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उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

बृहदारण्यक उपनिषद्

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रात में दीपक के पास बैठे याज्ञवल्क्य हाथ उठाकर कुछ समझाते हैं और सामने बैठी मैत्रेयी ध्यान से सुनती हैं; बाहर चाँदनी में आश्रम की कुटिया दिख रही है।
शुक्ल यजुर्वेद · उपनिषद्
वन में रचा गया विशाल पाठ, और उसकी वे मुलाक़ातें जिनमें पहली बार कहा गया, “मैं ही ब्रह्म हूँ।”

आज से कोई ढाई-तीन हज़ार बरस पहले के उत्तर भारत की एक तस्वीर मन में लाइए। उन दिनों जीवन और मौत के गहरे-से-गहरे सवाल किताबों में नहीं सुलझते थे, खुली सभाओं में और वन की कुटियों में सुलझते थे। राजा अपने दरबार में ज्ञान की होड़ कराते, बड़े-बड़े पंडित आमने-सामने बैठकर एक-दूसरे को परखते, और जो सबको निरुत्तर कर देता, इनाम उसी का होता। ऐसी ही होड़ों का नायक था याज्ञवल्क्य, अपने ज़माने का एक बेहद निडर दिमाग़, जो भरी सभा को अकेले चुप करा देता था।

ग्रंथ का नाम ही उसका मिज़ाज बता देता है। “बृहत्” यानी विशाल, “आरण्यक” यानी वन का पाठ, यानी वन में रचा गया विशाल ग्रंथ, जो पुराने शतपथ-ब्राह्मण के आख़िरी हिस्से से निकला है। तीन काण्डों में बँटा हुआ। पर यह उपनिषद् यह नहीं पूछता कि सृष्टि कैसे बनी। यह पूछता है कि जब सब कुछ छिन जाए, तब क्या बचता है। जो देख रहा है, सुन रहा है, सोच रहा है, वह कौन है। इसी खोज में यहाँ पहली बार वह वाक्य कहा गया जिसे आगे पूरी वेदान्त-परम्परा दोहराती रही, “अहं ब्रह्मास्मि”, मैं ही ब्रह्म हूँ। साथ ही वह तरीक़ा भी, “नेति, नेति”, यह भी नहीं, यह भी नहीं।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

याज्ञवल्क्य: उस युग के प्रकांड ऋषि, राजा जनक के दरबारी-दार्शनिक, और शुक्ल-यजुर्वेद की परम्परा के प्रवर्तक। बहस में किसी से नहीं हारते।

जनक: मिथिला (विदेह) के राजा, जो राजपाट के साथ-साथ ब्रह्म-विद्या के दीवाने थे, और इन्हीं सवालों पर सभाएँ कराते थे।

मैत्रेयी: याज्ञवल्क्य की पत्नी और ब्रह्मवादिनी (ब्रह्म की खोज में लगी स्त्री)। उनकी दूसरी पत्नी कात्यायनी घर-संसार में रमी एक साधारण गृहिणी थीं।

गार्गी वाचक्नवी: जनक की सभा की अकेली विदुषी, जिसके सवालों से बड़े-बड़े विद्वान कतराते थे।

उद्दालक आरुणि और शाकल्य: सभा के दो और प्रकांड आचार्य, जिन्होंने याज्ञवल्क्य को घेरा।

प्रजापति: सृष्टि के रचयिता, जिन्होंने देवता, मनुष्य और असुर, तीनों को एक ही अक्षर से सिखाया।

मधु काण्ड · अध्याय एक और दो

अध्याय-दर-अध्याय पढ़िए

हर अध्याय अपना पूरा पन्ना है: कथा, संवाद, सार और मूल पाठ के संकेत। पहली बार पढ़ रहे हों तो अध्याय 2 (मैत्रेयी) या 3 (जनक की सभा) से शुरू कीजिए।

  1. अध्याय 1: अश्वमेध, प्राणों की होड़ और अहं ब्रह्मास्मियज्ञ का घोड़ा जो सारा ब्रह्माण्ड है, भूख जो मृत्यु है, प्राणों की होड़, और सृष्टि के आरम्भ में गूँजा पहला शब्द, मैं हूँ।
  2. अध्याय 2: नेति नेति, मैत्रेयी का प्रश्न और मधु-विद्यागार्ग्य के बारह उत्तर और अजातशत्रु का एक जवाब, सोते हुए आदमी के भीतर का रास्ता, ब्रह्म के दो रूप, और वह संवाद जिसमें मैत्रेयी ने अमरता माँगी।
  3. अध्याय 3: जनक की सभा, गार्गी के बाण और अक्षरसोने से मढ़े सींगों वाली हज़ार गायें, आठ विद्वानों के सवाल, गार्गी वाचक्नवी के दो बाण, और वह अक्षर जिस पर आकाश बुना हुआ है।
  4. अध्याय 4: जनक, याज्ञवल्क्य और आत्मज्योतिविदेह की सभा में एक राजा अपने सारे सीखे हुए उत्तर खोल देता है, और याज्ञवल्क्य उसे जागने, सपने, गहरी नींद और मृत्यु के पार तक ले जाते हैं।
  5. अध्याय 5: एक अक्षर, सत्य और अन्तकाल की प्रार्थनाएक अक्षर का उपदेश, हृदय और सत्य की उपासना, गायत्री का चौथा पद, और मरते समय सूर्य से माँगी गयी वह प्रार्थना जो आज भी दोहराई जाती है।
  6. अध्याय 6: पाँच अग्नियाँ, दो राहें और वंश की डोरप्राणों का झगड़ा एक बार फिर, पंचालों की सभा के पाँच सवाल, वह आग जिसमें संसार पकता है, देवयान और पितृयाण, और गुरुओं की वह डोर जो माँओं के नाम से गिनी गयी।

और अन्त में, अपनी ओर

“नेति, नेति।” जब भी हम कहते हैं, “यह मैं हूँ”, यह देह, यह नाम, यह पद, यह जमा-पूँजी, उपनिषद् पीछे से कहता है, यह भी नहीं, यह भी नहीं। यह ख़ाली करने वाली बात नहीं है। यह तो हर पकड़ से उँगली हटाकर उस एक की ओर इशारा है, जो यह सब देख रहा है।

और जिस शान्ति-मन्त्र से यह उपनिषद् खुलता और बन्द होता है, वह यही याद दिलाता है, “वह पूर्ण है, यह भी पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण निकाल लीजिए, पीछे पूर्ण ही बचता है।” हम किसी अधूरेपन से पूर्णता की ओर नहीं चल रहे। हम पहले से वही पूर्ण हैं। बृहदारण्यक का न्योता बस इतना है, मैत्रेयी वाला सवाल एक बार अपने भीतर रखकर देखिए, इन सब चीज़ों में से जिनके पीछे मैं दौड़ रहा हूँ, कौन-सी मुझे सचमुच अमर करेगी? और फिर, एक पल के लिए ही सही, उस ओर मुड़िए जो यह सवाल पूछ रहा है।