जपुजी साहिब · Japji Sahib
गुरु नानक की सुबह वाली प्रार्थना। गुरु ग्रंथ साहिब का पहला पन्ना। और शायद सबसे सीधा सवाल जो कोई पूछ सकता है: “किव सचिआरा होईऐ”, सच्चा इंसान बना कैसे जाए?
पहले एक बात

गुरु नानक हर सुबह यह गाते थे। और जब गुरु ग्रंथ साहिब संकलित हुआ, तो उसका पहला पन्ना यही बना, जपुजी साहिब। यानी यह पूरी सिख वाणी का दरवाज़ा है, एक रचना से कहीं आगे।
बनावट देखिए। शुरू में मूल मंत्र, एक साँस में परमात्मा का पूरा परिचय। फिर 38 पउड़ियाँ, हर एक एक छोटी सीढ़ी। और अंत में एक सलोक, जो हवा को गुरु, पानी को पिता, धरती को माँ कह कर पूरी बात समेट देता है।
और एक सवाल पूरी रचना के बीचों-बीच धड़कता है। पहली पउड़ी में ही नानक पूछते हैं: “किव सचिआरा होईऐ?”, सच्चा इंसान बना कैसे जाए, और झूठ की दीवार टूटे कैसे? बाक़ी 37 पउड़ियाँ, एक तरह से, इसी एक सवाल के साथ बैठना है। आइए, साथ बैठते हैं।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से, धीरे। यह सुबह की प्रार्थना है, और इसे जल्दबाज़ी से कोई फ़ायदा नहीं। एक प्यारी बात: पउड़ी 8 से 11 तक एक ही शब्द लौटता है, “सुणिऐ” (सुनने से); और पउड़ी 12 से 15 तक “मंनै” (मान लेने से)। इन्हें एक-एक झुंड की तरह पढ़िए, ताल महसूस होगी। और आख़िरी पाँच पउड़ियाँ (34-38) एक सीढ़ी हैं, पाँच खंड, धरती से सच तक।
मूल मंत्र
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु
अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
भाव: यह पूरे गुरु ग्रंथ साहिब का मूल मंत्र है, और एक साँस में परमात्मा का पूरा परिचय। परमात्मा एक है। उसका नाम “सत्य” है। वह सब कुछ रचने वाला है। निडर है, किसी से डर नहीं। किसी से वैर नहीं रखता। समय और मृत्यु से परे है। जन्म-मरण के चक्र से बाहर है। स्वयंभू है, अपने ही बल से है। और आख़िरी शब्द सबसे ज़रूरी है: “गुरप्रसादि”, उसे समझा जा सकता है, पर गुरु की कृपा से। यानी यह पूरी यात्रा अकेले की नहीं।
॥ जपु ॥ · पउड़ी 1
सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार ॥
चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिव तार ॥
भुखिआ भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार ॥
सहस सिआणपा लख होहि त इक न चलै नालि ॥
किव सचिआरा होईऐ किव कूड़ै तुटै पालि ॥
हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि ॥1॥
भाव: नानक पहली ही पउड़ी में चार रास्ते आज़माते हैं, और चारों को एक-एक करके छोड़ देते हैं। लाख बार सोचने से मन साफ़ नहीं होता। लाख बार चुप बैठ जाने से चुप्पी नहीं आती। दुनिया भर का सामान जमा कर लो, भूख नहीं मिटती। और लाखों चतुराइयाँ सीख लो, मरते वक़्त एक भी साथ नहीं जाती।
तो फिर वह सीधा सवाल आता है, जिस पर पूरी रचना टिकी है: “किव सचिआरा होईऐ?” सच्चा इंसान बना कैसे जाए? और नानक का जवाब इसी पउड़ी में है, छोटा सा, “हुकमि रजाई चलणा।” उसकी रज़ा में, उसके हुकम में चलना। बाक़ी 37 पउड़ियाँ इसी एक शब्द, “हुकम”, को खोलती हैं।
पउड़ी 2
हुकमी होवनि आकार हुकमु न कहिआ जाई ॥
हुकमी होवनि जीअ हुकमि मिलै वडिआई ॥
हुकमी उतमु नीचु हुकमि लिखि दुख सुख पाईअहि ॥
इकना हुकमी बखसीस इकि हुकमी सदा भवाईअहि ॥
हुकमै अंदरि सभु को बाहरि हुकम न कोइ ॥
नानक हुकमै जे बुझै त हउमै कहै न कोइ ॥2॥
भाव: तो यह “हुकम” है क्या? पउड़ी 1 ने जवाब दिया था, पउड़ी 2 उसे खोलती है। हर आकार हुकम से बना। हर जीव हुकम से। मान-सम्मान, ऊँच-नीच, सुख-दुख, सब उसी एक व्यवस्था के अंदर। नानक एक बात साफ़ कह देते हैं: “हुकमु न कहिआ जाई”, हुकम को शब्दों में पूरा बाँधा नहीं जा सकता। यह एक जीती-जागती व्यवस्था है, किसी नियम-पुस्तिका से कहीं ज़्यादा।
और आख़िरी लाइन में पूरी पउड़ी का इनाम है: “हुकमै जे बुझै त हउमै कहै न कोइ”, जो इस व्यवस्था को समझ ले, उसके भीतर से “मैं-मेरा” का शोर अपने आप थम जाता है। अहंकार समझ से जाता है, लड़ाई से नहीं।
पउड़ी 3
गावै को ताणु होवै किसै ताणु ॥
गावै को दाति जाणै नीसाणु ॥
गावै को गुण वडिआईआ चार ॥
गावै को विदिआ विखमु वीचारु ॥
… हुकमी हुकमु चलाए राहु ॥
नानक विगसै वेपरवाहु ॥3॥
भाव: लोग उसे गाते हैं, पर हर कोई अपने-अपने ढंग से। कोई उसकी ताक़त गाता है, कोई उसकी देन। कोई उसके गुण गाता है, कोई उसका गहरा, कठिन ज्ञान। कोई गाता है कि वह शरीर बनाता है और फिर मिट्टी कर देता है; कोई गाता है कि वह दूर है, कोई कि वह बिल्कुल पास।
नानक की बात यह है: कोई एक “सही” तरीक़ा नहीं है उसे गाने का। हर इंसान अपनी जगह से गाता है। और वह? “विगसै वेपरवाहु”, वह बेपरवाह, खिला हुआ रहता है। सारा हिसाब-किताब हमारी तरफ़ है; उसकी तरफ़ बस एक मुस्कान।
पउड़ी 4
साचा साहिबु साचु नाइ भाखिआ भाउ अपारु ॥
आखहि मंगहि देहि देहि दाति करे दातारु ॥
… अम्रित वेला सचु नाउ वडिआई वीचारु ॥
करमी आवै कपड़ा नदरी मोखु दुआरु ॥
नानक एवै जाणीऐ सभु आपे सचिआरु ॥4॥
भाव: सब उससे माँगते हैं, “दे दे, दे दे”, और वह देने वाला देता रहता है। तो एक सवाल उठता है: उसके सामने हम रखें क्या? कौनसा शब्द बोलें कि वह सुन कर प्यार से अपना ले?
नानक का जवाब इस पउड़ी में दो शब्दों में है, और बहुत प्यारा है: “अम्रित वेला।” सुबह का वह शांत पहर, जब दुनिया अभी जागी नहीं। उस वक़्त उठ कर सच्चे नाम का सुमिरन करना, उसकी महानता पर ठहरना। यह जपुजी की एकमात्र ठोस सलाह है, और यही वजह है कि यह सुबह की प्रार्थना है।
पउड़ी 5
थापिआ न जाइ कीता न होइ ॥ आपे आपि निरंजनु सोइ ॥
… गुरमुखि नादं गुरमुखि वेदं गुरमुखि रहिआ समाई ॥
गुरु ईसरु गुरु गोरखु बरमा गुरु पारबती माई ॥
… सभना जीआ का इकु दाता सो मै विसरि न जाई ॥5॥
भाव: उसे कोई बना नहीं सकता, स्थापित नहीं कर सकता, वह अपने आप है, बेदाग़। यहाँ तक तो ठीक। पर इस पउड़ी का असली दिल गुरु की बात है।
नानक एक हिम्मत वाली लाइन कहते हैं: “गुरु ईसरु, गुरु गोरखु, बरमा, गुरु पारबती माई”, गुरु ही शिव, गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही पार्वती। यानी जो कुछ इन सब देवताओं का सार है, वह गुरु में है। और क्यों? क्योंकि “जे हउ जाणा आखा नाही”, अगर मैं उसे जान भी लूँ, तो कह नहीं सकता। गुरु वही है जो उस अनकही बात की एक झलक दे देता है। बस एक झलक, “गुरा इक देहि बुझाई।”
पउड़ी 6
तीरथि नावा जे तिसु भावा विणु भाणे कि नाइ करी ॥
… मति विचि रतन जवाहर माणिक जे इक गुर की सिख सुणी ॥
गुरा इक देहि बुझाई ॥
सभना जीआ का इकु दाता सो मै विसरि न जाई ॥6॥
भाव: तीर्थ पर नहाना तभी काम का है जब वह उसे भाए, वरना नहाने से क्या? नानक बाहरी कर्मकांड को एक तरफ़ रख देते हैं, बहुत शांति से।
और फिर एक चमकती हुई लाइन देते हैं: “मति विचि रतन जवाहर माणिक”, आपकी अपनी बुद्धि में रत्न, जवाहर, माणिक छिपे हैं। ख़ज़ाना भीतर है, बाहर तीर्थों में ढूँढने की चीज़ नहीं। बस उसे खोलने के लिए “गुर की सिख” चाहिए, गुरु का एक बोल, सच्चे मन से सुना हुआ।
पउड़ी 7

जे जुग चारे आरजा होर दसूणी होइ ॥
नवा खंडा विचि जाणीऐ नालि चलै सभु कोइ ॥
चंगा नाउ रखाइ कै जसु कीरति जगि लेइ ॥
जे तिसु नदरि न आवई त वात न पुछै के ॥
… नानक निरगुणि गुणु करे गुणवंतिआ गुणु दे ॥7॥
भाव: ज़रा यह तस्वीर देखिए। मान लीजिए किसी की उम्र चारों युगों जितनी हो, फिर दस गुना और। पूरी दुनिया में नाम हो, हर कोई उसके साथ चले, उसकी कीर्ति हर तरफ़ फैले।
और फिर नानक एक ही लाइन में सब पलट देते हैं: “जे तिसु नदरि न आवई त वात न पुछै के”, अगर उसकी कृपा-दृष्टि न मिली, तो कोई पूछेगा भी नहीं। लंबी उम्र, बड़ा नाम, दुनिया भर की शोहरत, सब एक तरफ़, और उसकी एक नज़र दूसरी तरफ़। यह पउड़ी घमंड को बहुत नरमी से, पर बहुत साफ़, उसकी जगह दिखा देती है।
(लाइन में “जुग चारे” आया, चार युग: सत, त्रेता, द्वापर, कलि। परम्परा इन्हें घटती हुई लंबाई का एक चक्र मानती है, कुल मिला कर लाखों मानव-वर्ष। यहाँ बस इतना काफ़ी है: एक बहुत, बहुत लंबा समय।)
पउड़ी 8 · सुणिऐ
सुणिऐ सिध पीर सुरि नाथ ॥ सुणिऐ धरति धवल आकास ॥
सुणिऐ दीप लोअ पाताल ॥ सुणिऐ पोहि न सकै कालु ॥
नानक भगता सदा विगासु ॥ सुणिऐ दूख पाप का नासु ॥8॥
भाव: यहाँ से चार पउड़ियाँ एक ही शब्द से शुरू होती हैं, “सुणिऐ”, यानी सुनने से। इसे एक ताल की तरह महसूस कीजिए, ढोल पर एक ही थाप, बार-बार।
पर “सुनना” क्या? यहाँ कान खुले रखने भर की बात नहीं हो रही। यह श्रद्धा से, मन लगा कर सुनना है, वैसे जैसे आप किसी बहुत प्यारी बात को सुनते हैं, पूरे होकर। नानक कहते हैं, ऐसे सुनने भर से सिद्ध, पीर, योगी सब झुक जाते हैं; धरती-आकाश की थाह मिलती है; और काल, मृत्यु का डर, छू नहीं पाता। और भक्त? “सदा विगासु”, हमेशा खिला हुआ।
पउड़ी 9 · सुणिऐ
सुणिऐ ईसरु बरमा इंदु ॥ सुणिऐ मुखि सालाहण मंदु ॥
सुणिऐ जोग जुगति तनि भेद ॥ सुणिऐ सासत सिम्रिति वेद ॥
नानक भगता सदा विगासु ॥ सुणिऐ दूख पाप का नासु ॥9॥
भाव: ताल चलती रहती है। ध्यान से सुनने से एक बात होती है जो रोज़ देखी जा सकती है, “सुणिऐ मुखि सालाहण मंदु”, सुनने से मुँह से भी अच्छी बात निकलने लगती है। यानी आप जो सुनते हैं, धीरे-धीरे वही बन जाते हैं, और वही बोलने लगते हैं। सुनना एक चुपचाप की training है।
पउड़ी 10 · सुणिऐ
सुणिऐ सतु संतोखु गिआनु ॥ सुणिऐ अठसठि का इसनानु ॥
सुणिऐ पड़ि पड़ि पावहि मानु ॥ सुणिऐ लागै सहजि धिआनु ॥
नानक भगता सदा विगासु ॥ सुणिऐ दूख पाप का नासु ॥10॥
भाव: नानक एक ज़ोरदार दावा करते हैं: सच्चे मन से सुनने भर से 68 तीर्थों के स्नान जितना पुण्य मिल जाता है। यानी जो काम लोग दूर-दूर की यात्राओं में ढूँढते हैं, वह एक ठहरे हुए, सुनते हुए मन में पहले से है। और “सहजि धिआनु”, ध्यान बिना ज़ोर लगाए, अपने आप, सहज लग जाता है।
(परम्परा में 68 तीर्थ अत्यंत पवित्र माने जाते हैं, नदियाँ, नगर, पर्वत, मंदिर, सब मिला कर। नानक यहाँ उनकी निंदा नहीं कर रहे; वे बस इतना कह रहे हैं कि असली तीर्थ ध्यान से सुनने वाले मन के भीतर है।)
पउड़ी 11 · सुणिऐ
सुणिऐ सरा गुणा के गाह ॥ सुणिऐ सेख पीर पातिसाह ॥
सुणिऐ अंधे पावहि राहु ॥ सुणिऐ हाथ होवै असगाहु ॥
नानक भगता सदा विगासु ॥ सुणिऐ दूख पाप का नासु ॥11॥
भाव: “सुणिऐ” वाली ताल यहाँ अपनी सबसे सुंदर लाइन पर पहुँचती है: “सुणिऐ अंधे पावहि राहु”, सुनने से अंधे को भी रास्ता मिल जाता है। यहाँ “अंधा” का मतलब आँखों वाले विकलांग से ज़्यादा, उस इंसान की बात है जो अज्ञान में रास्ता भटक गया हैं। सच्चे मन से सुनना ही उसके हाथ में एक दीया थमा देता है।
पउड़ी 12 · मंनै
मंने की गति कही न जाइ ॥ जे को कहै पिछै पछुताइ ॥
कागदि कलम न लिखणहारु ॥ मंने का बहि करनि वीचारु ॥
ऐसा नामु निरंजनु होइ ॥ जे को मंनि जाणै मनि कोइ ॥12॥
भाव: अब शब्द बदलता है, “सुणिऐ” से “मंनै।” सुनना पहला कदम था; मानना, यानी उस सुनी हुई बात को सच मान कर अपने भीतर बसा लेना, अगला।
और नानक शुरू में ही हाथ खड़े कर देते हैं, बहुत प्यारे ढंग से। जो “मानने” तक पहुँच गया, उसकी हालत बयान नहीं की जा सकती। जो बयान करने की कोशिश करेगा, बाद में पछताएगा। काग़ज़-कलम से यह लिखी नहीं जाती। क्यों? क्योंकि कुछ चीज़ें, गहरी शांति, प्रेम, ध्यान का एक पल, सिर्फ़ जी कर ही जानी जाती हैं। उन्हें समझा कर बताना मुमकिन ही नहीं।
पउड़ी 13 · मंनै
मंनै सुरति होवै मनि बुधि ॥ मंनै सगल भवण की सुधि ॥
मंनै मुहि चोटा ना खाइ ॥ मंनै जम कै साथि न जाइ ॥
ऐसा नामु निरंजनु होइ ॥ जे को मंनि जाणै मनि कोइ ॥13॥
भाव: मानने का असर गिनाते हैं नानक, और एक लाइन ख़ास है: “मंनै मुहि चोटा ना खाइ”, जिसके भीतर वह भरोसा बैठ गया, उसे ज़िंदगी की चोटें मुँह पर नहीं लगतीं। इसका मतलब यह नहीं कि चोटें आती नहीं। मतलब यह है कि वे उसे गिरा नहीं पातीं। एक भीतरी ज़मीन है जो डगमगाती नहीं।
पउड़ी 14 · मंनै
मंनै मारगि ठाक न पाइ ॥ मंनै पति सिउ परगटु जाइ ॥
मंनै मगु न चलै पंथु ॥ मंनै धरम सेती सनबंधु ॥
ऐसा नामु निरंजनु होइ ॥ जे को मंनि जाणै मनि कोइ ॥14॥
भाव: “मंनै मारगि ठाक न पाइ”, जिसके पास वह भरोसा है, उसके रास्ते में अड़चन नहीं ठहरती। फिर से, अड़चनें आती ज़रूर हैं, पर वे रोक नहीं पातीं। भरोसा वार रोकने वाला कवच नहीं; यह वह चीज़ है जिससे आप वार के बावजूद चलते रहते हैं।
पउड़ी 15 · मंनै
मंनै पावहि मोखु दुआरु ॥ मंनै परवारै साधारु ॥
मंनै तरै तारे गुरु सिख ॥ मंनै नानक भवहि न भिख ॥
ऐसा नामु निरंजनु होइ ॥ जे को मंनि जाणै मनि कोइ ॥15॥
भाव: “मंनै” वाली चौकड़ी यहाँ एक सुंदर बात पर बंद होती है: यह भरोसा सिर्फ़ आपका नहीं रहता, “मंनै तरै तारे”, जो ख़ुद तर जाता है, वह औरों को भी तार ले जाता है। एक इंसान का सच्चा भरोसा उसके पूरे परिवार, उसकी पूरी संगत तक फैल जाता है। शांति संक्रामक होती है।
पउड़ी 16
पंच परवाण पंच परधानु ॥ … धौलु धरमु दइआ का पूतु ॥
संतोखु थापि रखिआ जिनि सूति ॥ … जो तुधु भावै साई भली कार ॥
तू सदा सलामति निरंकार ॥16॥
भाव: इस पउड़ी में एक बेहद सुंदर तस्वीर है। पुरानी कथाओं में धरती एक बैल के सींग पर टिकी मानी जाती थी।”धौलु धरमु, दइआ का पूतु”, वह बैल धर्म है, और धर्म दया का बेटा है। और पूरी व्यवस्था “संतोख” की डोरी से बँधी है।
ज़रा इसे महसूस कीजिए: पूरी दुनिया तीन चीज़ों पर खड़ी है, धर्म, दया, संतोष। और इस पउड़ी का अंत जपुजी की सबसे प्यारी टेक से होता है, जो अब चार बार लौटेगी: “जो तुधु भावै साई भली कार”, जो आपको भाए, वही भला काम।
पउड़ी 17
असंख जप असंख भाउ ॥ असंख पूजा असंख तप ताउ ॥
… कुदरति कवण कहा वीचारु ॥ वारिआ न जावा एक वार ॥
जो तुधु भावै साई भली कार ॥ तू सदा सलामति निरंकार ॥17॥
भाव: अब एक नया शब्द ताल पकड़ता है, “असंख”, यानी अनगिनत। अनगिनत लोग जप करते हैं, पूजा करते हैं, तप करते हैं, ग्रंथ पढ़ते हैं, दान देते हैं। नानक गिनती नहीं कर रहे; वे एक एहसास दिला रहे हैं, सृष्टि कितनी विशाल है, और उसमें भलाई कितने अनगिनत रूपों में चल रही है। और उस विशालता के सामने नानक का जवाब वही टेक है: “वारिआ न जावा एक वार”, मैं आप पर एक बार भी न्योछावर हैं सकूँ, तो बड़ी बात।
पउड़ी 18
असंख मूरख अंध घोर ॥ असंख चोर हरामखोर ॥
… असंख निंदक सिरि करहि भारु ॥ नानकु नीचु कहै वीचारु ॥
जो तुधु भावै साई भली कार ॥ तू सदा सलामति निरंकार ॥18॥
भाव: “असंख” की ताल जारी है, पर अब नानक दूसरा पहलू दिखाते हैं, और बिना घबराए। अनगिनत मूर्ख हैं, अनगिनत चोर, अनगिनत झूठे, अनगिनत निंदक। दुनिया का अँधेरा भी उतना ही असंख्य है जितना उसका उजाला।
पर देखिए नानक कहाँ पहुँचते हैं, कोई फ़ैसला नहीं सुनाते, घृणा नहीं करते। बस वही टेक दोहरा देते हैं: “जो तुधु भावै साई भली कार।” अँधेरा भी उसी की व्यवस्था के अंदर है। यह एक गहरी शांति है, दुनिया के बुरे को देख कर भी न जलना।
पउड़ी 19

असंख नाव असंख थाव ॥ अगम अगम असंख लोअ ॥
… अखरी नामु अखरी सालाह ॥ अखरी गिआनु गीत गुण गाह ॥
… जेता कीता तेता नाउ ॥ विणु नावै नाही को थाउ ॥19॥
भाव: इस पउड़ी में एक प्यारी बात है शब्दों के बारे में। नानक कहते हैं, “अखरी”, यानी अक्षरों से ही, हम उसका नाम लेते हैं, उसकी स्तुति करते हैं, ज्ञान पाते हैं, गीत गाते हैं। शब्द हमारी सीमा भी हैं और हमारा पुल भी। उसे पूरा बाँध तो नहीं सकते, पर उस तक इशारा शब्दों से ही करना है।
और एक गहरी लाइन: “विणु नावै नाही को थाउ”, उसके नाम के बिना कोई जगह नहीं। हर चीज़, हर कोना, उसी से भरा है।
पउड़ी 20
भरीऐ हथु पैरु तनु देह ॥ पाणी धोतै उतरसु खेह ॥
मूत पलीती कपड़ु होइ ॥ दे साबूणु लईऐ ओहु धोइ ॥
भरीऐ मति पापा कै संगि ॥ ओहु धोपै नावै कै रंगि ॥
… आपे बीजि आपे ही खाहु ॥ नानक हुकमी आवहु जाहु ॥20॥
भाव: यह पउड़ी एक एकदम रोज़ की तस्वीर से शुरू होती है, और इसीलिए दिल को छूती है। हाथ-पैर गंदे हों? पानी से धो लो। कपड़ा गंदा हो? साबुन लगा कर धो लो। सीधी बात।
फिर नानक एक सवाल छोड़ देते हैं: और जब मन ख़ुद मैला हो जाए, गलतियों से, पापों से, तब? वह किसी पानी, किसी साबुन से नहीं धुलता। वह “नावै कै रंगि” धुलता है, नाम के रंग में डूब कर। और लाइन का अंत कर्म का सीधा सिद्धांत है: “आपे बीजि आपे ही खाहु”, जो बोओगे, वही काटोगे।
पउड़ी 21
तीरथु तपु दइआ दतु दानु ॥ जे को पावै तिल का मानु ॥
… कवणु सु वेला वखतु कवणु कवण थिति कवणु वारु ॥
… जा करता सिरठी कउ साजे आपे जाणै सोई ॥
… नानक जे को आपौ जाणै अगै गइआ न सोहै ॥21॥
भाव: पउड़ी का पहला हिस्सा फिर वही बात कहता है: तीर्थ, तप, दान, इनका मोल “तिल” भर है, अगर भीतर सच्चाई न हो।
फिर नानक एक मज़ेदार सवाल पूछते हैं: यह सृष्टि बनी कब? कौनसा दिन, कौनसी तिथि, कौनसा महीना था? और जवाब? पंडित नहीं जानते, चाहे वेद-पुराण पढ़ लें। काज़ी नहीं जानते, चाहे क़ुरान देख लें। योगी नहीं जानते। “जा करता सिरठी कउ साजे आपे जाणै सोई”, जिसने बनाई, बस वही जानता है। नानक की बात सीधी है: अपने ज्ञान पर इतराना मत। और आख़िरी लाइन इसे मुहर लगा देती है, “जे को आपौ जाणै अगै गइआ न सोहै”, जो ख़ुद को बहुत बड़ा ज्ञानी समझता है, वह उसके दरबार में शोभा नहीं देता।
पउड़ी 22
पाताला पाताल लख आगासा आगास ॥
ओड़क ओड़क भालि थके वेद कहनि इक वात ॥
सहस अठारह कहनि कतेबा असुलू इकु धातु ॥
लेखा होइ त लिखीऐ लेखै होइ विणासु ॥
नानक वडा आखीऐ आपे जाणै आपु ॥22॥
भाव: पातालों के नीचे पाताल, आकाशों के ऊपर आकाश, लाखों। ऋषि छोर ढूँढते-ढूँढते थक गए, और आख़िर में वेद बस एक बात कह पाए। हज़ारों ग्रंथ भी एक ही सार पर आ टिके: वह एक है।
एक प्यारी लाइन यहाँ है: “लेखा होइ त लिखीऐ”, अगर उसका हिसाब हो ही सकता, तो लिख देते। पर वह तो असीम है, हिसाब बनता ही नहीं। तो नानक बस इतना कहते हैं, “वडा आखीऐ”, उसे “बड़ा” कह दो, और इतना मान लो कि वह ख़ुद ही ख़ुद को जानता है।
पउड़ी 23
सालाही सालाहि एती सुरति न पाईआ ॥
नदीआ अतै वाह पवहि समुंदि न जाणीअहि ॥
समुंद साह सुलतान गिरहा सेती मालु धनु ॥
कीड़ी तुलि न होवनी जे तिसु मनहु न वीसरहि ॥23॥
भाव: एक सुंदर तस्वीर। नदियाँ समुद्र में गिरती रहती हैं, पर क्या वे कभी समुद्र की पूरी गहराई जान पाती हैं? नहीं। हमारी बुद्धि नदी है, वह परमात्मा का समुद्र पूरा नाप नहीं सकती।
और फिर पउड़ी की चोट वाली लाइन: एक राजा, एक सुल्तान, पहाड़ जितना धन, और एक छोटी सी चींटी। अगर उस चींटी के मन में वह बसा है, और राजा के मन में नहीं, तो वह बादशाह उस चींटी के बराबर भी नहीं। असली बड़प्पन याद में है, तिजोरी में नहीं मिलता।
पउड़ी 24
अंतु न सिफती कहणि न अंतु ॥ अंतु न करणै देणि न अंतु ॥
अंतु न वेखणि सुणणि न अंतु ॥ … वडा साहिबु ऊचा थाउ ॥
ऊचे उपरि ऊचा नाउ ॥ … नानक नदरी करमी दाति ॥24॥
भाव: इस पउड़ी में एक शब्द बार-बार लौटता है, “अंतु न”, कोई अंत नहीं। उसकी स्तुति का अंत नहीं, उसकी देन का अंत नहीं, उसकी रचना का अंत नहीं। जितना कहो, उतनी और बढ़ती जाती है।
और पउड़ी का सार आख़िरी लाइन में है: “नदरी करमी दाति”, उसकी देन उसकी नज़र से, उसकी कृपा से मिलती है। नानक बार-बार यहीं लौटते हैं,कृपा से खुलती है। तो असली काम उस कृपा के लायक़ बनना है, बुद्धि तेज़ करने पर अकेला भरोसा नहीं।
पउड़ी 25
बहुता करमु लिखिआ ना जाइ ॥ वडा दाता तिलु न तमाइ ॥
… एहि भि दाति तेरी दातार ॥ बंदि खलासी भाणै होइ ॥
… जिस नो बखसे सिफति सालाह ॥ नानक पातिसाही पातिसाहु ॥25॥
भाव: उसकी कृपा इतनी है कि लिखी नहीं जा सकती, और सबसे बड़ी बात, “तिलु न तमाइ”, वह देता है, पर बदले में तिल भर लालच नहीं रखता। बेशर्त देना।
और एक हैरान करने वाली लाइन: दुख, भूख, तकलीफ़, “एहि भि दाति आपकी”, नानक कहते हैं ये भी आपकी ही देन हैं।पर गहरी है: अगर सब कुछ उसी की व्यवस्था में है, तो कठिन घड़ियाँ भी उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं, किसी सज़ा से बिल्कुल अलग।
पउड़ी 26
अमुल गुण अमुल वापार ॥ अमुल वापारीए अमुल भंडार ॥
… आखहि बरमे आखहि इंद ॥ आखहि गोपी तै गोविंद ॥
… जेवडु भावै तेवडु होइ ॥ नानक जाणै साचा सोइ ॥26॥
भाव: अब “अमुल” शब्द ताल बन जाता है, अमूल्य, जिसकी क़ीमत न लगाई जा सके। उसके गुण अमूल्य, उसका प्रेम अमूल्य, उसका न्याय अमूल्य, उसकी कृपा अमूल्य।
और फिर एक लंबी सूची, ब्रह्मा कहते हैं, इंद्र कहते हैं, गोपियाँ और गोविंद कहते हैं, शिव कहते हैं, सिद्ध कहते हैं। सब उसे बयान करने की कोशिश में लगे हैं। नानक का निचोड़: “जेवडु भावै तेवडु होइ”, वह जितना चाहे, उतना बड़ा। उसकी क़ीमत लगाने की कोशिश ही एक तरह की नादानी है।
पउड़ी 27 · सो दरु
सो दरु केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब समाले ॥
वाजे नाद अनेक असंखा केते वावणहारे ॥
… गावहि तुहनो पउणु पाणी बैसंतरु …
… सो पातिसाहु साहा पातिसाहिबु नानक रहणु रजाई ॥27॥
भाव: यह जपुजी की सबसे मशहूर पउड़ियों में से है, इतनी कि यह गुरु ग्रंथ साहिब में आगे फिर से आती है। नानक एक सवाल से शुरू करते हैं: वह दरवाज़ा कैसा होंगे, वह घर कैसा होंगे, जहाँ बैठ कर वह पूरी सृष्टि सँभालता है?
और फिर एक भव्य तस्वीर खुलती है, उस दरबार में अनगिनत संगीत बज रहे हैं। हवा गा रही है, पानी गा रहा है, आग गा रही है। देवता, सिद्ध, योगी, 68 तीर्थ, चारों खानियाँ, सारे ब्रह्मांड, सब गा रहे हैं। पूरी सृष्टि एक गाता हुआ दरबार है। और नानक उस सबके बीच बस एक छोटी सी जगह माँगते हैं: “रहणु रजाई”, आपकी रज़ा में रह जाऊँ, बस इतना।
पउड़ी 28
मुंदा संतोखु सरमु पतु झोली धिआन की करहि बिभूति ॥
खिंथा कालु कुआरी काइआ जुगति डंडा परतीति ॥
आई पंथी सगल जमाती मनि जीतै जगु जीतु ॥
आदेसु तिसै आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥28॥
भाव: यहाँ नानक योगियों से सीधी बात कर रहे हैं, और बहुत प्यार से। योगी कान में कुंडल पहनते हैं, झोली रखते हैं, शरीर पर भस्म मलते हैं, हाथ में डंडा रखते हैं। नानक कहते हैं, ठीक है, पर असली कुंडल क्या हैं? संतोष। असली झोली? धीरज। असली भस्म? ध्यान। असली डंडा? भरोसा।
यानी बाहर के चिह्न उतार कर भीतर के गुण पहनो। और पउड़ी का दिल एक लाइन में है: “मनि जीतै जगु जीतु”, अपना मन जीत लो, दुनिया जीत ली। सबसे बड़ी जीत भीतर मिलती है, बाहर ढूँढने पर हाथ नहीं आती।
पउड़ी 29
भुगति गिआनु दइआ भंडारणि घटि घटि वाजहि नाद ॥
आपि नाथु नाथी सभ जा की रिधि सिधि अवरा साद ॥
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग ॥
आदेसु तिसै आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥29॥
भाव: योगी “भुगति”, यानी भंडारे का भोजन बाँटते हैं। नानक कहते हैं, असली भोजन ज्ञान है, और उसे बाँटने वाली दया। हर हृदय में पहले से एक नाद गूँज रहा है।
और एक ज़रूरी बात इस पउड़ी में: “रिधि सिधि अवरा साद”, चमत्कारी शक्तियाँ बस एक अलग, छोटा सा स्वाद हैं, असली मंज़िल से अलग। यह बिल्कुल वही चेतावनी है जो पतंजलि सिद्धियों के बारे में देते हैं। शक्तियाँ रास्ते में मिलती हैं; उन्हें मंज़िल मत समझ लेना।
पउड़ी 30
एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु ॥
इकु संसारी इकु भंडारी इकु लाए दीबाणु ॥
… ओहु वेखै ओना नदरि न आवै बहुता एहु विडाणु ॥
आदेसु तिसै आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥30॥
भाव: एक माया-शक्ति से तीन “चेले” जन्मे, तीन गुण (सत्व, रजस्, तमस्), और उनसे तीन काम करने वाले: ब्रह्मा (रचने वाला), विष्णु (पालने वाला), शिव (समेटने वाला)।
पर नानक एक हैरान करने वाली बात जोड़ देते हैं: “ओहु वेखै, ओना नदरि न आवै”, वह परमात्मा इन तीनों को देखता है, पर ये तीनों उसे नहीं देख पाते। यानी जिन्हें हम सबसे ऊँचा मानते हैं, वे भी उस एक के सामने काम करने वाले भर हैं। “बहुता एहु विडाणु”, कैसा अचरज है यह।
पउड़ी 31
आसणु लोइ लोइ भंडार ॥ जो किछु पाइआ सु एका वार ॥
करि करि वेखै सिरजणहारु ॥ नानक सचे की साची कार ॥
आदेसु तिसै आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥31॥
भाव: उसके आसन हर लोक में, उसके भंडार हर जगह। एक प्यारी लाइन यहाँ है: “जो किछु पाइआ सु एका वार”, जो भी इस सृष्टि में रखा गया, एक बार में रख दिया गया। व्यवस्था पूरी है, उसमें बार-बार ठीक करने की ज़रूरत नहीं। और रचने वाला? “करि करि वेखै”, रच कर, अपनी रचना को देखता रहता है। एक कलाकार की तरह, अपने काम को निहारता हुआ।
पउड़ी 32
इक दू जीभौ लख होहि लख होवहि लख वीस ॥
लखु लखु गेड़ा आखीअहि एकु नामु जगदीस ॥
एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीऐ होइ इकीस ॥
सुणि गला आकास की कीटा आई रीस ॥
नानक नदरी पाईऐ कूड़ी कूड़ै ठीस ॥32॥
भाव: एक मज़ेदार कल्पना से पउड़ी शुरू होती है: मान लो एक जीभ की जगह लाख जीभें हो जाएँ, और हर जीभ लाख बार उसका नाम ले, फिर भी कम। उसकी महिमा गिनती से बड़ी है।
पर पउड़ी की असली चोट आख़िरी लाइन में है, और एक प्यारी, ज़मीनी तस्वीर के साथ: “सुणि गला आकास की कीटा आई रीस”, आसमान की ऊँची बातें सुन कर एक कीड़ा भी सोचने लगता है “मैं भी पहुँच जाऊँगा।” नानक का इशारा: सिर्फ़ बड़ी-बड़ी बातें कर लेने से ऊँचाई नहीं मिलती। वह “नदरी पाईऐ”, कृपा से मिलती है। बाक़ी सब “कूड़ी ठीस”, खोखली डींग।
पउड़ी 33
आखणि जोरु चुपै नह जोरु ॥ जोरु न मंगणि देणि न जोरु ॥
जोरु न जीवणि मरणि नह जोरु ॥ जोरु न राजि मालि मनि सोरु ॥
जोरु न सुरती गिआनि वीचारि ॥ जोरु न जुगती छुटै संसारु ॥
जिसु हथि जोरु करि वेखै सोइ ॥ नानक उतमु नीचु न कोइ ॥33॥
भाव: इस पउड़ी में एक शब्द हथौड़े की तरह बार-बार पड़ता है, “जोरु नह”, कोई ज़ोर नहीं चलता। हमारे पास ज़बरदस्ती बोलने का ज़ोर नहीं, ज़बरदस्ती चुप रहने का नहीं। ज़बरदस्ती जीने का ज़ोर नहीं, मौत रोकने का नहीं। ज़बरदस्ती ज्ञान पाने का भी नहीं।
यह पउड़ी पहली बार में थोड़ी कठोर लग सकती है। पर इसे ध्यान से पढ़िए, यह असल में एक राहत है। अगर इतना कुछ हमारे ज़ोर में है ही नहीं, तो उस सबकी चिंता का बोझ भी हमारा नहीं। और आख़िरी लाइन सबको बराबर कर देती है: “उतमु नीचु न कोइ”, कोई ऊँचा नहीं, कोई नीचा नहीं। सबका ज़ोर एक ही जगह है, उसके हाथ में।
पउड़ी 34 · धरम खंड

राती रुती थिती वार ॥ पवण पाणी अगनी पाताल ॥
तिसु विचि धरती थापि रखी धरम साल ॥
… सचा आपि सचा दरबारु ॥ … कच पकाई ओथै पाइ ॥
नानक गइआ जापै जाइ ॥34॥
भाव: यहाँ से आख़िरी पाँच पउड़ियाँ एक सीढ़ी हैं, पाँच खंड, यानी आत्मा की यात्रा के पाँच पड़ाव। यह पहला पड़ाव है: धरम खंड।
नानक एक सुंदर बात कहते हैं, रात, ऋतु, तिथि, हवा, पानी, आग, इन सबके बीच धरती को रखा गया, और रखा गया एक ख़ास मक़सद से: “धरम साल”, एक धर्मशाला, एक अभ्यास की जगह। यानी यह धरती जान-बूझ कर बनाई हुई जगह है, जहाँ कर्म किए जाते हैं और परखे जाते हैं, कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं। पहली सीढ़ी सीधी है: यहाँ आप जो करते हैं, वह मायने रखता है।
पउड़ी 35 · ज्ञान खंड
धरम खंड का एहो धरमु ॥ गिआन खंड का आखहु करमु ॥
केते पवण पाणी वैसंतर केते कान महेस ॥
… केतीआ सुरती सेवक केते नानक अंतु न अंतु ॥35॥
भाव: दूसरी सीढ़ी: ज्ञान खंड। और यहाँ नानक कुछ करते हैं जो रोमांचक है, वे अचानक scale खोल देते हैं। अनगिनत हवाएँ, अनगिनत पानी, अनगिनत शिव, अनगिनत ब्रह्मा, अनगिनत सूरज, चाँद, ग्रह, लोक।
यह पउड़ी आपका मन जान-बूझ कर बड़ा करती है। धरम खंड में आप अपने छोटे से जीवन और कर्म के बारे में सोच रहे थे। ज्ञान खंड में पहुँच कर पता चलता है, सृष्टि कितनी विशाल है, और “मैं” उसमें कितना नन्हा। और यह जानना डर के बजाय एक राहत देता है।
पउड़ी 36 · सरम खंड
गिआन खंड महि गिआनु परचंडु ॥ तिथै नाद बिनोद कोड अनंदु ॥
सरम खंड की बाणी रूपु ॥ तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुतु अनूपु ॥
… तिथै घड़ीऐ सुरति मति मनि बुधि ॥36॥
भाव: तीसरी सीढ़ी: सरम खंड, मेहनत का खंड। नानक एक सुंदर रूपक देते हैं, यहाँ कुछ “घड़ा जाता है।” किसी सुनार की तरह, यहाँ चेतना, समझ, बुद्धि को आकार दिया जाता है, ढाला जाता है।
ज्ञान मिल जाना एक बात है; उससे ख़ुद को बदल लेना दूसरी। सरम खंड वही जगह है, जहाँ ज्ञान से इंसान घड़ा जाता है, सिर्फ़ जानने पर रुक नहीं जाता। और नानक ईमानदारी से कहते हैं, “ता कीआ गला कथीआ ना जाहि”, यहाँ की बातें शब्दों में नहीं आतीं।
पउड़ी 37 · करम खंड और सच खंड
करम खंड की बाणी जोरु ॥ … तिन महि रामु रहिआ भरपूर ॥
… सच खंडि वसै निरंकारु ॥ करि करि वेखै नदरि निहाल ॥
… जिव जिव हुकमु तिवै तिव कार ॥ नानक कथना करड़ा सारु ॥37॥
भाव: आख़िरी दो सीढ़ियाँ इसी एक पउड़ी में। चौथी, करम खंड, कृपा का खंड। यहाँ की बाणी है “जोरु”, एक भीतरी ताक़त। यहाँ रहने वाले महान योद्धा हैं, पर उनकी ताक़त भीतर से आती है, बाहर के पठ्ठेपन से नहीं; उनके भीतर “रामु रहिआ भरपूर”, परमात्मा पूरा भरा है। वे न डिगते हैं, न धोखा खाते हैं।
और पाँचवीं, आख़िरी सीढ़ी, सच खंड। यहाँ निरंकार ख़ुद बसता है, और अपनी सृष्टि को “नदरि निहाल”, कृपा भरी नज़र से, निहारता रहता है। नानक एक आख़िरी, ईमानदार लाइन जोड़ते हैं: “कथना करड़ा सारु”, इसे शब्दों में कहना लोहे को चबाने जैसा कठिन है। कुछ जगहें सिर्फ़ पहुँच कर जानी जाती हैं।
पउड़ी 38 · सुनार की भट्ठी

जतु पाहारा धीरजु सुनिआरु ॥ अहरणि मति वेदु हथीआरु ॥
भउ खला अगनि तप ताउ ॥ भांडा भाउ अम्रितु तितु ढालि ॥
घड़ीऐ सबदु सची टकसाल ॥
जिन कउ नदरि करमु तिन कार ॥ नानक नदरी नदरि निहाल ॥38॥
भाव: जपुजी की आख़िरी पउड़ी, और सबसे सुंदर रूपक। नानक एक पूरी सुनार की दुकान खड़ी कर देते हैं, और हर औज़ार एक भीतरी गुण है।
संयम को भट्ठी बनाओ। धीरज को सुनार। समझ को वह निहाई जिस पर सोना पीटा जाता है, और ज्ञान को हथौड़ा। डर को धौंकनी, और तप को आग। प्रेम को वह बर्तन जिसमें पिघला हुआ सोना ढाला जाए। और इस पूरी टकसाल में जो ढाला जाता है, वह है, “सबद”, सच्चा शब्द, नाम।
ज़रा सोचिए नानक क्या कह रहे हैं: एक सच्चा इंसान बनना एक हुनर है, एक कारीगरी है। यह अपने आप नहीं होता; यह घड़ा जाता है, संयम, धीरज, डर, तप, प्रेम, इन सबकी भट्ठी में। और पहली पउड़ी का वह सवाल, “किव सचिआरा होईऐ?”, यहाँ अपना जवाब पा लेता है। सच्चा इंसान बनाया जाता है, इसी टकसाल में। और आख़िरी शब्द फिर वही है: “नदरी”, कृपा से।
सलोक · समापन
पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु ॥
दिवसु राति दुइ दाई दाइआ खेलै सगल जगतु ॥
चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरमु हदूरि ॥
करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूरि ॥
जिनी नामु धिआइआ गए मसकति घालि ॥
नानक ते मुख उजले केती छुटी नालि ॥1॥
भाव: और जपुजी एक ऐसी लाइन पर बंद होती है जो याद रह जाती है: हवा गुरु है, पानी पिता, और धरती महान माँ। दिन और रात दो दाइयाँ हैं, जिनकी गोद में सारा संसार खेल रहा है।
ज़रा इस तस्वीर की कोमलता देखिए। 38 पउड़ियाँ परमात्मा की विशालता, अनंतता, अगम्यता की बात करती रहीं। और अंत में नानक उसे घर ले आते हैं, हवा, पानी, धरती, दिन, रात। वह दूर का राजा नहीं; वह आपकी हर साँस में, आपके हर घूँट पानी में है।
और आख़िरी लाइन पूरी रचना का सार है: “जिनी नामु धिआइआ, गए मसकति घालि”, जिन्होंने नाम का ध्यान किया, और मेहनत से जिए, वे सफल गए। “ते मुख उजले”, उनका चेहरा रोशन। और सबसे प्यारी बात आख़िर में, “केती छुटी नालि”, उनके साथ और कितने ही तर गए। एक सच्चा इंसान औरों को भी साथ ले जाता है, अकेले पार नहीं जाता।
पढ़ कर आगे क्या
इसी site पर: सुखमनी साहिबपाँचवें गुरु अर्जुन देव की रचना, “मन को शांति देने वाला रत्न।” जपुजी सुबह की प्रार्थना है, सुखमनी मन की सांत्वना। दोनों साथ पढ़िए।
और एक सवाल जेब में रखिए, वही जो नानक ने पहली पउड़ी में पूछा था: “किव सचिआरा होईऐ?” आज एक छोटा सा मौक़ा देखिए जहाँ ज़ोर लगाने के बजाय “हुकम” में बहना, जो हो रहा है उसे लड़े बिना स्वीकारना, ज़्यादा सच्चा रास्ता था।
साथ में पढ़ें · Companion Texts
- सुखमनी साहिब M5 की magnum opus, जपजी की echo।
- आनंद साहिब M3 की 40-पउड़ी ananda-rachna।
- आसा-दी-वार M1 की 24-पउड़ी morning-वार।