विशेष पाठ
अनन्त बिल्व: चितिशक्ति का स्वरूप
वसिष्ठ का अमाप्य बिल्व: अखण्ड चेतना में प्रकट होते जगत का दृष्टान्त।
कथा पढ़िए →घर की लाइब्रेरी · जीवित ब्रह्मांड
महाकाव्य, उपनिषद् और दर्शन: मूल बनावट के साथ पढ़े हुए, और ऐसी हिन्दी में सुनाए हुए जैसे कोई अपना पास बैठकर क़िस्सा कहे।
भारतीय ग्रंथों का एक अभियन्ता-पाठ
संपादित चयन
आठ अलग प्रवेश-द्वार। हर चयन अपने ग्रंथ, प्रसंग और पढ़ने के समय तक साफ़ रास्ता देता है।
पहिया, स्पर्श, खींचकर या तीर-कुंजियों से चयन बदलिए।सभी ग्रंथ देखिए →
आज का अंश
हे महाभागे! मैं वानर हूँ और बुद्धिमान श्रीराम का दूत। देखिए, श्रीराम के नाम से अंकित यह देव-मुद्रिका (अँगूठी), जो उन महात्मा ने आपके विश्वास के लिए मुझे दी और मैं लाया हूँ। आश्वस्त हो जाइए, आपका कल्याण हो; आपके दुःखों का फल अब समाप्त हुआ।
वाल्मीकि रामायण · सुन्दरकाण्ड, सर्ग 14-40
हनुमान पहली बार सीता को अपनी पहचान बताते हैं और राम की मुद्रिका उनके सामने रखते हैं। अंश का पाठ और प्रसंग, दोनों स्रोतों से जाँचे गए हैं।
आरम्भ
तीन संपादित रास्ते। कोई पूर्वज्ञान नहीं चाहिए, केवल उतना समय और मन जितना आज आपके पास है।
पहली बार आए हैं तो इस सरल क्रम से पुस्तकालय को जानिए।
रास्ता खोलिए → 02 · आधा घंटातीस मिनट में पढ़े जा सकने वाले चुने हुए प्रवेश-द्वार।
रास्ता खोलिए → 03 · कठिन समयदुख के समय साथ बैठने वाले पाठों का शांत क्रम।
रास्ता खोलिए →कथाओं के बीच थोड़ा घूमिए
कथा-आकाश से कहानी चुनिए, जीवित कोश में रिश्ते समझिए, या कथा-गोले के भीतर पूरी चित्र-दीर्घा घुमाइए।
ग्रंथों की सूची से नहीं, जुड़े हुए तारों से खोजिए। जिस कथा की रोशनी बुलाए, वहीं से पढ़ना शुरू कीजिए।
आकाश खोलिए →पात्र, स्थान, विचार और समय: पूरे पुस्तकालय के रिश्ते एक जगह देखिए, फिर सीधे पाठ तक पहुँचिए।
जीवित कोश खोलिए →चित्रों से जड़ी एक घूमती दीर्घा। गोले को घुमाइए, कोई कथा चुनिए, और उसके पन्ने तक पहुँचिए।
गोला घुमाइए →पहले से कोई ग्रंथ मन में है?
पूरा पुस्तकालय देखिएविशेष पाठ
वसिष्ठ का अमाप्य बिल्व: अखण्ड चेतना में प्रकट होते जगत का दृष्टान्त।
कथा पढ़िए →हमारा तरीक़ा
यह निजी घर की लाइब्रेरी है, लेकिन हर पाठ के पीछे का संपादकीय काम सार्वजनिक और जाँचने योग्य रखा गया है।
अर्थ को सँभालते हुए ऐसी भाषा, जिसमें लंबा ग्रंथ भी पास बैठकर सुनाई कथा लगे।
हमारे बारे में →नक़्शे, क्रम और कड़ियाँ, ताकि पात्रों और विचारों के बीच रास्ता कभी न खोए।
जीवित कोश देखिए →संस्करण, पाठ-साक्ष्य और संपादकीय निर्णय जहाँ संभव हो वहीं से खोले जा सकते हैं।
स्रोत देखिए →कथा चुनिए, धीरे पढ़िए, और जब मन हो वहीं लौट आइए।
अपना रास्ता चुनिए →