अंग 254

अंग
254
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਲੋਕੁ ॥
ਗਨਿ ਮਿਨਿ ਦੇਖਹੁ ਮਨੈ ਮਾਹਿ ਸਰਪਰ ਚਲਨੋ ਲੋਗ ॥
ਆਸ ਅਨਿਤ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਟੈ ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਅਰੋਗ ॥੧॥
सलोकु ॥
गनि मिनि देखहु मनै माहि सरपर चलनो लोग ॥
आस अनित गुरमुखि मिटै नानक नाम अरोग ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (हे भाई !) मन में अच्छी तरह विचार के देख लो। सारा जगत जरूर (अपनी अपनी बारी यहाँ से) चला जाएगा (फिर नाशवंत के लिए आस क्यूँ?) हे नानक ! प्रभू का नाम मनुष्य के मन को (आशा आदि के) रोगों से बचा लेता है। गुरू की शरण पड़ने से नाश-वंत पदार्थों की आस मिट जाती है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਗਗਾ ਗੋਬਿਦ ਗੁਣ ਰਵਹੁ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਜਪਿ ਨੀਤ ॥
ਕਹਾ ਬਿਸਾਸਾ ਦੇਹ ਕਾ ਬਿਲਮ ਨ ਕਰਿਹੋ ਮੀਤ ॥
ਨਹ ਬਾਰਿਕ ਨਹ ਜੋਬਨੈ ਨਹ ਬਿਰਧੀ ਕਛੁ ਬੰਧੁ ॥
ਓਹ ਬੇਰਾ ਨਹ ਬੂਝੀਐ ਜਉ ਆਇ ਪਰੈ ਜਮ ਫੰਧੁ ॥
ਗਿਆਨੀ ਧਿਆਨੀ ਚਤੁਰ ਪੇਖਿ ਰਹਨੁ ਨਹੀ ਇਹ ਠਾਇ ॥
ਛਾਡਿ ਛਾਡਿ ਸਗਲੀ ਗਈ ਮੂੜ ਤਹਾ ਲਪਟਾਹਿ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸਿਮਰਤ ਰਹੈ ਜਾਹੂ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗ ॥
ਨਾਨਕ ਆਏ ਸਫਲ ਤੇ ਜਾ ਕਉ ਪ੍ਰਿਅਹਿ ਸੁਹਾਗ ॥੧੯॥
पउड़ी ॥
गगा गोबिद गुण रवहु सासि सासि जपि नीत ॥
कहा बिसासा देह का बिलम न करिहो मीत ॥
नह बारिक नह जोबनै नह बिरधी कछु बंधु ॥
ओह बेरा नह बूझीऐ जउ आइ परै जम फंधु ॥
गिआनी धिआनी चतुर पेखि रहनु नही इह ठाइ ॥
छाडि छाडि सगली गई मूड़ तहा लपटाहि ॥
गुर प्रसादि सिमरत रहै जाहू मसतकि भाग ॥
नानक आए सफल ते जा कउ प्रिअहि सुहाग ॥१९॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे मित्र !) श्वास-श्वास सदा गोबिंद का नाम जपो। प्रभू के गुण चेते करते रहो। (देखना) ढील ना करनी। इस शरीर का कोई भरोसा नहीं। बालपन हो। जवानी हो या बुढ़ापा हो (मौत के आने में किसी भी वक्त) कोई रुकावट नहीं। उस वक्त का पता नहीं लग सकता। जब जम का फंदा (गले में) आ पड़ता है। देखो ! ज्ञानवान हो। सुरति जोड़ने वाले हों। चाहे समझदार (सियाणे) हों। किसी ने भी सदा इस जगह टिके नहीं रहना। मूर्ख ही उन पदार्थों को जफ्फा मारते हैं जिन्हें (अपनी अपनी बारी) सारी दुनिया छोड़ गई। जिस मनुष्य के माथे पर भाग्यों के लेख अंकुरित हों। वह गुरू की कृपा से सदा प्रभू का नाम सिमरता रहता है। हे नानक ! जिन्होंने प्यारे प्रभू का सुहाग (खसमाना) नसीब है। उनका ही जगत में आना मुबारक है। 19।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਘੋਖੇ ਸਾਸਤ੍ਰ ਬੇਦ ਸਭ ਆਨ ਨ ਕਥਤਉ ਕੋਇ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦੀ ਹੁਣਿ ਹੋਵਤ ਨਾਨਕ ਏਕੈ ਸੋਇ ॥੧॥
सलोकु ॥
घोखे सासत्र बेद सभ आन न कथतउ कोइ ॥
आदि जुगादी हुणि होवत नानक एकै सोइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक सारे वेद-शास्त्र विचार के देख लिए हैं। इनमें से कोई भी ये नहीं कहता कि परमातमा के बिना कोई और भी सदा स्थिर रहने वाला है। हे नानक ! एक परमात्मा ही है जो जगत के शुरू से है। युगों के आरम्भ से है। अब भी है और आगे भी रहेगा। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਘਘਾ ਘਾਲਹੁ ਮਨਹਿ ਏਹ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਦੂਸਰ ਨਾਹਿ ॥
ਨਹ ਹੋਆ ਨਹ ਹੋਵਨਾ ਜਤ ਕਤ ਓਹੀ ਸਮਾਹਿ ॥
ਘੂਲਹਿ ਤਉ ਮਨ ਜਉ ਆਵਹਿ ਸਰਨਾ ॥
ਨਾਮ ਤਤੁ ਕਲਿ ਮਹਿ ਪੁਨਹਚਰਨਾ ॥
ਘਾਲਿ ਘਾਲਿ ਅਨਿਕ ਪਛੁਤਾਵਹਿ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਕਹਾ ਥਿਤਿ ਪਾਵਹਿ ॥
ਘੋਲਿ ਮਹਾ ਰਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਤਿਹ ਪੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਰਿ ਜਾ ਕਉ ਦੀਆ ॥੨੦॥
पउड़ी ॥
घघा घालहु मनहि एह बिनु हरि दूसर नाहि ॥
नह होआ नह होवना जत कत ओही समाहि ॥
घूलहि तउ मन जउ आवहि सरना ॥
नाम ततु कलि महि पुनहचरना ॥
घालि घालि अनिक पछुतावहि ॥
बिनु हरि भगति कहा थिति पावहि ॥
घोलि महा रसु अंम्रितु तिह पीआ ॥
नानक हरि गुरि जा कउ दीआ ॥२०॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (हे भाई !) अपने मन में (ये सच्चाई) अच्छी तरह बैठा लो कि प्रभू के बिना और कोई सदा स्थिर नहीं। ना कोई अब तक हुआ है ना ही होगा। हर जगह वह प्रभू ही मौजूद है। हे मन ! अगर तू उस सदा स्थिर हरी की शरण पड़े। तो ही रस पाएगा। इस मानस जनम में एक प्रभू का नाम ही है जो किये विकारों का प्रभाव मिटा सकता है। अनेकों ही लोग (हरी सिमरन के बिना) विभिन्न तरह की मेहनत कर करके आखिर में पछताते ही हैं। परमात्मा की भक्ती के बिना और कहीं भी मन को शान्ति नहीं मिलती। उसने महा = रस वाला (अत्यंत स्वादिष्ट) नाम = अमृत घोल के पी लिया (भाव। उसने बड़े प्रेम के साथ नाम जपा जिस में से ऐसा स्वाद आया जैसे किसी अति मीठे शर्बत आदि में से)। हे नानक ! गुरू ने जिस को हरी-नाम की दाति दे दी। 20।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਙਣਿ ਘਾਲੇ ਸਭ ਦਿਵਸ ਸਾਸ ਨਹ ਬਢਨ ਘਟਨ ਤਿਲੁ ਸਾਰ ॥
ਜੀਵਨ ਲੋਰਹਿ ਭਰਮ ਮੋਹ ਨਾਨਕ ਤੇਊ ਗਵਾਰ ॥੧॥
सलोकु ॥
ङणि घाले सभ दिवस सास नह बढन घटन तिलु सार ॥
जीवन लोरहि भरम मोह नानक तेऊ गवार ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक (जीव की उम्र के) सारा दिन श्वास गिन के ही (जीव को जगत में) भेजता है। (उस गिनती से) एक तिल जितना भी कम-ज्यादा नहीं होता। हे नानक ! वे लोग मूर्ख हैं जो मोह की भटकना में पड़ कर (प्रभू द्वारा मिली उम्र से ज्यादा) जीने की तमन्ना रखते हैं। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਙੰਙਾ ਙ੍ਰਾਸੈ ਕਾਲੁ ਤਿਹ ਜੋ ਸਾਕਤ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨ ॥
ਅਨਿਕ ਜੋਨਿ ਜਨਮਹਿ ਮਰਹਿ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਨ ਚੀਨ ॥
ਙਿਆਨ ਧਿਆਨ ਤਾਹੂ ਕਉ ਆਏ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਿਹ ਆਪਿ ਦਿਵਾਏ ॥
ਙਣਤੀ ਙਣੀ ਨਹੀ ਕੋਊ ਛੂਟੈ ॥
ਕਾਚੀ ਗਾਗਰਿ ਸਰਪਰ ਫੂਟੈ ॥
ਸੋ ਜੀਵਤ ਜਿਹ ਜੀਵਤ ਜਪਿਆ ॥
ਪ੍ਰਗਟ ਭਏ ਨਾਨਕ ਨਹ ਛਪਿਆ ॥੨੧॥
पउड़ी ॥
ङंङा ङ्रासै कालु तिह जो साकत प्रभि कीन ॥
अनिक जोनि जनमहि मरहि आतम रामु न चीन ॥
ङिआन धिआन ताहू कउ आए ॥
करि किरपा जिह आपि दिवाए ॥
ङणती ङणी नही कोऊ छूटै ॥
काची गागरि सरपर फूटै ॥
सो जीवत जिह जीवत जपिआ ॥
प्रगट भए नानक नह छपिआ ॥२१॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी मौत का डर उन लोगों को ग्रसता है जिन्हें प्रभू ने अपने से विछोड़ दिया है। उन्होंने व्यापक प्रभू को नहीं पहिचाना। और वे अनेक जूनियों में जन्म लेते मरते रहते हैं। (मौत का सहम उतार के) प्रभू के साथ सांझ उन्होंने ही डाली। प्रभू से सुरति उन्होंने ही जोड़ी। जिन्हें प्रभू ने मेहर करके ये दाति दी। सोचें सोचने से (भी इस होनी से) कोई बच नहीं सकता। (ये शरीर) कच्चा घड़ा है इसने जरूर टूटना है। (पर) हे नानक ! (कोई लम्बी उम्र जी गया। कोई थोड़ी) उसी को जीना समझो जिसने जीते-जी परमात्मा का सिमरन किया है। सिमरन करने वाला मनुष्य छुपा नहीं रहता। जगत में नाम भी कमाता है। 21।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਚਿਤਿ ਚਿਤਵਉ ਚਰਣਾਰਬਿੰਦ ਊਧ ਕਵਲ ਬਿਗਸਾਂਤ ॥
ਪ੍ਰਗਟ ਭਏ ਆਪਹਿ ਗੋੁਬਿੰਦ ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਮਤਾਂਤ ॥੧॥
सलोकु ॥
चिति चितवउ चरणारबिंद ऊध कवल बिगसांत ॥
प्रगट भए आपहि गोुबिंद नानक संत मतांत ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ (मैं तो अपने) चिक्त में प्रभू सुंदर चरण टिकाता हूँ (जो जीव ये काम करता है उसका माया की ओर) उल्टा हुआ मन (सीधा हो के) कमल फूल की तरह खिल जाता है। हे नानक ! गुरू की शिक्षा से गोबिंद स्वयं ही उस हृदय में आ प्रगट होता है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਚਚਾ ਚਰਨ ਕਮਲ ਗੁਰ ਲਾਗਾ ॥ ਧਨਿ ਧਨਿ ਉਆ ਦਿਨ ਸੰਜੋਗ ਸਭਾਗਾ ॥
ਚਾਰਿ ਕੁੰਟ ਦਹ ਦਿਸਿ ਭ੍ਰਮਿ ਆਇਓ ॥
ਭਈ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤਬ ਦਰਸਨੁ ਪਾਇਓ ॥
ਚਾਰ ਬਿਚਾਰ ਬਿਨਸਿਓ ਸਭ ਦੂਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲ ਹੂਆ ॥
ਚਿੰਤ ਬਿਸਾਰੀ ਏਕ ਦ੍ਰਿਸਟੇਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਜਿਹ ਨੇਤ੍ਰਾ ॥੨੨॥
पउड़ी ॥
चचा चरन कमल गुर लागा ॥ धनि धनि उआ दिन संजोग सभागा ॥
चारि कुंट दह दिसि भ्रमि आइओ ॥
भई क्रिपा तब दरसनु पाइओ ॥
चार बिचार बिनसिओ सभ दूआ ॥
साधसंगि मनु निरमल हूआ ॥
चिंत बिसारी एक द्रिसटेता ॥
नानक गिआन अंजनु जिह नेत्रा ॥२२॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी जब (किसी जीव का माथा) गुरू के सुंदर चरणों से लगे, वह समय भाग्यशाली समझो (प्रभू के दीदार की खातिर जीव) चारों तरफ दसों दिशाओं में भी भटक आए (तब भी सफलता नहीं मिलती) दीदार तभी होता है। जब उसकी मेहर हो (और मेहर होने से ही गुरू की संगति मिलती है)। आचार – विचार स्वच्छ हो जाते हैं। माया का सारा प्यार समाप्त हो जाता है। गुरू की संगति में मन पवित्र हो जाता है। उसे (हर जगह) एक परमात्मा के ही दर्शन होते हैं। वह और सभी चितवनें (सोचें) विसार देता है (और एक परमात्मा को ही चितवता रहता है)। हे नानक ! (गुरू की बख्शी) सूझ का अंजन जिसकी आँखों में पड़ता है। 22।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਛਾਤੀ ਸੀਤਲ ਮਨੁ ਸੁਖੀ ਛੰਤ ਗੋਬਿਦ ਗੁਨ ਗਾਇ ॥
ਐਸੀ ਕਿਰਪਾ ਕਰਹੁ ਪ੍ਰਭ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਦਸਾਇ ॥੧॥
सलोकु ॥
छाती सीतल मनु सुखी छंत गोबिद गुन गाइ ॥
ऐसी किरपा करहु प्रभ नानक दास दसाइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ तेरी सिफत सालाह की बाणी गा के मेरे दिल में ठंड पड़ जाए। मेरा मन सुखी हो जाए। हे नानक ! (कह,) हे प्रभू ! मैं तेरे दासों का दास हूँ। मुझ पर ऐसी मेहर कर 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਛਛਾ ਛੋਹਰੇ ਦਾਸ ਤੁਮਾਰੇ ॥
ਦਾਸ ਦਾਸਨ ਕੇ ਪਾਨੀਹਾਰੇ ॥
ਛਛਾ ਛਾਰੁ ਹੋਤ ਤੇਰੇ ਸੰਤਾ ॥
पउड़ी ॥
छछा छोहरे दास तुमारे ॥
दास दासन के पानीहारे ॥
छछा छारु होत तेरे संता ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। मैं तेरा दास हूँ। तेरा बच्चा हूँ (मेहर कर) तेरे दासों के दासों का मैं पानी भरने वाला बनूँ (उनकी सेवा में मुझे आनंद प्रतीत हो)। मैं तेरे संतजनों की चरणधूड़ हो जाऊँ।

संदर्भ: यह अंग 254 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Saket के Mall में Sunday-shopping के बीच कोई हल्की-सी पंक्ति याद आ जाए, क्या होगा।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 10 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 254” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 255 →, पीछे का: ← अंग 253

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।