अंग 310

अंग
310
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਿ ਤੂ ਸਚੁ ਸਚੇ ਸੇਵਾ ਤੇਰੀ ਹੋਤਿ ॥੧੬॥
जन नानक नामु सलाहि तू सचु सचे सेवा तेरी होति ॥१६॥

हिन्दी अर्थ: हे दास नानक ! तू (भी इसी तरह) नाम की उस्तति कर। सचमुच तेरी यह सेवा प्रभू के दर पर कबूल होगी। 16।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਸਭਿ ਰਸ ਤਿਨ ਕੈ ਰਿਦੈ ਹਹਿ ਜਿਨ ਹਰਿ ਵਸਿਆ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹਿ ਤੇ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਤਿਨ ਕਉ ਸਭਿ ਦੇਖਣ ਜਾਹਿ ॥
ਜਿਨ ਨਿਰਭਉ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਤਿਨ ਕਉ ਭਉ ਕੋਈ ਨਾਹਿ ॥
ਹਰਿ ਉਤਮੁ ਤਿਨੀ ਸਰੇਵਿਆ ਜਿਨ ਕਉ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਆਹਿ ॥
ਤੇ ਹਰਿ ਦਰਗਹਿ ਪੈਨਾਈਅਹਿ ਜਿਨ ਹਰਿ ਵੁਠਾ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਓਇ ਆਪਿ ਤਰੇ ਸਭ ਕੁਟੰਬ ਸਿਉ ਤਿਨ ਪਿਛੈ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਛਡਾਹਿ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਉ ਹਰਿ ਮੇਲਿ ਜਨ ਤਿਨ ਵੇਖਿ ਵੇਖਿ ਹਮ ਜੀਵਾਹਿ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
सभि रस तिन कै रिदै हहि जिन हरि वसिआ मन माहि ॥
हरि दरगहि ते मुख उजले तिन कउ सभि देखण जाहि ॥
जिन निरभउ नामु धिआइआ तिन कउ भउ कोई नाहि ॥
हरि उतमु तिनी सरेविआ जिन कउ धुरि लिखिआ आहि ॥
ते हरि दरगहि पैनाईअहि जिन हरि वुठा मन माहि ॥
ओइ आपि तरे सभ कुटंब सिउ तिन पिछै सभु जगतु छडाहि ॥
जन नानक कउ हरि मेलि जन तिन वेखि वेखि हम जीवाहि ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ जिनके हृदय में प्रभू बस गया है (भाव। जिन्होंने मन में प्रभू को अनुभव कर लिया है)। सारे रस उनके अंदर हैं (भाव। संसारिक पदार्थों के रसों का स्वाद लेने के लिए वह जीव अपने मन को माया की तरफ दौड़ने नहीं देते। हृदय में नाम-रस का आनंद लेते हैं। जो सब रसों से उक्तम रस है)। हरी की दरगाह में वह खिले माथे जाते हैं; और सारे लोग उनके दर्शनों की अभिलाशा करते हैं। जिन्होंने निरभव प्रभू का नाम सिमरा है। उनको (खुद को भी) कोई डर नहीं रह जाता; (पर यह) उक्तम प्रभू उन मनुष्यों ने ही सिमरा है जिनके हृदय में आरम्भ से (अच्छे किए कर्मों के संस्कार) लिखे हुए हैं। जिनके मन में प्रभू बसता है (भाव। प्रगट होता है) उन्हें उसकी हजूरी में आदर मिलता है। वह खुद सारे परिवार समेत (संसार-सागर से) पार लांघ जाते हैं। और अपने नक्शे-कदमों पर चला के सारे संसार को (विकारों से) बचा लेते हैं। हे हरी ! (ऐसे अपने) बंदे दास नानक को भी मिला। हम उन्हें देख-देख के जीएं। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਸਾ ਧਰਤੀ ਭਈ ਹਰੀਆਵਲੀ ਜਿਥੈ ਮੇਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਬੈਠਾ ਆਇ ॥
ਸੇ ਜੰਤ ਭਏ ਹਰੀਆਵਲੇ ਜਿਨੀ ਮੇਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਦੇਖਿਆ ਜਾਇ ॥
ਧਨੁ ਧੰਨੁ ਪਿਤਾ ਧਨੁ ਧੰਨੁ ਕੁਲੁ ਧਨੁ ਧਨੁ ਸੁ ਜਨਨੀ ਜਿਨਿ ਗੁਰੂ ਜਣਿਆ ਮਾਇ ॥
ਧਨੁ ਧੰਨੁ ਗੁਰੂ ਜਿਨਿ ਨਾਮੁ ਅਰਾਧਿਆ ਆਪਿ ਤਰਿਆ ਜਿਨੀ ਡਿਠਾ ਤਿਨਾ ਲਏ ਛਡਾਇ ॥
ਹਰਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲਹੁ ਦਇਆ ਕਰਿ ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਧੋਵੈ ਪਾਇ ॥੨॥
मः ४ ॥
सा धरती भई हरीआवली जिथै मेरा सतिगुरु बैठा आइ ॥
से जंत भए हरीआवले जिनी मेरा सतिगुरु देखिआ जाइ ॥
धनु धंनु पिता धनु धंनु कुलु धनु धनु सु जननी जिनि गुरू जणिआ माइ ॥
धनु धंनु गुरू जिनि नामु अराधिआ आपि तरिआ जिनी डिठा तिना लए छडाइ ॥
हरि सतिगुरु मेलहु दइआ करि जनु नानकु धोवै पाइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ जिस जमीन पर मेरा प्यारा सतिगुरू आ के बैठा है। वह जमीन हरी-भरी हो गई है। वह जीव हरे हो गए हैं (भाव। उन मनुष्यों के हृदय खिल गए हैं) जिन्होंने जा के प्यारे सतिगुरू का दर्शन किया है। हे माँ ! वह पिता भाग्यशाली है। वह कुल भाग्यशाली है वह माँ भाग्यशाली है जिसने सतिगुरू को जन्म दिया है। वह सतिगुरू धन्य है जिसने प्रभू का नाम सिमरा है; (नाम सिमर के) खुद पार हुआ है और जिन्होंने उसके दर्शन किए हैं उन्हें भी विकारों से छुड़ा लिया है। हे हरी ! मेहर करके मुझे भी (ऐसा) सतिगुरू मिलाओ। दास नानक उसके पैर धोए। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਸਚੁ ਸਚਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਅਮਰੁ ਹੈ ਜਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਹਰਿ ਉਰਿ ਧਾਰਿਆ ॥
ਸਚੁ ਸਚਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਜਿਨਿ ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਬਿਖੁ ਮਾਰਿਆ ॥
ਜਾ ਡਿਠਾ ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਤਾਂ ਅੰਦਰਹੁ ਮਨੁ ਸਾਧਾਰਿਆ ॥
ਬਲਿਹਾਰੀ ਗੁਰ ਆਪਣੇ ਸਦਾ ਸਦਾ ਘੁਮਿ ਵਾਰਿਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਤਾ ਮਨਮੁਖਿ ਹਾਰਿਆ ॥੧੭॥
पउड़ी ॥
सचु सचा सतिगुरु अमरु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥
सचु सचा सतिगुरु पुरखु है जिनि कामु क्रोधु बिखु मारिआ ॥
जा डिठा पूरा सतिगुरू तां अंदरहु मनु साधारिआ ॥
बलिहारी गुर आपणे सदा सदा घुमि वारिआ ॥
गुरमुखि जिता मनमुखि हारिआ ॥१७॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ सतिगुरू सदा स्थिर रहने वाले अमर प्रभू का रूप है। (क्योंकि) उसने प्रभू को अपने अंदर हृदय में परोया हुआ है। (और इस तरह) उसने (हृदय में से काम-क्रोध आदि के) विष को निकाल दिया है। जब मैंने (ऐसा यह) पूरा सतिगुरू देखा। तब मेरे मन को अंदर धीरज आया (इसलिए) मैं अपने सतिगुरू से सदा वारने और सदके जाता हूँ। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (मानस जनम की बाजी) जीत जाता है और मन के पीछे चलने वाला हार जाता है। 17।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲਿਓਨੁ ਮੁਖਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਸੀ ॥
ਸੋ ਕਰੇ ਜਿ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਵਸੀ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਘਰੀ ਵਸਾਇਸੀ ॥
ਜਿਨ ਅੰਦਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਤਿਨ ਕਾ ਭਉ ਸਭੁ ਗਵਾਇਸੀ ॥
ਜਿਨ ਰਖਣ ਕਉ ਹਰਿ ਆਪਿ ਹੋਇ ਹੋਰ ਕੇਤੀ ਝਖਿ ਝਖਿ ਜਾਇਸੀ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਤੂ ਹਰਿ ਹਲਤਿ ਪਲਤਿ ਛੋਡਾਇਸੀ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
करि किरपा सतिगुरु मेलिओनु मुखि गुरमुखि नामु धिआइसी ॥
सो करे जि सतिगुर भावसी गुरु पूरा घरी वसाइसी ॥
जिन अंदरि नामु निधानु है तिन का भउ सभु गवाइसी ॥
जिन रखण कउ हरि आपि होइ होर केती झखि झखि जाइसी ॥
जन नानक नामु धिआइ तू हरि हलति पलति छोडाइसी ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ जिस मनुष्य को कृपा करके उस प्रभू ने सतिगुरू मिलाया है। वह गुरू के सन्मुख हो के मुंह से नाम सिमरता है। और वही कुछ करता है जो सतिगुरू को ठीक लगता है। जिनके हृदय में नाम का खजाना (बस जाता) है। पूरा सतिगुरू (आगे) उसके हृदय में (‘नाम निधान’) बसा देता है। सतिगुरू उनका सारा डर दूर कर देता है। जिनकी रक्षा करने के लिए प्रभू खुद (तैयार) हो। और कितनी ही दुनिया खप खप मरे (अर्थात जोर लगा ले) (पर। उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती)। (इस वास्ते) हे नानक ! तू नाम जप। प्रभू इस लोक में और परलोक में (हरेक किस्म के डर से) बचा लेगा। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਗੁਰਸਿਖਾ ਕੈ ਮਨਿ ਭਾਵਦੀ ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਹਰਿ ਰਾਖਹੁ ਪੈਜ ਸਤਿਗੁਰੂ ਕੀ ਨਿਤ ਚੜੈ ਸਵਾਈ ॥
ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਮਨਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਹੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਛਡਾਈ ॥
ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਤਾਣੁ ਦੀਬਾਣੁ ਹਰਿ ਤਿਨਿ ਸਭ ਆਣਿ ਨਿਵਾਈ ॥
ਜਿਨੀ ਡਿਠਾ ਮੇਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭਾਉ ਕਰਿ ਤਿਨ ਕੇ ਸਭਿ ਪਾਪ ਗਵਾਈ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਤੇ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਬਹੁ ਸੋਭਾ ਪਾਈ ॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਮੰਗੈ ਧੂੜਿ ਤਿਨ ਜੋ ਗੁਰ ਕੇ ਸਿਖ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥੨॥
मः ४ ॥
गुरसिखा कै मनि भावदी गुर सतिगुर की वडिआई ॥
हरि राखहु पैज सतिगुरू की नित चड़ै सवाई ॥
गुर सतिगुर कै मनि पारब्रहमु है पारब्रहमु छडाई ॥
गुर सतिगुर ताणु दीबाणु हरि तिनि सभ आणि निवाई ॥
जिनी डिठा मेरा सतिगुरु भाउ करि तिन के सभि पाप गवाई ॥
हरि दरगह ते मुख उजले बहु सोभा पाई ॥
जनु नानकु मंगै धूड़ि तिन जो गुर के सिख मेरे भाई ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ गुरसिखों के मन को अपने सतिगुरू की महिमा प्यारी लगती है। हे प्रभू ! तू सतिगुरू की पैज रखता है। और सतिगुरू की महिमा दिनो दिन बढ़ती है। जो पारब्रहम (सब जीवों को विकार आदि से) बचा लेता है। वह पारब्रहम गुरू सतिगुरू के मन में (सदा बसता है)। प्रभू ही सतिगुरू का बल व आसरा है। उस प्रभू ने ही सारे जीव सतिगुरू के आगे ला निवाए हैं। जिन्होंने (हृदय में) प्यार रख के प्यारे सतिगुरू के दर्शन किए हैं। सतिगुरू उनके सारे पाप दूर कर देता है। हरी की दरगाह में वह खिले माथे जाते हैं। और उनकी बड़ी शोभा होती है। जो मेरे भाई सतिगुरू के (इस प्रकार के) सिख हैं। दास नानक उनके चरणों की धूड़ माँगता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਹਉ ਆਖਿ ਸਲਾਹੀ ਸਿਫਤਿ ਸਚੁ ਸਚੁ ਸਚੇ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਸਾਲਾਹੀ ਸਚੁ ਸਲਾਹ ਸਚੁ ਸਚੁ ਕੀਮਤਿ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਈ ॥
पउड़ी ॥
हउ आखि सलाही सिफति सचु सचु सचे की वडिआई ॥
सालाही सचु सलाह सचु सचु कीमति किनै न पाई ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ वह सच्चा प्रभू सराहनीय है और उसकी महिमा करनी सदा साथ निभने वाला कार्य है। (जिस) सच्चे प्रभू की कोई मनुष्य कीमत नहीं डाल सका। (इस वास्ते मेरी भी यही प्रार्थना है कि) मैं सच्चे प्रभू की सच्ची वडिआई और सच्चे गुण कह कह के सालाहूँ।

संदर्भ: यह अंग 310 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।

IGI Airport की 3 बजे की flight का इंतज़ार, सब लोग phones पर, मन कहीं और।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 310” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 311 →, पीछे का: ← अंग 309

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।