अंग 298

अंग
298
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਊਤਮੁ ਊਚੌ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਗੁਣ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਣਹਿ ਸੇਖ ॥
ਨਾਰਦ ਮੁਨਿ ਜਨ ਸੁਕ ਬਿਆਸ ਜਸੁ ਗਾਵਤ ਗੋਬਿੰਦ ॥
ਰਸ ਗੀਧੇ ਹਰਿ ਸਿਉ ਬੀਧੇ ਭਗਤ ਰਚੇ ਭਗਵੰਤ ॥
ਮੋਹ ਮਾਨ ਭ੍ਰਮੁ ਬਿਨਸਿਓ ਪਾਈ ਸਰਨਿ ਦਇਆਲ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਮਨਿ ਤਨਿ ਬਸੇ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਨਿਹਾਲ ॥
ਲਾਭੁ ਮਿਲੈ ਤੋਟਾ ਹਿਰੈ ਸਾਧਸੰਗਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਖਾਟਿ ਖਜਾਨਾ ਗੁਣ ਨਿਧਿ ਹਰੇ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥੬॥
ऊतमु ऊचौ पारब्रहमु गुण अंतु न जाणहि सेख ॥
नारद मुनि जन सुक बिआस जसु गावत गोबिंद ॥
रस गीधे हरि सिउ बीधे भगत रचे भगवंत ॥
मोह मान भ्रमु बिनसिओ पाई सरनि दइआल ॥
चरन कमल मनि तनि बसे दरसनु देखि निहाल ॥
लाभु मिलै तोटा हिरै साधसंगि लिव लाइ ॥
खाटि खजाना गुण निधि हरे नानक नामु धिआइ ॥६॥

हिन्दी अर्थ: परमात्मा (सबसे) श्रेष्ठ और (सबसे) ऊँचा है (किसी की उस तक पहुँच नहीं)। अनेकों शेशनाग भी उसके गुणों का अंत नहीं जान सकते। नारद ऋषि। अनेकों मुनिवर। सुखदेव और ब्यास (आदि ऋषि) गोबिंद की सिफत सालाह गाते हैं। भगवान के भगत उसके नाम-रस में भीगे रहते हैं। उसकी याद में परोए रहते हैं और भक्ति में मस्त रहते हैं। जिन मनुष्यों ने दया के घर प्रभू का आसरा ले लिया (उनके अंदर से माया का) मोह। अहंकार और भटकना सब कुछ नाश हो गया। जिन के मन में। हृदय में परमात्मा के सुंदर चरण बस गए। परमात्मा के दर्शन करके उनका तन-मन खिल पड़ा। साधसंगति के द्वारा प्रभू चरणों में सुरति जोड़ के (उच्च आत्मिक जीवन-रूप) लाभ कमा लेते हैं (विकारों की तरफ पड़ने से जो आत्मिक जीवन में कमी आती है। वह) कमी दूर हो जाती है। हे नानक ! तू भी परमात्मा का नाम सिमर। और गुणों के खजाने परमात्मा के नाम का खजाना इकट्ठा कर। 6।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਸੰਤ ਮੰਡਲ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਥਹਿ ਬੋਲਹਿ ਸਤਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਸੰਤੋਖੀਐ ਏਕਸੁ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੭॥
सलोकु ॥
संत मंडल हरि जसु कथहि बोलहि सति सुभाइ ॥
नानक मनु संतोखीऐ एकसु सिउ लिव लाइ ॥७॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु- हे नानक ! संत जन (सदा) परमात्मा की सिफति सालाह उचारते हैं। प्रेम में टिक के सदा कायम रहने वाले प्रभू के गुण बयान करते हैं (क्योंकि) एक परमात्मा (के चरनों) में सुरति जोड़े रखने से मन शांति रहता है। 7।
ਪਉੜੀ ॥
ਸਪਤਮਿ ਸੰਚਹੁ ਨਾਮ ਧਨੁ ਟੂਟਿ ਨ ਜਾਹਿ ਭੰਡਾਰ ॥
ਸੰਤਸੰਗਤਿ ਮਹਿ ਪਾਈਐ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰ ॥
ਆਪੁ ਤਜਹੁ ਗੋਬਿੰਦ ਭਜਹੁ ਸਰਨਿ ਪਰਹੁ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਦੂਖ ਹਰੈ ਭਵਜਲੁ ਤਰੈ ਮਨ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਇ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਮਨਿ ਹਰਿ ਜਪੈ ਸਫਲੁ ਜਨਮੁ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸਦਾ ਸੰਗਿ ਕਰਨੈਹਾਰੁ ਪਛਾਣੁ ॥
ਸੋ ਸਾਜਨੁ ਸੋ ਸਖਾ ਮੀਤੁ ਜੋ ਹਰਿ ਕੀ ਮਤਿ ਦੇਇ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪੇਇ ॥੭॥
पउड़ी ॥
सपतमि संचहु नाम धनु टूटि न जाहि भंडार ॥
संतसंगति महि पाईऐ अंतु न पारावार ॥
आपु तजहु गोबिंद भजहु सरनि परहु हरि राइ ॥
दूख हरै भवजलु तरै मन चिंदिआ फलु पाइ ॥
आठ पहर मनि हरि जपै सफलु जनमु परवाणु ॥
अंतरि बाहरि सदा संगि करनैहारु पछाणु ॥
सो साजनु सो सखा मीतु जो हरि की मति देइ ॥
नानक तिसु बलिहारणै हरि हरि नामु जपेइ ॥७॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) परमात्मा का नाम-धन इकट्ठा करो। नाम-धन के खजाने कभी खत्म नहीं होते। (पर। उस परमात्मा का ये नाम-धन) साध-संगति में रहने से ही मिलता है। जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिसके स्वरूप के इस पार उस पार का छोर नहीं मिलता। (हे भाई !) स्वै भाव दूर करो। परमात्मा का भजन करते रहो। प्रभू पातशाह की शरण पड़े रहो (जो मनुष्य प्रभू की शरण पड़ा रहता है। वह अपने सारे) दुख दूर कर लेता है। संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। और मन-चाहा फल प्राप्त कर लेता है। (हे भाई !) जो मनुष्य आठों पहर अपने मन में परमात्मा का नाम जपता है। उसका मानस जनम कामयाब हो जाता है। वह (परमात्मा की हजूरी में) कबूल हो जाता है। जो परमात्मा (हरेक जीव के) अंदर बाहर सदा साथ (बसता) है वह सृजनहार प्रभू उस मनुष्य का मित्र बन जाता है। (हे भाई !) जो मनुष्य (हमें) परमात्मा (का नाम जपने) की मति देता है। वही (हमारा असली) सज्जन है। साथी है। मित्र है। हे नानक ! (कह,) जो मनुष्य सदा हरि-नाम जपता है। मैं उससे कुर्बान जाता हूँ। 7।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਗੁਨ ਗਾਈਅਹਿ ਤਜੀਅਹਿ ਅਵਰਿ ਜੰਜਾਲ ॥
ਜਮਕੰਕਰੁ ਜੋਹਿ ਨ ਸਕਈ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੂ ਦਇਆਲ ॥੮॥
सलोकु ॥
आठ पहर गुन गाईअहि तजीअहि अवरि जंजाल ॥
जमकंकरु जोहि न सकई नानक प्रभू दइआल ॥८॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु- हे नानक ! अगर आठों पहर (परमात्मा) के गुण गाए जाएं। और अन्य सभी बंधन त्याग दिए जाएं। तो परमात्मा दयावान हो जाता है और जमदूत देख नहीं सकते (मौत का डर नजदीक नहीं फटकता। आत्मिक मौत पास नहीं आ सकती)। 8।
ਪਉੜੀ ॥
ਅਸਟਮੀ ਅਸਟ ਸਿਧਿ ਨਵ ਨਿਧਿ ॥
ਸਗਲ ਪਦਾਰਥ ਪੂਰਨ ਬੁਧਿ ॥
ਕਵਲ ਪ੍ਰਗਾਸ ਸਦਾ ਆਨੰਦ ॥
ਨਿਰਮਲ ਰੀਤਿ ਨਿਰੋਧਰ ਮੰਤ ॥
ਸਗਲ ਧਰਮ ਪਵਿਤ੍ਰ ਇਸਨਾਨੁ ॥
ਸਭ ਮਹਿ ਊਚ ਬਿਸੇਖ ਗਿਆਨੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਭਜਨੁ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਸੰਗਿ ॥
ਜਪਿ ਤਰੀਐ ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ॥੮॥
पउड़ी ॥
असटमी असट सिधि नव निधि ॥
सगल पदारथ पूरन बुधि ॥
कवल प्रगास सदा आनंद ॥
निरमल रीति निरोधर मंत ॥
सगल धरम पवित्र इसनानु ॥
सभ महि ऊच बिसेख गिआनु ॥
हरि हरि भजनु पूरे गुर संगि ॥
जपि तरीऐ नानक नाम हरि रंगि ॥८॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (नाम के प्रताप में ही) आठों करामाती ताकतें और दुनिया के नौ खजाने आ जाते हैं। सारे पदार्थ प्राप्त हो जाते हैं। वह बुद्धि मिल जाती है जो कभी गलती नहीं करती। (मन में) सदा चाव ही चाव टिका रहता है। (हृदय का) कमल-फूल खिल जाता है (जैसे सूरज की किरणों से कमल-फूल खिलता है। वैसे ही नाम की बरकति से हृदय खिला रहता है)। (परमात्मा का नाम एक ऐसा) मंत्र है जिस का असर बेकार नहीं जा सकता। (इस मंत्र की बरकति से) जीवन-जुगति पवित्र हो जाती है। (हे भाई ! परमात्मा का नाम ही) सारे धर्मों (का धर्म है। सारे तीर्थ-स्नानों से) पवित्र स्नान है। (नाम-सिमरन ही सारे शास्त्र आदि के दिए ज्ञान से) सबसे ऊँचा और श्रेष्ठ ज्ञान है। हे नानक ! पूरे गुरू की संगति में रह के अगर हरि नाम का भजन किया जाय। परमात्मा के प्रेम रंग में टिक के हरि नाम जप के (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 8।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਨਾਰਾਇਣੁ ਨਹ ਸਿਮਰਿਓ ਮੋਹਿਓ ਸੁਆਦ ਬਿਕਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਬਿਸਾਰਿਐ ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਅਵਤਾਰ ॥੯॥
सलोकु ॥
नाराइणु नह सिमरिओ मोहिओ सुआद बिकार ॥
नानक नामि बिसारिऐ नरक सुरग अवतार ॥९॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु- (जिस मनुष्य ने कभी) परमात्मा का नाम नहीं सिमरा। (वह सदा) विकारों में (दुनिया के पदार्थों के) स्वादों में फंसा रहता है। हे नानक ! अगर परमात्मा का नाम भुला दिया जाए तो नरक-स्वर्ग (भोगने के लिए बार-बार) जनम लेना पड़ता है। 9।
ਪਉੜੀ ॥
ਨਉਮੀ ਨਵੇ ਛਿਦ੍ਰ ਅਪਵੀਤ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਜਪਹਿ ਕਰਤ ਬਿਪਰੀਤਿ ॥
ਪਰ ਤ੍ਰਿਅ ਰਮਹਿ ਬਕਹਿ ਸਾਧ ਨਿੰਦ ॥
ਕਰਨ ਨ ਸੁਨਹੀ ਹਰਿ ਜਸੁ ਬਿੰਦ ॥
ਹਿਰਹਿ ਪਰ ਦਰਬੁ ਉਦਰ ਕੈ ਤਾਈ ॥
ਅਗਨਿ ਨ ਨਿਵਰੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਨ ਬੁਝਾਈ ॥
ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਬਿਨੁ ਏਹ ਫਲ ਲਾਗੇ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਬਿਸਰਤ ਮਰਿ ਜਮਹਿ ਅਭਾਗੇ ॥੯॥
पउड़ी ॥
नउमी नवे छिद्र अपवीत ॥
हरि नामु न जपहि करत बिपरीति ॥
पर त्रिअ रमहि बकहि साध निंद ॥
करन न सुनही हरि जसु बिंद ॥
हिरहि पर दरबु उदर कै ताई ॥
अगनि न निवरै त्रिसना न बुझाई ॥
हरि सेवा बिनु एह फल लागे ॥
नानक प्रभ बिसरत मरि जमहि अभागे ॥९॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (उन मनुष्यों की कान-नाक आदिक) नौवों इंद्रियां गंदी हुई रहती हैं। जो मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं जपते। वे (मानवता की मर्यादा के) उलट (बुरे) कर्म करते रहते हैं (प्रभू के सिमरन से टूटे हुए मनुष्य) पराई सि्त्रयां भोगते हैं और भले मनुष्यों की निंदा करते रहते हैं। वे कभी पल भर के लिए भी (अपने) कानों से परमात्मा की सिफत सालाह नहीं सुनते। (सिमरन-हीन लोग) अपना पेट भरने की खातिर पराया धन चुराते रहते हैं (फिर भी उनकी) लालच की आग नहीं बुझती (उनके अंदर से) तृष्णा नहीं मिटती। हे नानक ! परमात्मा की सेवा भगती के बिना (उनके सारे उद्यमों को ऊपर बताए हुए) ऐसे फल ही लगते हैं। परमात्मा को बिसारने के कारण वह भाग-हीन मनुष्य नित्य जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। 9।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਦਸ ਦਿਸ ਖੋਜਤ ਮੈ ਫਿਰਿਓ ਜਤ ਦੇਖਉ ਤਤ ਸੋਇ ॥
ਮਨੁ ਬਸਿ ਆਵੈ ਨਾਨਕਾ ਜੇ ਪੂਰਨ ਕਿਰਪਾ ਹੋਇ ॥੧੦॥
सलोकु ॥
दस दिस खोजत मै फिरिओ जत देखउ तत सोइ ॥
मनु बसि आवै नानका जे पूरन किरपा होइ ॥१०॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु- मैं जिधर देखता हूँ। उधर वह (परमात्मा) ही बस रहा है, (पर घर छोड़ के) दसों दिशाओं में मैं ढूँढता फिरा हूँ (जंगल आदि में कहीं भी मन वश में नहीं आता); हे नानक ! (कह, वैसे तो) मन तभी वश में आता है यदि सर्व-गुणों के मालिक परमात्मा की (अपनी) मेहर हो। 10।
ਪਉੜੀ ॥
ਦਸਮੀ ਦਸ ਦੁਆਰ ਬਸਿ ਕੀਨੇ ॥
ਮਨਿ ਸੰਤੋਖੁ ਨਾਮ ਜਪਿ ਲੀਨੇ ॥
ਕਰਨੀ ਸੁਨੀਐ ਜਸੁ ਗੋਪਾਲ ॥
ਨੈਨੀ ਪੇਖਤ ਸਾਧ ਦਇਆਲ ॥
ਰਸਨਾ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ਬੇਅੰਤ ॥
ਮਨ ਮਹਿ ਚਿਤਵੈ ਪੂਰਨ ਭਗਵੰਤ ॥
पउड़ी ॥
दसमी दस दुआर बसि कीने ॥
मनि संतोखु नाम जपि लीने ॥
करनी सुनीऐ जसु गोपाल ॥
नैनी पेखत साध दइआल ॥
रसना गुन गावै बेअंत ॥
मन महि चितवै पूरन भगवंत ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- दसों ही इंद्रियों को मनुष्य अपने काबू में कर लेता है। (जब परमात्मा की कृपा से मनुष्य) परमात्मा का नाम जपता है तो उसके मन में संतोख पैदा होता है। (प्रभू की कृपा से) कानों से सृष्टि के पालनहार प्रभू की सिफतसालाह सुनी जाती है। आँखों से दया के घर गुरू का दर्शन करते हैं। जीभ बेअंत प्रभू के गुण गाने लग पड़ती है। और मनुष्य अपने मन में सर्व-व्यापक भगवान (के गुण) याद करता है।

संदर्भ: यह अंग 298 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

मानसून की पहली बारिश, दिल्ली के पुराने मोहल्ले में।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 53 पंक्तियों का है, 9 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 298” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 299 →, पीछे का: ← अंग 297

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।