अंग
292
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕੋਊ ਨਰਕ ਕੋਊ ਸੁਰਗ ਬੰਛਾਵਤ ॥
ਆਲ ਜਾਲ ਮਾਇਆ ਜੰਜਾਲ ॥
ਹਉਮੈ ਮੋਹ ਭਰਮ ਭੈ ਭਾਰ ॥
ਦੂਖ ਸੂਖ ਮਾਨ ਅਪਮਾਨ ॥
ਅਨਿਕ ਪ੍ਰਕਾਰ ਕੀਓ ਬਖੵਾਨ ॥
ਆਪਨ ਖੇਲੁ ਆਪਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ॥
ਖੇਲੁ ਸੰਕੋਚੈ ਤਉ ਨਾਨਕ ਏਕੈ ॥੭॥
ਆਲ ਜਾਲ ਮਾਇਆ ਜੰਜਾਲ ॥
ਹਉਮੈ ਮੋਹ ਭਰਮ ਭੈ ਭਾਰ ॥
ਦੂਖ ਸੂਖ ਮਾਨ ਅਪਮਾਨ ॥
ਅਨਿਕ ਪ੍ਰਕਾਰ ਕੀਓ ਬਖੵਾਨ ॥
ਆਪਨ ਖੇਲੁ ਆਪਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ॥
ਖੇਲੁ ਸੰਕੋਚੈ ਤਉ ਨਾਨਕ ਏਕੈ ॥੭॥
कोऊ नरक कोऊ सुरग बंछावत ॥
आल जाल माइआ जंजाल ॥
हउमै मोह भरम भै भार ॥
दूख सूख मान अपमान ॥
अनिक प्रकार कीओ बखॵान ॥
आपन खेलु आपि करि देखै ॥
खेलु संकोचै तउ नानक एकै ॥७॥
आल जाल माइआ जंजाल ॥
हउमै मोह भरम भै भार ॥
दूख सूख मान अपमान ॥
अनिक प्रकार कीओ बखॵान ॥
आपन खेलु आपि करि देखै ॥
खेलु संकोचै तउ नानक एकै ॥७॥
हिन्दी अर्थ: तब कोई जीव नर्कों का भागी और कोई स्वर्गों का चाहवान बना। घरों के धंधे, माया के बंधन। अहंकार, मोह, भुलेखे, डर, दुख, सुख, आदर, निरादरी- ऐसी कई किस्मों की बातें चल पड़ीं। हे नानक ! प्रभू स्वयं तमाशा रच के स्वयं देख रहा है। जब इस खेल को समेटता है तो एक स्वयं ही स्वयं हो जाता है। 7।
ਜਹ ਅਬਿਗਤੁ ਭਗਤੁ ਤਹ ਆਪਿ ॥
ਜਹ ਪਸਰੈ ਪਾਸਾਰੁ ਸੰਤ ਪਰਤਾਪਿ ॥
ਦੁਹੂ ਪਾਖ ਕਾ ਆਪਹਿ ਧਨੀ ॥
ਉਨ ਕੀ ਸੋਭਾ ਉਨਹੂ ਬਨੀ ॥
ਆਪਹਿ ਕਉਤਕ ਕਰੈ ਅਨਦ ਚੋਜ ॥
ਆਪਹਿ ਰਸ ਭੋਗਨ ਨਿਰਜੋਗ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਆਪਨ ਨਾਇ ਲਾਵੈ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਖੇਲ ਖਿਲਾਵੈ ॥
ਬੇਸੁਮਾਰ ਅਥਾਹ ਅਗਨਤ ਅਤੋਲੈ ॥
ਜਿਉ ਬੁਲਾਵਹੁ ਤਿਉ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਬੋਲੈ ॥੮॥੨੧॥
ਜਹ ਪਸਰੈ ਪਾਸਾਰੁ ਸੰਤ ਪਰਤਾਪਿ ॥
ਦੁਹੂ ਪਾਖ ਕਾ ਆਪਹਿ ਧਨੀ ॥
ਉਨ ਕੀ ਸੋਭਾ ਉਨਹੂ ਬਨੀ ॥
ਆਪਹਿ ਕਉਤਕ ਕਰੈ ਅਨਦ ਚੋਜ ॥
ਆਪਹਿ ਰਸ ਭੋਗਨ ਨਿਰਜੋਗ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਆਪਨ ਨਾਇ ਲਾਵੈ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਖੇਲ ਖਿਲਾਵੈ ॥
ਬੇਸੁਮਾਰ ਅਥਾਹ ਅਗਨਤ ਅਤੋਲੈ ॥
ਜਿਉ ਬੁਲਾਵਹੁ ਤਿਉ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਬੋਲੈ ॥੮॥੨੧॥
जह अबिगतु भगतु तह आपि ॥
जह पसरै पासारु संत परतापि ॥
दुहू पाख का आपहि धनी ॥
उन की सोभा उनहू बनी ॥
आपहि कउतक करै अनद चोज ॥
आपहि रस भोगन निरजोग ॥
जिसु भावै तिसु आपन नाइ लावै ॥
जिसु भावै तिसु खेल खिलावै ॥
बेसुमार अथाह अगनत अतोलै ॥
जिउ बुलावहु तिउ नानक दास बोलै ॥८॥२१॥
जह पसरै पासारु संत परतापि ॥
दुहू पाख का आपहि धनी ॥
उन की सोभा उनहू बनी ॥
आपहि कउतक करै अनद चोज ॥
आपहि रस भोगन निरजोग ॥
जिसु भावै तिसु आपन नाइ लावै ॥
जिसु भावै तिसु खेल खिलावै ॥
बेसुमार अथाह अगनत अतोलै ॥
जिउ बुलावहु तिउ नानक दास बोलै ॥८॥२१॥
हिन्दी अर्थ: जहाँ अदृश्य प्रभू है वहाँ उसका भक्त है। जहाँ भक्त है वहाँ वह प्रभू स्वयं है। हर जगह संतों की महिमा के वास्ते प्रभू जगत का पसारा पसार रहा है। (संतों का प्रताप और माया का प्रभाव- इन) दोनों पक्षों का मालिक प्रभू स्वयं ही है। प्रभू जी अपनी शोभा स्वयं ही जानते हैं। प्रभू खुद ही खेलें खेल रहा है खुद ही आनंद तमाशे कर रहा है। खुद ही रसों को भोगने वाला है और खुद ही निर्लिप है। जो उसे भाता है उसे अपने नाम में जोड़ता है। और जिसको चाहता है माया की खेलें खिलाता है। हे नानक ! (ऐसे अरदास कर और कह,) हे बेअंत ! हे अथाह ! हे अगनत ! हे अडोल प्रभू ! जैसे तू बुलाता है वैसे तेरे दास बोलते हैं। 8। 21।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਕੇ ਠਾਕੁਰਾ ਆਪੇ ਵਰਤਣਹਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਪਸਰਿਆ ਦੂਜਾ ਕਹ ਦ੍ਰਿਸਟਾਰ ॥੧॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਕੇ ਠਾਕੁਰਾ ਆਪੇ ਵਰਤਣਹਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਪਸਰਿਆ ਦੂਜਾ ਕਹ ਦ੍ਰਿਸਟਾਰ ॥੧॥
सलोकु ॥
जीअ जंत के ठाकुरा आपे वरतणहार ॥
नानक एको पसरिआ दूजा कह द्रिसटार ॥१॥
जीअ जंत के ठाकुरा आपे वरतणहार ॥
नानक एको पसरिआ दूजा कह द्रिसटार ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे जीवों जंतुओं के पालने वाले प्रभू ! तू खुद ही हर जगह में व्याप्त है। हे नानक ! प्रभू स्वयं ही हर जगह मौजूद है। (उससे बिना कोई) दूसरा कहीं देखने में आया है?। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਆਪਿ ਕਥੈ ਆਪਿ ਸੁਨਨੈਹਾਰੁ ॥
ਆਪਹਿ ਏਕੁ ਆਪਿ ਬਿਸਥਾਰੁ ॥
ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਏ ॥
ਆਪਨੈ ਭਾਣੈ ਲਏ ਸਮਾਏ ॥
ਤੁਮ ਤੇ ਭਿੰਨ ਨਹੀ ਕਿਛੁ ਹੋਇ ॥
ਆਪਨ ਸੂਤਿ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਪਰੋਇ ॥
ਜਾ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਜੀਉ ਆਪਿ ਬੁਝਾਏ ॥
ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪਾਏ ॥
ਸੋ ਸਮਦਰਸੀ ਤਤ ਕਾ ਬੇਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸਗਲ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਕਾ ਜੇਤਾ ॥੧॥
ਆਪਿ ਕਥੈ ਆਪਿ ਸੁਨਨੈਹਾਰੁ ॥
ਆਪਹਿ ਏਕੁ ਆਪਿ ਬਿਸਥਾਰੁ ॥
ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਏ ॥
ਆਪਨੈ ਭਾਣੈ ਲਏ ਸਮਾਏ ॥
ਤੁਮ ਤੇ ਭਿੰਨ ਨਹੀ ਕਿਛੁ ਹੋਇ ॥
ਆਪਨ ਸੂਤਿ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਪਰੋਇ ॥
ਜਾ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਜੀਉ ਆਪਿ ਬੁਝਾਏ ॥
ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪਾਏ ॥
ਸੋ ਸਮਦਰਸੀ ਤਤ ਕਾ ਬੇਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸਗਲ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਕਾ ਜੇਤਾ ॥੧॥
असटपदी ॥
आपि कथै आपि सुननैहारु ॥
आपहि एकु आपि बिसथारु ॥
जा तिसु भावै ता स्रिसटि उपाए ॥
आपनै भाणै लए समाए ॥
तुम ते भिंन नही किछु होइ ॥
आपन सूति सभु जगतु परोइ ॥
जा कउ प्रभ जीउ आपि बुझाए ॥
सचु नामु सोई जनु पाए ॥
सो समदरसी तत का बेता ॥
नानक सगल स्रिसटि का जेता ॥१॥
आपि कथै आपि सुननैहारु ॥
आपहि एकु आपि बिसथारु ॥
जा तिसु भावै ता स्रिसटि उपाए ॥
आपनै भाणै लए समाए ॥
तुम ते भिंन नही किछु होइ ॥
आपन सूति सभु जगतु परोइ ॥
जा कउ प्रभ जीउ आपि बुझाए ॥
सचु नामु सोई जनु पाए ॥
सो समदरसी तत का बेता ॥
नानक सगल स्रिसटि का जेता ॥१॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी II (सब जीवों में) प्रभू खुद बोल रहा है खुद ही सुनने वाला है। आप ही स्वं एक है और उसने स्वं ही सारी स्रष्टि का विस्तार किया हुआ है जैसा उसे उपयुक्त लगता है वैसे ही स्रष्टि को उत्पन्न करताहै और अपनी इच्छा अनुसार ही स्वं में समेट लेता है (हे प्रभू !) तुझसे अलग कुछ नहीं। तूने (अपने हुकम-रूप) धागे में सारे जगत को परो रखा है। जिस मनुष्य को प्रभू जी स्वयं सूझ बख्शते हैं। वह मनुष्य प्रभू का सदा-स्थिर रहने वाला नाम हासिल कर लेता है। वह मनुष्य सबकी ओर एक नजर से देखता है। अकाल-पुरख का महिरम हो जाता है। हे नानक ! वह सारे जगत का जीतने वाला है। 1।
ਜੀਅ ਜੰਤ੍ਰ ਸਭ ਤਾ ਕੈ ਹਾਥ ॥
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਅਨਾਥ ਕੋ ਨਾਥੁ ॥
ਜਿਸੁ ਰਾਖੈ ਤਿਸੁ ਕੋਇ ਨ ਮਾਰੈ ॥
ਸੋ ਮੂਆ ਜਿਸੁ ਮਨਹੁ ਬਿਸਾਰੈ ॥
ਤਿਸੁ ਤਜਿ ਅਵਰ ਕਹਾ ਕੋ ਜਾਇ ॥
ਸਭ ਸਿਰਿ ਏਕੁ ਨਿਰੰਜਨ ਰਾਇ ॥
ਜੀਅ ਕੀ ਜੁਗਤਿ ਜਾ ਕੈ ਸਭ ਹਾਥਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਜਾਨਹੁ ਸਾਥਿ ॥
ਗੁਨ ਨਿਧਾਨ ਬੇਅੰਤ ਅਪਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਦਾ ਬਲਿਹਾਰ ॥੨॥
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਅਨਾਥ ਕੋ ਨਾਥੁ ॥
ਜਿਸੁ ਰਾਖੈ ਤਿਸੁ ਕੋਇ ਨ ਮਾਰੈ ॥
ਸੋ ਮੂਆ ਜਿਸੁ ਮਨਹੁ ਬਿਸਾਰੈ ॥
ਤਿਸੁ ਤਜਿ ਅਵਰ ਕਹਾ ਕੋ ਜਾਇ ॥
ਸਭ ਸਿਰਿ ਏਕੁ ਨਿਰੰਜਨ ਰਾਇ ॥
ਜੀਅ ਕੀ ਜੁਗਤਿ ਜਾ ਕੈ ਸਭ ਹਾਥਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਜਾਨਹੁ ਸਾਥਿ ॥
ਗੁਨ ਨਿਧਾਨ ਬੇਅੰਤ ਅਪਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਦਾ ਬਲਿਹਾਰ ॥੨॥
जीअ जंत्र सभ ता कै हाथ ॥
दीन दइआल अनाथ को नाथु ॥
जिसु राखै तिसु कोइ न मारै ॥
सो मूआ जिसु मनहु बिसारै ॥
तिसु तजि अवर कहा को जाइ ॥
सभ सिरि एकु निरंजन राइ ॥
जीअ की जुगति जा कै सभ हाथि ॥
अंतरि बाहरि जानहु साथि ॥
गुन निधान बेअंत अपार ॥
नानक दास सदा बलिहार ॥२॥
दीन दइआल अनाथ को नाथु ॥
जिसु राखै तिसु कोइ न मारै ॥
सो मूआ जिसु मनहु बिसारै ॥
तिसु तजि अवर कहा को जाइ ॥
सभ सिरि एकु निरंजन राइ ॥
जीअ की जुगति जा कै सभ हाथि ॥
अंतरि बाहरि जानहु साथि ॥
गुन निधान बेअंत अपार ॥
नानक दास सदा बलिहार ॥२॥
हिन्दी अर्थ: सारे जीव-जंतु उस प्रभू के वश में हैं। वह दीनों पर दया करने वाला है। और अनाथों का मालिक है। जिस जीव की प्रभू स्वयं रक्षा करता है उसको कोई मार नहीं सकता। मरा हुआ (तो) वह जीव है जिसको प्रभू भुला देता है। उस प्रभू को छोड़ के और कहाँ कोई जाए? सब जीवों के सिर पर एक स्वयं प्रभू ही है जो माया के प्रभाव से परे है। जिसके वश में सब जीवों की जिंदगी का भेद है। उस प्रभू को अंदर बाहर सब जगह अंग-संग जानो। जो गुणों का खजाना है। बेअंत है और अपार है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) सेवक उससे सदके हैं 2।
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹੇ ਦਇਆਲ ॥
ਸਭ ਊਪਰਿ ਹੋਵਤ ਕਿਰਪਾਲ ॥
ਅਪਨੇ ਕਰਤਬ ਜਾਨੈ ਆਪਿ ॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਰਹਿਓ ਬਿਆਪਿ ॥
ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੈ ਜੀਅਨ ਬਹੁ ਭਾਤਿ ॥
ਜੋ ਜੋ ਰਚਿਓ ਸੁ ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਤਿ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥
ਭਗਤਿ ਕਰਹਿ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਬਿਸ੍ਵਾਸੁ ਕਰਿ ਮਾਨਿਆ ॥
ਕਰਨਹਾਰੁ ਨਾਨਕ ਇਕੁ ਜਾਨਿਆ ॥੩॥
ਸਭ ਊਪਰਿ ਹੋਵਤ ਕਿਰਪਾਲ ॥
ਅਪਨੇ ਕਰਤਬ ਜਾਨੈ ਆਪਿ ॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਰਹਿਓ ਬਿਆਪਿ ॥
ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੈ ਜੀਅਨ ਬਹੁ ਭਾਤਿ ॥
ਜੋ ਜੋ ਰਚਿਓ ਸੁ ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਤਿ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥
ਭਗਤਿ ਕਰਹਿ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਬਿਸ੍ਵਾਸੁ ਕਰਿ ਮਾਨਿਆ ॥
ਕਰਨਹਾਰੁ ਨਾਨਕ ਇਕੁ ਜਾਨਿਆ ॥੩॥
पूरन पूरि रहे दइआल ॥
सभ ऊपरि होवत किरपाल ॥
अपने करतब जानै आपि ॥
अंतरजामी रहिओ बिआपि ॥
प्रतिपालै जीअन बहु भाति ॥
जो जो रचिओ सु तिसहि धिआति ॥
जिसु भावै तिसु लए मिलाइ ॥
भगति करहि हरि के गुण गाइ ॥
मन अंतरि बिस्वासु करि मानिआ ॥
करनहारु नानक इकु जानिआ ॥३॥
सभ ऊपरि होवत किरपाल ॥
अपने करतब जानै आपि ॥
अंतरजामी रहिओ बिआपि ॥
प्रतिपालै जीअन बहु भाति ॥
जो जो रचिओ सु तिसहि धिआति ॥
जिसु भावै तिसु लए मिलाइ ॥
भगति करहि हरि के गुण गाइ ॥
मन अंतरि बिस्वासु करि मानिआ ॥
करनहारु नानक इकु जानिआ ॥३॥
हिन्दी अर्थ: दया के घर प्रभू जी हर जगह मौजूद हैं। और सब जीवों पर मेहर करते हैं। प्रभू अपने खेल खुद जानता है। सबके दिल की जानने वाला प्रभू हर जगह मौजूद है। जीवों को कई तरीकों से पालता है। जो जो जीव उसने पैदा किया है। वह उसी प्रभू को सिमरता है। जिस पर प्रसन्न होता है उसको साथ जोड़ लेता है। ( जिन पर प्रसन्न होता है) वह उसके गुण गा गा के उसकी भक्ति करते हैं। हे नानक ! जिस मनुष्य ने मन में श्रद्धा धार के प्रभू को (सचमुख अस्तित्व वाला) मान लिया है। उस ने एक करतार को ही पहिचाना है। 3।
ਜਨੁ ਲਾਗਾ ਹਰਿ ਏਕੈ ਨਾਇ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਆਸ ਨ ਬਿਰਥੀ ਜਾਇ ॥
ਸੇਵਕ ਕਉ ਸੇਵਾ ਬਨਿ ਆਈ ॥
ਹੁਕਮੁ ਬੂਝਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਈ ॥
ਇਸ ਤੇ ਊਪਰਿ ਨਹੀ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਜਾ ਕੈ ਮਨਿ ਬਸਿਆ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ॥
ਬੰਧਨ ਤੋਰਿ ਭਏ ਨਿਰਵੈਰ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਪੂਜਹਿ ਗੁਰ ਕੇ ਪੈਰ ॥
ਇਹ ਲੋਕ ਸੁਖੀਏ ਪਰਲੋਕ ਸੁਹੇਲੇ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਆਸ ਨ ਬਿਰਥੀ ਜਾਇ ॥
ਸੇਵਕ ਕਉ ਸੇਵਾ ਬਨਿ ਆਈ ॥
ਹੁਕਮੁ ਬੂਝਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਈ ॥
ਇਸ ਤੇ ਊਪਰਿ ਨਹੀ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਜਾ ਕੈ ਮਨਿ ਬਸਿਆ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ॥
ਬੰਧਨ ਤੋਰਿ ਭਏ ਨਿਰਵੈਰ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਪੂਜਹਿ ਗੁਰ ਕੇ ਪੈਰ ॥
ਇਹ ਲੋਕ ਸੁਖੀਏ ਪਰਲੋਕ ਸੁਹੇਲੇ ॥
जनु लागा हरि एकै नाइ ॥
तिस की आस न बिरथी जाइ ॥
सेवक कउ सेवा बनि आई ॥
हुकमु बूझि परम पदु पाई ॥
इस ते ऊपरि नही बीचारु ॥
जा कै मनि बसिआ निरंकारु ॥
बंधन तोरि भए निरवैर ॥
अनदिनु पूजहि गुर के पैर ॥
इह लोक सुखीए परलोक सुहेले ॥
तिस की आस न बिरथी जाइ ॥
सेवक कउ सेवा बनि आई ॥
हुकमु बूझि परम पदु पाई ॥
इस ते ऊपरि नही बीचारु ॥
जा कै मनि बसिआ निरंकारु ॥
बंधन तोरि भए निरवैर ॥
अनदिनु पूजहि गुर के पैर ॥
इह लोक सुखीए परलोक सुहेले ॥
हिन्दी अर्थ: (जो) सेवक एक प्रभू के नाम में टिका हुआ है उसकी आस कभी खाली नहीं जाती। सेवक को ये फबता है कि सब की सेवा करे। प्रभू की रजा समझ के उसे ऊँचा दर्जा मिल जाता है। जिन के मन में अकाल-पुरख बसता है उन्हें इस (नाम-सिमरन) से बड़ा और कोई विचार नहीं सूझता। (माया के) बंधन तोड़ के वे निर्वैर हो जाते हैं और हर वक्त सतिगुरू के चरन पूजते हैं। वह मनुष्य इस जनम में सुखी हैं और परलोक में सुखी होते हैं (क्योंकि)
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 292 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
startup की 14-घंटे की रात, founder अकेले laptop पर।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 60 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 292” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 293 →, पीछे का: ← अंग 291।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।