अंग
278
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਨਾ ਰੂਪ ਜਿਉ ਸ੍ਵਾਗੀ ਦਿਖਾਵੈ ॥
ਜਿਉ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਨਚਾਵੈ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥੭॥
ਜਿਉ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਨਚਾਵੈ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥੭॥
नाना रूप जिउ स्वागी दिखावै ॥
जिउ प्रभ भावै तिवै नचावै ॥
जो तिसु भावै सोई होइ ॥
नानक दूजा अवरु न कोइ ॥७॥
जिउ प्रभ भावै तिवै नचावै ॥
जो तिसु भावै सोई होइ ॥
नानक दूजा अवरु न कोइ ॥७॥
हिन्दी अर्थ: बहु-रूपीए की तरह कई तरह के रूप दिखा रहा है। जैसे प्रभू को भाता है तैसे ही (जीवों को) नचाता है। वही होता है जो उस मालिक को ठीक लगता है। हे नानक ! (उस जैसा) कोई और दूसरा नहीं। 7।
ਕਬਹੂ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਇਹੁ ਪਾਵੈ ॥
ਉਸੁ ਅਸਥਾਨ ਤੇ ਬਹੁਰਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਹੋਇ ਗਿਆਨ ਪਰਗਾਸੁ ॥
ਉਸੁ ਅਸਥਾਨ ਕਾ ਨਹੀ ਬਿਨਾਸੁ ॥
ਮਨ ਤਨ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਇਕ ਰੰਗਿ ॥
ਸਦਾ ਬਸਹਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੈ ਸੰਗਿ ॥
ਜਿਉ ਜਲ ਮਹਿ ਜਲੁ ਆਇ ਖਟਾਨਾ ॥
ਤਿਉ ਜੋਤੀ ਸੰਗਿ ਜੋਤਿ ਸਮਾਨਾ ॥
ਮਿਟਿ ਗਏ ਗਵਨ ਪਾਏ ਬਿਸ੍ਰਾਮ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਸਦ ਕੁਰਬਾਨ ॥੮॥੧੧॥
ਉਸੁ ਅਸਥਾਨ ਤੇ ਬਹੁਰਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਹੋਇ ਗਿਆਨ ਪਰਗਾਸੁ ॥
ਉਸੁ ਅਸਥਾਨ ਕਾ ਨਹੀ ਬਿਨਾਸੁ ॥
ਮਨ ਤਨ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਇਕ ਰੰਗਿ ॥
ਸਦਾ ਬਸਹਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੈ ਸੰਗਿ ॥
ਜਿਉ ਜਲ ਮਹਿ ਜਲੁ ਆਇ ਖਟਾਨਾ ॥
ਤਿਉ ਜੋਤੀ ਸੰਗਿ ਜੋਤਿ ਸਮਾਨਾ ॥
ਮਿਟਿ ਗਏ ਗਵਨ ਪਾਏ ਬਿਸ੍ਰਾਮ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਸਦ ਕੁਰਬਾਨ ॥੮॥੧੧॥
कबहू साधसंगति इहु पावै ॥
उसु असथान ते बहुरि न आवै ॥
अंतरि होइ गिआन परगासु ॥
उसु असथान का नही बिनासु ॥
मन तन नामि रते इक रंगि ॥
सदा बसहि पारब्रहम कै संगि ॥
जिउ जल महि जलु आइ खटाना ॥
तिउ जोती संगि जोति समाना ॥
मिटि गए गवन पाए बिस्राम ॥
नानक प्रभ कै सद कुरबान ॥८॥११॥
उसु असथान ते बहुरि न आवै ॥
अंतरि होइ गिआन परगासु ॥
उसु असथान का नही बिनासु ॥
मन तन नामि रते इक रंगि ॥
सदा बसहि पारब्रहम कै संगि ॥
जिउ जल महि जलु आइ खटाना ॥
तिउ जोती संगि जोति समाना ॥
मिटि गए गवन पाए बिस्राम ॥
नानक प्रभ कै सद कुरबान ॥८॥११॥
हिन्दी अर्थ: (जब) कभी (प्रभू की अंश) ये जीव सत्संग में पहुँचता है। तो उस स्थान से वापस नहीं आता। (क्योंकि) इसके अंदर प्रभू के ज्ञान का प्रकाश हो जाता है (और) उस (ज्ञान के प्रकाश वाली) हालत का नाश नहीं होता। (जिन मनुष्यों के) तन मन प्रभू के नाम में और प्यार में रंगे रहते हैं। वे सदा प्रभू की हजूरी में बसते हैं। (सो) जैसे पानी में पानी आ मिलता है वैसे ही (सत्संग में टिके हुए की) आत्मा प्रभू की ज्योति में लीन हो जाती है। उस के (जनम मरन के) फेरे समाप्त हो जाते हैं। (प्रभू-चरणों में) उसे ठिकाना मिल जाता है। हे नानक ! प्रभू से सदके जाएं। 8। 11।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਸੁਖੀ ਬਸੈ ਮਸਕੀਨੀਆ ਆਪੁ ਨਿਵਾਰਿ ਤਲੇ ॥
ਬਡੇ ਬਡੇ ਅਹੰਕਾਰੀਆ ਨਾਨਕ ਗਰਬਿ ਗਲੇ ॥੧॥
ਸੁਖੀ ਬਸੈ ਮਸਕੀਨੀਆ ਆਪੁ ਨਿਵਾਰਿ ਤਲੇ ॥
ਬਡੇ ਬਡੇ ਅਹੰਕਾਰੀਆ ਨਾਨਕ ਗਰਬਿ ਗਲੇ ॥੧॥
सलोकु ॥
सुखी बसै मसकीनीआ आपु निवारि तले ॥
बडे बडे अहंकारीआ नानक गरबि गले ॥१॥
सुखी बसै मसकीनीआ आपु निवारि तले ॥
बडे बडे अहंकारीआ नानक गरबि गले ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ गरीबी स्वभाव वाला आदमी स्वै-भाव दूर करके और विनम्र रहके सुखी रहता है। (पर) बड़े बड़े अहंकारी मनुष्य हे नानक ! अहंकार में गल जाते हैं। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਜਿਸ ਕੈ ਅੰਤਰਿ ਰਾਜ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਸੋ ਨਰਕਪਾਤੀ ਹੋਵਤ ਸੁਆਨੁ ॥
ਜੋ ਜਾਨੈ ਮੈ ਜੋਬਨਵੰਤੁ ॥
ਸੋ ਹੋਵਤ ਬਿਸਟਾ ਕਾ ਜੰਤੁ ॥
ਆਪਸ ਕਉ ਕਰਮਵੰਤੁ ਕਹਾਵੈ ॥
ਜਨਮਿ ਮਰੈ ਬਹੁ ਜੋਨਿ ਭ੍ਰਮਾਵੈ ॥
ਧਨ ਭੂਮਿ ਕਾ ਜੋ ਕਰੈ ਗੁਮਾਨੁ ॥
ਸੋ ਮੂਰਖੁ ਅੰਧਾ ਅਗਿਆਨੁ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਿਸ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਗਰੀਬੀ ਬਸਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਈਹਾ ਮੁਕਤੁ ਆਗੈ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥੧॥
ਜਿਸ ਕੈ ਅੰਤਰਿ ਰਾਜ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਸੋ ਨਰਕਪਾਤੀ ਹੋਵਤ ਸੁਆਨੁ ॥
ਜੋ ਜਾਨੈ ਮੈ ਜੋਬਨਵੰਤੁ ॥
ਸੋ ਹੋਵਤ ਬਿਸਟਾ ਕਾ ਜੰਤੁ ॥
ਆਪਸ ਕਉ ਕਰਮਵੰਤੁ ਕਹਾਵੈ ॥
ਜਨਮਿ ਮਰੈ ਬਹੁ ਜੋਨਿ ਭ੍ਰਮਾਵੈ ॥
ਧਨ ਭੂਮਿ ਕਾ ਜੋ ਕਰੈ ਗੁਮਾਨੁ ॥
ਸੋ ਮੂਰਖੁ ਅੰਧਾ ਅਗਿਆਨੁ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਿਸ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਗਰੀਬੀ ਬਸਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਈਹਾ ਮੁਕਤੁ ਆਗੈ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥੧॥
असटपदी ॥
जिस कै अंतरि राज अभिमानु ॥
सो नरकपाती होवत सुआनु ॥
जो जानै मै जोबनवंतु ॥
सो होवत बिसटा का जंतु ॥
आपस कउ करमवंतु कहावै ॥
जनमि मरै बहु जोनि भ्रमावै ॥
धन भूमि का जो करै गुमानु ॥
सो मूरखु अंधा अगिआनु ॥
करि किरपा जिस कै हिरदै गरीबी बसावै ॥
नानक ईहा मुकतु आगै सुखु पावै ॥१॥
जिस कै अंतरि राज अभिमानु ॥
सो नरकपाती होवत सुआनु ॥
जो जानै मै जोबनवंतु ॥
सो होवत बिसटा का जंतु ॥
आपस कउ करमवंतु कहावै ॥
जनमि मरै बहु जोनि भ्रमावै ॥
धन भूमि का जो करै गुमानु ॥
सो मूरखु अंधा अगिआनु ॥
करि किरपा जिस कै हिरदै गरीबी बसावै ॥
नानक ईहा मुकतु आगै सुखु पावै ॥१॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। जिस मनुष्य के मन में राज का गुमान है। वह कुक्ता नर्क में पड़ने का अधिकारी है। जो मनुष्य अपने आप को बहुत सुंदर समझता है। वह विष्टा का ही कीड़ा होता है (क्योंकि सदा विषौ-विकारों के गंद में पड़ा रहता है)। जो अपने आप को बढ़िया काम करने वाला कहलाता है। वह सदा पैदा होता है मरता है। कई जूनियों में भटकता फिरता है। जो मनुष्य धन और धरती (की मल्कियत) का अहंकार करता है। वह मूर्ख है बड़ा जाहिल है। मेहर करके जिस मनुष्य के दिल में गरीबी का (स्वभाव) डालता है। हे नानक ! (वह मनुष्य) इस जिंदगी में विकारों से बचा रहता है और परलोक में सुख पाता है। 1।
ਧਨਵੰਤਾ ਹੋਇ ਕਰਿ ਗਰਬਾਵੈ ॥
ਤ੍ਰਿਣ ਸਮਾਨਿ ਕਛੁ ਸੰਗਿ ਨ ਜਾਵੈ ॥
ਬਹੁ ਲਸਕਰ ਮਾਨੁਖ ਊਪਰਿ ਕਰੇ ਆਸ ॥
ਪਲ ਭੀਤਰਿ ਤਾ ਕਾ ਹੋਇ ਬਿਨਾਸ ॥
ਸਭ ਤੇ ਆਪ ਜਾਨੈ ਬਲਵੰਤੁ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਹੋਇ ਜਾਇ ਭਸਮੰਤੁ ॥
ਕਿਸੈ ਨ ਬਦੈ ਆਪਿ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
ਧਰਮ ਰਾਇ ਤਿਸੁ ਕਰੇ ਖੁਆਰੀ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਜਾ ਕਾ ਮਿਟੈ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਨਾਨਕ ਦਰਗਹ ਪਰਵਾਨੁ ॥੨॥
ਤ੍ਰਿਣ ਸਮਾਨਿ ਕਛੁ ਸੰਗਿ ਨ ਜਾਵੈ ॥
ਬਹੁ ਲਸਕਰ ਮਾਨੁਖ ਊਪਰਿ ਕਰੇ ਆਸ ॥
ਪਲ ਭੀਤਰਿ ਤਾ ਕਾ ਹੋਇ ਬਿਨਾਸ ॥
ਸਭ ਤੇ ਆਪ ਜਾਨੈ ਬਲਵੰਤੁ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਹੋਇ ਜਾਇ ਭਸਮੰਤੁ ॥
ਕਿਸੈ ਨ ਬਦੈ ਆਪਿ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
ਧਰਮ ਰਾਇ ਤਿਸੁ ਕਰੇ ਖੁਆਰੀ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਜਾ ਕਾ ਮਿਟੈ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਨਾਨਕ ਦਰਗਹ ਪਰਵਾਨੁ ॥੨॥
धनवंता होइ करि गरबावै ॥
त्रिण समानि कछु संगि न जावै ॥
बहु लसकर मानुख ऊपरि करे आस ॥
पल भीतरि ता का होइ बिनास ॥
सभ ते आप जानै बलवंतु ॥
खिन महि होइ जाइ भसमंतु ॥
किसै न बदै आपि अहंकारी ॥
धरम राइ तिसु करे खुआरी ॥
गुर प्रसादि जा का मिटै अभिमानु ॥
सो जनु नानक दरगह परवानु ॥२॥
त्रिण समानि कछु संगि न जावै ॥
बहु लसकर मानुख ऊपरि करे आस ॥
पल भीतरि ता का होइ बिनास ॥
सभ ते आप जानै बलवंतु ॥
खिन महि होइ जाइ भसमंतु ॥
किसै न बदै आपि अहंकारी ॥
धरम राइ तिसु करे खुआरी ॥
गुर प्रसादि जा का मिटै अभिमानु ॥
सो जनु नानक दरगह परवानु ॥२॥
हिन्दी अर्थ: मनुष्य धनवान हो के गुमान करता है। (पर उसके) साथ (अंत समय) कोई तीले जितनी चीज भी नहीं जाती। बहुते लश्करों और मनुष्यों पर आदमी आशाएं लगाए रखता है। (पर) पल में उसका नाश हो जाता है (और उनमें से कोई भी सहायक नहीं होता)। मनुष्य अपने आप को सब से बलशाली समझता है। (पर अंत के समय) एक छिन में (जल के) राख हो जाता है। (जो आदमी) खुद (इतना) अहंकारी हो जाता है कि किसी की भी परवाह नहीं करता। धर्मराज (अंत के समय) उसकी मिट्टी पलीत करता है। सतिगुरू की दया से जिसका अहंकार मिटता है। वह मनुष्य। हे नानक ! प्रभू की दरगाह में कबूल होता है। 2।
ਕੋਟਿ ਕਰਮ ਕਰੈ ਹਉ ਧਾਰੇ ॥
ਸ੍ਰਮੁ ਪਾਵੈ ਸਗਲੇ ਬਿਰਥਾਰੇ ॥
ਅਨਿਕ ਤਪਸਿਆ ਕਰੇ ਅਹੰਕਾਰ ॥
ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਅਵਤਾਰ ॥
ਅਨਿਕ ਜਤਨ ਕਰਿ ਆਤਮ ਨਹੀ ਦ੍ਰਵੈ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਕਹੁ ਕੈਸੇ ਗਵੈ ॥
ਆਪਸ ਕਉ ਜੋ ਭਲਾ ਕਹਾਵੈ ॥
ਤਿਸਹਿ ਭਲਾਈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਸਰਬ ਕੀ ਰੇਨ ਜਾ ਕਾ ਮਨੁ ਹੋਇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੀ ਨਿਰਮਲ ਸੋਇ ॥੩॥
ਸ੍ਰਮੁ ਪਾਵੈ ਸਗਲੇ ਬਿਰਥਾਰੇ ॥
ਅਨਿਕ ਤਪਸਿਆ ਕਰੇ ਅਹੰਕਾਰ ॥
ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਅਵਤਾਰ ॥
ਅਨਿਕ ਜਤਨ ਕਰਿ ਆਤਮ ਨਹੀ ਦ੍ਰਵੈ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਕਹੁ ਕੈਸੇ ਗਵੈ ॥
ਆਪਸ ਕਉ ਜੋ ਭਲਾ ਕਹਾਵੈ ॥
ਤਿਸਹਿ ਭਲਾਈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਸਰਬ ਕੀ ਰੇਨ ਜਾ ਕਾ ਮਨੁ ਹੋਇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੀ ਨਿਰਮਲ ਸੋਇ ॥੩॥
कोटि करम करै हउ धारे ॥
स्रमु पावै सगले बिरथारे ॥
अनिक तपसिआ करे अहंकार ॥
नरक सुरग फिरि फिरि अवतार ॥
अनिक जतन करि आतम नही द्रवै ॥
हरि दरगह कहु कैसे गवै ॥
आपस कउ जो भला कहावै ॥
तिसहि भलाई निकटि न आवै ॥
सरब की रेन जा का मनु होइ ॥
कहु नानक ता की निरमल सोइ ॥३॥
स्रमु पावै सगले बिरथारे ॥
अनिक तपसिआ करे अहंकार ॥
नरक सुरग फिरि फिरि अवतार ॥
अनिक जतन करि आतम नही द्रवै ॥
हरि दरगह कहु कैसे गवै ॥
आपस कउ जो भला कहावै ॥
तिसहि भलाई निकटि न आवै ॥
सरब की रेन जा का मनु होइ ॥
कहु नानक ता की निरमल सोइ ॥३॥
हिन्दी अर्थ: (यदि मनुष्य) करोड़ों (धार्मिक) कर्म करे (और उनका) अहंकार (भी) करे तो वह सारे काम व्यर्थ हैं। (उन कामों का फल उसे केवल) थकावट (ही) मिलती है। अनेको तप और साधन करके अगर इनका मान करे। (तो वह भी) नर्कों-स्वर्गों में ही बारंबार पैदा होता है (भाव। कभी सुख और कभी दुख भोगता है)। अनेकों यत्न करने से अगर हृदय नरम नहीं होता तो बताओ। वह मनुष्य प्रभू की दरगाह में कैसे पहुँच सकता है? जो मनुष्य अपने आप को नेक कहलाता है। नेकी उसके नजदीक भी नहीं फटकती। जिस मनुष्य का मन सबके चरणों की धूड़ हो जाता है। कह हे नानक ! उस मनुष्य की सुंदर शोभा फैलती है। 3।
ਜਬ ਲਗੁ ਜਾਨੈ ਮੁਝ ਤੇ ਕਛੁ ਹੋਇ ॥
ਤਬ ਇਸ ਕਉ ਸੁਖੁ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
ਜਬ ਇਹ ਜਾਨੈ ਮੈ ਕਿਛੁ ਕਰਤਾ ॥
ਤਬ ਲਗੁ ਗਰਭ ਜੋਨਿ ਮਹਿ ਫਿਰਤਾ ॥
ਜਬ ਧਾਰੈ ਕੋਊ ਬੈਰੀ ਮੀਤੁ ॥
ਤਬ ਲਗੁ ਨਿਹਚਲੁ ਨਾਹੀ ਚੀਤੁ ॥
ਜਬ ਲਗੁ ਮੋਹ ਮਗਨ ਸੰਗਿ ਮਾਇ ॥
ਤਬ ਲਗੁ ਧਰਮ ਰਾਇ ਦੇਇ ਸਜਾਇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਬੰਧਨ ਤੂਟੈ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਹਉ ਛੂਟੈ ॥੪॥
ਤਬ ਇਸ ਕਉ ਸੁਖੁ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
ਜਬ ਇਹ ਜਾਨੈ ਮੈ ਕਿਛੁ ਕਰਤਾ ॥
ਤਬ ਲਗੁ ਗਰਭ ਜੋਨਿ ਮਹਿ ਫਿਰਤਾ ॥
ਜਬ ਧਾਰੈ ਕੋਊ ਬੈਰੀ ਮੀਤੁ ॥
ਤਬ ਲਗੁ ਨਿਹਚਲੁ ਨਾਹੀ ਚੀਤੁ ॥
ਜਬ ਲਗੁ ਮੋਹ ਮਗਨ ਸੰਗਿ ਮਾਇ ॥
ਤਬ ਲਗੁ ਧਰਮ ਰਾਇ ਦੇਇ ਸਜਾਇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਬੰਧਨ ਤੂਟੈ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਹਉ ਛੂਟੈ ॥੪॥
जब लगु जानै मुझ ते कछु होइ ॥
तब इस कउ सुखु नाही कोइ ॥
जब इह जानै मै किछु करता ॥
तब लगु गरभ जोनि महि फिरता ॥
जब धारै कोऊ बैरी मीतु ॥
तब लगु निहचलु नाही चीतु ॥
जब लगु मोह मगन संगि माइ ॥
तब लगु धरम राइ देइ सजाइ ॥
प्रभ किरपा ते बंधन तूटै ॥
गुर प्रसादि नानक हउ छूटै ॥४॥
तब इस कउ सुखु नाही कोइ ॥
जब इह जानै मै किछु करता ॥
तब लगु गरभ जोनि महि फिरता ॥
जब धारै कोऊ बैरी मीतु ॥
तब लगु निहचलु नाही चीतु ॥
जब लगु मोह मगन संगि माइ ॥
तब लगु धरम राइ देइ सजाइ ॥
प्रभ किरपा ते बंधन तूटै ॥
गुर प्रसादि नानक हउ छूटै ॥४॥
हिन्दी अर्थ: मनुष्य जब तक ये समझता है कि मुझसे कुछ हो सकता है। तब तक इसे कोई सुख नहीं होता। जब तक ये समझता है कि मैं (अपने बल से) कुछ करता हूँ। तब तक (अलग-पन के अहंकार के कारण) जूनियों में पड़ा रहता है। जब तक मनुष्य किसी को वैरी और किसी को मित्र समझता है। तब तक इसका मन ठिकाने नहीं आता। जब तक आदमी माया के मोह में गरक रहता है। तब तक इसे धर्मराज दण्ड देता है। (माया के) बंधन प्रभू की मेहर से टूटते हैं। हे नानक ! मनुष्य का अहंकार गुरू की कृपा से खत्म होता है। 4।
ਸਹਸ ਖਟੇ ਲਖ ਕਉ ਉਠਿ ਧਾਵੈ ॥
सहस खटे लख कउ उठि धावै ॥
हिन्दी अर्थ: (मनुष्य) हजारों (रुपए) कमाता है तो लाखों (रुपयों) की खतिर उठ के दौड़ता है;
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 278 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Sangam Vihar में सुबह 4 बजे जब रसोई शुरू होती है।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 59 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 278” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 279 →, पीछे का: ← अंग 277।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।