अंग 289

अंग
289
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਬਿਖ ਜਾਹਿ ॥
ਆਪਿ ਜਪਹੁ ਅਵਰਾ ਨਾਮੁ ਜਪਾਵਹੁ ॥
ਸੁਨਤ ਕਹਤ ਰਹਤ ਗਤਿ ਪਾਵਹੁ ॥
ਸਾਰ ਭੂਤ ਸਤਿ ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਉ ॥
ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ਨਾਨਕ ਗੁਨ ਗਾਉ ॥੬॥
जनम जनम के किलबिख जाहि ॥
आपि जपहु अवरा नामु जपावहु ॥
सुनत कहत रहत गति पावहु ॥
सार भूत सति हरि को नाउ ॥
सहजि सुभाइ नानक गुन गाउ ॥६॥

हिन्दी अर्थ: इस तरह कई जन्मों के पाप नाश हो जाएंगे। (प्रभू का नाम) तू खुद जप। और औरों को जपने के लिए प्रेरित कर। (नाम) सुनते हुए। उच्चारते हुए और निर्मल रहन-सहन रखते हुए उच्च अवस्था बन जाएगी। प्रभू का नाम ही सब पदार्थों से उक्तम पदार्थ है; (इसलिए) हे नानक ! आत्मिक अडोलता में टिक के प्रेम से प्रभू के गुण गा। 6।
ਗੁਨ ਗਾਵਤ ਤੇਰੀ ਉਤਰਸਿ ਮੈਲੁ ॥
ਬਿਨਸਿ ਜਾਇ ਹਉਮੈ ਬਿਖੁ ਫੈਲੁ ॥
ਹੋਹਿ ਅਚਿੰਤੁ ਬਸੈ ਸੁਖ ਨਾਲਿ ॥
ਸਾਸਿ ਗ੍ਰਾਸਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥
ਛਾਡਿ ਸਿਆਨਪ ਸਗਲੀ ਮਨਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਪਾਵਹਿ ਸਚੁ ਧਨਾ ॥
ਹਰਿ ਪੂੰਜੀ ਸੰਚਿ ਕਰਹੁ ਬਿਉਹਾਰੁ ॥
ਈਹਾ ਸੁਖੁ ਦਰਗਹ ਜੈਕਾਰੁ ॥
ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਏਕੋ ਦੇਖੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਾ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਲੇਖੁ ॥੭॥
गुन गावत तेरी उतरसि मैलु ॥
बिनसि जाइ हउमै बिखु फैलु ॥
होहि अचिंतु बसै सुख नालि ॥
सासि ग्रासि हरि नामु समालि ॥
छाडि सिआनप सगली मना ॥
साधसंगि पावहि सचु धना ॥
हरि पूंजी संचि करहु बिउहारु ॥
ईहा सुखु दरगह जैकारु ॥
सरब निरंतरि एको देखु ॥
कहु नानक जा कै मसतकि लेखु ॥७॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) प्रभू के गुण गाते हुए तेरी (विकारों की) मैल उतर जाएगी। और अहंम् रूपी विष का पसारा भी मिट जाएगा। बेफिक्र हो जाएगा और सुखी जीवन व्यतीत होगा (तू) हर दम प्रभू के नाम को याद कर। हे मन ! सारी चतुराई छोड़ दे। सदा साथ निभने वाला धन सतिसंग में मिलेगा। प्रभू के नाम की राशि संचित कर, यही व्यवहार कर। इस जीवन में सुख मिलेगा और प्रभू की दरगाह में आदर होगा। सब जीवों के अंदर एक अकाल-पुरख को ही देख। (पर) हे नानक ! कह, (यह काम वही मनुष्य करता है) जिसके माथे पर भाग्य हैं। 7।
ਏਕੋ ਜਪਿ ਏਕੋ ਸਾਲਾਹਿ ॥
ਏਕੁ ਸਿਮਰਿ ਏਕੋ ਮਨ ਆਹਿ ॥
ਏਕਸ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਉ ਅਨੰਤ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਜਾਪਿ ਏਕ ਭਗਵੰਤ ॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਏਕੁ ਹਰਿ ਆਪਿ ॥
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਪ੍ਰਭੁ ਬਿਆਪਿ ॥
ਅਨਿਕ ਬਿਸਥਾਰ ਏਕ ਤੇ ਭਏ ॥
ਏਕੁ ਅਰਾਧਿ ਪਰਾਛਤ ਗਏ ॥
ਮਨ ਤਨ ਅੰਤਰਿ ਏਕੁ ਪ੍ਰਭੁ ਰਾਤਾ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਇਕੁ ਜਾਤਾ ॥੮॥੧੯॥
एको जपि एको सालाहि ॥
एकु सिमरि एको मन आहि ॥
एकस के गुन गाउ अनंत ॥
मनि तनि जापि एक भगवंत ॥
एको एकु एकु हरि आपि ॥
पूरन पूरि रहिओ प्रभु बिआपि ॥
अनिक बिसथार एक ते भए ॥
एकु अराधि पराछत गए ॥
मन तन अंतरि एकु प्रभु राता ॥
गुर प्रसादि नानक इकु जाता ॥८॥१९॥

हिन्दी अर्थ: एक प्रभू को ही जप और एक प्रभू की ही सिफत कर। एक को सिमर और हे मन ! एक प्रभू के मिलने की तमन्ना रख। एक प्रभू के ही गुण गा। मन में और शारीरिक इंद्रियों से एक भगवान को ही जप। (सब जगह) प्रभू खुद ही खुद है। सब जीवों में प्रभू ही बस रहा है। (जगत के) अनेकों पसारे एक प्रभू से ही पसरे हुए हैं। एक प्रभू को सिमरने से पाप नाश हो जाते हैं। जिस मनुष्य के मन और शरीर में एक प्रभू ही परोया गया है। हे नानक ! उस ने गुरू की कृपा से उस एक प्रभू को पहचान लिया है। 8। 19।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਫਿਰਤ ਫਿਰਤ ਪ੍ਰਭ ਆਇਆ ਪਰਿਆ ਤਉ ਸਰਨਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਪ੍ਰਭ ਬੇਨਤੀ ਅਪਨੀ ਭਗਤੀ ਲਾਇ ॥੧॥
सलोकु ॥
फिरत फिरत प्रभ आइआ परिआ तउ सरनाइ ॥
नानक की प्रभ बेनती अपनी भगती लाइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे प्रभू ! भटकता भटकता मैं तेरी शरण आ पड़ा हूँ। हे प्रभू ! नानक की ये विनती है कि मुझे अपनी भक्ति में जोड़। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਜਾਚਕ ਜਨੁ ਜਾਚੈ ਪ੍ਰਭ ਦਾਨੁ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਦੇਵਹੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥
ਸਾਧ ਜਨਾ ਕੀ ਮਾਗਉ ਧੂਰਿ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਮੇਰੀ ਸਰਧਾ ਪੂਰਿ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਵਉ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਪ੍ਰਭ ਤੁਮਹਿ ਧਿਆਵਉ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਸਿਉ ਲਾਗੈ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
ਭਗਤਿ ਕਰਉ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਨਿਤ ਨੀਤਿ ॥
ਏਕ ਓਟ ਏਕੋ ਆਧਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕੁ ਮਾਗੈ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਭ ਸਾਰੁ ॥੧॥
असटपदी ॥
जाचक जनु जाचै प्रभ दानु ॥
करि किरपा देवहु हरि नामु ॥
साध जना की मागउ धूरि ॥
पारब्रहम मेरी सरधा पूरि ॥
सदा सदा प्रभ के गुन गावउ ॥
सासि सासि प्रभ तुमहि धिआवउ ॥
चरन कमल सिउ लागै प्रीति ॥
भगति करउ प्रभ की नित नीति ॥
एक ओट एको आधारु ॥
नानकु मागै नामु प्रभ सारु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ हे प्रभू ! (यह) मंगता (याचक) दास (तेरे नाम का) दान मांगता है; हे हरी ! कृपा करके (अपना) नाम दे। मैं साधु जनों के पैरों की खाक मांगता हूँ। हे पारब्रहम ! मेरी इच्छा पूरी कर। मैं सदा ही प्रभू के गुण गाऊँ। हे प्रभू ! मैं हर दम तुझे ही सिमरूँ। प्रभू के कमल (जैसे सुंदर) चरनों से मेरी प्रीति लगी रहे और सदा ही प्रभू की भक्ति करता रहूँ। (प्रभू का नाम ही) एक ही मेरी ओट है और एक ही आसरा है। नानक प्रभू का श्रेष्ठ नाम मांगता है। 1।
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਮਹਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਵੈ ਬਿਰਲਾ ਕੋਇ ॥
ਜਿਨ ਚਾਖਿਆ ਸੇ ਜਨ ਤ੍ਰਿਪਤਾਨੇ ॥
ਪੂਰਨ ਪੁਰਖ ਨਹੀ ਡੋਲਾਨੇ ॥
ਸੁਭਰ ਭਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਰਸ ਰੰਗਿ ॥
ਉਪਜੈ ਚਾਉ ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ॥
ਪਰੇ ਸਰਨਿ ਆਨ ਸਭ ਤਿਆਗਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਪ੍ਰਗਾਸ ਅਨਦਿਨੁ ਲਿਵ ਲਾਗਿ ॥
ਬਡਭਾਗੀ ਜਪਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੨॥
प्रभ की द्रिसटि महा सुखु होइ ॥
हरि रसु पावै बिरला कोइ ॥
जिन चाखिआ से जन त्रिपताने ॥
पूरन पुरख नही डोलाने ॥
सुभर भरे प्रेम रस रंगि ॥
उपजै चाउ साध कै संगि ॥
परे सरनि आन सभ तिआगि ॥
अंतरि प्रगास अनदिनु लिव लागि ॥
बडभागी जपिआ प्रभु सोइ ॥
नानक नामि रते सुखु होइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू की (मेहर की) नजर से बड़ा सुख होता है। (पर) कोई विरला मनुष्य ही प्रभू के नाम का स्वाद चखता है जिन्होंने (नाम रस) चखा है वह मनुष्य (माया की ओर से) संतुष्ट हो गए हैं। वह पूर्ण मनुष्य बन गए हैं कभी (माया के फायदे नुकसान में) डोलते नहीं। प्रभू के प्यार के स्वाद की मौज में वह सराबोर (नाको-नाक भरे) रहते हैं। साध जनों की संगति में रह के (उनके अंदर) (प्रभू मिलाप का) चाव पैदा होता है। और सारे (आसरे) छोड़ के वह प्रभू की शरण पड़ते हैं। उनके अंदर प्रकाश हो जाता है और हर समय उनकी लिव (प्रभू चरनों में) लगी रहती है। बहुत भाग्यशालियों ने प्रभू को सिमरा है। हे नानक ! प्रभू के नाम में रंगे रहने से सुख होता है। 2।
ਸੇਵਕ ਕੀ ਮਨਸਾ ਪੂਰੀ ਭਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਨਿਰਮਲ ਮਤਿ ਲਈ ॥
ਜਨ ਕਉ ਪ੍ਰਭੁ ਹੋਇਓ ਦਇਆਲੁ ॥
ਸੇਵਕੁ ਕੀਨੋ ਸਦਾ ਨਿਹਾਲੁ ॥
ਬੰਧਨ ਕਾਟਿ ਮੁਕਤਿ ਜਨੁ ਭਇਆ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਦੂਖੁ ਭ੍ਰਮੁ ਗਇਆ ॥
ਇਛ ਪੁਨੀ ਸਰਧਾ ਸਭ ਪੂਰੀ ॥
ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਦ ਸੰਗਿ ਹਜੂਰੀ ॥
ਜਿਸ ਕਾ ਸਾ ਤਿਨਿ ਲੀਆ ਮਿਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਭਗਤੀ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੩॥
सेवक की मनसा पूरी भई ॥
सतिगुर ते निरमल मति लई ॥
जन कउ प्रभु होइओ दइआलु ॥
सेवकु कीनो सदा निहालु ॥
बंधन काटि मुकति जनु भइआ ॥
जनम मरन दूखु भ्रमु गइआ ॥
इछ पुनी सरधा सभ पूरी ॥
रवि रहिआ सद संगि हजूरी ॥
जिस का सा तिनि लीआ मिलाइ ॥
नानक भगती नामि समाइ ॥३॥

हिन्दी अर्थ: तब सेवक के मन के फुरने पूरे हो जाते हैं। (माया की ओर से दौड़ समाप्त हो जाती है)। (जब सेवक) अपने गुरू से उक्तम शिक्षा लेता है प्रभू अपने (ऐसे) सेवक पर मेहर करता है। और सेवक को सदा प्रसन्न रखता है। सेवक (माया वाली) जंजीर तोड़ के मुक्त हो जाता है। उसका जनम मरण (का चक्र) का दुख और सहसा खत्म हो जाता है। सेवक की इच्छा और श्रद्धा सफल हो जाती है। उसे प्रभू सब जगह व्यापक अपने अंग संग दिखता है। जिस मालिक का वह सेवक बनता है। वह अपने साथ मिला लेता है। हे नानक ! सेवक भगती करके नाम में टिका रहता है। 3।
ਸੋ ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਜਿ ਘਾਲ ਨ ਭਾਨੈ ॥
ਸੋ ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਜਿ ਕੀਆ ਜਾਨੈ ॥
सो किउ बिसरै जि घाल न भानै ॥
सो किउ बिसरै जि कीआ जानै ॥

हिन्दी अर्थ: (मनुष्य को) वह प्रभू क्यूँ बिसर जाए जो (मनुष्य की करी हुई) मेहनत को व्यर्थ नहीं जाने देता। जो की हुई कमाई को याद रखता है?

संदर्भ: यह अंग 289 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

CBSE board-exam का दिन सुबह, बच्चा pencil-box check कर रहा, माँ चुप।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 61 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 289” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 290 →, पीछे का: ← अंग 288

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।