तब इहु कहा कमावन परिआ जब इहु कछू न होता ॥
जब एक निरंजन निरंकार प्रभ सभु किछु आपहि करता ॥3॥
अपने करतब आपे जानै जिनि इहु रचनु रचाइआ ॥
कहु नानक करणहारु है आपे सतिगुरि भरमु चुकाइआ ॥4॥5॥163॥
हरि बिनु अवर क्रिआ बिरथे ॥
जप तप संजम करम कमाणे इहि ओरै मूसे ॥1॥ रहाउ ॥
बरत नेम संजम महि रहता तिन का आढु न पाइआ ॥
आगै चलणु अउरु है भाई ऊंहा कामि न आइआ ॥1॥
तीरथि नाइ अरु धरनी भ्रमता आगै ठउर न पावै ॥
ऊहा कामि न आवै इह बिधि ओहु लोगन ही पतीआवै ॥2॥
चतुर बेद मुख बचनी उचरै आगै महलु न पाईऐ ॥
बूझै नाही एकु सुधाखरु ओहु सगली झाख झखाईऐ ॥3॥
नानकु कहतो इहु बीचारा जि कमावै सु पार गरामी ॥
गुरु सेवहु अरु नामु धिआवहु तिआगहु मनहु गुमानी ॥4॥6॥164॥
माधउ हरि हरि हरि मुखि कहीऐ ॥
हम ते कछू न होवै सुआमी जिउ राखहु तिउ रहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
किआ किछु करै कि करणैहारा किआ इसु हाथि बिचारे ॥
जितु तुम लावहु तित ही लागा पूरन खसम हमारे ॥1॥
करहु क्रिपा सरब के दाते एक रूप लिव लावहु ॥
नानक की बेनंती हरि पहि अपुना नामु जपावहु ॥2॥7॥165॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दीन दइआल दमोदर राइआ जीउ ॥
कोटि जना करि सेव लगाइआ जीउ ॥
भगत वछलु तेरा बिरदु रखाइआ जीउ ॥
पूरन सभनी जाई जीउ ॥1॥
किउ पेखा प्रीतमु कवण सुकरणी जीउ ॥
संता दासी सेवा चरणी जीउ ॥
इहु जीउ वताई बलि बलि जाई जीउ ॥
तिसु निवि निवि लागउ पाई जीउ ॥2॥
पोथी पंडित बेद खोजंता जीउ ॥
होइ बैरागी तीरथि नावंता जीउ ॥
गीत नाद कीरतनु गावंता जीउ ॥
हरि निरभउ नामु धिआई जीउ ॥3॥
भए क्रिपाल सुआमी मेरे जीउ ॥
पतित पवित लगि गुर के पैरे जीउ ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! माया की खातिर) भटकना के कारण (माया के) मोह के कारण (जीव को) कोई अच्छी बात नहीं सूझती।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।