अंग 317

अंग
317
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜੋ ਮਾਰੇ ਤਿਨਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਸੇ ਕਿਸੈ ਨ ਸੰਦੇ ॥
ਵੈਰੁ ਕਰਨਿ ਨਿਰਵੈਰ ਨਾਲਿ ਧਰਮਿ ਨਿਆਇ ਪਚੰਦੇ ॥
ਜੋ ਜੋ ਸੰਤਿ ਸਰਾਪਿਆ ਸੇ ਫਿਰਹਿ ਭਵੰਦੇ ॥
ਪੇਡੁ ਮੁੰਢਾਹੂ ਕਟਿਆ ਤਿਸੁ ਡਾਲ ਸੁਕੰਦੇ ॥੩੧॥
जो मारे तिनि पारब्रहमि से किसै न संदे ॥
वैरु करनि निरवैर नालि धरमि निआइ पचंदे ॥
जो जो संति सरापिआ से फिरहि भवंदे ॥
पेडु मुंढाहू कटिआ तिसु डाल सुकंदे ॥३१॥

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य ईश्वर की तरफ से मरे हुए हैं। वह किसी के (सगे) नहीं। निर्वैरों के साथ (भी) वैर करते हैं। और (परमात्मा के) धर्म-न्याय के अनुसार दुखी होते हैं। जो मनुष्य संतों द्वारा तिरस्कारे हुए हैं। वह (जनम मरण में) भटकते फिरते हैं। (ये बात स्पष्ट है कि) जो पेड़ जड़ से काट दिया जाय उसकी टहनियां भी सूख जाती हैं। 31।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਭੰਨਣ ਘੜਣ ਸਮਰਥੁ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਸਦਾ ਸਮਾਲਹਿ ਮਿਤ੍ਰ ਤੂ ਦੁਖੁ ਸਬਾਇਆ ਲਥੁ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
गुर नानक हरि नामु द्रिड़ाइआ भंनण घड़ण समरथु ॥
प्रभु सदा समालहि मित्र तू दुखु सबाइआ लथु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ॥५॥ हे नानक ! जो हरी शरीरों को सहजे ही नाश करके बना सकता है। सतिगुरू ने उस हरी का नाम (हमारे हृदय में) परो दिया है (और हमारा सब दुख दूर हो गया है)। हे मित्र ! अगर तू (भी) प्रभू को याद करे। तो (तेरे भी) सब दुख समाप्त हो जाएं। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਖੁਧਿਆਵੰਤੁ ਨ ਜਾਣਈ ਲਾਜ ਕੁਲਾਜ ਕੁਬੋਲੁ ॥
ਨਾਨਕੁ ਮਾਂਗੈ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸੰਜੋਗੁ ॥੨॥
मः ५ ॥
खुधिआवंतु न जाणई लाज कुलाज कुबोलु ॥
नानकु मांगै नामु हरि करि किरपा संजोगु ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ (जैसे) भूखा मनुष्य आदर (के वचन) या निरादरी के बुरे बोलों को नहीं जानता (भाव। परवाह नहीं करता और रोटी के लिए सवाल कर देता है। वैसे ही) हे हरी ! नानक (भी) तेरा नाम मांगता है। मेहर करके मिलाप बख्श। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਜੇਵੇਹੇ ਕਰਮ ਕਮਾਵਦਾ ਤੇਵੇਹੇ ਫਲਤੇ ॥
ਚਬੇ ਤਤਾ ਲੋਹ ਸਾਰੁ ਵਿਚਿ ਸੰਘੈ ਪਲਤੇ ॥
ਘਤਿ ਗਲਾਵਾਂ ਚਾਲਿਆ ਤਿਨਿ ਦੂਤਿ ਅਮਲ ਤੇ ॥
ਕਾਈ ਆਸ ਨ ਪੁੰਨੀਆ ਨਿਤ ਪਰ ਮਲੁ ਹਿਰਤੇ ॥
ਕੀਆ ਨ ਜਾਣੈ ਅਕਿਰਤਘਣ ਵਿਚਿ ਜੋਨੀ ਫਿਰਤੇ ॥
ਸਭੇ ਧਿਰਾਂ ਨਿਖੁਟੀਅਸੁ ਹਿਰਿ ਲਈਅਸੁ ਧਰ ਤੇ ॥
ਵਿਝਣ ਕਲਹ ਨ ਦੇਵਦਾ ਤਾਂ ਲਇਆ ਕਰਤੇ ॥
ਜੋ ਜੋ ਕਰਤੇ ਅਹੰਮੇਉ ਝੜਿ ਧਰਤੀ ਪੜਤੇ ॥੩੨॥
पउड़ी ॥
जेवेहे करम कमावदा तेवेहे फलते ॥
चबे तता लोह सारु विचि संघै पलते ॥
घति गलावां चालिआ तिनि दूति अमल ते ॥
काई आस न पुंनीआ नित पर मलु हिरते ॥
कीआ न जाणै अकिरतघण विचि जोनी फिरते ॥
सभे धिरां निखुटीअसु हिरि लईअसु धर ते ॥
विझण कलह न देवदा तां लइआ करते ॥
जो जो करते अहंमेउ झड़ि धरती पड़ते ॥३२॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (अकृतज्ञ) मनुष्य जैसे कर्म करता है। वह कर्म वैसा ही फल देता है; अगर कोई गर्म व करड़ा लोहा चबाए तो वह गले में चुभ जाता है। वह जमदूत (उन खोटे) कर्मों के कारण गले में रस्सा डाल के (भाव। निरादरी का बरताव करके) आगे लगा लेता है। सदा पराई मैल चुराते की (भाव निंदा करके सदा पराए पाप सिर पर लेते की) कोई आस पूरी नहीं होती (लोक और परलोक दोनों बर्बाद जाते हैं)। जूनियों में भटकता-भटकता वह अकृतज्ञ प्रभू के उपकारों को नहीं समझता (कि उसने मेहर करके मानस जनम बख्शा है)। (निंदा आदि के सारे दाँव-पेचों की) उसकी सारी ताकत खत्म हो जाती है। तब (फल भोगने के लिए) प्रभू उसे धरती से उठा लेता है। जब (चारों तरफ) झगड़े को (अकृतज्ञ) समाप्त नहीं होने देता (अर्थात। अति कर देता है) तो करतार (उसे) उठा लेता है। (असल बात ये कि) जो जो मनुष्य अहंकार करते हैं वे आखिर जमीन पे ही गिरते हैं। 32।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੩ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੁ ਬਿਬੇਕ ਬੁਧਿ ਹੋਇ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਹਿਰਦੈ ਹਾਰੁ ਪਰੋਇ ॥
ਪਵਿਤੁ ਪਾਵਨੁ ਪਰਮ ਬੀਚਾਰੀ ॥
ਜਿ ਓਸੁ ਮਿਲੈ ਤਿਸੁ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੀ ॥
ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਬਾਸਨਾ ਸਮਾਣੀ ॥
ਹਰਿ ਦਰਿ ਸੋਭਾ ਮਹਾ ਉਤਮ ਬਾਣੀ ॥
ਜਿ ਪੁਰਖੁ ਸੁਣੈ ਸੁ ਹੋਇ ਨਿਹਾਲੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਿਐ ਪਾਇਆ ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਮਾਲੁ ॥੧॥
सलोक मः ३ ॥
गुरमुखि गिआनु बिबेक बुधि होइ ॥
हरि गुण गावै हिरदै हारु परोइ ॥
पवितु पावनु परम बीचारी ॥
जि ओसु मिलै तिसु पारि उतारी ॥
अंतरि हरि नामु बासना समाणी ॥
हरि दरि सोभा महा उतम बाणी ॥
जि पुरखु सुणै सु होइ निहालु ॥
नानक सतिगुर मिलिऐ पाइआ नामु धनु मालु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख रहता है, उसमें ज्ञान और विचार वाली बुद्धि होती है; वह हरी के गुण गाता है और हृदय में (गुणों का हार) परो लेता है। (आचरण का) बड़ा शुद्ध और ऊँची मति वाला होता है। जो मनुष्य उसकी संगति करता है उसे भी (संसार सागर से) पार लंघा लेता है। उस मनुष्य के हृदय में हरी के नाम (रूपी) सुगन्धि समाई हुई होती है। (जिस कारण) उसकी बोली बड़ी उक्तम होती है और हरी के दरगाह में (उसकी) शोभा होती है। जो मनुष्य (उस बोली को) सुनता है। वह प्रसन्न होता है। हे नानक ! सतिगुरू को मिल के उसने ये नाम (रूप) खजाना प्राप्त किया हुआ होता है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੇ ਜੀਅ ਕੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਪੈ ਕਿ ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਵੈ ॥
ਗੁਰਸਿਖਾਂ ਅੰਦਰਿ ਸਤਿਗੁਰੂ ਵਰਤੈ ਜੋ ਸਿਖਾਂ ਨੋ ਲੋਚੈ ਸੋ ਗੁਰ ਖੁਸੀ ਆਵੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਆਖੈ ਸੁ ਕਾਰ ਕਮਾਵਨਿ ਸੁ ਜਪੁ ਕਮਾਵਹਿ ਗੁਰਸਿਖਾਂ ਕੀ ਘਾਲ ਸਚਾ ਥਾਇ ਪਾਵੈ ॥
ਵਿਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕੇ ਹੁਕਮੈ ਜਿ ਗੁਰਸਿਖਾਂ ਪਾਸਹੁ ਕੰਮੁ ਕਰਾਇਆ ਲੋੜੇ ਤਿਸੁ ਗੁਰਸਿਖੁ ਫਿਰਿ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਅਗੈ ਕੋ ਜੀਉ ਲਾਇ ਘਾਲੈ ਤਿਸੁ ਅਗੈ ਗੁਰਸਿਖੁ ਕਾਰ ਕਮਾਵੈ ॥
ਜਿ ਠਗੀ ਆਵੈ ਠਗੀ ਉਠਿ ਜਾਇ ਤਿਸੁ ਨੇੜੈ ਗੁਰਸਿਖੁ ਮੂਲਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਬ੍ਰਹਮੁ ਬੀਚਾਰੁ ਨਾਨਕੁ ਆਖਿ ਸੁਣਾਵੈ ॥
ਜਿ ਵਿਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕੇ ਮਨੁ ਮੰਨੇ ਕੰਮੁ ਕਰਾਏ ਸੋ ਜੰਤੁ ਮਹਾ ਦੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥੨॥
मः ४ ॥
सतिगुर के जीअ की सार न जापै कि पूरै सतिगुर भावै ॥
गुरसिखां अंदरि सतिगुरू वरतै जो सिखां नो लोचै सो गुर खुसी आवै ॥
सतिगुरु आखै सु कार कमावनि सु जपु कमावहि गुरसिखां की घाल सचा थाइ पावै ॥
विणु सतिगुर के हुकमै जि गुरसिखां पासहु कंमु कराइआ लोड़े तिसु गुरसिखु फिरि नेड़ि न आवै ॥
गुर सतिगुर अगै को जीउ लाइ घालै तिसु अगै गुरसिखु कार कमावै ॥
जि ठगी आवै ठगी उठि जाइ तिसु नेड़ै गुरसिखु मूलि न आवै ॥
ब्रहमु बीचारु नानकु आखि सुणावै ॥
जि विणु सतिगुर के मनु मंने कंमु कराए सो जंतु महा दुखु पावै ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ सतिगुरू के दिल का भेद मनुष्य को समझ नहीं आ सकता कि सतिगुरू को क्या अच्छा लगता है (सो इस तरह सतिगुरू की प्रसन्नता हासिल करनी कठिन है); (पर हां) सतिगुरू सच्चे सिखों के हृदय में व्यापक है। जो मनुष्य उनकी (सेवा की) तमन्ना रखता है वह सतिगुरू की प्रसन्नता के (दायरे) में आ जाता है। (क्योंकि) जो आज्ञा सतिगुरू देता है वही काम गुरसिख करते हैं। वही भजन करते हैं। सच्चा प्रभू सिखों की मेहनत कबूल करता है। जो मनुष्य सतिगुरू के आशय के विरुद्ध गुरसिखों से काम कराना चाहे। गुरू का सिख फिर उसके नजदीक नहीं आता। (पर) जो मनुष्य सतिगुरू की हजूरी में चिक्त जोड़ के (सेवा की मेहनत) करे। गुरसिख उसकी सेवा करता है। जो मनुष्य फरेब करने आता है और फरेब के ख्याल में चला जाता है। उसके नजदीक गुरू का सिख बिल्कुल ही नहीं आता। नानक कह के सुनाता है (भाव। जोर दे कर सुनाता है कि) शुद्ध सत्य विचार (की बात ये है कि) सतिगुरू का मन पतीजे बिना (भाव। गुरू आशय के विरुद्ध) जो मनुष्य (ठॅगी आदि करके गुरसिखों से) काम करवाए (भाव। अपनी सेवा करवाए) वह व्यक्ति महा दुख पाता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਤੂੰ ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਅਤਿ ਵਡਾ ਤੁਹਿ ਜੇਵਡੁ ਤੂੰ ਵਡ ਵਡੇ ॥
ਜਿਸੁ ਤੂੰ ਮੇਲਹਿ ਸੋ ਤੁਧੁ ਮਿਲੈ ਤੂੰ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਲੈਹਿ ਲੇਖਾ ਛਡੇ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਤੂੰ ਆਪਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ਸੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਮਨੁ ਗਡ ਗਡੇ ॥
ਤੂੰ ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਤੂ ਸਭੁ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਚੰਮੁ ਤੇਰਾ ਹਡੇ ॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਖੁ ਤੂੰ ਸਚਿਆ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਆਸ ਤੇਰੀ ਵਡ ਵਡੇ ॥੩੩॥੧॥ ਸੁਧੁ ॥
पउड़ी ॥
तूं सचा साहिबु अति वडा तुहि जेवडु तूं वड वडे ॥
जिसु तूं मेलहि सो तुधु मिलै तूं आपे बखसि लैहि लेखा छडे ॥
जिस नो तूं आपि मिलाइदा सो सतिगुरु सेवे मनु गड गडे ॥
तूं सचा साहिबु सचु तू सभु जीउ पिंडु चंमु तेरा हडे ॥
जिउ भावै तिउ रखु तूं सचिआ नानक मनि आस तेरी वड वडे ॥३३॥१॥ सुधु ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे बड़ों से बड़े ! तू सच्चा मालिक और बहुत बड़ा है। अपने जितना तू खुद ही है। वही मनुष्य तुझे मिलता है। जिसे तू स्वयं मिलाता है और जिसका लेखा छोड़ के तू स्वयं बख्श लेता है। जिसको तू खुद मिलाता है वही मन डुबो के (मन लगा के) सतिगुरू की सेवा करता है। तू सच्चा मालिक है। सदा स्थिर रहने वाला है। जीवों का सब कुछ – जिंद। शरीर। चमड़ी। हड्डियां – तेरे ही बख्शे हुए हैं। हे बड़ों से भी बड़े ! सच्चे प्रभू ! जैसे तुझे ठीक लगे वैसे ही हमारी रक्षा कर। नानक के मन में तेरी ही आस है। 33। 1। सुधु।

संदर्भ: यह अंग 317 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

India Gate के लॉन में Sunday शाम की family-picnic।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 43 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 317” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 318 →, पीछे का: ← अंग 316

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।