
विष्णु की कथाएँ, गीता प्रेस के विष्णुपुराण से, कहानी के रूप में। जैसे-जैसे और कथाएँ जुड़ती जाएँगी, यह संग्रह बढ़ता जाएगा।
प्रथम अंश: सृष्टि, काल और अवतार

सृष्टि, काल और विष्णु की महिमामैत्रेय के प्रश्न पर पराशर बताते हैं कि यह जगत् कहाँ से आया और काल किसे कहते हैं।
वराह अवतार और पृथ्वी का उद्धाररसातल में डूबी पृथ्वी को भगवान् वराह अपनी दाढ़ों पर उठा लाते हैं।

सर्ग, प्रजापति और स्वायम्भुव मनुब्रह्मा के मानस-पुत्र, प्रजापतियों का प्रकट होना और मनु-शतरूपा से सृष्टि का विस्तार।

लक्ष्मी और समुद्र-मन्थनदुर्वासा के शाप से श्रीहीन हुए देवता क्षीरसागर मथते हैं और लक्ष्मीजी प्रकट होती हैं।

राजा वेन और पृथु का चरित्रअधर्मी वेन के बाद पृथु का प्राकट्य, जो पृथ्वी को दुहकर प्रजा का पालन करते हैं।

प्रचेता और दक्ष की उत्पत्तिसमुद्र के भीतर हज़ारों वर्ष तप करते प्रचेता, और दक्ष प्रजापति के वंश का आरम्भ।

मरुद्गण का जन्म और विष्णु की विभूतिदिति के गर्भ को इन्द्र चीरते हैं और उससे उनचास मरुत् उठते हैं; फिर विष्णु की जगद्व्यवस्था।
द्वितीय अंश: भूगोल और ज्ञान

भूगोल: सप्त द्वीप, पाताल और नरकजम्बूद्वीप से लेकर सात पातालों और भिन्न-भिन्न नरकों तक फैले ब्रह्माण्ड का नक्शा।

ऊर्ध्वलोक और ज्योतिष्चक्रभूः से सत्यलोक तक के ऊपरी लोक, सूर्य का रथ और शिशुमार-चक्र में बँधे ग्रह-नक्षत्र।

भरत और जड़भरत की कथामृग के मोह में अटके राजा भरत का पुनर्जन्म, और जड़ बने ज्ञानी की सौवीर-नरेश को सीख।

ऋभु का निदाघ को अद्वैत-उपदेशगुरु ऋभु बार-बार लौटकर शिष्य निदाघ को 'तू और मैं' का भेद मिटाना सिखाते हैं।
तृतीय अंश: मन्वन्तर, वेद और धर्म

चौदह मन्वन्तर, व्यास और अठारह पुराणएक-एक कल्प में बदलते मनु और इन्द्र, हर युग के अलग व्यास, और वेद-शाखाओं का बँटवारा।

यमगीतायमराज अपने दूतों को समझाते हैं कि विष्णु के भक्त को छूने का साहस मत करना।

मायामोह और राजा शतधनुदेवों के कहने पर भगवान् मायामोह को रचते हैं, और पत्नी शैव्या की निष्ठा से शतधनु का उद्धार होता है।
चतुर्थ अंश: राजवंश और भविष्य

सूर्यवंश: सौभरि, त्रिशंकु और सगरइक्ष्वाकु का वंश, जल में तप करते सौभरि का मोह, त्रिशंकु का स्वर्ग और सगर की विजय।
गंगावतरण, राम और निमिसगर-पुत्रों के उद्धार के लिए गंगा का उतरना, श्रीराम का संक्षिप्त चरित और निमि-जनक की कथा।

पुरूरवा और उर्वशीचन्द्रवंश का आरम्भ, और अप्सरा उर्वशी से पुरूरवा का प्रेम तथा वियोग।

ययाति की कथाशाप से बूढ़े हुए ययाति अपने पुत्र पुरु से यौवन उधार लेते हैं, फिर भोग की व्यर्थता समझते हैं।

स्यमन्तक मणि की कथासूर्य की दी हुई मणि पर लगा चोरी का लांछन, और जाम्बवान् की गुफा में श्रीकृष्ण का सत्य।

भविष्य के राजा और कलियुग का आगमनपराशर पहले ही बता देते हैं कि आगे कौन-कौन राजा होंगे, मगध का वंश, और कलियुग के लक्षण।
पंचम अंश: श्रीकृष्ण-लीला
षष्ठ अंश: कलियुग, प्रलय और ब्रह्मयोग

कलियुग का धर्मपराशर बताते हैं कि कलियुग में थोड़े से भजन का भी बड़ा फल, और स्त्री-शूद्र का सहज कल्याण।

चार प्रकार के प्रलयनैमित्तिक, प्राकृत, आत्यन्तिक और नित्य, सृष्टि किन-किन रूपों में समेटी जाती है।

केशिध्वज, खाण्डिक्य और ब्रह्मयोगदो प्रतिद्वंद्वी राजाओं की भेंट, जहाँ शत्रु ही गुरु बनकर मोक्ष का मार्ग देता है; और ग्रन्थ का उपसंहार।
