अंग
216
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਭਰਮ ਮੋਹ ਕਛੁ ਸੂਝਸਿ ਨਾਹੀ ਇਹ ਪੈਖਰ ਪਏ ਪੈਰਾ ॥੨॥
ਤਬ ਇਹੁ ਕਹਾ ਕਮਾਵਨ ਪਰਿਆ ਜਬ ਇਹੁ ਕਛੂ ਨ ਹੋਤਾ ॥
ਜਬ ਏਕ ਨਿਰੰਜਨ ਨਿਰੰਕਾਰ ਪ੍ਰਭ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਆਪਹਿ ਕਰਤਾ ॥੩॥
ਅਪਨੇ ਕਰਤਬ ਆਪੇ ਜਾਨੈ ਜਿਨਿ ਇਹੁ ਰਚਨੁ ਰਚਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕਰਣਹਾਰੁ ਹੈ ਆਪੇ ਸਤਿਗੁਰਿ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥੪॥੫॥੧੬੩॥
ਤਬ ਇਹੁ ਕਹਾ ਕਮਾਵਨ ਪਰਿਆ ਜਬ ਇਹੁ ਕਛੂ ਨ ਹੋਤਾ ॥
ਜਬ ਏਕ ਨਿਰੰਜਨ ਨਿਰੰਕਾਰ ਪ੍ਰਭ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਆਪਹਿ ਕਰਤਾ ॥੩॥
ਅਪਨੇ ਕਰਤਬ ਆਪੇ ਜਾਨੈ ਜਿਨਿ ਇਹੁ ਰਚਨੁ ਰਚਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕਰਣਹਾਰੁ ਹੈ ਆਪੇ ਸਤਿਗੁਰਿ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥੪॥੫॥੧੬੩॥
भरम मोह कछु सूझसि नाही इह पैखर पए पैरा ॥२॥
तब इहु कहा कमावन परिआ जब इहु कछू न होता ॥
जब एक निरंजन निरंकार प्रभ सभु किछु आपहि करता ॥३॥
अपने करतब आपे जानै जिनि इहु रचनु रचाइआ ॥
कहु नानक करणहारु है आपे सतिगुरि भरमु चुकाइआ ॥४॥५॥१६३॥
तब इहु कहा कमावन परिआ जब इहु कछू न होता ॥
जब एक निरंजन निरंकार प्रभ सभु किछु आपहि करता ॥३॥
अपने करतब आपे जानै जिनि इहु रचनु रचाइआ ॥
कहु नानक करणहारु है आपे सतिगुरि भरमु चुकाइआ ॥४॥५॥१६३॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! माया की खातिर) भटकना के कारण (माया के) मोह के कारण (जीव को) कोई अच्छी बात नहीं सूझती। इसके पैरों में माया के मोह की बाधाएं~ जंजीरें पड़ी हुई हैं (जैसे गधे आदि को बढ़िया ढंगा~ बाधा डाली जाती है) (हे भाई ! गुरू के बिना और कौन बताए? कि) जब (जगत-रचना से पहले) इस जीव की कोई हस्ती नहीं थी~ जब केवल एक निरंजन आकार-रहित प्रभू खुद ही खुद था~ जब प्रभू स्वयं ही सब कुछ करने वाला था~ तब ये जीव क्या कमाने के काबिल था? (और~ अब ये गुमान करता है कि मैं धन का मालिक हूँ~ मैं धरती का मालिक हूँ)। 3। जिस परमात्मा ने ये जगत रचना रची है वही स्वयं अपने किए कामों को जानता है और हे नानक ! कह,गुरू ने ही (ये तन~ धन~ धरती आदि की मल्कियतों का) भुलेखा दूर किया है और समझाया है कि वही सब कुछ करने की स्मर्था रखता है (अज्ञानी जीव व्यर्थ ही मल्कियतों का अहंकार करता है और भटकता फिरता है)। 4। 4। 163।
ਗਉੜੀ ਮਾਲਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਅਵਰ ਕ੍ਰਿਆ ਬਿਰਥੇ ॥
ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮ ਕਰਮ ਕਮਾਣੇ ਇਹਿ ਓਰੈ ਮੂਸੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਰਤ ਨੇਮ ਸੰਜਮ ਮਹਿ ਰਹਤਾ ਤਿਨ ਕਾ ਆਢੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥
ਆਗੈ ਚਲਣੁ ਅਉਰੁ ਹੈ ਭਾਈ ਊਂਹਾ ਕਾਮਿ ਨ ਆਇਆ ॥੧॥
ਤੀਰਥਿ ਨਾਇ ਅਰੁ ਧਰਨੀ ਭ੍ਰਮਤਾ ਆਗੈ ਠਉਰ ਨ ਪਾਵੈ ॥
ਊਹਾ ਕਾਮਿ ਨ ਆਵੈ ਇਹ ਬਿਧਿ ਓਹੁ ਲੋਗਨ ਹੀ ਪਤੀਆਵੈ ॥੨॥
ਚਤੁਰ ਬੇਦ ਮੁਖ ਬਚਨੀ ਉਚਰੈ ਆਗੈ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਈਐ ॥
ਬੂਝੈ ਨਾਹੀ ਏਕੁ ਸੁਧਾਖਰੁ ਓਹੁ ਸਗਲੀ ਝਾਖ ਝਖਾਈਐ ॥੩॥
ਨਾਨਕੁ ਕਹਤੋ ਇਹੁ ਬੀਚਾਰਾ ਜਿ ਕਮਾਵੈ ਸੁ ਪਾਰ ਗਰਾਮੀ ॥
ਗੁਰੁ ਸੇਵਹੁ ਅਰੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹੁ ਤਿਆਗਹੁ ਮਨਹੁ ਗੁਮਾਨੀ ॥੪॥੬॥੧੬੪॥
ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਅਵਰ ਕ੍ਰਿਆ ਬਿਰਥੇ ॥
ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮ ਕਰਮ ਕਮਾਣੇ ਇਹਿ ਓਰੈ ਮੂਸੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਰਤ ਨੇਮ ਸੰਜਮ ਮਹਿ ਰਹਤਾ ਤਿਨ ਕਾ ਆਢੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥
ਆਗੈ ਚਲਣੁ ਅਉਰੁ ਹੈ ਭਾਈ ਊਂਹਾ ਕਾਮਿ ਨ ਆਇਆ ॥੧॥
ਤੀਰਥਿ ਨਾਇ ਅਰੁ ਧਰਨੀ ਭ੍ਰਮਤਾ ਆਗੈ ਠਉਰ ਨ ਪਾਵੈ ॥
ਊਹਾ ਕਾਮਿ ਨ ਆਵੈ ਇਹ ਬਿਧਿ ਓਹੁ ਲੋਗਨ ਹੀ ਪਤੀਆਵੈ ॥੨॥
ਚਤੁਰ ਬੇਦ ਮੁਖ ਬਚਨੀ ਉਚਰੈ ਆਗੈ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਈਐ ॥
ਬੂਝੈ ਨਾਹੀ ਏਕੁ ਸੁਧਾਖਰੁ ਓਹੁ ਸਗਲੀ ਝਾਖ ਝਖਾਈਐ ॥੩॥
ਨਾਨਕੁ ਕਹਤੋ ਇਹੁ ਬੀਚਾਰਾ ਜਿ ਕਮਾਵੈ ਸੁ ਪਾਰ ਗਰਾਮੀ ॥
ਗੁਰੁ ਸੇਵਹੁ ਅਰੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹੁ ਤਿਆਗਹੁ ਮਨਹੁ ਗੁਮਾਨੀ ॥੪॥੬॥੧੬੪॥
गउड़ी माला महला ५ ॥
हरि बिनु अवर क्रिआ बिरथे ॥
जप तप संजम करम कमाणे इहि ओरै मूसे ॥१॥ रहाउ ॥
बरत नेम संजम महि रहता तिन का आढु न पाइआ ॥
आगै चलणु अउरु है भाई ऊंहा कामि न आइआ ॥१॥
तीरथि नाइ अरु धरनी भ्रमता आगै ठउर न पावै ॥
ऊहा कामि न आवै इह बिधि ओहु लोगन ही पतीआवै ॥२॥
चतुर बेद मुख बचनी उचरै आगै महलु न पाईऐ ॥
बूझै नाही एकु सुधाखरु ओहु सगली झाख झखाईऐ ॥३॥
नानकु कहतो इहु बीचारा जि कमावै सु पार गरामी ॥
गुरु सेवहु अरु नामु धिआवहु तिआगहु मनहु गुमानी ॥४॥६॥१६४॥
हरि बिनु अवर क्रिआ बिरथे ॥
जप तप संजम करम कमाणे इहि ओरै मूसे ॥१॥ रहाउ ॥
बरत नेम संजम महि रहता तिन का आढु न पाइआ ॥
आगै चलणु अउरु है भाई ऊंहा कामि न आइआ ॥१॥
तीरथि नाइ अरु धरनी भ्रमता आगै ठउर न पावै ॥
ऊहा कामि न आवै इह बिधि ओहु लोगन ही पतीआवै ॥२॥
चतुर बेद मुख बचनी उचरै आगै महलु न पाईऐ ॥
बूझै नाही एकु सुधाखरु ओहु सगली झाख झखाईऐ ॥३॥
नानकु कहतो इहु बीचारा जि कमावै सु पार गरामी ॥
गुरु सेवहु अरु नामु धिआवहु तिआगहु मनहु गुमानी ॥४॥६॥१६४॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला ५ ॥ (हे भाई !) परमात्मा के सिमरन के बिना और सारे (निहित धार्मिक) काम व्यार्थ हैं। (देवतों को प्रसन्न करने वाले) जप करने~ तप साधने~ इन्द्रियों को विकारों से रोकने के लिए हठ योग के साधन करने- ये सारे (प्रभू की दरगाह से) पहले ही छीन लिए जाते हैं। 1। मनुष्य वर्तों संजमों के नियमों में ही व्यस्त रहता है~ पर उन उद्यमों का मूल्य उसे एक कौड़ी भी नहीं मिलता। हे भाई ! जीव के साथ परलोक में साथ निभाने वाला पदार्थ और है (वर्त नेम संजम आदिक में से कोई भी) परलोक में काम नहीं आता। 1। जो मनुष्य तीर्थों पर स्नान करता है और (त्यागी बन के) धरती पर रटन करता फिरता है (वह भी) प्रभू की दरगाह में जगह नहीं ढूँढ सकता। ऐसा कोई तरीका प्रभू की हजूरी में काम नहीं आता। वह (त्यागी इन तरीकों से) सिर्फ लोगों को ही (अपने धर्मी होने का) निश्चय दिलाता है। 2। (हे भाई ! अगर पण्डित) चारों वेद जुबानी उचार सकता है (तो इस तरह भी) प्रभू की हजूरी में ठिकाना नहीं मिलता। जो मनुष्य परमात्मा का पवित्र नाम (सिमरना) नहीं समझता वह (और और उद्यमों के साथ) निरी ख्वारी ही बर्दाश्त करता है। 3। (हे भाई !) नानक ये एक विचार की बात कहता है~ जो मनुष्य इसे इस्तेमाल में ले आता है वह संसार समुंद्र से पार लांघने के लायक हो जाता है (वह विचार ये है – हे भाई !) गुरु की शरण पड़। अपने मन में से अहंकार दूर कर~ और परमात्मा का नाम सिमर। 4। 6। 164।
ਗਉੜੀ ਮਾਲਾ ੫ ॥
ਮਾਧਉ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮੁਖਿ ਕਹੀਐ ॥
ਹਮ ਤੇ ਕਛੂ ਨ ਹੋਵੈ ਸੁਆਮੀ ਜਿਉ ਰਾਖਹੁ ਤਿਉ ਰਹੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਿਆ ਕਿਛੁ ਕਰੈ ਕਿ ਕਰਣੈਹਾਰਾ ਕਿਆ ਇਸੁ ਹਾਥਿ ਬਿਚਾਰੇ ॥
ਜਿਤੁ ਤੁਮ ਲਾਵਹੁ ਤਿਤ ਹੀ ਲਾਗਾ ਪੂਰਨ ਖਸਮ ਹਮਾਰੇ ॥੧॥
ਕਰਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਸਰਬ ਕੇ ਦਾਤੇ ਏਕ ਰੂਪ ਲਿਵ ਲਾਵਹੁ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਬੇਨੰਤੀ ਹਰਿ ਪਹਿ ਅਪੁਨਾ ਨਾਮੁ ਜਪਾਵਹੁ ॥੨॥੭॥੧੬੫॥
ਮਾਧਉ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮੁਖਿ ਕਹੀਐ ॥
ਹਮ ਤੇ ਕਛੂ ਨ ਹੋਵੈ ਸੁਆਮੀ ਜਿਉ ਰਾਖਹੁ ਤਿਉ ਰਹੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਿਆ ਕਿਛੁ ਕਰੈ ਕਿ ਕਰਣੈਹਾਰਾ ਕਿਆ ਇਸੁ ਹਾਥਿ ਬਿਚਾਰੇ ॥
ਜਿਤੁ ਤੁਮ ਲਾਵਹੁ ਤਿਤ ਹੀ ਲਾਗਾ ਪੂਰਨ ਖਸਮ ਹਮਾਰੇ ॥੧॥
ਕਰਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਸਰਬ ਕੇ ਦਾਤੇ ਏਕ ਰੂਪ ਲਿਵ ਲਾਵਹੁ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਬੇਨੰਤੀ ਹਰਿ ਪਹਿ ਅਪੁਨਾ ਨਾਮੁ ਜਪਾਵਹੁ ॥੨॥੭॥੧੬੫॥
गउड़ी माला ५ ॥
माधउ हरि हरि हरि मुखि कहीऐ ॥
हम ते कछू न होवै सुआमी जिउ राखहु तिउ रहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
किआ किछु करै कि करणैहारा किआ इसु हाथि बिचारे ॥
जितु तुम लावहु तित ही लागा पूरन खसम हमारे ॥१॥
करहु क्रिपा सरब के दाते एक रूप लिव लावहु ॥
नानक की बेनंती हरि पहि अपुना नामु जपावहु ॥२॥७॥१६५॥
माधउ हरि हरि हरि मुखि कहीऐ ॥
हम ते कछू न होवै सुआमी जिउ राखहु तिउ रहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
किआ किछु करै कि करणैहारा किआ इसु हाथि बिचारे ॥
जितु तुम लावहु तित ही लागा पूरन खसम हमारे ॥१॥
करहु क्रिपा सरब के दाते एक रूप लिव लावहु ॥
नानक की बेनंती हरि पहि अपुना नामु जपावहु ॥२॥७॥१६५॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला ५ ॥ हे माया के पति प्रभू ! हे हरी ! (मेहर कर~ ताकि हम) तेरा नाम मुंह से उचार सकें। (हे स्वामी प्रभू !) हम जीवों से कुछ नहीं हो सकता। जिस तरह तू हमें रखता है~ उसी तरह हम रहते हैं। 1। रहाउ। ये जीव क्या करें? ये हैं क्या करने के काबिल? इन बिचारों के हाथ में है क्या? (ये जीव अपने आप कुछ नहीं करता~ कुछ नहीं कर सकता~ इसके हाथ में कोई ताकत नहीं)। हे मेरे सर्व-व्यापक खसम प्रभू ! जिस तरफ तू इसे लगाता है~ उसी तरफ ये लगा फिरता है। 1। हे सारे जीवों को दातें देने वाले प्रभू ! मेहर कर~ मुझे सिर्फ अपने ही स्वरूप की लगन बख्श। मैं नानक की परमात्मा के पास (यही) विनती है (-हे प्रभू !) मुझसे अपना नाम जपा। 2। 7। 165।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਦਮੋਦਰ ਰਾਇਆ ਜੀਉ ॥
ਕੋਟਿ ਜਨਾ ਕਰਿ ਸੇਵ ਲਗਾਇਆ ਜੀਉ ॥
ਭਗਤ ਵਛਲੁ ਤੇਰਾ ਬਿਰਦੁ ਰਖਾਇਆ ਜੀਉ ॥
ਪੂਰਨ ਸਭਨੀ ਜਾਈ ਜੀਉ ॥੧॥
ਕਿਉ ਪੇਖਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਕਵਣ ਸੁਕਰਣੀ ਜੀਉ ॥
ਸੰਤਾ ਦਾਸੀ ਸੇਵਾ ਚਰਣੀ ਜੀਉ ॥
ਇਹੁ ਜੀਉ ਵਤਾਈ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਈ ਜੀਉ ॥
ਤਿਸੁ ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਲਾਗਉ ਪਾਈ ਜੀਉ ॥੨॥
ਪੋਥੀ ਪੰਡਿਤ ਬੇਦ ਖੋਜੰਤਾ ਜੀਉ ॥
ਹੋਇ ਬੈਰਾਗੀ ਤੀਰਥਿ ਨਾਵੰਤਾ ਜੀਉ ॥
ਗੀਤ ਨਾਦ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਵੰਤਾ ਜੀਉ ॥
ਹਰਿ ਨਿਰਭਉ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ਜੀਉ ॥੩॥
ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰੇ ਜੀਉ ॥
ਪਤਿਤ ਪਵਿਤ ਲਗਿ ਗੁਰ ਕੇ ਪੈਰੇ ਜੀਉ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਦਮੋਦਰ ਰਾਇਆ ਜੀਉ ॥
ਕੋਟਿ ਜਨਾ ਕਰਿ ਸੇਵ ਲਗਾਇਆ ਜੀਉ ॥
ਭਗਤ ਵਛਲੁ ਤੇਰਾ ਬਿਰਦੁ ਰਖਾਇਆ ਜੀਉ ॥
ਪੂਰਨ ਸਭਨੀ ਜਾਈ ਜੀਉ ॥੧॥
ਕਿਉ ਪੇਖਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਕਵਣ ਸੁਕਰਣੀ ਜੀਉ ॥
ਸੰਤਾ ਦਾਸੀ ਸੇਵਾ ਚਰਣੀ ਜੀਉ ॥
ਇਹੁ ਜੀਉ ਵਤਾਈ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਈ ਜੀਉ ॥
ਤਿਸੁ ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਲਾਗਉ ਪਾਈ ਜੀਉ ॥੨॥
ਪੋਥੀ ਪੰਡਿਤ ਬੇਦ ਖੋਜੰਤਾ ਜੀਉ ॥
ਹੋਇ ਬੈਰਾਗੀ ਤੀਰਥਿ ਨਾਵੰਤਾ ਜੀਉ ॥
ਗੀਤ ਨਾਦ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਵੰਤਾ ਜੀਉ ॥
ਹਰਿ ਨਿਰਭਉ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ਜੀਉ ॥੩॥
ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰੇ ਜੀਉ ॥
ਪਤਿਤ ਪਵਿਤ ਲਗਿ ਗੁਰ ਕੇ ਪੈਰੇ ਜੀਉ ॥
रागु गउड़ी माझ महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दीन दइआल दमोदर राइआ जीउ ॥
कोटि जना करि सेव लगाइआ जीउ ॥
भगत वछलु तेरा बिरदु रखाइआ जीउ ॥
पूरन सभनी जाई जीउ ॥१॥
किउ पेखा प्रीतमु कवण सुकरणी जीउ ॥
संता दासी सेवा चरणी जीउ ॥
इहु जीउ वताई बलि बलि जाई जीउ ॥
तिसु निवि निवि लागउ पाई जीउ ॥२॥
पोथी पंडित बेद खोजंता जीउ ॥
होइ बैरागी तीरथि नावंता जीउ ॥
गीत नाद कीरतनु गावंता जीउ ॥
हरि निरभउ नामु धिआई जीउ ॥३॥
भए क्रिपाल सुआमी मेरे जीउ ॥
पतित पवित लगि गुर के पैरे जीउ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दीन दइआल दमोदर राइआ जीउ ॥
कोटि जना करि सेव लगाइआ जीउ ॥
भगत वछलु तेरा बिरदु रखाइआ जीउ ॥
पूरन सभनी जाई जीउ ॥१॥
किउ पेखा प्रीतमु कवण सुकरणी जीउ ॥
संता दासी सेवा चरणी जीउ ॥
इहु जीउ वताई बलि बलि जाई जीउ ॥
तिसु निवि निवि लागउ पाई जीउ ॥२॥
पोथी पंडित बेद खोजंता जीउ ॥
होइ बैरागी तीरथि नावंता जीउ ॥
गीत नाद कीरतनु गावंता जीउ ॥
हरि निरभउ नामु धिआई जीउ ॥३॥
भए क्रिपाल सुआमी मेरे जीउ ॥
पतित पवित लगि गुर के पैरे जीउ ॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी माझ महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे गरीबों पर तरस करने वाले प्रभू पातशाह जी ! तूने करोड़ों लोगों को अपने सेवक बना के अपनी सेवा-भक्ति में लगाया हुआ है। भगतों का प्यारा होना- ये तेरा मूल स्वभाव बना आ रहा है। हे प्रभू ! तू सब जगहों पर मौजूद है। 1। (हे भाई !) मैं कैसे उस प्रभू प्रीतम का दर्शन करूँ? वह कौन सी श्रेष्ठ करनी है (जिससे मैं उसे देखूँ) ? (जहां भी पूछूँ यही उक्तर मिलता है कि) मैं संत जनों की दासी बनूँ ओर उनके चरणों की सेवा करूँ। मैं अपनी ये जिंद उस प्रभू पातशाह पर से सदके करूँ~ और~ उस पर से कुर्बान हो जाऊँ। झुक झुक के मैं सदा उसके पैर लगती रहूँ। 2। (हे भाई !) कोई पण्डित (बन के) वेद आदिक धर्म-पुस्तकें खोजता रहता है~ कोई (दुनिया से) वैरागवान हो के (हरेक) तीर्थ पर स्नान करता फिरता है~ कोई गीत गाता है~ नाद बजाता है~ कीर्तन करता है~ पर मैं परमात्मा का वह नाम जपता रहता हूँ जो (मेरे अंदर) निर्भयता पैदा करता है। 3। (हे भाई !) जिन मनुष्यों पे मेरे स्वामी प्रभू जी दयावान होते हैं~ वे मनुष्य गुरू के चरणों में लग के (पहले विकारों में) गिरे हुए (होने के बावजूद भी) स्वच्छ आचरण वाले बन जाते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 216 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Karol Bagh की shopping street की भीड़, और घर लौटते वक़्त की थकान।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 216” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 217 →, पीछे का: ← अंग 215।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।