है, देह, इन्द्रियाँ, साँस, सब अपने-अपने घर लौट जाते हैं। पीछे जो रह जाता है वह है नाम और कर्म, और कर्म कोई मामूली हरकत नहीं, वह हमारे पूरे मन की गहरी वृत्ति है। इसीलिए अगला जन्म इसी से ढलता है, अच्छे से अच्छा, बुरे से बुरा। और इस पूरी पकड़ से असली छुटकारा तभी है जब हम अपने अलग-थलग “मैं” को छोड़कर उस एक परम सत्ता से जुड़ जाएँ, जो अकेली मौत को भी निगल जाती है।

भीतर बैठा शासक: अन्तर्यामी

जनक की सभा में सवालों का सिलसिला अभी थमा ही था। गार्गी वाचक्नवी, एक तेज़ बुद्धि की विदुषी, अपने प्रश्न पूछकर बैठ चुकी थीं। तभी उद्दालक आरुणि, अरुण के पुत्र और अपने ज़माने के एक प्रकांड आचार्य, अपने आसन से उठे और याज्ञवल्क्य, राजा जनक की सभा के परम आचार्य, से बात का धागा फिर पकड़ लिया। उन्होंने एक अनोखा क़िस्सा सुनाया। बोले, हम मद्र देश में पतंचल काप्य के घर ठहरे थे, यज्ञ की पढ़ाई और अनुष्ठान के लिए। वहाँ घर के स्वामी की पत्नी पर एक गन्धर्व (एक सूक्ष्म लोक का प्राणी) उतर आया था, और उसी के मुँह से कुछ विचित्र बातें निकल रही थीं।

A vast cosmic thread (sutratman) strung with all worlds, beings, gods and stars like luminous beads on a single string, an unseen inner ruler at its center; sages gaze upward in wonder, mandala-like classical Indian cosmology art.

हमने उस गन्धर्व से पूछा, आप कौन हैं? उसने कहा, हम कबन्ध आथर्वण हैं। फिर बिना किसी के पूछे ही उसने घर के स्वामी और हम सभी के सामने एक सवाल रख दिया, क्या आप वह सूत्र (धागा) जानते हैं जिसमें यह लोक, परलोक और सारे प्राणी मोतियों की तरह पिरोए हुए हैं? पतंचल ने हाथ जोड़ दिए, हम यह धागा नहीं जानते। गन्धर्व ने आगे पूछा, और क्या आप उस अन्तर्यामी (भीतर बैठकर सबको चलाने वाली सत्ता) को जानते हैं, जो भीतर रहकर इन सब लोकों और प्राणियों को साधे रखता है, और जिसका होना किसी को मालूम तक नहीं? हम वही नहीं जानते थे। तब गन्धर्व ने कहा, जो इस धागे को और इस अन्तर्यामी को जान ले, वही असल में ब्रह्म का ज्ञाता है, वही लोकों का, देवों का, वेदों का, सब प्राणियों का और सबकी आत्मा का जानने वाला है। यह कहकर उद्दालक याज्ञवल्क्य की ओर मुड़े, हमने तो उसी गन्धर्व से यह दोनों बातें सीख लीं। अब आप बताइए। और अगर बिना जाने ये गाएँ हाँक ले गए, तो आपका सिर गिर पड़ेगा।

याज्ञवल्क्य शान्त रहे, बोले, गौतम, हम यह सूत्र भी जानते हैं और अन्तर्यामी भी। उद्दालक ने झट टोका, जानता हूँ, जानता हूँ तो कोई भी कह देता है। जैसा जानते हैं, वैसा कह दीजिए, फिर हम मानें। याज्ञवल्क्य का यही उत्तर वह प्रसिद्ध अन्तर्यामी-ब्राह्मण है। पहले उन्होंने धागे की बात खोली, यह सूत्र और कुछ नहीं, समूचे जगत् की वायु यानी प्राण-शक्ति है, वह सूक्ष्म जीवन-ऊर्जा जिसके साँचे में हर शरीर ढला है। स्वामी कृष्णानन्द इसे ऐसे समझाते हैं, बाहर से यही ऊर्जा जगत् जैसी दिखती है और भीतर से अलग-अलग प्राणियों जैसी। इसी ने सबको थाम रखा है, इसीलिए जब तक यह रहती है, शरीर पूरा और सधा हुआ जान पड़ता है।

स्वामी जी एक मार्मिक उदाहरण देते हैं। मृत्यु के समय शरीर के अंग ढीले पड़कर लटक क्यों जाते हैं? इसलिए कि जो प्राण-शक्ति अंगों को जोड़कर एक लय में बाँधे रखती थी, वह हट गई। उनके अनुसार जिसे हम जीवन कहते हैं, वह बस इसी विश्वव्यापी ऊर्जा का किसी एक शरीर में से बहना है। जैसे ही वह बहना रुकता है, ईंटें बिखर जाती हैं, और हम उसे मृत्यु कह देते हैं। उद्दालक ने सिर झुकाया, यह उत्तर ठीक है। पर अब अन्तर्यामी क्या है, वह सुनाइए।

याज्ञवल्क्य ने एक-एक करके परतें खोलीं। वह पृथ्वी के भीतर बसता है, पृथ्वी उसे नहीं जानती, पृथ्वी ही उसका शरीर है, और वही भीतर से पृथ्वी को चलाता है, यही आपकी आत्मा है, अन्तर्यामी, अमर। फिर वही बात जल, अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्र, दिशाएँ, और भीतर के प्राण, वाणी, आँख, कान, मन, बुद्धि, हर एक के साथ दोहराई गई। स्वामी कृष्णानन्द इस लय का सार ऐसे खींचते हैं, न कोई अलग देवों का दल है, न इससे बाहर कोई जगत्, न इससे जुदा कोई व्यक्ति। यह एक ही सत्ता ऊपर से देखें तो देवता जान पड़ती है, बाहर से देखें तो जगत्, और भीतर से देखें तो जीव।

स्वामी जी एक भ्रम साफ़ करते हैं। यहाँ भीतर का मतलब जगह वाला भीतर नहीं है, जैसे हम किसी कमरे के भीतर बैठे हों। यह तो चेतना की एक अवस्था है, जिसे इसीलिए भीतरी कहा गया कि उसे किसी वस्तु की तरह देखा नहीं जा सकता। उनके शब्दों में, वह दिखाई इसलिए नहीं देता कि वही तो देखने का कारण है। बिना उसके न कुछ देखा जा सकता है, न सुना, न सोचा। इसी को यह उपनिषद् कहता है, अदृष्टो द्रष्टा (जो दिखता नहीं, पर सबको देखता है), अश्रुतः श्रोता (जो सुना नहीं जाता, पर सबको सुनता है)। स्वामी कृष्णानन्द जोड़ते हैं, इसलिए जब कोई देखता है, तो असल में वही देखता है; जब कोई सोचता है, तो वही सोचता है। यही आत्मा है, यही चेतना है, इसके सिवा कोई दूसरा द्रष्टा है ही नहीं। यह सुनकर उद्दालक आरुणि चुप हो गए और अपने आसन पर बैठ गए। अब कहने को कुछ बचा न था।

स्वामी कृष्णानन्द एक सुन्दर चित्र देते हैं, जैसे पहिए के बीच की कील। पहिया घूमता है, कील नहीं घूमती। सब कुछ इसी अचल कील के चारों ओर घूमता है। जब सब हलचल में है, यह स्थिर है; जब सब बदलता है, यह वैसा का वैसा है; जब सब किसी मंज़िल की ओर भाग रहा है, यह ख़ुद सबकी मंज़िल है। यही वह धागा है जो दिखता नहीं, पर सबको पिरोए रखता है।

सार: एक ही भीतरी सत्ता हर प्राणी में धागे की तरह बैठी है, किसी को दिखे बिना सबको थामे हुए। आप जिससे देखते, सुनते, सोचते हैं, वह देखी-सुनी-सोची नहीं जा सकती, क्योंकि वही तो आप हैं, वह अन्तर्यामी, वह अमर आत्मा।

गार्गी के दो बाण, और अक्षर

राजा जनक की भरी सभा है, और एक के बाद एक विद्वान याज्ञवल्क्य से हारकर चुप हो चुके हैं। इसी सभा में एक ही स्त्री बैठी हैं, गार्गी वाचक्नवी, ऋषि वाचक्नु की पुत्री और स्वयं ब्रह्मवादिनी (ब्रह्म की जानकार)। वे उठती हैं और एक सीधा-सा सवाल रखती हैं, “यह सारा संसार जल पर बुना हुआ है (आपस में जुड़ा हुआ है), तो जल किस पर बुना है?” स्वामी कृष्णानन्द समझाते हैं कि गार्गी किसी एक तत्व का पता नहीं, उस जोड़ने वाले आधार का पता पूछ रही हैं, जिसके बिना मिट्टी भी बस बिखरा हुआ चूरा रह जाती, इमारत न बन पाती।

याज्ञवल्क्य एक-एक सीढ़ी बताते जाते हैं। जल वायु पर टिका, वायु अन्तरिक्ष पर, फिर गन्धर्व-लोक, सूर्य-लोक, चन्द्र-लोक, नक्षत्र-लोक, देव-लोक, इन्द्र-लोक, फिर प्रजापति-लोक (विराट्, सब लोकों की समष्टि-शक्ति), और अन्त में ब्रह्म-लोक यानी हिरण्यगर्भ। स्वामी जी के अनुसार यही वह सूत्र-आत्मा (वह धागा) है जिस पर सारी सृष्टि मनके की तरह पिरोई हुई है। पर गार्गी रुकती नहीं, “और यह ब्रह्म-लोक किस पर बुना है? सब कारणों का जो कारण है, उसका कारण कौन?”

यहाँ याज्ञवल्क्य उन्हें रोक देते हैं, “गार्गी, इतना मत पूछिए, कहीं आपका सिर न गिर जाए।” स्वामी कृष्णानन्द इसे एक अति-प्रश्न (हद के पार का सवाल) कहते हैं। जिस परम सत्ता पर सब कुछ टिका है, उसका भी कोई आधार पूछना तर्क से बाहर है, क्योंकि वही आख़िरी ठिकाना है। स्वामी जी के अनुसार वह ऐसी सत्ता है जो अपने आगे कोई सवाल नहीं चलने देती। गार्गी सहम कर चुप हो जाती हैं।

The woman-sage Gargi Vachaknavi standing boldly in Janaka's court like an archer with a strung bow and two sharp arrows poised, challenging the seated Yajnavalkya before the silent assembly, dramatic classical-Indian court painting.

पर उनका मन भरा नहीं। थोड़ी देर बाद वे फिर उठती हैं, इस बार पहले से कहीं तीखे सवाल लेकर। सभा से कहती हैं, “मैं इन ऋषि पर दो सवाल छोड़ती हूँ, मानो काशी या विदेह का कोई कुशल धनुर्धर अपना धनुष चढ़ाकर, दो नुकीले बाण हाथ में लेकर सामने आ खड़ा हो। याज्ञवल्क्य, सँभल जाइए।” पहला बाण, “जो आकाश से ऊपर है, जो धरती से नीचे है, जो दोनों के बीच है, और जो भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों में एक-सा है, वह किस पर बुना है?” याज्ञवल्क्य कहते हैं, उस अव्याकृत आकाश (अनगढ़, बिना भेद वाला सूक्ष्म आधार) पर, जो आँख से दिखने वाला आसमान नहीं है।

गार्गी नमन करके दूसरा बाण छोड़ती हैं, “और वह अव्याकृत आकाश किस पर बुना है?” अब याज्ञवल्क्य उस आख़िरी जगह तक पहुँचते हैं, “गार्गी, ज्ञानी इसे अक्षर (कभी न मिटने वाला) कहते हैं।” फिर वे इसे केवल इन्कार से बताते हैं, यह न मोटा है न महीन, न छोटा न लम्बा, इसका कोई रंग नहीं, कोई छाया नहीं, इसकी आँख नहीं पर यह सब देखता है, कान नहीं पर सब सुनता है, मन नहीं पर सब सोचता है। न यह किसी को खाता है, न इसे कोई खाता है।

फिर वह बात आती है जिस पर स्वामी कृष्णानन्द ज़ोर देते हैं। “इसी अक्षर के शासन में, गार्गी, सूर्य और चन्द्रमा अपनी-अपनी जगह बँधे हुए हैं, धरती और आसमान थमे हुए हैं, पल, घड़ी, दिन-रात, महीने और ऋतुएँ बँधी हुई हैं, नदियाँ अपनी-अपनी दिशा में बहती हैं।” स्वामी जी कहते हैं, यह शासन किसी मालिक के मुँह के हुक्म जैसा या इशारे जैसा नहीं है। इसका हुक्म बस इसका होना है। यह केवल है, और अपने होने भर से सब थामे रखता है। यह बाहर खड़ा कारीगर नहीं जो मेज़ बनाकर अलग हो जाए, यह तो भीतर बैठा अन्तर्यामी (भीतर से सब चलाने वाला नियामक) है, हर चीज़ की बनावट में घुला हुआ। और यही देखने वाला है, इसलिए इसे देखा नहीं जा सकता, जैसे आँख अपने आप को नहीं देख सकती। इसे पाने का एक ही ढंग है, स्वयं यही बन जाना।

सार: हर सवाल की एक आख़िरी ज़मीन होती है, जिसका आगे आधार पूछना बेमानी है, क्योंकि वही सबका आधार है। वह परम सत्ता हुक्म चलाकर नहीं, अपने होने भर से सूरज-चाँद से लेकर हमारी साँस तक सब थामे है। और वही हमारे भीतर का देखने वाला है, इसीलिए उसे आँख की तरह बाहर रखकर देखा नहीं जा सकता।

शाकल्य का सवाल: आख़िर कितने देवता हैं

राजा जनक की सभा सजी है और विद्वानों का दंगल चल रहा है। एक के बाद एक आचार्य उठते हैं, याज्ञवल्क्य (जनक की सभा के परम ज्ञानी ऋषि) से प्रश्न पूछते हैं, और संतुष्ट होकर बैठ जाते हैं। आठ प्रश्नकर्ता थे। अब आख़िरी, आठवाँ, उठता है। उनका नाम है विदग्ध शाकल्य (वेदपाठ में पगे हुए एक पंडित)। बाक़ी सब समझ चुके थे कि कहाँ रुक जाना है, पर शाकल्य को कुछ कर दिखाना था। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि यही वह व्यक्ति था जिसे प्रश्न पूछना ही नहीं चाहिए था, और यही वह व्यक्ति है जो उसी सभा में, उसी जगह, बिना मतलब के बहुत ज़्यादा पूछ बैठने के कारण गिर जाता है।

शाकल्य का सवाल बहुत सीधा सुनाई देता है, “हे याज्ञवल्क्य, कितने देवता हैं?” याज्ञवल्क्य पहले वेद की एक ऋचा का सहारा लेते हैं, जिसे निविद् (विश्वेदेवों यानी सब देवताओं का बखान करने वाला मंत्र) कहते हैं, और जवाब देते हैं, “तीन सौ तीन और तीन हज़ार तीन।” शाकल्य को यह जँचा नहीं। “बस यही जवाब है आपके पास? और कोई जवाब नहीं?” तब याज्ञवल्क्य गिनती उतारते जाते हैं। “तैंतीस।” फिर पूछा गया, तो “छह।” फिर “तीन।” फिर “दो।” फिर एक अजीब-सा जवाब, “डेढ़।” और जब शाकल्य फिर भी न माने, तब आख़िर में, “एक देवता है।” स्वामी कृष्णानन्द बताते हैं कि याज्ञवल्क्य यह पूरी गिनती एक हल्की-सी हँसी में उतार रहे हैं, पर हर अंक के पीछे एक गहरा अर्थ छिपा है।

शाकल्य ने तब पूछा, “ये जो हज़ारों गिनाए, ये असल में हैं कौन?” याज्ञवल्क्य का उत्तर पूरे प्रसंग की रीढ़ है, “ये सब असल में देवता हैं ही नहीं। ये तो बस उन तैंतीस की महिमाएँ हैं, उनकी विभूतियाँ, चमक, शक्तियाँ।” स्वामी कृष्णानन्द इसे यों खोलते हैं कि देवता का मतलब है वह शक्ति जो किसी रूप के भीतर बैठकर उसे चलाती है। आँख का देवता वह सूरज नहीं जो करोड़ों मील दूर है, उसका असली देवता तो वह सत्ता है जो आँख के भीतर से आँख को साधती है। हाथ तब तक नहीं उठता जब तक भीतर कोई शक्ति न हो, पलक तब तक नहीं झपकती जब तक भीतर कोई बल न हो। देवता बाहर कहीं स्वर्ग में नहीं बैठे, वे हमारे भीतर ही व्याप्त हैं।

फिर याज्ञवल्क्य उन तैंतीस को नाम देकर भीतर ले आते हैं, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, और इन इकतीस के साथ इन्द्र और प्रजापति। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार वसु (जिनमें सब कुछ बसता है, जैसे अग्नि, पृथ्वी, वायु, सूर्य, चंद्र, तारे) वे सूक्ष्म तत्त्व हैं जिनसे हमारा शरीर तक बना है; कोई वस्तु ठोस है ही नहीं, सब शक्ति का घनापन है। रुद्र (रुलाने वाले) हमारे भीतर के दस इन्द्रिय और मन हैं, ग्यारह, जो जाते समय हमें और हमारे अपनों को रुलाते हैं। आदित्य (खींच ले जाने वाले) साल के बारह महीने हैं, यानी काल, जो हर सूर्योदय के साथ इतनी ज़िन्दगी खींच ले जाता है। इन्द्र वह बल है जो हमारे भीतर बैठा हमें विश्वास देता है कि कुछ असंभव नहीं, और प्रजापति वह यज्ञ है, वह आत्म-समर्पण है, जिसकी पुकार हमारे भीतर का अन्तर्यामी (भीतर से सब कुछ चलाने वाला) करता है।

गिनती उतरते-उतरते परम सघन उत्तर पर ठहरती है। “दो देवता कौन?” याज्ञवल्क्य कहते हैं, “अन्न और प्राण।” स्वामी कृष्णानन्द इसे आज की भाषा में पदार्थ और ऊर्जा कहते हैं, बाहर से देखें तो पदार्थ, भीतर से देखें तो शक्ति, और इन दो के सिवा सारी सृष्टि में कुछ है ही नहीं। यही वह जगह है जहाँ अनेक देवता सिमटकर एक ही सत्ता की शक्तियाँ बन जाते हैं। हज़ारों नाम, पर पीछे एक ही ब्रह्म, जो हर रूप के भीतर बैठा उसे चला रहा है। “बस, संतुष्ट हो जाइए शाकल्य,” याज्ञवल्क्य कहते हैं।

पर शाकल्य संतुष्ट होने नहीं, जीतने आए थे। समझने की प्यास नहीं थी, हराने की ज़िद थी। कथा कहती है कि वे आगे और पूछ बैठते हैं, ऐसी बात जिसका जवाब ख़ुद उनके पास नहीं था, और जब याज्ञवल्क्य का पलटवार उन पर लौटता है तो वे उसे झेल नहीं पाते; उनका सिर गिर जाता है। स्वामी कृष्णानन्द इस घटना को मात्र किंवदंती नहीं मानते। उनके अनुसार यह उसी का परिणाम है जो बिना समझे, बेमतलब, सिर्फ़ अपनी विद्या दिखाने और दूसरे को नीचा करने के लिए पूछता चला जाता है। जिसका प्रश्न अहंकार से उठता है, ज्ञान की भूख से नहीं, वह अंत में अपने ही प्रश्न के बोझ तले गिरता है।

सार: हज़ारों देवता गिनाए जा सकते हैं, पर पीछे एक ही सत्ता है, जो हर आँख, हर हाथ, हर साँस के भीतर बैठी उसे चला रही है; देवता दूर स्वर्ग में नहीं, हमारे ही भीतर हैं। और जो जानने के लिए नहीं, सिर्फ़ जीतने के लिए पूछता है, वह आख़िर अपने ही अहंकार के बोझ से गिर जाता है।

आदमी की रौशनी क्या है: सूरज से लेकर अपनी आत्मा तक

दृश्य विदेह देश के राजमहल का है। राजा जनक, विदेह के सम्राट और तत्त्व के बड़े जिज्ञासु, अपने आचार्य का स्वागत करते हैं। आचार्य हैं याज्ञवल्क्य, उस युग के प्रकांड ब्रह्मवेत्ता (ब्रह्म को जानने वाले ऋषि)। एक बार जनक की विद्या से प्रसन्न होकर याज्ञवल्क्य ने उन्हें एक वरदान दिया था, जिसे काम-प्रश्न (जब मन चाहे तब प्रश्न पूछने की छूट) कहते हैं। इसी छूट के बल पर आज जनक एक छोटा-सा, पर भीतर तक उतरने वाला सवाल रखते हैं, “किं-ज्योतिः अयम् पुरुषः?” (यह आदमी की रौशनी क्या है), यानी यह आदमी किस रौशनी के सहारे चलता है, काम करता है, अपनी राह देखता है?

याज्ञवल्क्य पहले सीधा-सा उत्तर देते हैं, “सूरज की रौशनी।” दिन भर मनुष्य उसी आदित्य-ज्योति (सूरज की रोशनी) से उठता-बैठता और अपने काम निपटाता है। जनक तुरन्त आगे पूछते हैं, “और जब सूरज ढल जाए?” आचार्य कहते हैं, “तब चाँद उसकी रौशनी बनता है।” “और जब चाँद भी न हो?” “तब आग।” “और आग भी बुझ जाए?” “तब आवाज़ ही रौशनी है। घोर अँधेरे में जब हाथ तक न सूझे, और कोई बोल उठे कि हम यहाँ हैं, तो उस आवाज़ के सहारे आप जान लेते हैं कौन कहाँ है, और चल पड़ते हैं।” जनक फिर कुरेदते हैं, “और जब सब बुझ जाए, सूरज, चाँद, आग, और आवाज़ भी थम जाए, तब?” तब याज्ञवल्क्य वह बात कहते हैं जिस पर पूरा खंड टिका है, “आत्मा एव अस्य ज्योतिः” (आत्मा ही इसकी ज्योति है), आपकी अपनी आत्मा ही आपकी रौशनी है।

स्वामी कृष्णानन्द इस सीढ़ी का मर्म यों खोलते हैं। सूरज, चाँद, आग, आवाज़, ये सब उधार की रौशनियाँ हैं, बाहर से ली हुई टेक। हमारे भीतर एक छठी इन्द्रिय जैसी भीतरी ज्योति है, पर वह तब तक ढकी रहती है जब तक बाहरी सहारे मौजूद हैं। स्वामी जी के अनुसार हमने बचपन से निर्भर रहने की आदत पाली है, कभी माँ-बाप पर, कभी धन पर, कभी पद और साथियों पर, और इसी निर्भरता ने हमें यह भुला दिया कि हम स्वयं ताक़त की खान हैं। जब हर बाहरी टेक छिन जाए, तभी भीतर का वह बल और वह आत्म-गौरव सामने आता है जो हमेशा से हमारा अपना था। उनका सवाल मार्मिक है, क्या ज़रूरी है कि सूरज, चाँद, आग, सब डूबें, तभी हमें पता चले कि हमारे भीतर अपनी एक रौशनी है?

फिर जनक पूछ बैठते हैं, “यह आत्मा है क्या?” इसे समझाने के लिए याज्ञवल्क्य आदमी की तीन रोज़ की अवस्थाएँ खोलते हैं। पहली है जागृति (जागने की दशा)। स्वामी जी कहते हैं कि आत्मा यहाँ बुद्धि की झिलमिल में से झाँकती भर है, सीधे दिखती नहीं, क्योंकि वही तो देखने वाली है, इसलिए देखी नहीं जा सकती। और जिन बाहरी चीज़ों के पीछे हम दिन भर दौड़ते हैं, उन्हें यह उपनिषद् मृत्यु-रूप (मौत के रूप) कहता है, क्योंकि वे हमारी इन्द्रियों का बल चूस लेती हैं और आख़िर में हाथ कुछ नहीं आता।

दूसरी अवस्था है स्वप्न (सपना)। स्वामी जी इसे जागने और मिटने के बीच की दहलीज़ बताते हैं। यहाँ मन बाहर से कोई औज़ार नहीं लेता, अपने ही पदार्थ से एक पूरा संसार रच डालता है, रथ, घोड़े, रास्ते, नदियाँ, ताल, मित्र और शत्रु, सब अपने भीतर से गढ़ता है और स्वयं ही उनका कर्ता बन जाता है। स्वामी जी की बारीक बात यह है, सपने में कोई बाहरी सूरज नहीं होता, फिर भी जो चमक दिखती है वह मन की ही चमक है, यानी “स्वयं-ज्योतिः” (अपने आप से प्रकाशित), अपनी ही रौशनी। और वह रौशनी भी असल में आत्मा से ही उधार ली हुई है। यहीं वे चेताते हैं, जब सपने का सुख-दुख बिना किसी बाहरी वस्तु के अपने ही मन से बन सकता है, तो क्या पता जागते में भी हमारे सुख-दुख वैसे ही भीतर से ही बनते हों, और बाहर की चीज़ों को हम बेकार दोष देते हों।

तीसरी और गहरी-से-गहरी अवस्था है सुषुप्ति (गहरी, बिना सपने की नींद)। स्वामी जी इसका चित्र बहुत कोमल खींचते हैं। दिन भर संसार के रेगिस्तान में मृगजल के पीछे भटककर थका हुआ जीव शाम को अपनी माँ की गोद में लौट आता है, जो यह जानने वाली आत्मा ही है, और कहता है, वहाँ कुछ न मिला, हम लौट आए, और वह परम स्रोत उस लौटे हुए बच्चे को छाती से लगा लेता है। उनके अनुसार यह कोई जड़ बेहोशी नहीं होती, यह तो सत्ता के मूल का स्पर्श है। वहाँ कोई चाह बची ही नहीं रहती, उसे यह उपनिषद् अ-कामम् (निष्काम, इच्छारहित) कहता है, और इसी से वह परम आनन्द और शोक से परे की दशा बन जाती है। स्वामी जी जोड़ते हैं कि यह दशा मुक्ति के बहुत क़रीब है, बस एक झीनी इच्छाओं की चादर बीच में पड़ी रहती है जिससे हम उस आनन्द को पहचान नहीं पाते, फिर भी हर सुबह उठकर जो ताज़गी और भरापन हम महसूस करते हैं, वह उसी परम सत्ता के स्पर्श का प्रसाद है, जिसे हम रोज़ छूकर आते हैं।

सार: एक-एक उधार की रौशनी हटाते जाइए, सूरज, चाँद, आग, आवाज़, और जो बचेगी वह आपकी अपनी आत्मा होगी। उस परम आनन्द की झलक कहीं दूर नहीं, गहरी नींद में आप उसे हर रोज़ छूते हैं, बस इच्छाओं की चादर के पार उसे पहचान नहीं पाते।

मौत के बाद: इल्ली, सुनार, और कामना

याज्ञवल्क्य, बृहदारण्यक के वही प्रकांड ऋषि जो राजा जनक की सभा में एक-एक करके सब प्रतिद्वंद्वियों को परास्त कर चुके हैं, अब जीवन के उस छोर पर ठहरते हैं जहाँ हर इंसान को आख़िर जाना है: मृत्यु। यह वह जगह है जहाँ पूरा बृहदारण्यक एक ठंडे, बारीक स्वर में बताता है कि जब देह छूटती है, तब असल में क्या-क्या घटता है। याज्ञवल्क्य कोई डरावना दृश्य नहीं खींचते; वे बस उस यात्रा का नक़्शा खोलकर रख देते हैं जिससे होकर हर जीव गुज़रता है।

स्वामी कृष्णानन्द इस ब्राह्मण का खुलासा बहुत धीरज से करते हैं। उनके अनुसार मरते समय शरीर की सारी शक्तियाँ धीरे-धीरे सिमटकर हृदय में इकट्ठी होने लगती हैं। मस्तिष्क सोचना बंद कर देता है, साँस मंद पड़ जाती है। आँख में बैठा जो दृष्टि का तेज़ था, वह अपने केंद्र (सूर्य) की ओर लौट जाता है, मानो कोई राजदूत अपना काम पूरा करके भेजने वाले के पास वापस चला गया हो। इसीलिए आँखें खुली रहने पर भी मरता हुआ आदमी किसी को पहचान नहीं पाता; पास खड़ा कोई पूछे कि आप मुझे पहचानते हैं, तो जवाब नहीं आता, क्योंकि देखने वाली शक्ति अपने स्रोत में लौट चुकी होती है। एक-एक करके सूँघना, चखना, बोलना, सुनना, छूना, सब इंद्रियाँ अपने मूल में लीन हो जाती हैं।

तब हृदय के एक कोने में, स्वामी जी कहते हैं, एक नन्हीं-सी रोशनी कौंधती है, किसी दीये की क्षीण लौ जैसी। यही उस घड़ी की अकेली चेतना है, न देह का बोध, न आसपास के लोगों का। उसी प्रकाश के सहारे आत्मा देह से बाहर निकलती है, कभी सिर के रास्ते, कभी आँख के, कभी किसी और द्वार से। प्राण (जीवनशक्ति) उसके पीछे-पीछे चलता है, और प्राण के पीछे बाक़ी सारी इंद्रिय-शक्तियाँ। फिर वे एक मार्मिक सवाल उठाते हैं: जब हम यह संसार छोड़ते हैं, तो साथ क्या ले जाते हैं? इतनी सम्पत्ति, इतने नाते, इतनी पढ़ाई। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार उपनिषद् का जवाब सीधा है: जो ज्ञान आपके जीवन का हिस्सा बन चुका हो, बस वही साथ जाता है (विद्या), किताबों में धरा ज्ञान नहीं; और वही कर्म साथ जाता है जो आपने मन से, अपनी मरज़ी से, किसी अर्थ के साथ किया हो (कर्म)। साथ ही मन में जमी पुरानी छापें (वासना यानी अंदर बैठी इच्छाओं की लकीरें, और संस्कार यानी कर्मों के पुराने निशान), यही मानसिक गठरी देह से विदा होती है। जो आपके भीतर तक नहीं उतरा, वह बाहरी सामान की तरह यहीं छूट जाता है।

A green caterpillar at the very tip of a leaf, stretching its front body to grip the next blade before releasing the old, a glowing soul-light leaving one body for another beside it, delicate nature-symbolic classical illustration.

अब वह सुंदर दृष्टांत आता है जिस पर यह खंड टिका है। स्वामी जी समझाते हैं कि आत्मा का एक देह छोड़कर दूसरी थामना ठीक वैसा है जैसे इल्ली (तृणजलायुका यानी पत्ती पर रेंगने वाला कीड़ा) एक पत्ते के सिरे पर पहुँचकर चलती है। वह अपना अगला हिस्सा आगे बढ़ाकर नई जगह जमाती है, और जब तक वह पकड़ मज़बूत न हो जाए, तब तक पिछला हिस्सा नहीं उठाती। इसी तरह, स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं, पुरानी देह तब तक नहीं छूटती जब तक आगे का बंदोबस्त तैयार न हो जाए। जैसे यात्रा पर निकलने से पहले हम पहुँचने की जगह का इंतज़ाम कर लेते हैं, वैसे ही, हमारे होशपूर्वक सोचे बिना भी, प्रकृति की शक्तियाँ हमारे लिए अगली देह की भूमि बाँध देती हैं। यह कोई भौतिक पैर नहीं, एक सूक्ष्म टोह है जो हमें आगे के लोक से जोड़ देती है। उनके शब्दों में, यह दिखाता है कि सब कुछ आपस में बँधा हुआ है; हम किसी अंधे झोंके में नहीं फेंके जाते, प्रकृति की सारी शक्तियाँ हम पर नज़र रखती हैं।

फिर दूसरा दृष्टांत: सुनार (पेशस्कारी यानी गहना गढ़ने वाला कारीगर)। जैसे सुनार पुराने सोने को भट्ठी में गलाकर एक नया और सुंदर रूप गढ़ देता है, वैसे ही आत्मा इस देह को गिराकर एक नई, मनोहर देह रच लेती है। स्वामी कृष्णानन्द ज़ोर देकर कहते हैं कि सुनार नया सोना नहीं बनाता, वह उसी सोने को नया आकार देता है। उसी तरह पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, यही पाँच तत्व हर देह के मसाले हैं। यह देह भी इन्हीं से बनी, अगली भी इन्हीं से बनेगी। फ़र्क़ बस आकार का है, जैसे बढ़ई वही लकड़ी से कभी कुर्सी, कभी मेज़, कभी संदूक गढ़ देता है। आत्मा चाहे पितरों के लोक में जाए, चाहे गंधर्व या किसी देवता का रूप ले, चाहे हिरण्यगर्भ (सृष्टि के मूल सूक्ष्म पुरुष) तक पहुँचे, मसाला वही रहता है; मोटे रूप में यह हमारी जैसी देह दिखती है, बारीक रूप में काँच की तरह पारदर्शी और चमकीली हो जाती है, पर है तो वही तत्व।

और अब इस पूरे खंड का मर्म, वह वाक्य जो उपनिषद् यहाँ गढ़ता है। स्वामी कृष्णानन्द इसे यों खोलते हैं: आदमी असल में अपनी कामना (गहरी इच्छा) का बना होता है, काममय। मन में कोई-न-कोई इच्छा बनी ही रहती है, यही जीव की पहचान है। जैसी इच्छा वैसा संकल्प (मन का पक्का इरादा), जैसा संकल्प वैसा कर्म, और जैसा कर्म वैसी ही गति। जो जैसा करता है, जैसा बरतता है, वह वैसा ही बन जाता है: भला करने वाला भला, बुरा करने वाला बुरा। स्वामी जी इसे उपनिषद् का आचरण-सिद्धांत कहते हैं, कि भीतर जिस ओर हमारी भावना झुकती है, अगली देह में वैसा ही अनुभव हमारा इंतज़ार करता है। इसलिए मृत्यु कोई अंत नहीं; यह कामना और कर्म से तय अगली देह की ओर एक छलाँग है, एक छोर की पकड़ छोड़ने से पहले दूसरे छोर को थाम लेने वाली वही इल्ली की चाल।

सार: मौत किसी दरवाज़े का बंद होना नहीं, इल्ली की एक छलाँग है, जो अगली टहनी थामे बिना पुरानी नहीं छोड़ती। आत्मा सुनार की तरह उन्हीं पुराने तत्वों से नया रूप गढ़ती है, और उस रूप की लिखावट हमारी गहरी कामना तय करती है। हम जैसा चाहते हैं वैसा सोचते हैं, जैसा सोचते हैं वैसा करते हैं, और जैसा करते हैं वैसे ही बन जाते हैं। सो जो आगे होना है, उसका बीज आज की इच्छा में पहले से पड़ा है।

खिल काण्ड · अध्याय पाँच और छह

“द, द, द”: प्रजापति का तीन अक्षर का उपदेश

Creator Prajapati on his seat uttering the single syllable 'DA' to three rows of students (radiant gods, humans, dark asuras) who each hear a different teaching, storm clouds thundering 'da-da-da' overhead, vivid classical-Indian narrative panel.

बात सृष्टि के आदि की है। प्रजापति (सृष्टि के रचयिता, सब प्राणियों के पिता) के पास तीन तरह की संतानें ब्रह्मचर्य का व्रत पूरा करके खड़ी थीं, यानी गुरु के घर रहकर अध्ययन समाप्त कर चुकी थीं। पहले देवता आए, फिर मनुष्य, और अन्त में असुर (वे जीव जिनका स्वभाव दूसरों को सताने की ओर झुका रहता है)। तीनों ने हाथ जोड़कर कहा, “हमें कुछ उपदेश दीजिए।” प्रजापति ने हर बार बस एक अक्षर बोला, “द”। और हर बार पूछा, “क्या आप समझे?”

देवताओं से उन्होंने “द” कहा। देवता बोले, “हम समझ गए, आप कहते हैं दाम्यत (अपने को साधो, इन्द्रियों को क़ाबू में रखो)।” प्रजापति ने कहा, “हाँ, आप ठीक समझे।” फिर मनुष्यों से वही “द” कहा। मनुष्य बोले, “आप कहते हैं दत्त (दान दो, बाँटो)।” प्रजापति बोले, “हाँ, यही।” फिर असुरों से भी वही “द” कहा। असुर बोले, “आप कहते हैं दयध्वम् (दया करो, किसी पर क्रूरता मत करो)।” प्रजापति ने फिर सिर हिलाया, “हाँ, यही।” एक ही अक्षर, और तीन अलग-अलग आदेश। यह उपनिषद् कहता है कि आज भी आकाश में जब बादल गरजते हैं, तो वही दिव्य आवाज़ “द, द, द” दोहराती सुनाई देती है, साधो, दान दो, दया करो।

यहाँ चमत्कार यह है कि गुरु ने तीनों को अलग-अलग शिक्षा दी ही नहीं। शब्द एक था। फ़र्क़ सुनने वाले के भीतर था। हर शिष्य ने उस अधूरे अक्षर को अपनी गहरे-से-गहरी ज़रूरत से भर दिया। जिसको जिस बात की कमी थी, उसने वही सुना।

स्वामी कृष्णानन्द इस कथा को अपने ढंग से खोलते हैं। उनके अनुसार यह कोई देवता, मनुष्य और असुर की बाहरी जाति की बात है ही नहीं, यह तो तीन प्रकार की भीतरी कमज़ोरियों की बात है, और ये तीनों कमज़ोरियाँ हर एक व्यक्ति के भीतर बैठी रहती हैं। आध्यात्मिक राह में ये ही तीन बड़े रोड़े हैं। पहला रोड़ा है मन का स्वभाव, जो हर पल बाहर के विषयों की ओर भागता है और उनके बिना टिक नहीं पाता; यह “देवता” वाली कमज़ोरी है, सुख और भोग की ओर दौड़। इसकी दवा है दाम्यत, अपने को साधना।

स्वामी जी के अनुसार दूसरी कमज़ोरी है लोभ, हर चीज़ को बटोरकर अपने पास रख लेने की भूख। वे कहते हैं कि इसकी जड़ में दरअसल अपने ही “मैं” से अति का प्रेम है; जब आफ़त आती है तो आदमी पहले ख़ुद को बचाता है, बाक़ी सब बाद में। यही आत्म-प्रेम बाहर धन, सम्पत्ति और संग्रह के लोभ की शक्ल ले लेता है, और जितना मिलता है उतनी और भूख बढ़ती है। यह “मनुष्य” वाली कमज़ोरी है, और इसकी दवा है दत्त, बाँट देना, मुट्ठी खोल देना।

स्वामी जी तीसरी कमज़ोरी को सबमें भारी बताते हैं, दूसरों के दुख में आनन्द लेना, किसी को पीड़ा पहुँचाना, बदला और हिंसा की ओर झुकाव। यह “असुर” वाला स्वभाव है, और इसकी दवा है दयध्वम्, दया। उनकी बात का सार यह है कि एक ही गुरु, एक ही अक्षर, पर हर शिष्य को ठीक वही दवा मिली जो उसके अपने रोग की थी। उपदेश वही था; आईना सुनने वाले की कमी का था। और चूँकि ये तीनों रोग कहीं-न-कहीं हम सबके भीतर हैं, इसलिए वह तीन-तरफ़ा “द, द, द” किसी और को नहीं, हम सबको पुकारता है।

सार: सच्चा उपदेश नया ज्ञान नहीं उँडेलता, वह आईना दिखाता है। एक ही “द” तीनों ने अपनी-अपनी गहरे-से-गहरी कमी के हिसाब से सुना, क्योंकि हम वही सुनते हैं जिसकी हमें परम आवश्यकता होती है। बादल की गरज में आज भी वही पुकार है, अपने को साधो, बाँटो, और दया करो; और ये तीनों दवाएँ किसी और के लिए नहीं, हमारे ही तीन भीतरी रोगों के लिए हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

“नेति, नेति।” जब भी हम कहते हैं, “यह मैं हूँ”, यह देह, यह नाम, यह पद, यह जमा-पूँजी, उपनिषद् पीछे से कहता है, यह भी नहीं, यह भी नहीं। यह ख़ाली करने वाली बात नहीं है। यह तो हर पकड़ से उँगली हटाकर उस एक की ओर इशारा है, जो यह सब देख रहा है।

और जिस शान्ति-मन्त्र से यह उपनिषद् खुलता और बन्द होता है, वह यही याद दिलाता है, “वह पूर्ण है, यह भी पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण निकाल लीजिए, पीछे पूर्ण ही बचता है।” हम किसी अधूरेपन से पूर्णता की ओर नहीं चल रहे। हम पहले से वही पूर्ण हैं। बृहदारण्यक का न्योता बस इतना है, मैत्रेयी वाला सवाल एक बार अपने भीतर रखकर देखिए, इन सब चीज़ों में से जिनके पीछे मैं दौड़ रहा हूँ, कौन-सी मुझे सचमुच अमर करेगी? और फिर, एक पल के लिए ही सही, उस ओर मुड़िए जो यह सवाल पूछ रहा है।

व्याख्या मुख्यतः स्वामी कृष्णानन्द (दिव्य जीवन संघ) की बृहदारण्यक-उपनिषद्-टीका पर आधारित।

English