बृहदारण्यक उपनिषद्
महावाक्य “अहं ब्रह्मास्मि” का मूल। याज्ञवल्क्य के प्रसिद्ध संवादों का घर।
एक उपनिषद् जो ब्राह्मण के अन्दर से निकली
“बृहत्” यानी विशाल, “आरण्यक” यानी वन-पाठ। पारम्परिक नाम का अर्थ ही है, “वन में रचा गया विशाल पाठ”। यह उपनिषद् शतपथ-ब्राह्मण के अंतिम छह अध्यायों से बनी है, और प्रमुख दस उपनिषदों में सबसे विस्तृत है। आदि शंकराचार्य की दूसरी सबसे लम्बी उपनिषद्-टीका इसी पर है, छान्दोग्य के बाद।

पाठ की संरचना तीन काण्डों में है। पहला, “मधु काण्ड” (अध्याय एक और दो), जहाँ सृष्टि-कथा, यज्ञ-तत्त्व, और याज्ञवल्क्य के मैत्रेयी के साथ पहले संवाद रखे गए हैं। दूसरा, “मुनि काण्ड” (अध्याय तीन और चार), जो राजा जनक की सभा में याज्ञवल्क्य की प्रसिद्ध आठ-ऋषियों-वाली बहस के लिए जाना जाता है। तीसरा, “खिल काण्ड” (अध्याय पाँच और छह), जिसमें पूर्णमद-शान्ति-मन्त्र, “द द द” वाला उपाख्यान, और हिरण्मय-पात्र की प्रार्थना संग्रहीत हैं।
याज्ञवल्क्य का संस्कार
यदि किसी एक ऋषि का व्यक्तित्व इस उपनिषद् की पहचान बन गया है, तो वो याज्ञवल्क्य हैं। शुक्ल-यजुर्वेद के प्रवर्तक, राजा जनक के दरबारी-दार्शनिक, और अपनी पत्नियों के साथ बेबाक संवाद के लिए प्रसिद्ध। दो पत्नियाँ थीं उनकी, कात्यायनी (एक साधारण गृहिणी) और मैत्रेयी (एक स्व-स्थापित ब्रह्म-वादिनी)। जब याज्ञवल्क्य ने गृहस्थ-जीवन छोड़ने का निर्णय किया और सम्पत्ति को दोनों के बीच बाँटने की पेशकश की, तो मैत्रेयी का उत्तर एक तरह का दार्शनिक-निर्णायक-क्षण बन गया, “अगर सारी पृथ्वी मेरी हो जाए, तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी?” “नहीं”, याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, “धन से जीवन वैसा होगा जैसा धनवानों का होता है। मगर अमरता का धन से कोई सम्बन्ध नहीं।” तब मैत्रेयी ने वही प्रश्न पूछा जो इस उपनिषद् का केन्द्र है, “जिससे मैं अमर नहीं होऊँगी, उसको ले कर मैं क्या करूँगी? आप जो जानते हैं, वही मुझे बताइए।”
जनक की सभा में याज्ञवल्क्य का नौ ऋषियों के साथ संवाद इस उपनिषद् के मध्य-भाग में है। हर ऋषि एक प्रश्न रखता है, याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं। आख़िरी प्रश्न-कर्ता शाकल्य को याज्ञवल्क्य चेतावनी देते हैं, “अगर आप अब और प्रश्न पूछेंगे और उत्तर नहीं समझ पाएँगे, तो आपका सिर गिर जाएगा।” शाकल्य प्रश्न पूछते हैं। और परम्परा बताती है, सभा छोड़ने से पहले ही उनकी मृत्यु हो जाती है। कथा शायद अतिशयोक्ति है, मगर यह बताती है कि उस सभा का दार्विक स्तर कितना तेज़ था।
तीन वाक्य जो स्मरण-स्थायी हैं
“अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ब्रह्म हूँ)। यजुर्वेद का महावाक्य। पहले अध्याय के चौथे ब्राह्मण के दसवें मन्त्र में, और पूरे वेदान्त की सबसे सीधी आत्म-घोषणा।
“असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतम् गमय” (असत् से सत् की ओर ले चलें, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर)। पहले अध्याय के तीसरे ब्राह्मण की प्रसिद्ध त्रि-पंक्ति, जो आज भी दुनिया-भर के योग-कक्षाओं की उद्घाटन-प्रार्थना है।
“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं” (वो पूर्ण है, यह भी पूर्ण है)। पाँचवें अध्याय का प्रारम्भ, अनन्त-गणित का सूत्र, जो वेदान्त की केन्द्रीय सहज-स्थिति का संकेत है।
छह अध्याय
मुनि-काण्ड (याज्ञवल्क्य-जनक) पहला हिस्सा
जनक की सभा, याज्ञवल्क्य से 8 ब्राह्मणों का संवाद, अन्तर्यामिन्
मुनि-काण्ड (याज्ञवल्क्य-जनक) दूसरा हिस्सा + Maitreyi फिर
जनक-याज्ञवल्क्य personal-संवाद, Maitreyi-fuller-संस्करण
पढ़ने के बारे में
पाठक के लिए सबसे क़रीबी प्रवेश-बिन्दु दूसरे अध्याय का चौथा ब्राह्मण है, मैत्रेयी-संवाद। यह छोटा है, स्व-संगठित है, और दूसरी बार चौथे अध्याय के पाँचवें ब्राह्मण में दोहराया जाता है, अब अधिक विस्तार के साथ। दोनों पाठ साथ-साथ पढ़ने पर एक तरह की वार्तालाप-प्रगति महसूस होती है।
तीसरे अध्याय की बहस अधिक तकनीकी है, और इसे पढ़ने से पहले उपनिषद्-शब्दावली का थोड़ा परिचय मदद करता है, अन्तर्यामिन्, अक्षर, नेति-नेति, और इसी तरह की पारिभाषिक धाराएँ। पाँचवें अध्याय के “द द द” वाले उपाख्यान को T.S. Eliot ने “The Waste Land” के अंतिम भाग में लिया था, यह तथ्य अंग्रेज़ी-पाठकों के लिए एक रोचक प्रवेश-कण है।
साथ में पढ़ें
- छान्दोग्य उपनिषद्sister-उपनिषद्, साम-वेद से
- महावाक्यअहं ब्रह्मास्मि का explainer
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