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अंग 216

अंग
216
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भरम मोह कछु सूझसि नाही इह पैखर पए पैरा ॥2॥
तब इहु कहा कमावन परिआ जब इहु कछू न होता ॥
जब एक निरंजन निरंकार प्रभ सभु किछु आपहि करता ॥3॥
अपने करतब आपे जानै जिनि इहु रचनु रचाइआ ॥
कहु नानक करणहारु है आपे सतिगुरि भरमु चुकाइआ ॥4॥5॥163॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! माया की खातिर) भटकना के कारण (माया के) मोह के कारण (जीव को) कोई अच्छी बात नहीं सूझती। इसके पैरों में माया के मोह की बाधाएं, जंजीरें पड़ी हुई हैं (जैसे गधे आदि को बढ़िया ढंगा, बाधा डाली जाती है) (हे भाई ! गुरू के बिना और कौन बताए? कि) जब (जगत-रचना से पहले) इस जीव की कोई हस्ती नहीं थी, जब केवल एक निरंजन आकार-रहित प्रभू खुद ही खुद था, जब प्रभू स्वयं ही सब कुछ करने वाला था, तब ये जीव क्या कमाने के काबिल था? (और, अब ये गुमान करता है कि मैं धन का मालिक हूँ, मैं धरती का मालिक हूँ)। 3। जिस परमात्मा ने ये जगत रचना रची है वही स्वयं अपने किए कामों को जानता है और हे नानक ! कह,गुरू ने ही (ये तन, धन, धरती आदि की मल्कियतों का) भुलेखा दूर किया है और समझाया है कि वही सब कुछ करने की स्मर्था रखता है (अज्ञानी जीव व्यर्थ ही मल्कियतों का अहंकार करता है और भटकता फिरता है)। 4। 4। 163।
गउड़ी माला महला 5 ॥
हरि बिनु अवर क्रिआ बिरथे ॥
जप तप संजम करम कमाणे इहि ओरै मूसे ॥1॥ रहाउ ॥
बरत नेम संजम महि रहता तिन का आढु न पाइआ ॥
आगै चलणु अउरु है भाई ऊंहा कामि न आइआ ॥1॥
तीरथि नाइ अरु धरनी भ्रमता आगै ठउर न पावै ॥
ऊहा कामि न आवै इह बिधि ओहु लोगन ही पतीआवै ॥2॥
चतुर बेद मुख बचनी उचरै आगै महलु न पाईऐ ॥
बूझै नाही एकु सुधाखरु ओहु सगली झाख झखाईऐ ॥3॥
नानकु कहतो इहु बीचारा जि कमावै सु पार गरामी ॥
गुरु सेवहु अरु नामु धिआवहु तिआगहु मनहु गुमानी ॥4॥6॥164॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा के सिमरन के बिना और सारे (निहित धार्मिक) काम व्यार्थ हैं। (देवतों को प्रसन्न करने वाले) जप करने, तप साधने, इन्द्रियों को विकारों से रोकने के लिए हठ योग के साधन करने- ये सारे (प्रभू की दरगाह से) पहले ही छीन लिए जाते हैं। 1। मनुष्य वर्तों संजमों के नियमों में ही व्यस्त रहता है, पर उन उद्यमों का मूल्य उसे एक कौड़ी भी नहीं मिलता। हे भाई ! जीव के साथ परलोक में साथ निभाने वाला पदार्थ और है (वर्त नेम संजम आदिक में से कोई भी) परलोक में काम नहीं आता। 1। जो मनुष्य तीर्थों पर स्नान करता है और (त्यागी बन के) धरती पर रटन करता फिरता है (वह भी) प्रभू की दरगाह में जगह नहीं ढूँढ सकता। ऐसा कोई तरीका प्रभू की हजूरी में काम नहीं आता। वह (त्यागी इन तरीकों से) सिर्फ लोगों को ही (अपने धर्मी होने का) निश्चय दिलाता है। 2। (हे भाई ! अगर पण्डित) चारों वेद जुबानी उचार सकता है (तो इस तरह भी) प्रभू की हजूरी में ठिकाना नहीं मिलता। जो मनुष्य परमात्मा का पवित्र नाम (सिमरना) नहीं समझता वह (और और उद्यमों के साथ) निरी ख्वारी ही बर्दाश्त करता है। 3। (हे भाई !) नानक ये एक विचार की बात कहता है, जो मनुष्य इसे इस्तेमाल में ले आता है वह संसार समुंद्र से पार लांघने के लायक हो जाता है (वह विचार ये है – हे भाई !) गुरु की शरण पड़। अपने मन में से अहंकार दूर कर, और परमात्मा का नाम सिमर। 4। 6। 164।
गउड़ी माला 5 ॥
माधउ हरि हरि हरि मुखि कहीऐ ॥
हम ते कछू न होवै सुआमी जिउ राखहु तिउ रहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
किआ किछु करै कि करणैहारा किआ इसु हाथि बिचारे ॥
जितु तुम लावहु तित ही लागा पूरन खसम हमारे ॥1॥
करहु क्रिपा सरब के दाते एक रूप लिव लावहु ॥
नानक की बेनंती हरि पहि अपुना नामु जपावहु ॥2॥7॥165॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला 5 ॥ हे माया के पति प्रभू ! हे हरी ! (मेहर कर, ताकि हम) आपका नाम मुंह से उचार सकें। (हे स्वामी प्रभू !) हम जीवों से कुछ नहीं हो सकता। जिस तरह आप हमें रखता है, उसी तरह हम रहते हैं। 1। रहाउ। ये जीव क्या करें? ये हैं क्या करने के काबिल? इन बिचारों के हाथ में है क्या? (ये जीव अपने आप कुछ नहीं करता, कुछ नहीं कर सकता, इसके हाथ में कोई ताकत नहीं)। हे मेरे सर्व-व्यापक खसम प्रभू ! जिस तरफ आप इसे लगाता है, उसी तरफ ये लगा फिरता है। 1। हे सारे जीवों को दातें देने वाले प्रभू ! मेहर कर, मुझे सिर्फ अपने ही स्वरूप की लगन बख्श। मैं नानक की परमात्मा के पास (यही) विनती है (-हे प्रभू !) मुझसे अपना नाम जपा। 2। 7। 165।
रागु गउड़ी माझ महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दीन दइआल दमोदर राइआ जीउ ॥
कोटि जना करि सेव लगाइआ जीउ ॥
भगत वछलु तेरा बिरदु रखाइआ जीउ ॥
पूरन सभनी जाई जीउ ॥1॥
किउ पेखा प्रीतमु कवण सुकरणी जीउ ॥
संता दासी सेवा चरणी जीउ ॥
इहु जीउ वताई बलि बलि जाई जीउ ॥
तिसु निवि निवि लागउ पाई जीउ ॥2॥
पोथी पंडित बेद खोजंता जीउ ॥
होइ बैरागी तीरथि नावंता जीउ ॥
गीत नाद कीरतनु गावंता जीउ ॥
हरि निरभउ नामु धिआई जीउ ॥3॥
भए क्रिपाल सुआमी मेरे जीउ ॥
पतित पवित लगि गुर के पैरे जीउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी माझ महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे गरीबों पर तरस करने वाले प्रभू पातशाह जी ! तूने करोड़ों लोगों को अपने सेवक बना के अपनी सेवा-भक्ति में लगाया हुआ है। भगतों का प्यारा होना- ये आपका मूल स्वभाव बना । हे प्रभू ! आप सब जगहों पर मौजूद है। 1। (हे भाई !) मैं कैसे उस प्रभू प्रीतम का दर्शन करूँ? वह कौन सी श्रेष्ठ करनी है (जिससे मैं उसे देखूँ) ? (जहां भी पूछूँ यही उक्तर मिलता है कि) मैं संत जनों की दासी बनूँ ओर उनके चरणों की सेवा करूँ। मैं अपनी ये जिंद उस प्रभू पातशाह पर से सदके करूँ, और, उस पर से कुर्बान हो जाऊँ। झुक झुक के मैं सदा उसके पैर लगती रहूँ। 2। (हे भाई !) कोई पण्डित (बन के) वेद आदिक धर्म-पुस्तकें खोजता रहता है, कोई (दुनिया से) वैरागवान हो के (हरेक) तीर्थ पर स्नान करता फिरता है, कोई गीत गाता है, नाद बजाता है, कीर्तन करता है, पर मैं परमात्मा का वह नाम जपता रहता हूँ जो (मेरे अंदर) निर्भयता पैदा करता है। 3। (हे भाई !) जिन मनुष्यों पे मेरे स्वामी प्रभू जी दयावान होते हैं, वे मनुष्य गुरू के चरणों में लग के (पहले विकारों में) गिरे हुए (होने के बावजूद भी) स्वच्छ आचरण वाले बन जाते हैं।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! माया की खातिर) भटकना के कारण (माया के) मोह के कारण (जीव को) कोई अच्छी बात नहीं सूझती।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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