शब्द-कोश (Glossary)

शब्द-कोश

Glossary. Key terms across Gita, Kena, Katha, and the Yoga Vasistha
यह उपनिषदों और गीता में बार-बार आने वाले शब्दों का एक छोटा सा संग्रह है। हर शब्द का अर्थ, मूल भाव, और कहाँ-कहाँ मिलेगा।
यह सूची exhaustive नहीं। यह बस उन शब्दों की है जो भगवद् गीता, केनोपनिषद्, कठोपनिषद्, और योग वासिष्ठ की कथाओं में बार-बार आते हैं और जिनका एक central role है। हर entry में मूल अर्थ, थोड़ा संदर्भ, और एक-दो उदाहरण दिए गए हैं।

अध्यात्मadhyātma · “के संबंध में आत्मा”
आत्मा या व्यक्तिगत चेतना से जुड़ा हुआ। “अधि” का मतलब “के संबंध में”। तो जो कुछ भी आत्मा के स्तर पर हो रहा है, वो अध्यात्म है। उपनिषदों में अक्सर तीन समानांतर ढाँचे आते हैं: अधिदैव (देव-स्तर), अधिभूत (तत्त्व-स्तर), और अध्यात्म (आत्म-स्तर)।
अमृतamṛta · “जो मरता नहीं”
अ + मृत = “मृत नहीं”। मृत्यु-रहित, अमर। लेकिन यह केवल शरीर के न मरने का नहीं। यह वो स्थिति है जहाँ जन्म-मरण का चक्र ही टूट जाता है। उपनिषदों का सबसे ऊँचा लक्ष्य।
देखें: कठ 1.2.18, केन 2.4
अव्यक्तavyakta · “जो प्रकट नहीं”
मूल प्रकृति, जो दिखती नहीं, मगर सब कुछ जिससे निकलता है। सांख्य दर्शन का एक key term, जो कठोपनिषद् और गीता दोनों में दिखता है। एक तरह से “potential”, अभी रूप नहीं ले रहा, पर सब रूप उसी से निकलते हैं।
देखें: कठ 1.3.11

कर्मkarma · “क्रिया, कार्य”
शाब्दिक रूप से “जो किया जाता है”। पर भारतीय दर्शन में इसका तीहरा अर्थ है: (1) कोई भी क्रिया, (2) उस क्रिया का अदृश्य संस्कार जो भविष्य पर असर डालता है, और (3) पुनर्जन्म के संदर्भ में, पिछली क्रियाओं का कुल खाता। गीता का असली विषय है: कर्म कैसे किया जाए ताकि वो बँधे नहीं।

गुहाguhā · “गुफा”
शाब्दिक “गुफा”। उपनिषदों में यह हमेशा हृदय की भीतरी जगह का संकेत है। आत्मा “गुहा में बसी है” का मतलब है: सबसे गहरे, शान्त स्थान पर, जहाँ बाहरी हलचल नहीं पहुँचती।
देखें: कठ 1.2.12, कठ 1.3.1

त, द

तपtapas · “ताप, गर्मी”
शाब्दिक “गर्मी”। पर इसका मतलब है वो आंतरिक गर्मी जो अनुशासन से बनती है। तपस्या यानी अपने आप को कुछ कठिन में रखना, ताकि साधक की आंतरिक ऊर्जा बढ़े। तपस्या में शरीर को कष्ट देना मुख्य बात नहीं। विवेक और संयम का अभ्यास इसका असली रूप है।
देखें: केन 4.8
दमdama · “नियंत्रण”
इन्द्रिय-नियंत्रण। पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) उनके विषय की ओर भागने से रोकना। तप और दम साथ-साथ चलते हैं। तप भीतर की गर्मी है, दम बाहर की पकड़।
देखें: केन 4.8
धीरdhīra · “स्थिर, धैर्यवान”
वो जो ठहरा हुआ है, स्थिर है, धैर्य से काम लेता है। उपनिषद् बार-बार “धीर पुरुष” की बात करते हैं, जो उतावला नहीं, जो दौड़ता नहीं, जो विचार से चलता है। “धीर” का विपरीत है “मन्द”, जो instant gratification में फँसा रहता है।
देखें: कठ 1.2.2, केन 1.2

धर्मdharma · “धारण करने योग्य”
शब्द “धृ” से, जिसका मतलब है “धारण करना”। तो धर्म वो है जो जीवन को धारण करता है, टिकाए रखता है। यह कोई one-word translation नहीं माँगता। संदर्भ के हिसाब से इसका अर्थ कर्तव्य, नैतिकता, स्वभाव, सत्य-मार्ग, क़ानून, सब हो सकता है। गीता में इसका कई स्तर पर use है।
देखें: गीता 1.1, 18.66

पुरुषpuruṣa · “व्यक्ति, आत्मा”
यह शब्द बहुस्तरीय है। साधारण अर्थ में “व्यक्ति”। दर्शन में “चेतना”। सांख्य में “अव्यक्त प्रकृति” से अलग, चेतन तत्व। उपनिषदों में अक्सर “अंगूठे के बराबर पुरुष हृदय में स्थित है” का रूपक आता है, यानी आत्मा।
देखें: कठ 1.3.11, कठ 2.1.12
प्रेयpreya · “जो प्रिय हो”
जो अभी अच्छा लग रहा है, जो instant gratification देता है। मीठा खाना, दूसरी पेय, आराम, सब प्रेय हैं। ये गलत नहीं हैं, मगर इन्हें “श्रेय” समझ लेना गलती है। कठोपनिषद् का पहला सबक यही है।
देखें: कठ 1.2.1-2
प्राणprāṇa · “जीवन-शक्ति, साँस”
शाब्दिक “साँस”। पर उपनिषदों में यह सिर्फ़ साँस नहीं, वो शक्ति है जो जीवन को सक्रिय रखती है। पाँच प्राण माने गए हैं: प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान। साँस के पाँच काम।
देखें: कठ 2.2.3-5

ब, भ

ब्रह्मbrahman · “विशालता”
शब्द “बृह” से, जिसका मतलब है “विस्तार”। ब्रह्म वो परम सत्ता है जिसमें सब कुछ है। इसे personal God मानने की ज़रूरत नहीं। उपनिषदों में यह सब का substrate है, हर चीज़ ब्रह्म से निकली, ब्रह्म में है, ब्रह्म में लौटेगी।
भक्तिbhakti · “विभाजन, हिस्सा, समर्पण”
शब्द “भज्” से, जिसका मतलब है “बाँटना, सेवा करना”। तो भक्ति है, किसी के साथ ख़ुद को बाँट देना, समर्पित कर देना। गीता तीन रास्ते देती है: कर्म, ज्ञान, भक्ति। भक्ति सबसे आसान कही गई है, क्योंकि इसमें बौद्धिक तैयारी की कम ज़रूरत है।

मननmanana · “विचार”
सुनी हुई बात पर गहराई से सोचना। उपनिषद् सीखने के तीन चरण बताते हैं: श्रवण (सुनना), मनन (सोचना), निदिध्यासन (ध्यान करना)। बिना मनन के सुना हुआ अधूरा रहता है।
मोक्षmokṣa · “मुक्ति”
मूल शब्द “मुच्” से, “छोड़ना, मुक्त होना”। संसार-चक्र से मुक्ति। मोक्ष कोई जगह नहीं, एक स्थिति है। शरीर रहते हुए भी मोक्ष संभव है, इसे “जीवनमुक्ति” कहते हैं। कठोपनिषद् 2.3.14 कहता है: कामनाएँ छूटें, अभी अमर हो जाओगे।
देखें: कठ 2.3.14

य, र

यक्षyakṣa · “रहस्यमय उपस्थिति”
एक दिव्य प्राणी जिसका रूप-स्वरूप साफ़ नहीं। केनोपनिषद् में ब्रह्म “यक्ष” के रूप में देवताओं के सामने आता है, ताकि देवता पहचान न पाएँ। यह intentional anonymity है।
देखें: केन खण्ड 3
योगyoga · “जोड़ना, साधना”
“युज्” शब्द से, जोड़ना। शाब्दिक रूप से दो चीज़ों को एक करना। कठोपनिषद् इसकी पहली स्पष्ट परिभाषा देती है: “जब पाँचों इन्द्रियाँ मन के साथ ठहर जाएँ, और बुद्धि भी हलचल न करे, उसे योग कहते हैं।” पतंजलि के योगसूत्र इसी पर खड़े हैं।
देखें: कठ 2.3.10-11

श, स

श्रद्धाśraddhā · “गहरा भरोसा”
“आस्था” से थोड़ी अलग। श्रद्धा वो भीतरी झुकाव है जो जिज्ञासा और भक्ति, दोनों को जोड़ता है। नचिकेता के मन में “श्रद्धा का प्रवेश” हुआ था, सिर्फ़ विश्वास नहीं, एक तीखी जागृति। बिना श्रद्धा के सीखना सतही है।
देखें: कठ 1.1.2
श्रेयśreya · “जो कल्याण लाए”
जो दूरगामी रूप से अच्छा है, कल्याणकारी। यह अक्सर अभी कठिन लगता है। अनुशासन, सच बोलना, मेहनत, ये सब श्रेय हैं। प्रेय का विपरीत। कठोपनिषद् का पहला practical सबक।
देखें: कठ 1.2.1-2
साधनाsādhanā · “साधन”
किसी लक्ष्य के लिए नियमित अभ्यास। ध्यान, मंत्र-जप, यज्ञ, स्वाध्याय, सेवा, सब साधना के रूप हैं। शब्द “साधक” इसी से है।
सत्यsatya · “जो है”
“सत्” से, यानी “होना”। सत्य वो है जो वास्तव में है, जिसका अस्तित्व अटूट है। केन कहती है, “सत्य उपनिषद् का घर है”, यानी बिना सत्यवादिता के यह विद्या टिकती नहीं।
देखें: केन 4.8