Lulla Family

अंग 340

अंग
340
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कहि कबीर गुर भेटि महा सुख भ्रमत रहे मनु मानानां ॥4॥23॥74॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: कबीर कहता है। सतिगुरू को मिल के ऊँचा सुख प्राप्त होता है। भटकना समाप्त हो जाती है और मन (प्रभू में) रच जाता है। 4। 23। 74।
रागु गउड़ी पूरबी बावन अखरी कबीर जीउ की
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
बावन अछर लोक त्रै सभु कछु इन ही माहि ॥
ए अखर खिरि जाहिगे ओइ अखर इन महि नाहि ॥1॥
जहा बोल तह अछर आवा ॥
जह अबोल तह मनु न रहावा ॥
बोल अबोल मधि है सोई ॥
जस ओहु है तस लखै न कोई ॥2॥
अलह लहउ तउ किआ कहउ कहउ त को उपकार ॥
बटक बीज महि रवि रहिओ जा को तीनि लोक बिसथार ॥3॥
अलह लहंता भेद छै कछु कछु पाइओ भेद ॥
उलटि भेद मनु बेधिओ पाइओ अभंग अछेद ॥4॥
तुरक तरीकति जानीऐ हिंदू बेद पुरान ॥
मन समझावन कारने कछूअक पड़ीऐ गिआन ॥5॥
ओअंकार आदि मै जाना ॥
लिखि अरु मेटै ताहि न माना ॥
ओअंकार लखै जउ कोई ॥
सोई लखि मेटणा न होई ॥6॥
कका किरणि कमल महि पावा ॥
ससि बिगास संपट नही आवा ॥
अरु जे तहा कुसम रसु पावा ॥
अकह कहा कहि का समझावा ॥7॥
खखा इहै खोड़ि मन आवा ॥
खोड़े छाडि न दह दिस धावा ॥
खसमहि जाणि खिमा करि रहै ॥
तउ होइ निखिअउ अखै पदु लहै ॥8॥
गगा गुर के बचन पछाना ॥
दूजी बात न धरई काना ॥
रहै बिहंगम कतहि न जाई ॥
अगह गहै गहि गगन रहाई ॥9॥
घघा घटि घटि निमसै सोई ॥
घट फूटे घटि कबहि न होई ॥
ता घट माहि घाट जउ पावा ॥
सो घटु छाडि अवघट कत धावा ॥10॥
ङंङा निग्रहि सनेहु करि निरवारो संदेह ॥
नाही देखि न भाजीऐ परम सिआनप एह ॥11॥
चचा रचित चित्र है भारी ॥
तजि चित्रै चेतहु चितकारी ॥
चित्र बचित्र इहै अवझेरा ॥
तजि चित्रै चितु राखि चितेरा ॥12॥
छछा इहै छत्रपति पासा ॥
छकि कि न रहहु छाडि कि न आसा ॥
रे मन मै तउ छिन छिन समझावा ॥
ताहि छाडि कत आपु बधावा ॥13॥
जजा जउ तन जीवत जरावै ॥
जोबन जारि जुगति सो पावै ॥
अस जरि पर जरि जरि जब रहै ॥
तब जाइ जोति उजारउ लहै ॥14॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: बावन अक्षर (भाव। लिपियों के अक्षर) सारे जगत में (प्रयोग किए जा रहे हैं)। सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥ जगत का सारा कामकाज इन (लिपियों के) अक्षरों से चल रहा है। पर ये अक्षर नाश हो जाएंगे (भाव। जैसे जगत नाशवंत है। जगत में बरती जाने वाली हरेक चीज भी नाशवंत है। और बोलियों। भाषाओं में बरते जाने वाले अक्षर भी नाशवान हैं)। अकाल-पुरख से मिलाप जिस शकल में अनुभव होता है। उसके बयान करने के लिए कोई अक्षर ऐसे नहीं हैं जो इन अक्षरों में आ सकें। 1। जो वरतारा बयान किया जा सकता है। अक्षर (केवल) वहीं (ही) बरते जाते हैं; जो अवस्था बयान से परे है (भाव। जब अकाल-पुरख में लीनता होती है) वहाँ (बयान करने वाला) मन (खुद ही) नहीं रह जाता। जहाँ अक्षर प्रयोग किए जा सकते हैं (भाव। जो अवस्था बयान की जा सकती है) और जिस हालत का बयान नहीं हो सकता (भाव। परमात्मा में लीनता की अवस्था) – इन (दोनों) जगह परमात्मा खुद ही है और जैसा वह (परमात्मा) है वैसा (हू-ब-हू) कोई बयान नहीं कर सकता। 2। अगर वह अलॅभ (परमात्मा) मैं ढूँढ भी लूँ तो मैं (उसका सही स्वरूप) बयान नहीं कर सकता; अगर (बयान) करूँ भी तो उसका किसी को लाभ नहीं हो सकता। (वैसे) जिस परमात्मा के ये तीनों लोक (भाव। सारा जगत) पसारा हैं। वह इसमें ऐसे व्यापक है जैसे बरगद (का पेड़) बीज में (और बीज। बोहड़ में) है। 3। परमात्मा को मिलने का यत्न करते-करते (मेरी) दुविधा का नाश हो गया है। और (दुविधा का नाश होने से मैंने परमात्मा की) कुछ-कुछ रम्ज़ समझ ली है। दुविधा को उलटने से (मेरा) मन (परमात्मा में) छेदा (भेद दिया) गया है और मैंने उस अविनाशी व अभेदी प्रभू को प्राप्त कर लिया है। 4। (अच्छा) मुसलमान उसे समझा जाता है जो तरीकत में लगा हो। और (अच्छा) हिन्दू उसे। जो वेद-पुराणों की खोज करता हैं (दुविधा को मिटा के प्रभू के चरणों में जुड़े रहने के लिए) मन को उच्च जीवन की सूझ देने के वास्ते (ऊँची) विचार वाली बाणी थोड़ी बहुत पढ़नी जरूरी है; । 5। जो एक-रस सब जगह व्यापक परमात्मा सबको बनाने वाला है। मैं उसे अविनाशी समझता हूँ। और जिस व्याक्ति को वह प्रभू पैदा करता है और फिर मिटा देता है उसको मैं (परमात्मा के बराबर) नहीं मानता। अगर कोई मनुष्य उस सर्व-व्यापक परमात्मा को समझ ले (भाव। अपने अंदर अनुभव कर ले) तो उसे समझने से (उस मनुष्य की उस उच्च आत्मिक सुरति का) नाश नहीं होता। 6। अगर मैं (ज्ञान रूपी सूरज की) किरन (हृदय-रूपी) कमल फूल में टिका लूं। तो (माया रूपी) चंद्रमा की चाँदनी से। वह (खिला हुआ हृदय-फूल) (दुबारा) बंद नहीं हो सकता। और अगर कभी मैं उस खिली हुई हालत में (पहुँच के) (उस खिले हुए हृदय-रूप कमल) फूल का आनंद (भी) ले सकूँ। तो उसका बयान कथन से परे है। वह मैं कह के क्या समझ सकता हूँ?। 7। जब यह मन (-पंछी जिसे ज्ञान-किरण मिल चुकी है) स्वै-स्वरूप की खोड़ में (भाव।प्रभू चरणों में) आ टिकता है और इस घौंसले (भाव। प्रभू चरणों) को छोड़ के दसों दिशाओं में नहीं दौड़ता। पति प्रभू सब से सांझ डाल के क्षमा के श्रोत प्रभू में टिका रहता है। तो तब अविनाशी (प्रभू के साथ एक-रूप हो के) वह पदवी प्राप्त कर लेता है जो कभी नाश नहीं होती। 8। जिस मनुष्य ने सतिगुरू की बाणी के माध्यम से परमात्मा से सांझ डाल ली है। उसे (प्रभू की सिफत सालाह के बिना) कोई और बात आकर्षित नहीं कर पाती। वह पक्षी (की तरह सदा निर्मोही) रहता है; कहीं भी भटकता नहीं; जिस प्रभू को जगत की माया ग्रस नहीं सकती। उसे वह अपने हृदय में बसा लेता है; हृदय में बसा के अपनी सुरति को प्रभू चरणों में टिकाए रखता है (जैसे चोग से पेट भर के पक्षी मौज में आ के ऊँची आकाश में उड़ानें भरता है)। 9। हरेक शरीर में वह प्रभू ही बसता है। अगर कोई शरीर (-रूपी घड़ा) टूट जाए तो कभी प्रभू के अस्तित्व में कोई घाटा नहीं पड़ता। जब (कोई जीव) इस शरीर के अंदर ही (संसार समुंद्र से पार लांघने के लिए) पत्तन तलाश लेता है। तो इस घाट (पत्तन) को छोड़ के वह खड्डों में कहीं नहीं भटकता फिरता। 10। (हे भाई ! अपनी इंद्रियों को) अच्छी तरह रोक। (प्रभू से) प्यार बना। और सिदक-हीनता दूर कर। (ये काम मुश्किल जरूर है। पर) ये सोच के कि ये काम नहीं हो सकता (इस काम से) भागना नहीं चाहिए- (बस) सबसे बड़ी अकल (की बात) यही है। 11। (प्रभू का) बनाया हुआ ये जगत (मानो) एक बहुत बड़ी तस्वीर है। (हे भाई !) इस तस्वीर के (के मोह को) छोड़ के तस्वीर बनाने वाले को याद रख; (क्योंकि बड़ा) झमेला ये है कि यह (संसार-रूपी) तस्वीर मन को मोह लेने वाली है। (सो। इस मोह से बचने के लिए) तस्वीर (का ख्याल) छोड़ के तस्वीर को बनाने वाले में अपना चित्त परो के रख। 12। इस (चित्रकार प्रभू) के पास नहीं रहता जो (सबका) बादशाह है? (हे मेरे मन ! और) उम्मीदें छोड़ के तगड़ा हो हे मन ! मैं आपको हर समय समझाता हूँ कि उस (चित्रकार) को भुला के कहाँ (उसके बनाए हुए चित्र में) आप अपने आप को जकड़ रहा है। 13। जब (कोई जीव) माया में रहता हुआ ही शरीर (की वासनाएं) जला लेता है। वह मनुष्य जवानी (का मद) जला के जीने की (सही) जाच सीख लेता है। जब मनुष्य अपने (धन के अहंकार) को और पराई (दौलत की आस) को जला के अपने दायरे में रहता है। तब उच्च आत्मिक अवस्था में पहुँच के प्रभू की ज्योति का प्रकाश प्राप्त करता है। 14।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।