अंग
187
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਵਨ ਗੁਨੁ ਜੋ ਤੁਝੁ ਲੈ ਗਾਵਉ ॥
ਕਵਨ ਬੋਲ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਰੀਝਾਵਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਵਨ ਸੁ ਪੂਜਾ ਤੇਰੀ ਕਰਉ ॥
ਕਵਨ ਸੁ ਬਿਧਿ ਜਿਤੁ ਭਵਜਲ ਤਰਉ ॥੨॥
ਕਵਨ ਤਪੁ ਜਿਤੁ ਤਪੀਆ ਹੋਇ ॥
ਕਵਨੁ ਸੁ ਨਾਮੁ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਖੋਇ ॥੩॥
ਗੁਣ ਪੂਜਾ ਗਿਆਨ ਧਿਆਨ ਨਾਨਕ ਸਗਲ ਘਾਲ ॥
ਜਿਸੁ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਦਇਆਲ ॥੪॥
ਤਿਸ ਹੀ ਗੁਨੁ ਤਿਨ ਹੀ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਤਾ ॥
ਜਿਸ ਕੀ ਮਾਨਿ ਲੇਇ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੩੬॥੧੦੫॥
ਕਵਨ ਬੋਲ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਰੀਝਾਵਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਵਨ ਸੁ ਪੂਜਾ ਤੇਰੀ ਕਰਉ ॥
ਕਵਨ ਸੁ ਬਿਧਿ ਜਿਤੁ ਭਵਜਲ ਤਰਉ ॥੨॥
ਕਵਨ ਤਪੁ ਜਿਤੁ ਤਪੀਆ ਹੋਇ ॥
ਕਵਨੁ ਸੁ ਨਾਮੁ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਖੋਇ ॥੩॥
ਗੁਣ ਪੂਜਾ ਗਿਆਨ ਧਿਆਨ ਨਾਨਕ ਸਗਲ ਘਾਲ ॥
ਜਿਸੁ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਦਇਆਲ ॥੪॥
ਤਿਸ ਹੀ ਗੁਨੁ ਤਿਨ ਹੀ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਤਾ ॥
ਜਿਸ ਕੀ ਮਾਨਿ ਲੇਇ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੩੬॥੧੦੫॥
कवन गुनु जो तुझु लै गावउ ॥
कवन बोल पारब्रहम रीझावउ ॥१॥ रहाउ ॥
कवन सु पूजा तेरी करउ ॥
कवन सु बिधि जितु भवजल तरउ ॥२॥
कवन तपु जितु तपीआ होइ ॥
कवनु सु नामु हउमै मलु खोइ ॥३॥
गुण पूजा गिआन धिआन नानक सगल घाल ॥
जिसु करि किरपा सतिगुरु मिलै दइआल ॥४॥
तिस ही गुनु तिन ही प्रभु जाता ॥
जिस की मानि लेइ सुखदाता ॥१॥ रहाउ दूजा ॥३६॥१०५॥
कवन बोल पारब्रहम रीझावउ ॥१॥ रहाउ ॥
कवन सु पूजा तेरी करउ ॥
कवन सु बिधि जितु भवजल तरउ ॥२॥
कवन तपु जितु तपीआ होइ ॥
कवनु सु नामु हउमै मलु खोइ ॥३॥
गुण पूजा गिआन धिआन नानक सगल घाल ॥
जिसु करि किरपा सतिगुरु मिलै दइआल ॥४॥
तिस ही गुनु तिन ही प्रभु जाता ॥
जिस की मानि लेइ सुखदाता ॥१॥ रहाउ दूजा ॥३६॥१०५॥
हिन्दी अर्थ: अर्थ: हे पारब्रह्म प्रभू ! (तेरे बेअंत गुण हैं~ मुझे समझ नहीं आती कि) मैं तेरा कौन सा गुण ले के तेरी सिफत सालाह करूँ~ और कौन से बोल बोल के तुझे प्रसन्न करूँ? (हे प्रभू ! जगत के सारे जीव तेरा ही रूप हैं और तेरा कोई खास रूप नहीं। हे पारब्रह्म ! मैं तेरी कौन सी पूजा करूँ (जिससे तू प्रसन्न हो सके) ? हे प्रभू ! वह कौन सा तरीका है जिससे मैं संसार समुंद्र पार लांघ जाऊँ?। 2। वह कौन सी तप साधना है जिससे मनुष्य (कामयाब) तपस्वी कहलवा सकता है (और तुझे खुश कर सकता है) ? व ह कौन सा नाम है (जिसका जाप करके) (मनुष्य अपने अंदर से) अहंकार की मैल दूर कर सकता है?। 3। हे नानक ! (मनुष्य सिर्फ अपने प्रयासों के आसरे प्रभू को प्रसन्न नहीं कर सकता। उसी मनुष्य के गाए हुए) गुण (की हुई) पूजा~ ज्ञान और (जुड़ी हुई) सुरति आदिक की सारी मेहनत (सफल होती है) जिस पर दयाल हो के कृपा करके गुरू मिलता है। 4। उसी की ही की हुई सिफत सालाह (परवान है)~ उसी ने ही प्रभू के साथ जान पहिचान डाली है (जिसे गुरू मिला है और) जिसकी अरदास सारे सुख देने वाला परमात्मा मान लेता है। 1। रहाउ दूजा। 36। 105।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਪਨ ਤਨੁ ਨਹੀ ਜਾ ਕੋ ਗਰਬਾ ॥
ਰਾਜ ਮਿਲਖ ਨਹੀ ਆਪਨ ਦਰਬਾ ॥੧॥
ਆਪਨ ਨਹੀ ਕਾ ਕਉ ਲਪਟਾਇਓ ॥
ਆਪਨ ਨਾਮੁ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੁਤ ਬਨਿਤਾ ਆਪਨ ਨਹੀ ਭਾਈ ॥
ਇਸਟ ਮੀਤ ਆਪ ਬਾਪੁ ਨ ਮਾਈ ॥੨॥
ਸੁਇਨਾ ਰੂਪਾ ਫੁਨਿ ਨਹੀ ਦਾਮ ॥
ਹੈਵਰ ਗੈਵਰ ਆਪਨ ਨਹੀ ਕਾਮ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋ ਗੁਰਿ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਿਸ ਕਾ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥੪॥੩੭॥੧੦੬॥
ਆਪਨ ਤਨੁ ਨਹੀ ਜਾ ਕੋ ਗਰਬਾ ॥
ਰਾਜ ਮਿਲਖ ਨਹੀ ਆਪਨ ਦਰਬਾ ॥੧॥
ਆਪਨ ਨਹੀ ਕਾ ਕਉ ਲਪਟਾਇਓ ॥
ਆਪਨ ਨਾਮੁ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੁਤ ਬਨਿਤਾ ਆਪਨ ਨਹੀ ਭਾਈ ॥
ਇਸਟ ਮੀਤ ਆਪ ਬਾਪੁ ਨ ਮਾਈ ॥੨॥
ਸੁਇਨਾ ਰੂਪਾ ਫੁਨਿ ਨਹੀ ਦਾਮ ॥
ਹੈਵਰ ਗੈਵਰ ਆਪਨ ਨਹੀ ਕਾਮ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋ ਗੁਰਿ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਿਸ ਕਾ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥੪॥੩੭॥੧੦੬॥
गउड़ी महला ५ ॥
आपन तनु नही जा को गरबा ॥
राज मिलख नही आपन दरबा ॥१॥
आपन नही का कउ लपटाइओ ॥
आपन नामु सतिगुर ते पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥
सुत बनिता आपन नही भाई ॥
इसट मीत आप बापु न माई ॥२॥
सुइना रूपा फुनि नही दाम ॥
हैवर गैवर आपन नही काम ॥३॥
कहु नानक जो गुरि बखसि मिलाइआ ॥
तिस का सभु किछु जिस का हरि राइआ ॥४॥३७॥१०६॥
आपन तनु नही जा को गरबा ॥
राज मिलख नही आपन दरबा ॥१॥
आपन नही का कउ लपटाइओ ॥
आपन नामु सतिगुर ते पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥
सुत बनिता आपन नही भाई ॥
इसट मीत आप बापु न माई ॥२॥
सुइना रूपा फुनि नही दाम ॥
हैवर गैवर आपन नही काम ॥३॥
कहु नानक जो गुरि बखसि मिलाइआ ॥
तिस का सभु किछु जिस का हरि राइआ ॥४॥३७॥१०६॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) ये शरीर~ जिसका (तू) गर्व करता है (सदा वास्ते) अपना नहीं। राज~ भूमि~ धन (ये भी सदा के लिए) अपने नहीं हैं। 1। (हे भाई ! तू) किस किस से मोह कर रहा है? (इनमें से कोई भी सदा के लिए) तेरा अपना नहीं। (सदा के लिए) अपना (बने रहने वाला परमात्मा का) नाम (ही) है (जो) गुरू से प्राप्त होता है। 1। रहाउ। पुत्र~ स्त्री~ भाई~ प्यारे मित्र~ पिता~ माता (इनमें से कोई भी सदा के लिए) अपना नहीं। 2। (हे भाई !) सोना~ चाँदी व दौलत भी (सदा के लिए) अपने नहीं हैं। बढ़िया घोड़े~ बढ़िया हाथी (ये भी सदा के लिए) अपने काम नहीं आ सकते। 3। हे नानक ! कह,जिस मनुष्य को बख्शिश करके गुरू ने (प्रभू के साथ) मिला दिया है~ जिस मनुष्य का (सदा का साथी) परमात्मा बन गया है~ सब कुछ उसका अपना है (भाव~ उसे सारा जगत अपना दिखाई देता है~ उसे दुनिया के साक-सम्बंधियों का~ दुनिया के धन-पदार्थों का बिछोड़ा दुखी नहीं कर सकता)। 4। 37। 106।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਊਪਰਿ ਮੇਰੇ ਮਾਥੇ ॥
ਤਾ ਤੇ ਦੁਖ ਮੇਰੇ ਸਗਲੇ ਲਾਥੇ ॥੧॥
ਸਤਿਗੁਰ ਅਪੁਨੇ ਕਉ ਕੁਰਬਾਨੀ ॥
ਆਤਮ ਚੀਨਿ ਪਰਮ ਰੰਗ ਮਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਰਣ ਰੇਣੁ ਗੁਰ ਕੀ ਮੁਖਿ ਲਾਗੀ ॥
ਅਹੰਬੁਧਿ ਤਿਨਿ ਸਗਲ ਤਿਆਗੀ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਲਗੋ ਮਨਿ ਮੀਠਾ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਤਾ ਤੇ ਮੋਹਿ ਡੀਠਾ ॥੩॥
ਗੁਰੁ ਸੁਖਦਾਤਾ ਗੁਰੁ ਕਰਤਾਰੁ ॥
ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਣ ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਆਧਾਰੁ ॥੪॥੩੮॥੧੦੭॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਊਪਰਿ ਮੇਰੇ ਮਾਥੇ ॥
ਤਾ ਤੇ ਦੁਖ ਮੇਰੇ ਸਗਲੇ ਲਾਥੇ ॥੧॥
ਸਤਿਗੁਰ ਅਪੁਨੇ ਕਉ ਕੁਰਬਾਨੀ ॥
ਆਤਮ ਚੀਨਿ ਪਰਮ ਰੰਗ ਮਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਰਣ ਰੇਣੁ ਗੁਰ ਕੀ ਮੁਖਿ ਲਾਗੀ ॥
ਅਹੰਬੁਧਿ ਤਿਨਿ ਸਗਲ ਤਿਆਗੀ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਲਗੋ ਮਨਿ ਮੀਠਾ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਤਾ ਤੇ ਮੋਹਿ ਡੀਠਾ ॥੩॥
ਗੁਰੁ ਸੁਖਦਾਤਾ ਗੁਰੁ ਕਰਤਾਰੁ ॥
ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਣ ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਆਧਾਰੁ ॥੪॥੩੮॥੧੦੭॥
गउड़ी महला ५ ॥
गुर के चरण ऊपरि मेरे माथे ॥
ता ते दुख मेरे सगले लाथे ॥१॥
सतिगुर अपुने कउ कुरबानी ॥
आतम चीनि परम रंग मानी ॥१॥ रहाउ ॥
चरण रेणु गुर की मुखि लागी ॥
अहंबुधि तिनि सगल तिआगी ॥२॥
गुर का सबदु लगो मनि मीठा ॥
पारब्रहमु ता ते मोहि डीठा ॥३॥
गुरु सुखदाता गुरु करतारु ॥
जीअ प्राण नानक गुरु आधारु ॥४॥३८॥१०७॥
गुर के चरण ऊपरि मेरे माथे ॥
ता ते दुख मेरे सगले लाथे ॥१॥
सतिगुर अपुने कउ कुरबानी ॥
आतम चीनि परम रंग मानी ॥१॥ रहाउ ॥
चरण रेणु गुर की मुखि लागी ॥
अहंबुधि तिनि सगल तिआगी ॥२॥
गुर का सबदु लगो मनि मीठा ॥
पारब्रहमु ता ते मोहि डीठा ॥३॥
गुरु सुखदाता गुरु करतारु ॥
जीअ प्राण नानक गुरु आधारु ॥४॥३८॥१०७॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) गुरू के चरण मेरे माथे पर टिके हुए हैं~ उनकी बरकति से मेरे सारे दुख दूर हो गए हैं। 1। मैं अपने गुरू से सदके जाता हूँ (गुरू की कृपा से) मैं अपने आत्मिक जीवन की पड़ताल कर कर के (आत्म-मंथन कर करके) सबसे श्रेष्ठ आनंद ले रहा हूँ। 1। रहाउ। जिस मनुष्य के माथे पर गुरू के चरणों की धूड़ लग गई~ उसने अपनी सारी अहम् (पैदा करने वाली) बुद्धि त्याग दी। 2। (हे भाई !) गुरू का शबद मेरे मन को प्यारा लग रहा है~ उसकी बरकति से मैं परमात्मा के दर्शन कर रहा हूँ। 3। हे नानक ! (कह, मेरे वास्ते) गुरू (ही सारे) सुखों को देने वाला है~ गुरू करतार (का रूप) है। गुरू मेरी जीवात्मा का सहारा है~ गुरू मेरे प्राणों का सहारा है। 4। 38। 107।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰੇ ਮਨ ਮੇਰੇ ਤੂੰ ਤਾ ਕਉ ਆਹਿ ॥ ਜਾ ਕੈ ਊਣਾ ਕਛਹੂ ਨਾਹਿ ॥੧॥
ਹਰਿ ਸਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਕਰਿ ਮਨ ਮੀਤ ॥
ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੁ ਰਾਖਹੁ ਸਦ ਚੀਤ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰੇ ਮਨ ਮੇਰੇ ਤੂੰ ਤਾ ਕਉ ਸੇਵਿ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਅਪਰੰਪਰ ਦੇਵ ॥੨॥
ਤਿਸੁ ਊਪਰਿ ਮਨ ਕਰਿ ਤੂੰ ਆਸਾ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਜਾ ਕਾ ਭਰਵਾਸਾ ॥੩॥
ਜਾ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਗਾਵੈ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਸੋਇ ॥੪॥੩੯॥੧੦੮॥
ਰੇ ਮਨ ਮੇਰੇ ਤੂੰ ਤਾ ਕਉ ਆਹਿ ॥ ਜਾ ਕੈ ਊਣਾ ਕਛਹੂ ਨਾਹਿ ॥੧॥
ਹਰਿ ਸਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਕਰਿ ਮਨ ਮੀਤ ॥
ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੁ ਰਾਖਹੁ ਸਦ ਚੀਤ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰੇ ਮਨ ਮੇਰੇ ਤੂੰ ਤਾ ਕਉ ਸੇਵਿ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਅਪਰੰਪਰ ਦੇਵ ॥੨॥
ਤਿਸੁ ਊਪਰਿ ਮਨ ਕਰਿ ਤੂੰ ਆਸਾ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਜਾ ਕਾ ਭਰਵਾਸਾ ॥੩॥
ਜਾ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਗਾਵੈ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਸੋਇ ॥੪॥੩੯॥੧੦੮॥
गउड़ी महला ५ ॥
रे मन मेरे तूं ता कउ आहि ॥ जा कै ऊणा कछहू नाहि ॥१॥
हरि सा प्रीतमु करि मन मीत ॥
प्रान अधारु राखहु सद चीत ॥१॥ रहाउ ॥
रे मन मेरे तूं ता कउ सेवि ॥
आदि पुरख अपरंपर देव ॥२॥
तिसु ऊपरि मन करि तूं आसा ॥
आदि जुगादि जा का भरवासा ॥३॥
जा की प्रीति सदा सुखु होइ ॥
नानकु गावै गुर मिलि सोइ ॥४॥३९॥१०८॥
रे मन मेरे तूं ता कउ आहि ॥ जा कै ऊणा कछहू नाहि ॥१॥
हरि सा प्रीतमु करि मन मीत ॥
प्रान अधारु राखहु सद चीत ॥१॥ रहाउ ॥
रे मन मेरे तूं ता कउ सेवि ॥
आदि पुरख अपरंपर देव ॥२॥
तिसु ऊपरि मन करि तूं आसा ॥
आदि जुगादि जा का भरवासा ॥३॥
जा की प्रीति सदा सुखु होइ ॥
नानकु गावै गुर मिलि सोइ ॥४॥३९॥१०८॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे मेरे मन ! तू उस परमात्मा को मिलने की चाहत रख~ जिसके घर में किसी चीज की भी कमी नहीं। 1। हे मेरे मित्र मन !परमात्मा जैसा प्रीतम बना~ उस (प्रीतम को) प्राणों के आसरे (प्रीतम) को सदा अपने चित्त में परोए रख। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! तू उस परमात्मा की सेवा-भक्ति कर~ जो (सारे जगत का) मूल है~ जो सब में व्यापक है~ जो परे से परे है (बेअंत है) और जो प्रकाश-रूप है। 2। हे (मेरे) मन ! तू उस परमात्मा पर (अपनी सारी जरूरतें पूरी होने की) आस रख जिस (की सहायता) का भरोसा सदा से ही (सब जीवों को है)। 3। (हे भाई !) जिस परमात्मा से प्रीति करने की बरकति से सदा आत्मिक आनंद मिलता है~ नानक (अपने) गुरू को मिल के उसके गुण गाता है। 4। 39। 108।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੀਤੁ ਕਰੈ ਸੋਈ ਹਮ ਮਾਨਾ ॥
ਮੀਤ ਕੇ ਕਰਤਬ ਕੁਸਲ ਸਮਾਨਾ ॥੧॥
ਏਕਾ ਟੇਕ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਚੀਤ ॥
ਜਿਸੁ ਕਿਛੁ ਕਰਣਾ ਸੁ ਹਮਰਾ ਮੀਤ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੀਤੁ ਹਮਾਰਾ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਮੋਹਿ ਅਸਨਾਹਾ ॥੨॥
ਮੀਤੁ ਹਮਾਰਾ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਸਮਰਥ ਪੁਰਖੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਸੁਆਮੀ ॥੩॥
ਹਮ ਦਾਸੇ ਤੁਮ ਠਾਕੁਰ ਮੇਰੇ ॥
ਮੀਤੁ ਕਰੈ ਸੋਈ ਹਮ ਮਾਨਾ ॥
ਮੀਤ ਕੇ ਕਰਤਬ ਕੁਸਲ ਸਮਾਨਾ ॥੧॥
ਏਕਾ ਟੇਕ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਚੀਤ ॥
ਜਿਸੁ ਕਿਛੁ ਕਰਣਾ ਸੁ ਹਮਰਾ ਮੀਤ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੀਤੁ ਹਮਾਰਾ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਮੋਹਿ ਅਸਨਾਹਾ ॥੨॥
ਮੀਤੁ ਹਮਾਰਾ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਸਮਰਥ ਪੁਰਖੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਸੁਆਮੀ ॥੩॥
ਹਮ ਦਾਸੇ ਤੁਮ ਠਾਕੁਰ ਮੇਰੇ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
मीतु करै सोई हम माना ॥
मीत के करतब कुसल समाना ॥१॥
एका टेक मेरै मनि चीत ॥
जिसु किछु करणा सु हमरा मीत ॥१॥ रहाउ ॥
मीतु हमारा वेपरवाहा ॥
गुर किरपा ते मोहि असनाहा ॥२॥
मीतु हमारा अंतरजामी ॥
समरथ पुरखु पारब्रहमु सुआमी ॥३॥
हम दासे तुम ठाकुर मेरे ॥
मीतु करै सोई हम माना ॥
मीत के करतब कुसल समाना ॥१॥
एका टेक मेरै मनि चीत ॥
जिसु किछु करणा सु हमरा मीत ॥१॥ रहाउ ॥
मीतु हमारा वेपरवाहा ॥
गुर किरपा ते मोहि असनाहा ॥२॥
मीतु हमारा अंतरजामी ॥
समरथ पुरखु पारब्रहमु सुआमी ॥३॥
हम दासे तुम ठाकुर मेरे ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) मेरा मित्र प्रभू जो कुछ करता है~ उसे मैं (सिर-माथे) स्वीकार करता हूँ। मित्र-प्रभू के किए काम मुझे सुखदायक (प्रतीत होते) हैं। 1। (हे भाई !) मेरे मन-चित्त में सिर्फ ये सहारा है कि जिस परमात्मा की ये सारी रचना है वह मेरा मित्र है। 1। रहाउ। (हे भाई !) मेरा मित्र प्रभू बे-मोहताज है (उसे किसी की कोई गर्ज नहीं~ किसी से भय नहीं)~ गुरू की कृपा से उसके साथ मेरा प्यार बन गया है (भाव~ मेरे साथ उसकी सांझ इस वास्ते नहीं बनी कि उसे कोई गरज थी। ये तो सत्गुरू की मेहर हुई है)। 2। मेरा मित्र-प्रभू (हरेक जीव के) दिल की जानने वाला है। सब ताकतों का मालिक है~ सब में व्यापक है~ बेअंत है~ सब का मालिक है। 3। हे नानक ! (कह,) हे प्रभू !तू मेरा मालिक है~ मैं तेरा सेवक हूँ।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 187 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Janmashtami की मधुर रात, मंदिर में 12 बजे का दर्शन।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 52 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 187” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 188 →, पीछे का: ← अंग 186।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।