अंग 244

अंग
244
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਾਰੀ ਤਾ ਕੰਤ ਪਿਆਰੀ ਨਾਮੇ ਧਰੀ ਪਿਆਰੋ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਨਾਹ ਪਿਆਰੀ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਗਲਿ ਹਾਰੋ ॥੨॥
ਧਨ ਏਕਲੜੀ ਜੀਉ ਬਿਨੁ ਨਾਹ ਪਿਆਰੇ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਮੁਠੀ ਜੀਉ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਕਰਾਰੇ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦ ਪਿਆਰੇ ਕਉਣੁ ਦੁਤਰੁ ਤਾਰੇ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਖੁਆਈ ॥
ਕੂੜਿ ਵਿਗੁਤੀ ਤਾ ਪਿਰਿ ਮੁਤੀ ਸਾ ਧਨ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਈ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੇ ਰਾਤੀ ਸਹਜੇ ਮਾਤੀ ਅਨਦਿਨੁ ਰਹੈ ਸਮਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤੀ ਹਰਿ ਜੀਉ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥੩॥
ਤਾ ਮਿਲੀਐ ਹਰਿ ਮੇਲੇ ਜੀਉ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਕਵਣੁ ਮਿਲਾਏ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪ੍ਰੀਤਮ ਆਪਣੇ ਜੀਉ ਕਉਣੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਗੁਰੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ਇਉ ਮਿਲੀਐ ਮਾਏ ਤਾ ਸਾ ਧਨ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਬਿਨੁ ਘੋਰ ਅੰਧਾਰੁ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮਗੁ ਨ ਪਾਏ ॥
ਕਾਮਣਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੀ ਸਹਜੇ ਮਾਤੀ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਹਰਿ ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਇ ਪਿਆਰੇ ॥੪॥੧॥
हरि गुण सारी ता कंत पिआरी नामे धरी पिआरो ॥
नानक कामणि नाह पिआरी राम नामु गलि हारो ॥२॥
धन एकलड़ी जीउ बिनु नाह पिआरे ॥
दूजै भाइ मुठी जीउ बिनु गुर सबद करारे ॥
बिनु सबद पिआरे कउणु दुतरु तारे माइआ मोहि खुआई ॥
कूड़ि विगुती ता पिरि मुती सा धन महलु न पाई ॥
गुर सबदे राती सहजे माती अनदिनु रहै समाए ॥
नानक कामणि सदा रंगि राती हरि जीउ आपि मिलाए ॥३॥
ता मिलीऐ हरि मेले जीउ हरि बिनु कवणु मिलाए ॥
बिनु गुर प्रीतम आपणे जीउ कउणु भरमु चुकाए ॥
गुरु भरमु चुकाए इउ मिलीऐ माए ता सा धन सुखु पाए ॥
गुर सेवा बिनु घोर अंधारु बिनु गुर मगु न पाए ॥
कामणि रंगि राती सहजे माती गुर कै सबदि वीचारे ॥
नानक कामणि हरि वरु पाइआ गुर कै भाइ पिआरे ॥४॥१॥

हिन्दी अर्थ: जो जीव-स्त्री परमात्मा के नाम से प्यार डालती है परमात्मा के गुण (अपने हृदय में) संभालती है वह परमात्मा पति की प्यारी बन जाती है। हे नानक ! जिस जीव-स्त्री के गले में परमात्मा का नाम रूपी हार पड़ा रहता है। वह जीव-स्त्री परमात्मा की प्यारी हो जाती है। 2। हे जीउ ! जो जीव स्त्री प्यारे पति प्रभू के बिना अकेली (सूना जीवन व्यतीत कर रही) है। वह गुरू के सहारा देने वाले शबद के बिना और ही प्यार में ठगी जा रही है। गुरू के शबद के बिना और कोई नहीं जो उसे दुष्तर (संसार समुंद्र) से पार लंघा सकता है। वह माया के मोह में (फसी) परेशान होती रहती है। जब जीव-स्त्री (माया के) झूठे मोह में परेशान होती है। तब (समझो कि) पति प्रभू से वह छुटॅड़ हुई पड़ी है। वह जीव-स्त्री परमात्मा पति का ठिकाना नहीं ढूँढ सकती। (पर) जो जीव स्त्री गुरू के शबद में रंगी रहती है। वह आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है। वह हर वक्त (प्रभू चरणों में) लीन रहती है। हे नानक ! वह जीव स्त्री सदा (प्रभू पति के) प्रेम रंग में रंगी रहती है। उसे परमात्मा खुद (अपने चरणों में) मिलाए रखता है। 3। हे जीउ ! (प्रभू चरणों में) तब ही मिल सकते हैं। अगर प्रभू खुद ही मिला ले। परमात्मा के बिना (उसके चरणों में) और कौन मिला सकता है? (क्योंकि ) हे जीउ ! अपने प्रीतम गुरू के बिना और कोई (हमारे मन की) भटकना दूर नहीं कर सकता। हे माँ ! अगर गुरू (जीव स्त्री के मन की) भटकना दूर कर दे। तो इस तरह (प्रभू चरणों में) मिल सकते हैं। तभी जीव स्त्री आत्मिक आनंद पाती है। गुरू की शरण पड़े बिना उसे (जीवन का सही) रास्ता नहीं मिल सकता। हे नानक ! जो जीव-स्त्री गुरू के शबद की बरकति से (प्रभू पति के गुणों को) अपने सोच-मण्डल में टिकाती है। वह प्रभू के प्रेम रंग में रंगी रहती है। और आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है। गुरू के प्रेम में गुरू के प्यार में टिकने के कारण उस जीव-स्त्री का प्रभू पति से मिलाप हो जाता है। 4। 1।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਪਿਰ ਬਿਨੁ ਖਰੀ ਨਿਮਾਣੀ ਜੀਉ ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਕਿਉ ਜੀਵਾ ਮੇਰੀ ਮਾਈ ॥
ਪਿਰ ਬਿਨੁ ਨੀਦ ਨ ਆਵੈ ਜੀਉ ਕਾਪੜੁ ਤਨਿ ਨ ਸੁਹਾਈ ॥
ਕਾਪਰੁ ਤਨਿ ਸੁਹਾਵੈ ਜਾ ਪਿਰ ਭਾਵੈ ਗੁਰਮਤੀ ਚਿਤੁ ਲਾਈਐ ॥
ਸਦਾ ਸੁਹਾਗਣਿ ਜਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਗੁਰ ਕੈ ਅੰਕਿ ਸਮਾਈਐ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੈ ਮੇਲਾ ਤਾ ਪਿਰੁ ਰਾਵੀ ਲਾਹਾ ਨਾਮੁ ਸੰਸਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਨਾਹ ਪਿਆਰੀ ਜਾ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਸਾਰੇ ॥੧॥
ਸਾ ਧਨ ਰੰਗੁ ਮਾਣੇ ਜੀਉ ਆਪਣੇ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰੇ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੀ ਜੀਉ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੇ ਹਉਮੈ ਮਾਰੇ ਇਨ ਬਿਧਿ ਮਿਲਹੁ ਪਿਆਰੇ ॥
ਸਾ ਧਨ ਸੋਹਾਗਣਿ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤੀ ਸਾਚੈ ਨਾਮਿ ਪਿਆਰੇ ॥
ਅਪੁਨੇ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਰਹੀਐ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਗਹੀਐ ਦੁਬਿਧਾ ਮਾਰਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਹਰਿ ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਵਿਸਾਰੇ ॥੨॥
ਕਾਮਣਿ ਪਿਰਹੁ ਭੁਲੀ ਜੀਉ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਪਿਆਰੇ ॥
ਝੂਠੀ ਝੂਠਿ ਲਗੀ ਜੀਉ ਕੂੜਿ ਮੁਠੀ ਕੂੜਿਆਰੇ ॥
ਕੂੜੁ ਨਿਵਾਰੇ ਗੁਰਮਤਿ ਸਾਰੇ ਜੂਐ ਜਨਮੁ ਨ ਹਾਰੇ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਸੇਵੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵੈ ਵਿਚਹੁ ਹਉਮੈ ਮਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਵਸਾਏ ਐਸਾ ਕਰੇ ਸੀਗਾਰੋ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਮਣਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਣੀ ਜਿਸੁ ਸਾਚਾ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੋ ॥੩॥
ਮਿਲੁ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮਾ ਜੀਉ ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਖਰੀ ਨਿਮਾਣੀ ॥
ਮੈ ਨੈਣੀ ਨੀਦ ਨ ਆਵੈ ਜੀਉ ਭਾਵੈ ਅੰਨੁ ਨ ਪਾਣੀ ॥
ਪਾਣੀ ਅੰਨੁ ਨ ਭਾਵੈ ਮਰੀਐ ਹਾਵੈ ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ॥
गउड़ी महला ३ ॥
पिर बिनु खरी निमाणी जीउ बिनु पिर किउ जीवा मेरी माई ॥
पिर बिनु नीद न आवै जीउ कापड़ु तनि न सुहाई ॥
कापरु तनि सुहावै जा पिर भावै गुरमती चितु लाईऐ ॥
सदा सुहागणि जा सतिगुरु सेवे गुर कै अंकि समाईऐ ॥
गुर सबदै मेला ता पिरु रावी लाहा नामु संसारे ॥
नानक कामणि नाह पिआरी जा हरि के गुण सारे ॥१॥
सा धन रंगु माणे जीउ आपणे नालि पिआरे ॥
अहिनिसि रंगि राती जीउ गुर सबदु वीचारे ॥
गुर सबदु वीचारे हउमै मारे इन बिधि मिलहु पिआरे ॥
सा धन सोहागणि सदा रंगि राती साचै नामि पिआरे ॥
अपुने गुर मिलि रहीऐ अंम्रितु गहीऐ दुबिधा मारि निवारे ॥
नानक कामणि हरि वरु पाइआ सगले दूख विसारे ॥२॥
कामणि पिरहु भुली जीउ माइआ मोहि पिआरे ॥
झूठी झूठि लगी जीउ कूड़ि मुठी कूड़िआरे ॥
कूड़ु निवारे गुरमति सारे जूऐ जनमु न हारे ॥
गुर सबदु सेवे सचि समावै विचहु हउमै मारे ॥
हरि का नामु रिदै वसाए ऐसा करे सीगारो ॥
नानक कामणि सहजि समाणी जिसु साचा नामु अधारो ॥३॥
मिलु मेरे प्रीतमा जीउ तुधु बिनु खरी निमाणी ॥
मै नैणी नीद न आवै जीउ भावै अंनु न पाणी ॥
पाणी अंनु न भावै मरीऐ हावै बिनु पिर किउ सुखु पाईऐ ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ३ ॥ हे मेरी माँ ! पति प्रभू के मिलाप के बिना मेरी जीवात्मा बहुत कंगाल सी रहती है। प्रभू पति से मेल के बिना मेरे अंदर आत्मिक जीवन नहीं आ सकता। (हे माँ !) प्रभू पति के बिना मेरे अंदर शांति नहीं आती। मुझे अपने शरीर पर कोई कपड़ा नहीं सुहाता। (हे माँ !) कपड़ा शरीर पर तभी सुहाता है जब मैं प्रभू पति को भा जाऊँ। (पर। हे माँ !) गुरू की मति पर चलने से ही प्रभू में चिक्त जुड़ सकता है। जब जीव-स्त्री गुरू की शरण पड़ती है। तब वह सदा वास्ते भाग्यशाली बन जाती है। (इस वास्ते। हे माँ !) गुरू की गोद में टिके रहना चाहिए। (हे माँ !) जब गुरू के शबद में (मेरा चिक्त) जुड़ता है। तब मैं प्रभू पति को मिल पड़ती हूँ। (हे माँ !) प्रभू का नाम ही जगत में (असल) कमाई है। हे नानक ! जीव स्त्री जब परमात्मा के गुण अपने हृदय में बसाती है। तब वह प्रभू पति को प्यारी लगने लग पड़ती है। 1। वह जीव स्त्री अपने प्रभू पति के मिलाप में आत्मिक आनंद भोगती है (क्योंकि) (हे मेरी माँ !) जो जीव-स्त्री गुरू के शबद को अपने सोच मण्डल में टिकाती है। वह दिन रात प्रभू पति के प्रेम रंग में रंगी रहती है। गुरू के शबद को विचार मण्डल में संभालती है वह अपने अंदर से अहंकार दूर कर लेती है। (हे सत्संगी सहेलियो ! तुम भी) इस प्रकार प्रभू प्यारे को मिलो। (हे माँ !) वह जीव स्त्री हमेशा भाग्यशाली है। सदा प्रभू पति के प्रेम रंग में रंगी रहती है। जो सदा स्थिर प्रभू के नाम में प्रेम करती है। हे सहेलियो ! अपने गुरू को मिल के रहना चाहिए (गुरू से ही) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल ले सकते हैं। (जिसे ये नाम-जल मिल जाता है वह अपने अंदर से) मेर-तेर को समाप्त कर देती है। हे नानक ! उस जीव-स्त्री ने पति प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया। उसने सारे दुख भुला लिए। 2। (हे माँ !) जो जीव-स्त्री प्रभू पति (की याद) से टूट जाती है। वह माया के मोह में (फंस के और पदार्थों को) प्यार करने लग पड़ती है। वह झूठे और कूड़ पदार्थों की वणजारन झूठे मोह में लगी रहती है। झूठे मोह में ठॅगी जाती है। पर जो जीव-स्त्री गुरू की मति को (अपने हृदय में) संभालती है। वह झूठे मोह को (अपने अंदर से) दूर कर लेती है। (और इस तरह) अपना जन्म व्यर्थ नहीं गवाती। वह जीव स्त्री गुरू के शबद को संभालती है। सदा स्थिर प्रभू में लीन हो जाती है और अपने अंदर से अहंकार को खत्म कर देती है। वह परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसा लेती है – वह ऐसा आत्मिक श्रृंगार करती है। हे नानक ! सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम जिस जीव-स्त्री का जीवन आसरा है। वह जीव-स्त्री आत्मिक अडोलता में टिकी रहती है। 3। हे मेरे प्रीतम प्रभू जी ! मुझे मिल। तेरे बिना मैं बहुत आजिज हूँ। (हे प्रीतम जी !) तेरे बिना मेरे आँखों में नींद नहीं आती। मुझे ना अन्न अच्छा लगता है ना पानी। (हे माँ ! प्रीतम प्रभू के विछोड़े में) अन्न-पानी अच्छा नहीं लगता। सिसकियों में जिंद दुखी रहती है। पति प्रभू के बिना आत्मिक आनंद प्राप्त नहीं होता।

संदर्भ: यह अंग 244 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

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ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 244” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 245 →, पीछे का: ← अंग 243

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।