अंग 238

अंग
238
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਤਿਸ ਕਉ ਭਉ ਨਾਹਿ ॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਸੁ ਨਾਮਿ ਸਮਾਹਿ ॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਤਿਸ ਕੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੁਝੈ ॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਸੁ ਦਰਗਹ ਸਿਝੈ ॥੨॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਸੋ ਧਨਵੰਤਾ ॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਸੋ ਪਤਿਵੰਤਾ ॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਸੋਈ ਜਤੀ ॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਤਿਸੁ ਹੋਵੈ ਗਤੀ ॥੩॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਤਿਸ ਕਾ ਆਇਆ ਗਨੀ ॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਸੁ ਨਿਹਚਲੁ ਧਨੀ ॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਸੋ ਵਡਭਾਗਾ ॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਸੁ ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਗਾ ॥੪॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਸੁ ਜੀਵਨ ਮੁਕਤਾ ॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਤਿਸ ਕੀ ਨਿਰਮਲ ਜੁਗਤਾ ॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਸੋਈ ਸੁਗਿਆਨੀ ॥
ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਸੁ ਸਹਜ ਧਿਆਨੀ ॥੫॥
ਇਸੁ ਮਾਰੀ ਬਿਨੁ ਥਾਇ ਨ ਪਰੈ ॥ ਕੋਟਿ ਕਰਮ ਜਾਪ ਤਪ ਕਰੈ ॥
ਇਸੁ ਮਾਰੀ ਬਿਨੁ ਜਨਮੁ ਨ ਮਿਟੈ ॥
ਇਸੁ ਮਾਰੀ ਬਿਨੁ ਜਮ ਤੇ ਨਹੀ ਛੁਟੈ ॥੬॥
ਇਸੁ ਮਾਰੀ ਬਿਨੁ ਗਿਆਨੁ ਨ ਹੋਈ ॥
ਇਸੁ ਮਾਰੀ ਬਿਨੁ ਜੂਠਿ ਨ ਧੋਈ ॥
ਇਸੁ ਮਾਰੀ ਬਿਨੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਮੈਲਾ ॥
ਇਸੁ ਮਾਰੀ ਬਿਨੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਉਲਾ ॥੭॥
ਜਾ ਕਉ ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਿ ॥
ਤਿਸੁ ਭਈ ਖਲਾਸੀ ਹੋਈ ਸਗਲ ਸਿਧਿ ॥
ਗੁਰਿ ਦੁਬਿਧਾ ਜਾ ਕੀ ਹੈ ਮਾਰੀ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੋ ਬ੍ਰਹਮ ਬੀਚਾਰੀ ॥੮॥੫॥
जो इसु मारे तिस कउ भउ नाहि ॥
जो इसु मारे सु नामि समाहि ॥
जो इसु मारे तिस की त्रिसना बुझै ॥
जो इसु मारे सु दरगह सिझै ॥२॥
जो इसु मारे सो धनवंता ॥
जो इसु मारे सो पतिवंता ॥
जो इसु मारे सोई जती ॥
जो इसु मारे तिसु होवै गती ॥३॥
जो इसु मारे तिस का आइआ गनी ॥
जो इसु मारे सु निहचलु धनी ॥
जो इसु मारे सो वडभागा ॥
जो इसु मारे सु अनदिनु जागा ॥४॥
जो इसु मारे सु जीवन मुकता ॥
जो इसु मारे तिस की निरमल जुगता ॥
जो इसु मारे सोई सुगिआनी ॥
जो इसु मारे सु सहज धिआनी ॥५॥
इसु मारी बिनु थाइ न परै ॥ कोटि करम जाप तप करै ॥
इसु मारी बिनु जनमु न मिटै ॥
इसु मारी बिनु जम ते नही छुटै ॥६॥
इसु मारी बिनु गिआनु न होई ॥
इसु मारी बिनु जूठि न धोई ॥
इसु मारी बिनु सभु किछु मैला ॥
इसु मारी बिनु सभु किछु जउला ॥७॥
जा कउ भए क्रिपाल क्रिपा निधि ॥
तिसु भई खलासी होई सगल सिधि ॥
गुरि दुबिधा जा की है मारी ॥
कहु नानक सो ब्रहम बीचारी ॥८॥५॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जो मनुष्य इस दुबिधा को खत्म कर लेता है। उसे (दुनिया का कोई) डर सता नहीं सकता। जो जो मनुष्य इसे समाप्त कर लेते हैं। वह सारे परमात्मा के नाम में लीन हो जाते हैं। जो मनुष्य इस मेर-तेर को अपने अंदर से दूर कर लेते हैं। उनकी माया की तृष्णा समाप्त हो जाती है। वे परमात्मा की दरगाह में कामयाब हो जाते हैं। 2। (हे भाई !) जो मनुष्य दुबिधा को मिटा लेता है। वह नाम-धन का मालिक बन जाता है। वह इज्जत वाला हो जाता है। वही असल जती है। उसको उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त हो जाती है। 3। (हे भाई !) जो मनुष्य दुबिधा को मिटा लेता है। उसका जगत में आना सफल समझा जाता है। वह माया के हमलों के मुकाबले से अडोल रहता है। वही असल धनवान है। जो मनुष्य अपने अंदर से मेर-तेर दूर कर लेता है। वह बड़ा भाग्यशाली है। वह हर वक्त माया के हमलों से सुचेत रहता है। 4। जो मनुष्य इस दुबिधा को खत्म कर लेता है। वह दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ ही विकारों से आजाद रहता है। उसका रहन-सहन सदा पवित्र होता है। वही मनुष्य परमात्मा के साथ गहरी सांझ वाला है। वह सदा आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। 5। (हे भाई !) इस मेर-तेर को दूर किए बिना कोई भी मनुष्य परमात्मा की नजरों में कबूल नहीं होता। चाहे वह करोड़ों जप और तप आदि कर्म करता रहे। दुबिधा को मिटाए बिना मनुष्य का जन्मों का चक्र खत्म नहीं होता। जमों से निजात नहीं मिलती। 6। (हे भाई !) दुबिधा दूर किए बिना मनुष्य की परमात्मा के साथ गहरी सांझ नहीं बन सकती। मन में से विकारों की मैल नहीं धुलती। जब तक मनुष्य दुबिधा को नहीं खत्म करता। (वह) जो कुछ भी करता है मन को और विकारी बनाए जाता है और परमात्मा से दूरी बनाए रखता है। 7। जिस मनुष्य पर दया का खजाना परमात्मा दयावान होता है। उसे दुबिधा से निजात मिल जाती है। उसे जीवन की पूरी सफलता प्राप्त हो जाती है। हे नानक ! कह, गुरू ने जिस मनुष्य के अंदर से मेर-तेर दूर कर दी। वह परमात्मा के गुणों के विचार करने के काबिल हो गया। 8। 5।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਸਿਉ ਜੁਰੈ ਤ ਸਭੁ ਕੋ ਮੀਤੁ ॥
ਹਰਿ ਸਿਉ ਜੁਰੈ ਤ ਨਿਹਚਲੁ ਚੀਤੁ ॥
ਹਰਿ ਸਿਉ ਜੁਰੈ ਨ ਵਿਆਪੈ ਕਾੜੑਾ ॥
ਹਰਿ ਸਿਉ ਜੁਰੈ ਤ ਹੋਇ ਨਿਸਤਾਰਾ ॥੧॥
ਰੇ ਮਨ ਮੇਰੇ ਤੂੰ ਹਰਿ ਸਿਉ ਜੋਰੁ ॥
ਕਾਜਿ ਤੁਹਾਰੈ ਨਾਹੀ ਹੋਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵਡੇ ਵਡੇ ਜੋ ਦੁਨੀਆਦਾਰ ॥
ਕਾਹੂ ਕਾਜਿ ਨਾਹੀ ਗਾਵਾਰ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਦਾਸੁ ਨੀਚ ਕੁਲੁ ਸੁਣਹਿ ॥
ਤਿਸ ਕੈ ਸੰਗਿ ਖਿਨ ਮਹਿ ਉਧਰਹਿ ॥੨॥
ਕੋਟਿ ਮਜਨ ਜਾ ਕੈ ਸੁਣਿ ਨਾਮ ॥
ਕੋਟਿ ਪੂਜਾ ਜਾ ਕੈ ਹੈ ਧਿਆਨ ॥
ਕੋਟਿ ਪੁੰਨ ਸੁਣਿ ਹਰਿ ਕੀ ਬਾਣੀ ॥
ਕੋਟਿ ਫਲਾ ਗੁਰ ਤੇ ਬਿਧਿ ਜਾਣੀ ॥੩॥
ਮਨ ਅਪੁਨੇ ਮਹਿ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਚੇਤ ॥
ਬਿਨਸਿ ਜਾਹਿ ਮਾਇਆ ਕੇ ਹੇਤ ॥
ਹਰਿ ਅਬਿਨਾਸੀ ਤੁਮਰੈ ਸੰਗਿ ॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਰਚੁ ਰਾਮ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥੪॥
ਜਾ ਕੈ ਕਾਮਿ ਉਤਰੈ ਸਭ ਭੂਖ ॥
ਜਾ ਕੈ ਕਾਮਿ ਨ ਜੋਹਹਿ ਦੂਤ ॥
ਜਾ ਕੈ ਕਾਮਿ ਤੇਰਾ ਵਡ ਗਮਰੁ ॥
ਜਾ ਕੈ ਕਾਮਿ ਹੋਵਹਿ ਤੂੰ ਅਮਰੁ ॥੫॥
ਜਾ ਕੇ ਚਾਕਰ ਕਉ ਨਹੀ ਡਾਨ ॥
ਜਾ ਕੇ ਚਾਕਰ ਕਉ ਨਹੀ ਬਾਨ ॥
ਜਾ ਕੈ ਦਫਤਰਿ ਪੁਛੈ ਨ ਲੇਖਾ ॥
ਤਾ ਕੀ ਚਾਕਰੀ ਕਰਹੁ ਬਿਸੇਖਾ ॥੬॥
ਜਾ ਕੈ ਊਨ ਨਾਹੀ ਕਾਹੂ ਬਾਤ ॥
ਏਕਹਿ ਆਪਿ ਅਨੇਕਹਿ ਭਾਤਿ ॥
ਜਾ ਕੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਹੋਇ ਸਦਾ ਨਿਹਾਲ ॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਕਰਿ ਤਾ ਕੀ ਘਾਲ ॥੭॥
ਨਾ ਕੋ ਚਤੁਰੁ ਨਾਹੀ ਕੋ ਮੂੜਾ ॥
ਨਾ ਕੋ ਹੀਣੁ ਨਾਹੀ ਕੋ ਸੂਰਾ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
हरि सिउ जुरै त सभु को मीतु ॥
हरि सिउ जुरै त निहचलु चीतु ॥
हरि सिउ जुरै न विआपै काड़॑ा ॥
हरि सिउ जुरै त होइ निसतारा ॥१॥
रे मन मेरे तूं हरि सिउ जोरु ॥
काजि तुहारै नाही होरु ॥१॥ रहाउ ॥
वडे वडे जो दुनीआदार ॥
काहू काजि नाही गावार ॥
हरि का दासु नीच कुलु सुणहि ॥
तिस कै संगि खिन महि उधरहि ॥२॥
कोटि मजन जा कै सुणि नाम ॥
कोटि पूजा जा कै है धिआन ॥
कोटि पुंन सुणि हरि की बाणी ॥
कोटि फला गुर ते बिधि जाणी ॥३॥
मन अपुने महि फिरि फिरि चेत ॥
बिनसि जाहि माइआ के हेत ॥
हरि अबिनासी तुमरै संगि ॥
मन मेरे रचु राम कै रंगि ॥४॥
जा कै कामि उतरै सभ भूख ॥
जा कै कामि न जोहहि दूत ॥
जा कै कामि तेरा वड गमरु ॥
जा कै कामि होवहि तूं अमरु ॥५॥
जा के चाकर कउ नही डान ॥
जा के चाकर कउ नही बान ॥
जा कै दफतरि पुछै न लेखा ॥
ता की चाकरी करहु बिसेखा ॥६॥
जा कै ऊन नाही काहू बात ॥
एकहि आपि अनेकहि भाति ॥
जा की द्रिसटि होइ सदा निहाल ॥
मन मेरे करि ता की घाल ॥७॥
ना को चतुरु नाही को मूड़ा ॥
ना को हीणु नाही को सूरा ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) जब मनुष्य परमात्मा के साथ प्यार पैदा करता है, तो उसे हरेक मनुष्य अपना मित्र दिखाई देता है। तब उसका चित्त (विकारों के हमलों के मुकाबले पर सदा) अडोल रहता है। कोई चिंता-फिक्र उस पर अपना जोर नहीं डाल सकती। (इस संसार समुंद्र में से) उसका पार उतारा हो जाता है। 1। हे मेरे मन ! तू अपनी प्रीति परमात्मा से बना। (परमात्मा से प्रीति बनाए बगैर) कोई और उद्यम तेरे किसी काम नहीं आएगा। 1। रहाउ। (हे भाई ! जगत में) जो जो बड़ी बड़ी जायदादों वाले हैं। उन मूर्खों की (कोई जयदाद आत्मिक जीवन के रास्ते में) उनके काम नहीं आती। (दूसरी तरफ) परमात्मा का भक्त चाहे छोटे कुल में भी पैदा हुआ हो, तो भी लोग उसकी शिक्षा सुनते हैं। और उसकी संगति में रह के (संसार समुंद्र की विकारों की लहरों में से) एक पल में बच निकलते हैं। 2। (हे भाई !) जिस परमात्मा का नाम सुनने में करोड़ों तीर्थ स्नान आ जाते हैं। जिस परमात्मा का ध्यान धरने में करोड़ों देव-पूजा आ जाती हैं। जिस परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी सुनने में करोड़ों पुंन हो जाते हैं। गुरू से उस परमात्मा से मिलाप की विधि सीखने से ये सारे करोड़ों फल प्राप्त हो जाते हैं। 3। (हे भाई !) अपने मन में तू सदा परमात्मा को याद रख। माया वाले तेरे सारे ही मोह नाश हो जाएंगे। हे मेरे मन ! वह कभी नाश ना होने वाला परमात्मा सदा तेरे साथ बसता है। तू उस परमात्मा के प्रेम-रंग में सदा जुड़ा रह। 4। (हे भाई !) जिसकी सेवा भक्ति में लगने से (माया की) सारी भूख दूर हो जाती है। और जमदूत देख भी नहीं सकते। (हे भाई !) जिसकी सेवा भक्ति की बरकति से तेरा (हर जगह) बहुत तेज प्रताप बन सकता है। और तू चिर-आत्मिक जीवन वाला बन सकता है 5। (हे भाई !) जिस परमात्मा के सेवक-भक्त को कोई दुख-कलेश छू नहीं सकता। कोई ऐब नहीं चिपक सकता। जिस परमात्मा के दफतर में (सेवक भक्त से किए कर्मों का कोई) हिसाब नहीं मांगा जाता (क्योंकि सेवा-भगती कीबरकति से उससे कोई कुकर्म होते ही नहीं) उस परमात्मा की सेवा भगती विशेष तौर पर करते रहो। 6। हे मेरे मन ! जिस परमात्मा के घर में किसी चीज की कमी नहीं। जो परमात्मा एक स्वयं ही स्वयं होता हुआ अनेकों रूपों में प्रगट हो रहा है। जिस परमात्मा की मेहर की निगाह से हरेक जीव निहाल हो जाता है। तू उस परमात्मा की सेवा भक्ति कर। 7। (पर) हे नानक ! (अपने आप) ना कोई मनुष्य समझदार बन सकता है। ना कोई मनुष्य (अपनी मर्जी से) मूर्ख टिका रहता है। ना कोई शक्तिहीन है ना कोई बलवान शूरवीर है।

संदर्भ: यह अंग 238 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

दिल्ली का summer-shaadi, मंडप के बीच bride-groom, और परिवार की उम्मीदें।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 60 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 238” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 239 →, पीछे का: ← अंग 237

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।