अंग 209

अंग
209
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤੁਮ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਰਾਤੇ ਸੰਤਹੁ ॥
ਨਿਬਾਹਿ ਲੇਹੁ ਮੋ ਕਉ ਪੁਰਖ ਬਿਧਾਤੇ ਓੜਿ ਪਹੁਚਾਵਹੁ ਦਾਤੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੁਮਰਾ ਮਰਮੁ ਤੁਮਾ ਹੀ ਜਾਨਿਆ ਤੁਮ ਪੂਰਨ ਪੁਰਖ ਬਿਧਾਤੇ ॥
ਰਾਖਹੁ ਸਰਣਿ ਅਨਾਥ ਦੀਨ ਕਉ ਕਰਹੁ ਹਮਾਰੀ ਗਾਤੇ ॥੧॥
ਤਰਣ ਸਾਗਰ ਬੋਹਿਥ ਚਰਣ ਤੁਮਾਰੇ ਤੁਮ ਜਾਨਹੁ ਅਪੁਨੀ ਭਾਤੇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਿਸੁ ਰਾਖਹੁ ਸੰਗੇ ਤੇ ਤੇ ਪਾਰਿ ਪਰਾਤੇ ॥੨॥
ਈਤ ਊਤ ਪ੍ਰਭ ਤੁਮ ਸਮਰਥਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੁਮਰੈ ਹਾਥੇ ॥
ਐਸਾ ਨਿਧਾਨੁ ਦੇਹੁ ਮੋ ਕਉ ਹਰਿ ਜਨ ਚਲੈ ਹਮਾਰੈ ਸਾਥੇ ॥੩॥
ਨਿਰਗੁਨੀਆਰੇ ਕਉ ਗੁਨੁ ਕੀਜੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਜਾਪੇ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭੇਟੇ ਮਨ ਤਨ ਸੀਤਲ ਧ੍ਰਾਪੇ ॥੪॥੧੪॥੧੩੫॥
गउड़ी महला ५ ॥
तुम हरि सेती राते संतहु ॥
निबाहि लेहु मो कउ पुरख बिधाते ओड़ि पहुचावहु दाते ॥१॥ रहाउ ॥
तुमरा मरमु तुमा ही जानिआ तुम पूरन पुरख बिधाते ॥
राखहु सरणि अनाथ दीन कउ करहु हमारी गाते ॥१॥
तरण सागर बोहिथ चरण तुमारे तुम जानहु अपुनी भाते ॥
करि किरपा जिसु राखहु संगे ते ते पारि पराते ॥२॥
ईत ऊत प्रभ तुम समरथा सभु किछु तुमरै हाथे ॥
ऐसा निधानु देहु मो कउ हरि जन चलै हमारै साथे ॥३॥
निरगुनीआरे कउ गुनु कीजै हरि नामु मेरा मनु जापे ॥
संत प्रसादि नानक हरि भेटे मन तन सीतल ध्रापे ॥४॥१४॥१३५॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे संत जनो ! (तुम भाग्यशाली हो कि) तुम परमात्मा के साथ रंगे हुए हो। हे सर्व-व्यापक करतार ! हे दातार ! मुझे भी (अपने प्यार में) निबाह ले~ मुझे भी सिरे तक (प्रीति के दर्जे तक) पहुँचा ले। 1। रहाउ। हे सर्व-व्यापक करतार ! अपने दिल की बात तू स्वयं ही जानता है~ मुझ अनाथ को गरीब को अपनी शरण में रख~ मेरी आत्मिक अवस्था ऊँची बना दे। 1। (हे प्रभू !) संसार समुंद्र से पार हो गुजरने के लिए तेरे चरण (मेरे लिए) जहाज हैं। किस तरीके से तू पार लंघाता है? – ये तू खुद ही जानता है। हे प्रभू ! मेहर करके जिस जिस मनुष्य को तू अपने साथ रखता है~ वे सारे (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 2। हे प्रभू ! (हम जीवों के लिए) इस लोक में और परलोक में तू ही सब ताकतों का मालिक है (हमारा हरेक सुख दुख) तेरे ही हाथ में है। हे प्रभू के संत जनो ! मुझे ऐसा नाम-खजाना दो~ जो (यहाँ से जाते समय) मेरे साथ जाए। 3। (हे संत जनो !) मुझ गुणहीन को (परमात्मा की सिफत सालाह का) गुण बख्शो। (मेहर करो) मेरा मन परमात्मा का नाम सदा जपता रहे। हे नानक ! गुरू संत की किरपा से जिन लोगों को परमात्मा मिल जाता है~ उनके मन (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाते हैं~ उनके तन ठण्डे ठार हो जाते हैं (विकारों की तपस से बच जाते हैं)। 4। 14। 135।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਹਜਿ ਸਮਾਇਓ ਦੇਵ ॥
ਮੋ ਕਉ ਸਤਿਗੁਰ ਭਏ ਦਇਆਲ ਦੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਟਿ ਜੇਵਰੀ ਕੀਓ ਦਾਸਰੋ ਸੰਤਨ ਟਹਲਾਇਓ ॥
ਏਕ ਨਾਮ ਕੋ ਥੀਓ ਪੂਜਾਰੀ ਮੋ ਕਉ ਅਚਰਜੁ ਗੁਰਹਿ ਦਿਖਾਇਓ ॥੧॥
ਭਇਓ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ਸਰਬ ਉਜੀਆਰਾ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਮਨਹਿ ਪ੍ਰਗਟਾਇਓ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਪੀਓ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਿਆ ਅਨਭੈ ਠਹਰਾਇਓ ॥੨॥
ਮਾਨਿ ਆਗਿਆ ਸਰਬ ਸੁਖ ਪਾਏ ਦੂਖਹ ਠਾਉ ਗਵਾਇਓ ॥
ਜਉ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਭਏ ਪ੍ਰਭ ਠਾਕੁਰ ਸਭੁ ਆਨਦ ਰੂਪੁ ਦਿਖਾਇਓ ॥੩॥
ਨਾ ਕਿਛੁ ਆਵਤ ਨਾ ਕਿਛੁ ਜਾਵਤ ਸਭੁ ਖੇਲੁ ਕੀਓ ਹਰਿ ਰਾਇਓ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਅਗਮ ਅਗਮ ਹੈ ਠਾਕੁਰ ਭਗਤ ਟੇਕ ਹਰਿ ਨਾਇਓ ॥੪॥੧੫॥੧੩੬॥
गउड़ी महला ५ ॥
सहजि समाइओ देव ॥
मो कउ सतिगुर भए दइआल देव ॥१॥ रहाउ ॥
काटि जेवरी कीओ दासरो संतन टहलाइओ ॥
एक नाम को थीओ पूजारी मो कउ अचरजु गुरहि दिखाइओ ॥१॥
भइओ प्रगासु सरब उजीआरा गुर गिआनु मनहि प्रगटाइओ ॥
अंम्रितु नामु पीओ मनु त्रिपतिआ अनभै ठहराइओ ॥२॥
मानि आगिआ सरब सुख पाए दूखह ठाउ गवाइओ ॥
जउ सुप्रसंन भए प्रभ ठाकुर सभु आनद रूपु दिखाइओ ॥३॥
ना किछु आवत ना किछु जावत सभु खेलु कीओ हरि राइओ ॥
कहु नानक अगम अगम है ठाकुर भगत टेक हरि नाइओ ॥४॥१५॥१३६॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे प्रकाश रूप प्रभू ! मैं अब आत्मिक अडोलता में लीन रहता हूँ। (तेरी मेहर से) मेरे पर सतिगुरू जी दयावान हो गए~1। रहाउ। मेरी (माया के मोह की) जंजीर काट के मुझे तेरा दास बना दिया है~ मुझे संत जनों की सेवा में लगा दिया है~ (हे प्रभू !) गुरू ने मुझे तेरा (हर जगह व्यापक) आश्चर्यजनक रूप दिखा दिया है~ अब मैं सिर्फ तेरे ही नाम का पुजारी बन गया हूँ। 1। (हे भाई !) जब से गुरू का बख्शा हुआ ज्ञान मेरे मन में प्रगट हो गया~ तो मेरे अंदर परमात्मा के अस्तित्व का प्रकाश हो गया~ मुझे हर जगह उसी की रौशनी नजर आने लगी। गुरू की कृपा से मैंने आत्मिक जीवन देने वाला परमात्मा का नाम-रस पीया है~ और मेरा मन (माया की तृष्णा से) भर चुका है। मैं उस परमात्मा में टिक गया हूँ जिसे कोई डर छू नहीं सकता। 2। (हे भाई !) गुरू का हुकम मान के मैंने सारे सुख-आनंद प्राप्त कर लिए हैं~ मैंने अपने अंदर से दुखों का डेरा ही उठा दिया है। जब से (गुरू की कृपा से) ठाकुर प्रभू जी मेरे पर मेहरवान हुए हैं~ मुझे हर जगह वह आनंद स्वरूप परमात्मा ही दिख रहा है। 3। (हे भाई ! जब से सतिगुरू जी मेरे पर दयावान हुए हैं~ मुझे विश्वास हो गया है कि) ना कुछ पैदा होता है ना कुछ मरता है~ ये सारा तो प्रभू पातशाह ने एक खेल रचाया हुआ है। हे नानक ! कह, सर्व-पालक परमात्मा अपहुँच है~ सब जीवों की पहुँच से परे है। उसके भक्तों को उस हरी के नाम का ही सहारा है। 4। 15। 136।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪੂਰਨ ਪਰਮੇਸੁਰ ਮਨ ਤਾ ਕੀ ਓਟ ਗਹੀਜੈ ਰੇ ॥
ਜਿਨਿ ਧਾਰੇ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਖੰਡ ਹਰਿ ਤਾ ਕੋ ਨਾਮੁ ਜਪੀਜੈ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨ ਕੀ ਮਤਿ ਤਿਆਗਹੁ ਹਰਿ ਜਨ ਹੁਕਮੁ ਬੂਝਿ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਰੇ ॥
ਜੋ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰੈ ਸੋਈ ਭਲ ਮਾਨਹੁ ਸੁਖਿ ਦੁਖਿ ਓਹੀ ਧਿਆਈਐ ਰੇ ॥੧॥
ਕੋਟਿ ਪਤਿਤ ਉਧਾਰੇ ਖਿਨ ਮਹਿ ਕਰਤੇ ਬਾਰ ਨ ਲਾਗੈ ਰੇ ॥
ਦੀਨ ਦਰਦ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਸੁਆਮੀ ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸਹਿ ਨਿਵਾਜੈ ਰੇ ॥੨॥
ਸਭ ਕੋ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਕ ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਨ ਸੁਖ ਸਾਗਰੁ ਰੇ ॥
ਦੇਂਦੇ ਤੋਟਿ ਨਾਹੀ ਤਿਸੁ ਕਰਤੇ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਰਤਨਾਗਰੁ ਰੇ ॥੩॥
ਜਾਚਿਕੁ ਜਾਚੈ ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ਸੁਆਮੀ ਘਟ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਸੋਈ ਰੇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਦਾਸੁ ਤਾ ਕੀ ਸਰਣਾਈ ਜਾ ਤੇ ਬ੍ਰਿਥਾ ਨ ਕੋਈ ਰੇ ॥੪॥੧੬॥੧੩੭॥
गउड़ी महला ५ ॥
पारब्रहम पूरन परमेसुर मन ता की ओट गहीजै रे ॥
जिनि धारे ब्रहमंड खंड हरि ता को नामु जपीजै रे ॥१॥ रहाउ ॥
मन की मति तिआगहु हरि जन हुकमु बूझि सुखु पाईऐ रे ॥
जो प्रभु करै सोई भल मानहु सुखि दुखि ओही धिआईऐ रे ॥१॥
कोटि पतित उधारे खिन महि करते बार न लागै रे ॥
दीन दरद दुख भंजन सुआमी जिसु भावै तिसहि निवाजै रे ॥२॥
सभ को मात पिता प्रतिपालक जीअ प्रान सुख सागरु रे ॥
देंदे तोटि नाही तिसु करते पूरि रहिओ रतनागरु रे ॥३॥
जाचिकु जाचै नामु तेरा सुआमी घट घट अंतरि सोई रे ॥
नानकु दासु ता की सरणाई जा ते ब्रिथा न कोई रे ॥४॥१६॥१३७॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे मेरे मन ! उस परमात्मा का आसरा लेना चाहिए~ जो बेअंत है~ सर्व-व्यापक है~ और सबसे बड़ा मालिक है। हे मन ! उस परमात्मा का नाम जपना चाहिए~ जिसने सारे धरती मण्डलों को~ सारे जगत को (पैदा करके) सहारा दिया हुआ है। 1। रहाउ। हे हरी के सेवको ! अपने मन की चतुराई छोड़ दो। परमात्मा की रजा को समझ के ही सुख पा सकते हैं। हे संत जनो ! सुख में (भी)~ और दुख में (भी) उस परमात्मा को ही याद करना चाहिए। हे संत जनो ! जो कुछ परमात्मा करता है~ उसे भला करके मानो। 1। (हे हरी जनो !) विकारों में गिरे हुए करोड़ों लोगों को (अगर चाहे तो) करतार एक पल में (विकारों से) बचा लेता है (और ये काम करते) करतार को छिन मात्र भी समय नहीं लगता। वह मालिक प्रभू गरीबों के दर्द-दुख नाश करने वाला है। जिस पर वह प्रसन्न होता है~ उस पर बख्शिशें करता है। 2। हे भाई ! परमात्मा सब की जिंद व प्राणों के वास्ते सुखों का समुंद्र है~ सभी का माँ-बाप है~ सबकी पालना करता है। (जीवों को दातें) देते हुए उस करतार के खजाने में कमी नहीं होती। वह रत्नों की खान है और रत्नों से नाको-नाक भरा हुआ है। 3। हे मेरे मालिक ! (तेरे दर का) मंगता (नानक) तेरा नाम (दात की तरह) मांगता है। (हे भाई !) दास नानक उस परमात्मा की ही शरण पड़ा है~ जिसके दर से कोई निराश नहीं जाता। 4। 16। 137।

संदर्भ: यह अंग 209 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Mehrauli के पुराने पत्थरों के पास, 800 साल का इतिहास और एक 600 साल पुरानी पंक्ति।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 33 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 209” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 210 →, पीछे का: ← अंग 208

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।