अंग
293
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਹਿ ਮੇਲੇ ॥੪॥
नानक हरि प्रभि आपहि मेले ॥४॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! प्रभू ने खुद उनको (अपने साथ) मिला लिया है।4।
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਕਰਹੁ ਅਨੰਦ ॥
ਗੁਨ ਗਾਵਹੁ ਪ੍ਰਭ ਪਰਮਾਨੰਦ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਤਤੁ ਕਰਹੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਦ੍ਰੁਲਭ ਦੇਹ ਕਾ ਕਰਹੁ ਉਧਾਰੁ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਚਨ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਉ ॥
ਪ੍ਰਾਨ ਤਰਨ ਕਾ ਇਹੈ ਸੁਆਉ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਪ੍ਰਭ ਪੇਖਹੁ ਨੇਰਾ ॥
ਮਿਟੈ ਅਗਿਆਨੁ ਬਿਨਸੈ ਅੰਧੇਰਾ ॥
ਸੁਨਿ ਉਪਦੇਸੁ ਹਿਰਦੈ ਬਸਾਵਹੁ ॥
ਮਨ ਇਛੇ ਨਾਨਕ ਫਲ ਪਾਵਹੁ ॥੫॥
ਗੁਨ ਗਾਵਹੁ ਪ੍ਰਭ ਪਰਮਾਨੰਦ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਤਤੁ ਕਰਹੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਦ੍ਰੁਲਭ ਦੇਹ ਕਾ ਕਰਹੁ ਉਧਾਰੁ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਚਨ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਉ ॥
ਪ੍ਰਾਨ ਤਰਨ ਕਾ ਇਹੈ ਸੁਆਉ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਪ੍ਰਭ ਪੇਖਹੁ ਨੇਰਾ ॥
ਮਿਟੈ ਅਗਿਆਨੁ ਬਿਨਸੈ ਅੰਧੇਰਾ ॥
ਸੁਨਿ ਉਪਦੇਸੁ ਹਿਰਦੈ ਬਸਾਵਹੁ ॥
ਮਨ ਇਛੇ ਨਾਨਕ ਫਲ ਪਾਵਹੁ ॥੫॥
साधसंगि मिलि करहु अनंद ॥
गुन गावहु प्रभ परमानंद ॥
राम नाम ततु करहु बीचारु ॥
द्रुलभ देह का करहु उधारु ॥
अंम्रित बचन हरि के गुन गाउ ॥
प्रान तरन का इहै सुआउ ॥
आठ पहर प्रभ पेखहु नेरा ॥
मिटै अगिआनु बिनसै अंधेरा ॥
सुनि उपदेसु हिरदै बसावहु ॥
मन इछे नानक फल पावहु ॥५॥
गुन गावहु प्रभ परमानंद ॥
राम नाम ततु करहु बीचारु ॥
द्रुलभ देह का करहु उधारु ॥
अंम्रित बचन हरि के गुन गाउ ॥
प्रान तरन का इहै सुआउ ॥
आठ पहर प्रभ पेखहु नेरा ॥
मिटै अगिआनु बिनसै अंधेरा ॥
सुनि उपदेसु हिरदै बसावहु ॥
मन इछे नानक फल पावहु ॥५॥
हिन्दी अर्थ: सत्संग में मिल के ये (आत्मिक) आनंद लो। परम खुशियों वाले प्रभू की सिफत-सालाह करो। प्रभू के नाम के भेद को विचारो और इस (मनुष्य-) शरीर का बचाव करो जो बड़ी मुश्किल से मिलता है। अकाल-पुरख के गुण गाओ जो अमर करने वाले बचन हैं। जिंदगी को (विकारों से) बचाने का यही तरीका है। आठों पहर प्रभू को अपने अंग-संग देखो (इस तरह) अज्ञानता मिट जाएगी और (माया वाला) अंधेरा नाश हो जाएगा। हे नानक ! (सतिगुरू का) उपदेश सुन के हृदय में बसाओ (इस तरह) मन-मांगी मुरादें मिलेंगीं। 5।
ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਦੁਇ ਲੇਹੁ ਸਵਾਰਿ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਅੰਤਰਿ ਉਰਿ ਧਾਰਿ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਪੂਰੀ ਦੀਖਿਆ ॥
ਜਿਸੁ ਮਨਿ ਬਸੈ ਤਿਸੁ ਸਾਚੁ ਪਰੀਖਿਆ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਦੂਖੁ ਦਰਦੁ ਮਨ ਤੇ ਭਉ ਜਾਇ ॥
ਸਚੁ ਵਾਪਾਰੁ ਕਰਹੁ ਵਾਪਾਰੀ ॥
ਦਰਗਹ ਨਿਬਹੈ ਖੇਪ ਤੁਮਾਰੀ ॥
ਏਕਾ ਟੇਕ ਰਖਹੁ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਬਹੁਰਿ ਨ ਆਵਹਿ ਜਾਹਿ ॥੬॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਅੰਤਰਿ ਉਰਿ ਧਾਰਿ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਪੂਰੀ ਦੀਖਿਆ ॥
ਜਿਸੁ ਮਨਿ ਬਸੈ ਤਿਸੁ ਸਾਚੁ ਪਰੀਖਿਆ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਦੂਖੁ ਦਰਦੁ ਮਨ ਤੇ ਭਉ ਜਾਇ ॥
ਸਚੁ ਵਾਪਾਰੁ ਕਰਹੁ ਵਾਪਾਰੀ ॥
ਦਰਗਹ ਨਿਬਹੈ ਖੇਪ ਤੁਮਾਰੀ ॥
ਏਕਾ ਟੇਕ ਰਖਹੁ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਬਹੁਰਿ ਨ ਆਵਹਿ ਜਾਹਿ ॥੬॥
हलतु पलतु दुइ लेहु सवारि ॥
राम नामु अंतरि उरि धारि ॥
पूरे गुर की पूरी दीखिआ ॥
जिसु मनि बसै तिसु साचु परीखिआ ॥
मनि तनि नामु जपहु लिव लाइ ॥
दूखु दरदु मन ते भउ जाइ ॥
सचु वापारु करहु वापारी ॥
दरगह निबहै खेप तुमारी ॥
एका टेक रखहु मन माहि ॥
नानक बहुरि न आवहि जाहि ॥६॥
राम नामु अंतरि उरि धारि ॥
पूरे गुर की पूरी दीखिआ ॥
जिसु मनि बसै तिसु साचु परीखिआ ॥
मनि तनि नामु जपहु लिव लाइ ॥
दूखु दरदु मन ते भउ जाइ ॥
सचु वापारु करहु वापारी ॥
दरगह निबहै खेप तुमारी ॥
एका टेक रखहु मन माहि ॥
नानक बहुरि न आवहि जाहि ॥६॥
हिन्दी अर्थ: लोक और परलोक दोनों सुधार लो। प्रभू का नाम अंदर हृदय में टिकाओ। पूरे सतिगुरू की शिक्षा भी पूर्ण (भाव- संपूर्ण, मुकम्मल) होती है। जिस मनुष्य के मन में (ये शिक्षा) बसती है उसको सदा स्थिर रहने वाला प्रभू समझ जाता है। मन और शरीर के द्वारा ध्यान जोड़ के नाम जपो। दुख-दर्द और मन से डर दूर हो जाएगा। हे बंजारे जीव ! सच्चा वणज करो। (नाम रूपी सच्चे व्यापार से) तुम्हारा सौदा प्रभू की दरगाह में बिक जाएगा। हे नानक ! मन में एक अकाल-पुरख का आसरा रखो। बार-बार जनम-मरन का चक्कर नहीं रहेगा। 6।
ਤਿਸ ਤੇ ਦੂਰਿ ਕਹਾ ਕੋ ਜਾਇ ॥
ਉਬਰੈ ਰਾਖਨਹਾਰੁ ਧਿਆਇ ॥
ਨਿਰਭਉ ਜਪੈ ਸਗਲ ਭਉ ਮਿਟੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਪ੍ਰਾਣੀ ਛੁਟੈ ॥
ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਭੁ ਰਾਖੈ ਤਿਸੁ ਨਾਹੀ ਦੂਖ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਮਨਿ ਹੋਵਤ ਸੂਖ ॥
ਚਿੰਤਾ ਜਾਇ ਮਿਟੈ ਅਹੰਕਾਰੁ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕਉ ਕੋਇ ਨ ਪਹੁਚਨਹਾਰੁ ॥
ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਠਾਢਾ ਗੁਰੁ ਸੂਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੇ ਕਾਰਜ ਪੂਰਾ ॥੭॥
ਉਬਰੈ ਰਾਖਨਹਾਰੁ ਧਿਆਇ ॥
ਨਿਰਭਉ ਜਪੈ ਸਗਲ ਭਉ ਮਿਟੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਪ੍ਰਾਣੀ ਛੁਟੈ ॥
ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਭੁ ਰਾਖੈ ਤਿਸੁ ਨਾਹੀ ਦੂਖ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਮਨਿ ਹੋਵਤ ਸੂਖ ॥
ਚਿੰਤਾ ਜਾਇ ਮਿਟੈ ਅਹੰਕਾਰੁ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕਉ ਕੋਇ ਨ ਪਹੁਚਨਹਾਰੁ ॥
ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਠਾਢਾ ਗੁਰੁ ਸੂਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੇ ਕਾਰਜ ਪੂਰਾ ॥੭॥
तिस ते दूरि कहा को जाइ ॥
उबरै राखनहारु धिआइ ॥
निरभउ जपै सगल भउ मिटै ॥
प्रभ किरपा ते प्राणी छुटै ॥
जिसु प्रभु राखै तिसु नाही दूख ॥
नामु जपत मनि होवत सूख ॥
चिंता जाइ मिटै अहंकारु ॥
तिसु जन कउ कोइ न पहुचनहारु ॥
सिर ऊपरि ठाढा गुरु सूरा ॥
नानक ता के कारज पूरा ॥७॥
उबरै राखनहारु धिआइ ॥
निरभउ जपै सगल भउ मिटै ॥
प्रभ किरपा ते प्राणी छुटै ॥
जिसु प्रभु राखै तिसु नाही दूख ॥
नामु जपत मनि होवत सूख ॥
चिंता जाइ मिटै अहंकारु ॥
तिसु जन कउ कोइ न पहुचनहारु ॥
सिर ऊपरि ठाढा गुरु सूरा ॥
नानक ता के कारज पूरा ॥७॥
हिन्दी अर्थ: उस प्रभू से परे कहाँ कोई जीव जा सकता है? जीव बचता ही राखनहार प्रभू को सिमर के है। जो मनुष्य निरभउ अकाल-पुरख को जपता है, उसका डर मिट जाता है। (क्योंकि) प्रभू की मेहर से ही बंदा (डर से) निजात पाता है। जिस बंदे की प्रभू रक्षा करता है उसे कोई दुख नहीं छूता। नाम जपने से मन में सुख पैदा होता है। (नाम सिमरने से) चिंता दूर हो जाती है। अहंकार मिट जाता है। उस मनुष्य की कोई बराबरी ही नहीं कर सकता। हे नानक ! जिस आदमी के सिर पर सूरमा सतिगुरू (रक्षक बन के) खड़ा हुआ है। उसके सारे काम रास आ जाते हैं। 7।
ਮਤਿ ਪੂਰੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਜਾ ਕੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ॥
ਦਰਸਨੁ ਪੇਖਤ ਉਧਰਤ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਜਾ ਕੇ ਅਨੂਪ ॥
ਸਫਲ ਦਰਸਨੁ ਸੁੰਦਰ ਹਰਿ ਰੂਪ ॥
ਧੰਨੁ ਸੇਵਾ ਸੇਵਕੁ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਪੁਰਖੁ ਪ੍ਰਧਾਨੁ ॥
ਜਿਸੁ ਮਨਿ ਬਸੈ ਸੁ ਹੋਤ ਨਿਹਾਲੁ ॥
ਤਾ ਕੈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਆਵਤ ਕਾਲੁ ॥
ਅਮਰ ਭਏ ਅਮਰਾ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਧਿਆਇਆ ॥੮॥੨੨॥
ਦਰਸਨੁ ਪੇਖਤ ਉਧਰਤ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਜਾ ਕੇ ਅਨੂਪ ॥
ਸਫਲ ਦਰਸਨੁ ਸੁੰਦਰ ਹਰਿ ਰੂਪ ॥
ਧੰਨੁ ਸੇਵਾ ਸੇਵਕੁ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਪੁਰਖੁ ਪ੍ਰਧਾਨੁ ॥
ਜਿਸੁ ਮਨਿ ਬਸੈ ਸੁ ਹੋਤ ਨਿਹਾਲੁ ॥
ਤਾ ਕੈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਆਵਤ ਕਾਲੁ ॥
ਅਮਰ ਭਏ ਅਮਰਾ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਧਿਆਇਆ ॥੮॥੨੨॥
मति पूरी अंम्रितु जा की द्रिसटि ॥
दरसनु पेखत उधरत स्रिसटि ॥
चरन कमल जा के अनूप ॥
सफल दरसनु सुंदर हरि रूप ॥
धंनु सेवा सेवकु परवानु ॥
अंतरजामी पुरखु प्रधानु ॥
जिसु मनि बसै सु होत निहालु ॥
ता कै निकटि न आवत कालु ॥
अमर भए अमरा पदु पाइआ ॥
साधसंगि नानक हरि धिआइआ ॥८॥२२॥
दरसनु पेखत उधरत स्रिसटि ॥
चरन कमल जा के अनूप ॥
सफल दरसनु सुंदर हरि रूप ॥
धंनु सेवा सेवकु परवानु ॥
अंतरजामी पुरखु प्रधानु ॥
जिसु मनि बसै सु होत निहालु ॥
ता कै निकटि न आवत कालु ॥
अमर भए अमरा पदु पाइआ ॥
साधसंगि नानक हरि धिआइआ ॥८॥२२॥
हिन्दी अर्थ: जिस प्रभू की समझ पूरन (पूर्ण । अभॅुल) है। जिसकी नजर में से अमृत बरसता है। उसका दीदार करने से जगत का उद्धार होता है। जिस प्रभू के कमलों (जैसे) अति सुंदर चरण हैं। उसका रूप सुंदर है। और उसका दीदार मुरादें पूरी करने वाला है। उसका सेवक (दरगाह में) कबूल हो जाता है (तभी तो) उसकी सेवा मुबारक है। वह अकाल-पुरख घट घट की जानने वाला और सबसे बड़ा है। जिस मनुष्य के हृदय में (ऐसा प्रभू) बसता है वह (फूल जैसा) खिलता है। उसके नजदीक काल (भी) नहीं आता (भाव। मौत का डर उसे छूता नहीं)। वे जनम मरण से रहित हो जाते हैं। और सदा कायम रहने वाला दरजा हासिल कर लेते हैं। हे नानक ! जिन मनुष्यों ने सत्संग में प्रभू को सिमरा है। 8। 22।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰ ਬਿਨਾਸੁ ॥
ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਸੰਤ ਭੇਟਿਆ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਪਰਗਾਸੁ ॥੧॥
ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰ ਬਿਨਾਸੁ ॥
ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਸੰਤ ਭੇਟਿਆ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਪਰਗਾਸੁ ॥੧॥
सलोकु ॥
गिआन अंजनु गुरि दीआ अगिआन अंधेर बिनासु ॥
हरि किरपा ते संत भेटिआ नानक मनि परगासु ॥१॥
गिआन अंजनु गुरि दीआ अगिआन अंधेर बिनासु ॥
हरि किरपा ते संत भेटिआ नानक मनि परगासु ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ (जिस मनुष्य को) सतिगुरू ने ज्ञान का सुरमा बख्शा है। उसके अज्ञान (रूपी) अंधेरे का नाश हो जाता है। हे नानक ! (जो मनुष्य) अकाल-पुरख की मेहर से गुरू को मिला है। उसके मन में (ज्ञान का) प्रकाश हो जाता है। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਅੰਤਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਡੀਠਾ ॥
ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਭੂ ਕਾ ਲਾਗਾ ਮੀਠਾ ॥
ਸਗਲ ਸਮਿਗ੍ਰੀ ਏਕਸੁ ਘਟ ਮਾਹਿ ॥
ਅਨਿਕ ਰੰਗ ਨਾਨਾ ਦ੍ਰਿਸਟਾਹਿ ॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਨਾਮੁ ॥
ਦੇਹੀ ਮਹਿ ਇਸ ਕਾ ਬਿਸ੍ਰਾਮੁ ॥
ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ਅਨਹਤ ਤਹ ਨਾਦ ॥
ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਈ ਅਚਰਜ ਬਿਸਮਾਦ ॥
ਤਿਨਿ ਦੇਖਿਆ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਦਿਖਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਜਨ ਸੋਝੀ ਪਾਏ ॥੧॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਅੰਤਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਡੀਠਾ ॥
ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਭੂ ਕਾ ਲਾਗਾ ਮੀਠਾ ॥
ਸਗਲ ਸਮਿਗ੍ਰੀ ਏਕਸੁ ਘਟ ਮਾਹਿ ॥
ਅਨਿਕ ਰੰਗ ਨਾਨਾ ਦ੍ਰਿਸਟਾਹਿ ॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਨਾਮੁ ॥
ਦੇਹੀ ਮਹਿ ਇਸ ਕਾ ਬਿਸ੍ਰਾਮੁ ॥
ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ਅਨਹਤ ਤਹ ਨਾਦ ॥
ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਈ ਅਚਰਜ ਬਿਸਮਾਦ ॥
ਤਿਨਿ ਦੇਖਿਆ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਦਿਖਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਜਨ ਸੋਝੀ ਪਾਏ ॥੧॥
असटपदी ॥
संतसंगि अंतरि प्रभु डीठा ॥
नामु प्रभू का लागा मीठा ॥
सगल समिग्री एकसु घट माहि ॥
अनिक रंग नाना द्रिसटाहि ॥
नउ निधि अंम्रितु प्रभ का नामु ॥
देही महि इस का बिस्रामु ॥
सुंन समाधि अनहत तह नाद ॥
कहनु न जाई अचरज बिसमाद ॥
तिनि देखिआ जिसु आपि दिखाए ॥
नानक तिसु जन सोझी पाए ॥१॥
संतसंगि अंतरि प्रभु डीठा ॥
नामु प्रभू का लागा मीठा ॥
सगल समिग्री एकसु घट माहि ॥
अनिक रंग नाना द्रिसटाहि ॥
नउ निधि अंम्रितु प्रभ का नामु ॥
देही महि इस का बिस्रामु ॥
सुंन समाधि अनहत तह नाद ॥
कहनु न जाई अचरज बिसमाद ॥
तिनि देखिआ जिसु आपि दिखाए ॥
नानक तिसु जन सोझी पाए ॥१॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी।॥ (जिस मनुष्य ने) गुरू की संगति में (रह के) अपने अंदर अकाल-पुरख को देखा है। उसे प्रभू का नाम प्यारा लग जाता है। (जगत के) सारे पदार्थ (उसे) एक प्रभू में ही (लीन दिखते हैं)। (उस प्रभू से ही) अनेकों किस्मों के रंग तमाशे (निकले हुए) दिखते हैं जो (मानो। जगत के) नौ ही खजानों (के बराबर) है और अमृत है- (उस मनुष्य के) शरीर में प्रभू के उस नाम का ठिकाना (हो जाता है) उस मनुष्य के अंदर शून्य-समाधि की अवस्था (निरंतर-निर्विघ्न सुरति) बना रहती है। और – ऐसा आश्चर्य एक-रस राग (-रूपी आनंद बना रहता है) जिसका बयान नहीं हो सकता। (पर) हे नानक ! ये (आनंद) उस मनुष्य ने देखा है जिसे प्रभू खुद दिखाता है (क्योंकि) उस मनुष्य को (उस आनंद की) समझ देता है। 1।
ਸੋ ਅੰਤਰਿ ਸੋ ਬਾਹਰਿ ਅਨੰਤ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਬਿਆਪਿ ਰਹਿਆ ਭਗਵੰਤ ॥
ਧਰਨਿ ਮਾਹਿ ਆਕਾਸ ਪਇਆਲ ॥
ਸਰਬ ਲੋਕ ਪੂਰਨ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਬਿਆਪਿ ਰਹਿਆ ਭਗਵੰਤ ॥
ਧਰਨਿ ਮਾਹਿ ਆਕਾਸ ਪਇਆਲ ॥
ਸਰਬ ਲੋਕ ਪੂਰਨ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥
सो अंतरि सो बाहरि अनंत ॥
घटि घटि बिआपि रहिआ भगवंत ॥
धरनि माहि आकास पइआल ॥
सरब लोक पूरन प्रतिपाल ॥
घटि घटि बिआपि रहिआ भगवंत ॥
धरनि माहि आकास पइआल ॥
सरब लोक पूरन प्रतिपाल ॥
हिन्दी अर्थ: वह बेअंत अंदर-बाहर (सब जगह) हरेक शरीर में भगवान मौजूद है। धरती आकाश व पाताल में है। सारे भवनों में मौजूद है और सब की पालना करता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 293 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली-NCR की office-canteen की 1 बजे की दोपहर।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 59 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 293” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 294 →, पीछे का: ← अंग 292।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।