लुल्ला परिवार का पुस्तकालय
कहानियाँ जो
हज़ारों बरस से
जाग रही हैं
महाभारत से उपनिषद् तक, चालीस से ज़्यादा ग्रंथ। श्लोक-दर-श्लोक पढ़े हुए, और ऐसी हिन्दी में सुनाए हुए जैसे कोई अपना पास बैठकर क़िस्सा कहे।
An engineer’s reading of the Indic canon
पुस्तकालय
जहाँ से चाहें, वहीं से खोलिए
हर ग्रंथ अपनी पूरी बनावट के साथ, कहानी की ज़ुबान में। डेस्कटॉप पर स्क्रॉल कीजिए, फ़ोन पर उँगली से सरकाइए।
तरीक़ा
पढ़ने का अपना अंदाज़
कहानीकार की ज़ुबान
श्लोक का अर्थ भी बचा रहे और कहानी की रवानी भी। हर पन्ना ऐसे, जैसे शाम की चाय पर कोई अपना सुना रहा हो।
इंजीनियर की नज़र
पहले ग्रंथ की बनावट, फिर पाठ। नक़्शे, कड़ियाँ और पढ़ने के क्रम, ताकि लंबे ग्रंथ में रास्ता न भटके।
जेब में, हर वक़्त
फ़ोन पर इंस्टॉल कीजिए और बिना इंटरनेट भी पढ़िए। दिन में उजली थीम, रात में स्याही जैसी गहरी।
झलकियाँ
रंग में रँगी कथाएँ
पन्नों के बीच बैठे चित्र, जो कहानी के ठीक उसी मोड़ पर मिलते हैं। किसी पर भी उँगली रखिए, कथा खुल जाएगी।
आज का वचन
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
भगवद्गीता · अध्याय 2 · श्लोक 47
हक़ काम पर है, फल पर नहीं। बस यही एक बात गाँठ बाँध लीजिए, बाक़ी गीता इसी की शरह है।
पूरा अध्याय पढ़िए →रास्ते
कहाँ से शुरू करें?
तीन रास्ते, तीन मिज़ाज। जो आपका हो, वही ठीक है।
पहली मुलाक़ात
हनुमान चालीसा से गीता के दूसरे अध्याय तक, हल्के क़दमों से। छोटे पाठ, पूरी मिठास।
रास्ता देखिए → 2कहानी के शौक़ीन
भागवतम् की पैंसठ कहानियों से शुरू कीजिए, फिर महाभारत के अठारह पर्व आपका इंतज़ार करेंगे।
रास्ता देखिए → 3दर्शन की प्यास
उपनिषदों के सवालों से योग वासिष्ठ की कहानियों तक। धीमा पाठ, गहरा पानी।
रास्ता देखिए →


















