अंग
299
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਸਤ ਚਰਨ ਸੰਤ ਟਹਲ ਕਮਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਸੰਜਮੁ ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਪਾਈਐ ॥੧੦॥
ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਸੰਜਮੁ ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਪਾਈਐ ॥੧੦॥
हसत चरन संत टहल कमाईऐ ॥
नानक इहु संजमु प्रभ किरपा पाईऐ ॥१०॥
नानक इहु संजमु प्रभ किरपा पाईऐ ॥१०॥
हिन्दी अर्थ: हाथों से संत जनों के चरणों की टहल की जाती है। हे नानक ! ये (ऊपर बताई) जीवन-जुगति परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होती है। 10।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਬਖਾਨੀਐ ਬਿਰਲਾ ਜਾਣੈ ਸ੍ਵਾਦੁ ॥
ਗੁਣ ਗੋਬਿੰਦ ਨ ਜਾਣੀਐ ਨਾਨਕ ਸਭੁ ਬਿਸਮਾਦੁ ॥੧੧॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਬਖਾਨੀਐ ਬਿਰਲਾ ਜਾਣੈ ਸ੍ਵਾਦੁ ॥
ਗੁਣ ਗੋਬਿੰਦ ਨ ਜਾਣੀਐ ਨਾਨਕ ਸਭੁ ਬਿਸਮਾਦੁ ॥੧੧॥
सलोकु ॥
एको एकु बखानीऐ बिरला जाणै स्वादु ॥
गुण गोबिंद न जाणीऐ नानक सभु बिसमादु ॥११॥
एको एकु बखानीऐ बिरला जाणै स्वादु ॥
गुण गोबिंद न जाणीऐ नानक सभु बिसमादु ॥११॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु (हे भाई !) सिर्फ एक परमात्मा की ही सिफत सालाह करनी चाहिए (सिफत सालाह में ही आत्मिक आनंद है पर) इस आत्मिक आनंद को कोई दुर्लभ मनुष्य ही पाता है। (परमात्मा के गुण गायन करने से आत्मिक आनंद तो मिलता है; पर) गुणों (के बयान करने) से परमात्मा का सही स्वरूप नहीं समझा जा सकता (क्योंकि) हे नानक ! वह तो सारा आश्चर्य रूप है। 11।
ਪਉੜੀ ॥
ਏਕਾਦਸੀ ਨਿਕਟਿ ਪੇਖਹੁ ਹਰਿ ਰਾਮੁ ॥
ਇੰਦ੍ਰੀ ਬਸਿ ਕਰਿ ਸੁਣਹੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥
ਮਨਿ ਸੰਤੋਖੁ ਸਰਬ ਜੀਅ ਦਇਆ ॥
ਇਨ ਬਿਧਿ ਬਰਤੁ ਸੰਪੂਰਨ ਭਇਆ ॥
ਧਾਵਤ ਮਨੁ ਰਾਖੈ ਇਕ ਠਾਇ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੁਧੁ ਜਪਤ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥
ਸਭ ਮਹਿ ਪੂਰਿ ਰਹੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਕਰਿ ਅਟਲ ਏਹੁ ਧਰਮ ॥੧੧॥
ਏਕਾਦਸੀ ਨਿਕਟਿ ਪੇਖਹੁ ਹਰਿ ਰਾਮੁ ॥
ਇੰਦ੍ਰੀ ਬਸਿ ਕਰਿ ਸੁਣਹੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥
ਮਨਿ ਸੰਤੋਖੁ ਸਰਬ ਜੀਅ ਦਇਆ ॥
ਇਨ ਬਿਧਿ ਬਰਤੁ ਸੰਪੂਰਨ ਭਇਆ ॥
ਧਾਵਤ ਮਨੁ ਰਾਖੈ ਇਕ ਠਾਇ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੁਧੁ ਜਪਤ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥
ਸਭ ਮਹਿ ਪੂਰਿ ਰਹੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਕਰਿ ਅਟਲ ਏਹੁ ਧਰਮ ॥੧੧॥
पउड़ी ॥
एकादसी निकटि पेखहु हरि रामु ॥
इंद्री बसि करि सुणहु हरि नामु ॥
मनि संतोखु सरब जीअ दइआ ॥
इन बिधि बरतु संपूरन भइआ ॥
धावत मनु राखै इक ठाइ ॥
मनु तनु सुधु जपत हरि नाइ ॥
सभ महि पूरि रहे पारब्रहम ॥
नानक हरि कीरतनु करि अटल एहु धरम ॥११॥
एकादसी निकटि पेखहु हरि रामु ॥
इंद्री बसि करि सुणहु हरि नामु ॥
मनि संतोखु सरब जीअ दइआ ॥
इन बिधि बरतु संपूरन भइआ ॥
धावत मनु राखै इक ठाइ ॥
मनु तनु सुधु जपत हरि नाइ ॥
सभ महि पूरि रहे पारब्रहम ॥
नानक हरि कीरतनु करि अटल एहु धरम ॥११॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) परमात्मा को (सदा अपने) नजदीक (बसता) देखो। यही है एकादशी (का व्रत।) अपनी इंद्रियों को काबू में रख के परमात्मा का नाम सुना करो- (जो मनुष्य अपने) मन में संतोष (धारण करता है और) सब जीवों के साथ दया-प्यार वाला सलूक करता है। इस तरीके से (जीवन गुजारते हुए उसका) व्रत सफल हो जाता है (भाव। यही है असल व्रत)। (इस तरह के व्रत से वह मनुष्य विकारों की तरफ) दौड़ते (अपने) मन को एक ठिकाने पे टिकाए रखता है। परमात्मा का (नाम) जपते हुए (परमात्मा के) नाम में (जुड़ने से) उसका मन पवित्र हो जाता है। उसका हृदय पवित्र हो जाता है। हे नानक ! जो प्रभू सारे जगत में हर जगह व्यापक है। उस प्रभू की सिफत सालाह करता रह। यह ऐसा धर्म है जिसका फल जरूर मिलता है। 11।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਦੁਰਮਤਿ ਹਰੀ ਸੇਵਾ ਕਰੀ ਭੇਟੇ ਸਾਧ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਿਉ ਮਿਲਿ ਰਹੇ ਬਿਨਸੇ ਸਗਲ ਜੰਜਾਲ ॥੧੨॥
ਦੁਰਮਤਿ ਹਰੀ ਸੇਵਾ ਕਰੀ ਭੇਟੇ ਸਾਧ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਿਉ ਮਿਲਿ ਰਹੇ ਬਿਨਸੇ ਸਗਲ ਜੰਜਾਲ ॥੧੨॥
सलोकु ॥
दुरमति हरी सेवा करी भेटे साध क्रिपाल ॥
नानक प्रभ सिउ मिलि रहे बिनसे सगल जंजाल ॥१२॥
दुरमति हरी सेवा करी भेटे साध क्रिपाल ॥
नानक प्रभ सिउ मिलि रहे बिनसे सगल जंजाल ॥१२॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु जो भाग्यशाली मनुष्य दया-के-धर गुरू से मिल लिए और जिन्होंने गुरू के द्वारा बताई हुई सेवा की। उन्होंने (अपने अंदर से) खोटी मति दूर कर ली। हे नानक ! जो लोग परमात्मा के चरणों में जुड़े रहते हैं। उनके (माया के मोह के) सारे बंधन नाश हो जाते हैं। 12।
ਪਉੜੀ ॥
ਦੁਆਦਸੀ ਦਾਨੁ ਨਾਮੁ ਇਸਨਾਨੁ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਕਰਹੁ ਤਜਿ ਮਾਨੁ ॥
ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਪਾਨ ਕਰਹੁ ਸਾਧਸੰਗਿ ॥
ਮਨ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੈ ਕੀਰਤਨ ਪ੍ਰਭ ਰੰਗਿ ॥
ਕੋਮਲ ਬਾਣੀ ਸਭ ਕਉ ਸੰਤੋਖੈ ॥
ਪੰਚ ਭੂ ਆਤਮਾ ਹਰਿ ਨਾਮ ਰਸਿ ਪੋਖੈ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਏਹ ਨਿਹਚਉ ਪਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਰਮਤ ਫਿਰਿ ਜੋਨਿ ਨ ਆਈਐ ॥੧੨॥
ਦੁਆਦਸੀ ਦਾਨੁ ਨਾਮੁ ਇਸਨਾਨੁ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਕਰਹੁ ਤਜਿ ਮਾਨੁ ॥
ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਪਾਨ ਕਰਹੁ ਸਾਧਸੰਗਿ ॥
ਮਨ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੈ ਕੀਰਤਨ ਪ੍ਰਭ ਰੰਗਿ ॥
ਕੋਮਲ ਬਾਣੀ ਸਭ ਕਉ ਸੰਤੋਖੈ ॥
ਪੰਚ ਭੂ ਆਤਮਾ ਹਰਿ ਨਾਮ ਰਸਿ ਪੋਖੈ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਏਹ ਨਿਹਚਉ ਪਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਰਮਤ ਫਿਰਿ ਜੋਨਿ ਨ ਆਈਐ ॥੧੨॥
पउड़ी ॥
दुआदसी दानु नामु इसनानु ॥
हरि की भगति करहु तजि मानु ॥
हरि अंम्रित पान करहु साधसंगि ॥
मन त्रिपतासै कीरतन प्रभ रंगि ॥
कोमल बाणी सभ कउ संतोखै ॥
पंच भू आतमा हरि नाम रसि पोखै ॥
गुर पूरे ते एह निहचउ पाईऐ ॥
नानक राम रमत फिरि जोनि न आईऐ ॥१२॥
दुआदसी दानु नामु इसनानु ॥
हरि की भगति करहु तजि मानु ॥
हरि अंम्रित पान करहु साधसंगि ॥
मन त्रिपतासै कीरतन प्रभ रंगि ॥
कोमल बाणी सभ कउ संतोखै ॥
पंच भू आतमा हरि नाम रसि पोखै ॥
गुर पूरे ते एह निहचउ पाईऐ ॥
नानक राम रमत फिरि जोनि न आईऐ ॥१२॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई ! ख़लकति की) सेवा करो। परमात्मा का नाम जपो। और। जीवन पवित्र रखो। (मन में से) अहंकार त्याग के परमात्मा की भगती करते रहो। साध-संगति में मिल के आत्मिक जीवन देने वाला प्रभू का नाम रस पीते रहो। परमात्मा के प्रेम रंग में रंग के परमात्मा की सिफत सालाह करने से मन (दुनिया के पदार्थों से विकारों से) तृप्त रहता है। (सिफत सालाह की) मीठी वाणी हरेक (इंद्रिय) को आत्मिक आनंद देती है। सिफत सालाह की बरकति से मन पाँच तत्वों के ‘सतो’ अंश की घाड़त में घड़ा जा के परमात्मा के नाम-रस में प्रफुल्लित होता है। हे नानक ! पूरे गुरू से ये दाति यकीनी तौर पर मिल जाती है। और। परमात्मा का नाम सिमरने से फिर जोनियों में नहीं आते। 12।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਤੀਨਿ ਗੁਣਾ ਮਹਿ ਬਿਆਪਿਆ ਪੂਰਨ ਹੋਤ ਨ ਕਾਮ ॥
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਣੁ ਮਨਿ ਬਸੈ ਨਾਨਕ ਛੂਟੈ ਨਾਮ ॥੧੩॥
ਤੀਨਿ ਗੁਣਾ ਮਹਿ ਬਿਆਪਿਆ ਪੂਰਨ ਹੋਤ ਨ ਕਾਮ ॥
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਣੁ ਮਨਿ ਬਸੈ ਨਾਨਕ ਛੂਟੈ ਨਾਮ ॥੧੩॥
सलोकु ॥
तीनि गुणा महि बिआपिआ पूरन होत न काम ॥
पतित उधारणु मनि बसै नानक छूटै नाम ॥१३॥
तीनि गुणा महि बिआपिआ पूरन होत न काम ॥
पतित उधारणु मनि बसै नानक छूटै नाम ॥१३॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु जगत माया के तीन गुणों के दबाव में आया रहता है (इस वास्ते कभी भी इसकी) वासनाएं पूरी नहीं होती। हे नानक ! वह मनुष्य (इस माया के पंजे में से) बच निकलता है जिसके मन में परमात्मा का नाम बस जाता है जिसके मन में वह परमात्मा आ बसता है जो विकारों में गिरे हुए मनुष्यों को विकारों में से बचाने की समर्था वाला है। 13।
ਪਉੜੀ ॥
ਤ੍ਰਉਦਸੀ ਤੀਨਿ ਤਾਪ ਸੰਸਾਰ ॥
ਆਵਤ ਜਾਤ ਨਰਕ ਅਵਤਾਰ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਭਜਨੁ ਨ ਮਨ ਮਹਿ ਆਇਓ ॥
ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਪ੍ਰਭੁ ਨਿਮਖ ਨ ਗਾਇਓ ॥
ਹਰਖ ਸੋਗ ਕਾ ਦੇਹ ਕਰਿ ਬਾਧਿਓ ॥
ਦੀਰਘ ਰੋਗੁ ਮਾਇਆ ਆਸਾਧਿਓ ॥
ਦਿਨਹਿ ਬਿਕਾਰ ਕਰਤ ਸ੍ਰਮੁ ਪਾਇਓ ॥
ਨੈਨੀ ਨੀਦ ਸੁਪਨ ਬਰੜਾਇਓ ॥
ਹਰਿ ਬਿਸਰਤ ਹੋਵਤ ਏਹ ਹਾਲ ॥
ਸਰਨਿ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਪੁਰਖ ਦਇਆਲ ॥੧੩॥
ਤ੍ਰਉਦਸੀ ਤੀਨਿ ਤਾਪ ਸੰਸਾਰ ॥
ਆਵਤ ਜਾਤ ਨਰਕ ਅਵਤਾਰ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਭਜਨੁ ਨ ਮਨ ਮਹਿ ਆਇਓ ॥
ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਪ੍ਰਭੁ ਨਿਮਖ ਨ ਗਾਇਓ ॥
ਹਰਖ ਸੋਗ ਕਾ ਦੇਹ ਕਰਿ ਬਾਧਿਓ ॥
ਦੀਰਘ ਰੋਗੁ ਮਾਇਆ ਆਸਾਧਿਓ ॥
ਦਿਨਹਿ ਬਿਕਾਰ ਕਰਤ ਸ੍ਰਮੁ ਪਾਇਓ ॥
ਨੈਨੀ ਨੀਦ ਸੁਪਨ ਬਰੜਾਇਓ ॥
ਹਰਿ ਬਿਸਰਤ ਹੋਵਤ ਏਹ ਹਾਲ ॥
ਸਰਨਿ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਪੁਰਖ ਦਇਆਲ ॥੧੩॥
पउड़ी ॥
त्रउदसी तीनि ताप संसार ॥
आवत जात नरक अवतार ॥
हरि हरि भजनु न मन महि आइओ ॥
सुख सागर प्रभु निमख न गाइओ ॥
हरख सोग का देह करि बाधिओ ॥
दीरघ रोगु माइआ आसाधिओ ॥
दिनहि बिकार करत स्रमु पाइओ ॥
नैनी नीद सुपन बरड़ाइओ ॥
हरि बिसरत होवत एह हाल ॥
सरनि नानक प्रभ पुरख दइआल ॥१३॥
त्रउदसी तीनि ताप संसार ॥
आवत जात नरक अवतार ॥
हरि हरि भजनु न मन महि आइओ ॥
सुख सागर प्रभु निमख न गाइओ ॥
हरख सोग का देह करि बाधिओ ॥
दीरघ रोगु माइआ आसाधिओ ॥
दिनहि बिकार करत स्रमु पाइओ ॥
नैनी नीद सुपन बरड़ाइओ ॥
हरि बिसरत होवत एह हाल ॥
सरनि नानक प्रभ पुरख दइआल ॥१३॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) जगत को तीन किस्म के दुख चिपके रहते हैं (जिसके कारण ये) जनम मरन के चक्कर में पड़ा रहता है। दुखों में ही पैदा होता है। (तीन तापों के कारण मनुष्य के) मन में परमात्मा का भजन नहीं टिकता। पलक झपकने के जितने के समय के वास्ते भी मनुष्य सुखों-के-समुंद्र प्रभू की सिफत सालाह नहीं करता। मनुष्य अपने आप को खुशी-ग़मी का पिण्ड बना के बसाए बैठा है। इसे माया (के मोह) का ऐसा लंबा रोग चिपका हुआ है जो काबू में नहीं आ सकता। (तीनों तापों के असर में मनुष्य) सारा दिन व्यर्थ काम करता-करता थक जाता है। (रात को जब) आँखों में नींद (आती है तब) सपनों में भी (दिन वाली दौड़-भाग की) बातें करता है। परमात्मा को भुला देने के कारण मनुष्य का ये हाल होता है। हे नानक ! (कह, अगर इस दुखदाई हालत से बचना है। तो) दया के श्रोत अकाल-पुरख प्रभू की शरण पड़। 13।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਚਾਰਿ ਕੁੰਟ ਚਉਦਹ ਭਵਨ ਸਗਲ ਬਿਆਪਤ ਰਾਮ ॥
ਨਾਨਕ ਊਨ ਨ ਦੇਖੀਐ ਪੂਰਨ ਤਾ ਕੇ ਕਾਮ ॥੧੪॥
ਚਾਰਿ ਕੁੰਟ ਚਉਦਹ ਭਵਨ ਸਗਲ ਬਿਆਪਤ ਰਾਮ ॥
ਨਾਨਕ ਊਨ ਨ ਦੇਖੀਐ ਪੂਰਨ ਤਾ ਕੇ ਕਾਮ ॥੧੪॥
सलोकु ॥
चारि कुंट चउदह भवन सगल बिआपत राम ॥
नानक ऊन न देखीऐ पूरन ता के काम ॥१४॥
चारि कुंट चउदह भवन सगल बिआपत राम ॥
नानक ऊन न देखीऐ पूरन ता के काम ॥१४॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु चारों तरफ और चौदह लोक – सब में ही परमात्मा बस रहा है। हे नानक ! (उस परमात्मा के भण्डारों में) कोई कमी नहीं देखी जाती। उसके किए सारे ही काम सफल होते हैं। 14।
ਪਉੜੀ ॥
ਚਉਦਹਿ ਚਾਰਿ ਕੁੰਟ ਪ੍ਰਭ ਆਪ ॥
ਸਗਲ ਭਵਨ ਪੂਰਨ ਪਰਤਾਪ ॥
ਦਸੇ ਦਿਸਾ ਰਵਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਏਕੁ ॥
ਧਰਨਿ ਅਕਾਸ ਸਭ ਮਹਿ ਪ੍ਰਭ ਪੇਖੁ ॥
ਜਲ ਥਲ ਬਨ ਪਰਬਤ ਪਾਤਾਲ ॥
ਪਰਮੇਸ੍ਵਰ ਤਹ ਬਸਹਿ ਦਇਆਲ ॥
ਸੂਖਮ ਅਸਥੂਲ ਸਗਲ ਭਗਵਾਨ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਨ ॥੧੪॥
ਚਉਦਹਿ ਚਾਰਿ ਕੁੰਟ ਪ੍ਰਭ ਆਪ ॥
ਸਗਲ ਭਵਨ ਪੂਰਨ ਪਰਤਾਪ ॥
ਦਸੇ ਦਿਸਾ ਰਵਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਏਕੁ ॥
ਧਰਨਿ ਅਕਾਸ ਸਭ ਮਹਿ ਪ੍ਰਭ ਪੇਖੁ ॥
ਜਲ ਥਲ ਬਨ ਪਰਬਤ ਪਾਤਾਲ ॥
ਪਰਮੇਸ੍ਵਰ ਤਹ ਬਸਹਿ ਦਇਆਲ ॥
ਸੂਖਮ ਅਸਥੂਲ ਸਗਲ ਭਗਵਾਨ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਨ ॥੧੪॥
पउड़ी ॥
चउदहि चारि कुंट प्रभ आप ॥
सगल भवन पूरन परताप ॥
दसे दिसा रविआ प्रभु एकु ॥
धरनि अकास सभ महि प्रभ पेखु ॥
जल थल बन परबत पाताल ॥
परमेस्वर तह बसहि दइआल ॥
सूखम असथूल सगल भगवान ॥
नानक गुरमुखि ब्रहमु पछान ॥१४॥
चउदहि चारि कुंट प्रभ आप ॥
सगल भवन पूरन परताप ॥
दसे दिसा रविआ प्रभु एकु ॥
धरनि अकास सभ महि प्रभ पेखु ॥
जल थल बन परबत पाताल ॥
परमेस्वर तह बसहि दइआल ॥
सूखम असथूल सगल भगवान ॥
नानक गुरमुखि ब्रहमु पछान ॥१४॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- चारों दिशाओं में परमात्मा स्वयं बस रहा है। सारे भवनों में उसका तेज-प्रताप चमकता है। सिर्फ एक प्रभू ही दसों दिशाओं में बसता है। (हे भाई !) धरती-आकाश सब में बसता परमात्मा देखो। पानी। धरती। जंगल। पहाड़।पाताल – इन सभी में ही दया-के-घर प्रभू जी बस रहे हैं। अदृश्य और दृष्टमान सारे ही जगत में भगवान मौजूद है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के बताए राह पर चलता है वह परमात्मा को (सब जगह बसता) पहिचान लेता है। 14।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਆਤਮੁ ਜੀਤਾ ਗੁਰਮਤੀ ਗੁਣ ਗਾਏ ਗੋਬਿੰਦ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦੀ ਭੈ ਮਿਟੇ ਨਾਨਕ ਬਿਨਸੀ ਚਿੰਦ ॥੧੫॥
ਆਤਮੁ ਜੀਤਾ ਗੁਰਮਤੀ ਗੁਣ ਗਾਏ ਗੋਬਿੰਦ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦੀ ਭੈ ਮਿਟੇ ਨਾਨਕ ਬਿਨਸੀ ਚਿੰਦ ॥੧੫॥
सलोकु ॥
आतमु जीता गुरमती गुण गाए गोबिंद ॥
संत प्रसादी भै मिटे नानक बिनसी चिंद ॥१५॥
आतमु जीता गुरमती गुण गाए गोबिंद ॥
संत प्रसादी भै मिटे नानक बिनसी चिंद ॥१५॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू की शिक्षा पर चल के अपने आप को (अपने मन को) बस में किया और परमात्मा की सिफत सालाह की। गुरू की कृपा से उसके सारे डर दूर हो गए और हरेक किस्म की चिंता-फिक्र का नाश हो गया। 15।
ਪਉੜੀ ॥
ਅਮਾਵਸ ਆਤਮ ਸੁਖੀ ਭਏ ਸੰਤੋਖੁ ਦੀਆ ਗੁਰਦੇਵ ॥
ਅਮਾਵਸ ਆਤਮ ਸੁਖੀ ਭਏ ਸੰਤੋਖੁ ਦੀਆ ਗੁਰਦੇਵ ॥
पउड़ी ॥
अमावस आतम सुखी भए संतोखु दीआ गुरदेव ॥
अमावस आतम सुखी भए संतोखु दीआ गुरदेव ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) जिस मनुष्य को सतिगुरू ने संतोख बख्शा। उसकी आत्मा सुखी हो गई।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 299 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Vasant-Panchami की सुबह, सरस्वती-pooja, बच्चों का पीला कुर्ता।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 57 पंक्तियों का है, 11 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 299” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 300 →, पीछे का: ← अंग 298।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।