वह रात जब अंधे राजा को नींद नहीं आई
संजय लौट आए थे। पाण्डवों के पास, कृष्ण के पास, सन्धि का अन्तिम सन्देश ले कर जो दूत भेजा गया था, वह खाली हाथ और भारी मन लौटा था, और लौटते ही उसने भरी सभा में धृतराष्ट्र को आड़े हाथों लिया था। कल सुबह वही संजय सबके सामने युधिष्ठिर का वचन सुनाने वाले थे, और उस वचन में क्या होगा, यह सोच-सोच कर अंधे राजा का मन सूखे पत्ते की तरह काँप रहा था।
रात गहरी हो चुकी थी, पर धृतराष्ट्र की आँखों में नींद का नाम नहीं था। बिस्तर पर वे करवटें बदलते रहे, और भीतर एक आग थी जो बुझने का नाम नहीं ले रही थी। आख़िर हार कर उन्होंने द्वारपाल को भेजा, विदुर को बुला लाओ, अभी। उसी विदुर को, जो उनका छोटा भाई था, जिसकी बुद्धि की कुरुओं में कोई बराबरी नहीं थी, और जिसकी एक ख़ास बात यह थी कि वह राजा को भी वही कहता था जो सच होता, चाहे वह कितना ही कड़वा क्यों न हो।
विदुर आए, हाथ जोड़ कर खड़े हुए, और बोले, राजन्, आपने इस आधी रात में याद किया, आज्ञा दीजिए, क्या सेवा है। धृतराष्ट्र ने अपनी जागती रातों का रोग कह सुनाया। संजय जो कह कर गया है, उसने मुझे भीतर तक झुलसा दिया है, उन्होंने कहा। नींद कोसों दूर है, शरीर जल रहा है। तुम धर्म और अर्थ दोनों के जानकार हो; मुझे वह बात बताओ जिससे इस तपते हुए मन को कुछ शान्ति मिले।
पहले एक सीधा-सा प्रश्न
विदुर ने उत्तर सीधे उपदेश से नहीं, एक सीधे-से अवलोकन से शुरू किया। रात को नींद किनकी आँखों से उड़ती है, राजन्, यह मैं आपको बताता हूँ, उन्होंने कहा। उसकी, जिस पर कोई बलवान चढ़ आया हो और वह दुर्बल हो। उसकी, जिसका सब कुछ छिन गया हो। उसकी, जो किसी की कामना में जल रहा हो। और उसकी, जो चोर हो, और पकड़े जाने के डर से काँप रहा हो।
फिर उन्होंने बहुत धीरे से वह बात कही जो इस पूरी रात का असली प्रश्न थी। इन दोषों में से कोई आपको तो नहीं छू गया, राजन्? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप किसी पराये धन पर ललचा कर इस तरह तप रहे हों? प्रश्न में कोई कठोरता नहीं थी, पर उसकी नोक सीधे उस घाव पर थी जिसे राजा सबसे अधिक छिपाता था, अपने बेटे की उस लालसा को, जो पाण्डवों का राज्य हड़पना चाहती थी और जिसे राजा रोक नहीं पा रहा था।
धृतराष्ट्र इस चुभन से कतरा गए। मुझे वह वचन सुनाओ, उन्होंने कहा, जो धर्म से भरा हो और कल्याण की ओर ले जाए। और तब विदुर ने वह प्रवाह खोला जो आगे रात भर बहता रहा।

समझदार कौन, और मूर्ख कौन
विदुर ने पहले यह बताया कि सचमुच समझदार आदमी पहचाना कैसे जाता है, क्योंकि बहुत-से लोग केवल समझदार दिखते हैं। समझदार वही है, उन्होंने कहा, जो वही काम उठाता है जो उठाने योग्य हो, और जिसकी योजना उसके पूरा होने से पहले किसी को पता नहीं चलती। जो ठंड, गरमी, भय और मोह से अपने काम में बाधा नहीं आने देता; जो अपनी शक्ति को जानता है, न उससे अधिक का बोझ उठाता है न कम का; और जिसे जो मिल जाए उसी में सन्तोष पा लेता है। ऐसा आदमी थोड़े में भी बड़ा होता है।
और फिर उन्होंने उसका उलटा चित्र खींचा, मूर्ख का, और इस चित्र की हर रेखा मानो हस्तिनापुर के किसी न किसी निर्णय की ओर इशारा कर रही थी। मूर्ख वह है जो बिना पूछे ही बोलता चला जाता है; जो उन पर भरोसा कर बैठता है जो भरोसे के लायक़ नहीं; जो अपनी ही ग़लती का दोष दूसरों के सिर मढ़ता है; और जो वहाँ क्रोध करता है जहाँ उसके पास उस क्रोध को निभाने की शक्ति ही नहीं। ऐसा आदमी, विदुर ने कहा, अपने ही हाथों अपने कुल को डुबाता है।
धृतराष्ट्र सुनते रहे, सिर हिलाते रहे, क्योंकि हर वाक्य सच था। पर सच को सुनना एक बात है, और उस पर चलना दूसरी।
जो जीत बल से नहीं होती
विदुर का स्वर अब और गहरा हुआ। कुछ जीतें ऐसी होती हैं, उन्होंने कहा, जो हथियार से नहीं, स्वभाव से जीती जाती हैं। क्रोध को शान्ति से जीतिए, बुराई को भलाई से, कंजूस को दान देकर, और झूठ को सच से। जो क्षमा कर सकता है, वही सबसे बलवान है, क्योंकि क्षमा दुर्बल की लाचारी नहीं, बलवान का चुनाव है।
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग और कुछ चीज़ें घर में रखने योग्य नहीं होतीं, और गिना दिया, वह आचार्य जो पढ़ा न सके, वह पुरोहित जिसने स्वयं न पढ़ा हो, वह राजा जो रक्षा न कर सके, वह पत्नी जो सदा कटु बोले। और बीच-बीच में वह तीखी बात भी आई जो सीधे राजा के बेटे की ओर थी, कि एक अकेला आदमी पाप करता है, और उसका फल पूरा कुल भोगता है। धृतराष्ट्र के लिए इस वाक्य में दुर्योधन का चेहरा साफ़ झलक रहा था।

एक कथा, जिसमें पिता ने अपने बेटे के विरुद्ध सच कहा
बात को और गहरा करने के लिए विदुर ने एक पुरानी कथा छेड़ी। केशिनी नाम की एक कन्या के पास दो वर आए थे, सुधन्वा और विरोचन। एक देवों के पक्ष का था, दूसरा असुरराज प्रह्लाद का पुत्र। केशिनी ने पूछ लिया, श्रेष्ठ कौन है, ब्राह्मण या दैत्य? और इसी बात पर दोनों में ठन गई। विरोचन ने गर्व से कहा, हम ही श्रेष्ठ हैं; सुधन्वा ने उसे चुनौती दी। देखते-देखते बात इतनी बढ़ी कि दोनों ने अपने-अपने प्राण ही दाँव पर लगा दिए, और तय हुआ कि इस प्रश्न का उत्तर वही देगा जो सच के लिए जाना जाता हो।
और न्याय किसे करना था? स्वयं प्रह्लाद को, विरोचन के अपने पिता को। यहीं इस कथा का काँटा था, क्योंकि कटघरे में जो खड़ा था वह प्रह्लाद का अपना बेटा था, और एक ओर था सच, दूसरी ओर अपना रक्त। प्रह्लाद ने सुधन्वा से पूछा, बताओ, झूठ बोलने का दण्ड क्या है, ताकि मैं जान कर बोलूँ। सुधन्वा का उत्तर काँपा देने वाला था, एक झूठ पाँच को मारता है, गाय के विषय में बोला गया झूठ दस को, घोड़े के विषय में सौ को, और मनुष्य के विषय में बोला झूठ हज़ार को; पर भूमि के विषय में बोला गया झूठ तो सब कुछ डुबो देता है। इसलिए, उसने कहा, भूमि के बारे में कभी असत्य मत कहना।
प्रह्लाद के सामने अब कोई रास्ता नहीं था। उन्होंने सच कहा, अपने ही पुत्र के विरुद्ध, कि सुधन्वा श्रेष्ठ है। और तब कुछ अनोखा हुआ। सुधन्वा ने, जो विरोचन के प्राणों का स्वामी बन चुका था, प्रसन्न हो कर उसके प्राण लौटा दिए, केवल इसलिए कि प्रह्लाद ने अपने बेटे के लिए भी झूठ नहीं बोला था। विदुर ने यहीं धागा सीधे राजा की ओर खींचा। यही बात है, राजन्, उन्होंने कहा। भूमि के लोभ में असत्य का सहारा मत लीजिए, और अपने पुत्रों तथा मन्त्रियों समेत अपने ही नाश की ओर मत बढ़िए।
व्यर्थ कौन, और आदर किसका
रात ढलती रही, और विदुर की वाणी बहती रही। उन्होंने मनु की गिनाई हुई वह सूची सुनाई, उन सत्रह तरह के लोगों की, जो मानो मुट्ठियों से आकाश को पीटते हैं और बालू से तेल निकालना चाहते हैं, जिनका सारा श्रम व्यर्थ चला जाता है, वह जो मूर्ख को समझाना चाहे, वह जो थोड़े को बहुत बनाना चाहे बिना मेहनत के, वह जो बैर पाल कर सुख ढूँढ़े।
फिर बात आदर और मर्यादा पर आई। जब कोई बड़ा या अतिथि सामने आता है, विदुर ने कहा, तो युवक के प्राण मानो ऊपर को उठ जाते हैं, और उठ कर अभिवादन करने से ही वे फिर ठिकाने आते हैं। गुरु का, अतिथि का, और बड़ों का सम्मान केवल शिष्टाचार नहीं, अपने ही भीतर के तेज को सँभालना है। और इन्हीं बीच वे सुन्दर उपमाएँ भी आईं, कि छल से जीने वाले को वेद भी नहीं तार पाते, जैसे पंख निकल आने पर चिड़ियाँ घोंसला छोड़ देती हैं वैसे ही उसके पुण्य उसे छोड़ जाते हैं।

और सुबह होने से पहले, एक स्वीकारोक्ति
जब रात का बड़ा हिस्सा बीत चुका था और विदुर बहुत कुछ कह चुके थे, तो धृतराष्ट्र ने वह बात कही जिसमें इस पूरी रात की, और शायद उनके पूरे जीवन की पीड़ा सिमट आई। तुम ठीक कहते हो, उन्होंने धीरे से कहा। तुम जो भी कहते हो, हर शब्द सच है, और सुनते समय मेरा मन भी यही कहता है कि यही उचित है।
पर एक बात है, उन्होंने आगे कहा, और यहीं उनकी आवाज़ टूटने लगी। जैसे ही दुर्योधन मेरे सामने आता है, यही मन फिर पलट जाता है। बुद्धि जो निश्चय रात भर करती है, बेटे का चेहरा देखते ही वह बिखर जाती है। जो भाग्य में बदा है, उसे शायद कोई मनुष्य लाँघ नहीं सकता।
यही इस पूरी विदुर-नीति का सबसे मार्मिक मोड़ है। एक राजा, जिसके पास संसार-भर की नीति सुनने को है, जो हर शब्द को सच मानता है, और फिर भी जो उस सच पर चल नहीं पाता, क्योंकि एक पिता का मोह उसकी सारी बुद्धि पर भारी पड़ जाता है। विदुर ने रात भर रोशनी दिखाई, पर जिस आँख को देखना ही नहीं था, वह अंधी केवल जन्म से नहीं थी। और शायद इसीलिए यह संवाद आज भी इतना सच लगता है, क्योंकि सही बात जान लेना एक चीज़ है, और उस पर चल पड़ना बिलकुल दूसरी।
यह कथा महाभारत के उद्योग पर्व के प्रजागर-पर्व (विदुर-नीति) पर आधारित है, विस्तृत कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम और भाव का अनुसरण करते हुए।