अंग 272

अंग
272
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸਫਲ ਜਨੰਮ ॥੫॥
नानक साध कै संगि सफल जनंम ॥५॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! साधू की संगति में मानस जनम का फल मिल जाता है।5। संतों की संगति में रह के सब जगह पहुँच हो जाती है (भाव। ऊँची आत्मिक अवस्था आ जाती है); हे नानक ! साधू की संगति में मानस जनम का फल मिल जाता है। 5।
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨਹੀ ਕਛੁ ਘਾਲ ॥
ਦਰਸਨੁ ਭੇਟਤ ਹੋਤ ਨਿਹਾਲ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਕਲੂਖਤ ਹਰੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨਰਕ ਪਰਹਰੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਈਹਾ ਊਹਾ ਸੁਹੇਲਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਬਿਛੁਰਤ ਹਰਿ ਮੇਲਾ ॥
ਜੋ ਇਛੈ ਸੋਈ ਫਲੁ ਪਾਵੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨ ਬਿਰਥਾ ਜਾਵੈ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਸਾਧ ਰਿਦ ਬਸੈ ॥
ਨਾਨਕ ਉਧਰੈ ਸਾਧ ਸੁਨਿ ਰਸੈ ॥੬॥
साध कै संगि नही कछु घाल ॥
दरसनु भेटत होत निहाल ॥
साध कै संगि कलूखत हरै ॥
साध कै संगि नरक परहरै ॥
साध कै संगि ईहा ऊहा सुहेला ॥
साधसंगि बिछुरत हरि मेला ॥
जो इछै सोई फलु पावै ॥
साध कै संगि न बिरथा जावै ॥
पारब्रहमु साध रिद बसै ॥
नानक उधरै साध सुनि रसै ॥६॥

हिन्दी अर्थ: साध जनों की संगति में रहने से तप आदि में तपने की आवश्यक्ता नहीं रहती। (क्योंकि उनके) दर्शन ही करके हृदय खिला रहता है। गुरमुखों की संगति में (मनुष्य अपने) पाप नाश कर लेता है। (और इस तरह) नर्कों से बच जाता है। संतों की संगति में रह के (मनुष्य) इस लोक में व परलोक में सुखी रहता है संतों की संगति में रह के (मनुष्य) बे-मुराद हो के नहीं जाता। (बल्कि) जो इच्छा करता है, वही फल पाता है। साध जनों की संगति में रहने से जीवन व्यर्थ नहीं जाता अकाल-पुरख संत जनों के हृदय में बसता है; हे नानक ! (मनुष्य) साध जनों की रसना से (उपदेश) सुन के (विकारों से) बच जाता है।6।
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸੁਨਉ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਉ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨ ਮਨ ਤੇ ਬਿਸਰੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਸਰਪਰ ਨਿਸਤਰੈ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਲਗੈ ਪ੍ਰਭੁ ਮੀਠਾ ॥
ਸਾਧੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਡੀਠਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਭਏ ਆਗਿਆਕਾਰੀ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਗਤਿ ਭਈ ਹਮਾਰੀ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਿਟੇ ਸਭਿ ਰੋਗ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਭੇਟੇ ਸੰਜੋਗ ॥੭॥
साध कै संगि सुनउ हरि नाउ ॥
साधसंगि हरि के गुन गाउ ॥
साध कै संगि न मन ते बिसरै ॥
साधसंगि सरपर निसतरै ॥
साध कै संगि लगै प्रभु मीठा ॥
साधू कै संगि घटि घटि डीठा ॥
साधसंगि भए आगिआकारी ॥
साधसंगि गति भई हमारी ॥
साध कै संगि मिटे सभि रोग ॥
नानक साध भेटे संजोग ॥७॥

हिन्दी अर्थ: मैं गुरमुखों की संगति में रह के प्रभू का नाम सुनूँ और प्रभू के गुण गाऊँ (ये मेरी कामना है)। संतों की संगति में रहने से प्रभू मन से भूलता नहीं। साध जनों की संगति में मनुष्य जरूर (विकारों से) बच निकलता है। भलों की संगति में रहने से प्रभू प्यारा लगने लग जाता है और वह हरेक शरीर में दिखाई देने लग जाता है। साधुओं की संगति करने से (हम) प्रभू के आज्ञाकारी हो जाते हैं और हमारी आत्मिक अवस्था सुधर जाती है। संत जनों की सुहबत में (विकार आदि) सारे रोग मिट जाते हैं; हे नानक ! (बड़े) भाग्यों से साध जन मिलते हैं।7।
ਸਾਧ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਬੇਦ ਨ ਜਾਨਹਿ ॥
ਜੇਤਾ ਸੁਨਹਿ ਤੇਤਾ ਬਖਿਆਨਹਿ ॥
ਸਾਧ ਕੀ ਉਪਮਾ ਤਿਹੁ ਗੁਣ ਤੇ ਦੂਰਿ ॥
ਸਾਧ ਕੀ ਉਪਮਾ ਰਹੀ ਭਰਪੂਰਿ ॥
ਸਾਧ ਕੀ ਸੋਭਾ ਕਾ ਨਾਹੀ ਅੰਤ ॥
ਸਾਧ ਕੀ ਸੋਭਾ ਸਦਾ ਬੇਅੰਤ ॥
ਸਾਧ ਕੀ ਸੋਭਾ ਊਚ ਤੇ ਊਚੀ ॥
ਸਾਧ ਕੀ ਸੋਭਾ ਮੂਚ ਤੇ ਮੂਚੀ ॥
ਸਾਧ ਕੀ ਸੋਭਾ ਸਾਧ ਬਨਿ ਆਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਪ੍ਰਭ ਭੇਦੁ ਨ ਭਾਈ ॥੮॥੭॥
साध की महिमा बेद न जानहि ॥
जेता सुनहि तेता बखिआनहि ॥
साध की उपमा तिहु गुण ते दूरि ॥
साध की उपमा रही भरपूरि ॥
साध की सोभा का नाही अंत ॥
साध की सोभा सदा बेअंत ॥
साध की सोभा ऊच ते ऊची ॥
साध की सोभा मूच ते मूची ॥
साध की सोभा साध बनि आई ॥
नानक साध प्रभ भेदु न भाई ॥८॥७॥

हिन्दी अर्थ: साध की वडिआई वेद (भी) नहीं जानते। वो तो जितना सुनते हैं। उतना ही बयान करते हैं (पर साध की महिमा बयान से परे है)। साध की समानता तीन गुणों से परे है (भाव। जगत की रचना में कोई ऐसी हस्ती नहीं जिसे साध जैसा कहा जा सके; हां) साध की समानता उस प्रभू से ही हो सकती है जो सर्व व्यापक है। साध की शोभा का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। सदा (इसको) बेअंत ही (कहा जा सकता) है। साधू की शोभा और बहुत ऊँची है साधू की शोभा बहुत बड़ी है। साधू की शोभा साधू को ही फबती है (क्योंकि) हे नानक ! (कह,) हे भाई ! साधू और प्रभू में (कोई) फर्क नहीं।8।7।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਮਨਿ ਸਾਚਾ ਮੁਖਿ ਸਾਚਾ ਸੋਇ ॥
ਅਵਰੁ ਨ ਪੇਖੈ ਏਕਸੁ ਬਿਨੁ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਇਹ ਲਛਣ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਹੋਇ ॥੧॥
सलोकु ॥
मनि साचा मुखि साचा सोइ ॥
अवरु न पेखै एकसु बिनु कोइ ॥
नानक इह लछण ब्रहम गिआनी होइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ (जिस मनुष्य के) मन में सदा स्थिर रहने वाला प्रभू (बसता है)। (जो) मुंह से (भी) उसी प्रभू को (जपता है)। (जो मनुष्य) एक अकाल-पुरख के बिना (कहीं भी) किसी और को नहीं देखता। हे नानक ! (वह मनुष्य) इन गुणों के कारण ब्रहमज्ञानी हो जाता है।1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸਦਾ ਨਿਰਲੇਪ ॥
ਜੈਸੇ ਜਲ ਮਹਿ ਕਮਲ ਅਲੇਪ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸਦਾ ਨਿਰਦੋਖ ॥
ਜੈਸੇ ਸੂਰੁ ਸਰਬ ਕਉ ਸੋਖ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸਮਾਨਿ ॥
ਜੈਸੇ ਰਾਜ ਰੰਕ ਕਉ ਲਾਗੈ ਤੁਲਿ ਪਵਾਨ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਧੀਰਜੁ ਏਕ ॥
ਜਿਉ ਬਸੁਧਾ ਕੋਊ ਖੋਦੈ ਕੋਊ ਚੰਦਨ ਲੇਪ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਇਹੈ ਗੁਨਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਉ ਪਾਵਕ ਕਾ ਸਹਜ ਸੁਭਾਉ ॥੧॥
असटपदी ॥
ब्रहम गिआनी सदा निरलेप ॥
जैसे जल महि कमल अलेप ॥
ब्रहम गिआनी सदा निरदोख ॥
जैसे सूरु सरब कउ सोख ॥
ब्रहम गिआनी कै द्रिसटि समानि ॥
जैसे राज रंक कउ लागै तुलि पवान ॥
ब्रहम गिआनी कै धीरजु एक ॥
जिउ बसुधा कोऊ खोदै कोऊ चंदन लेप ॥
ब्रहम गिआनी का इहै गुनाउ ॥
नानक जिउ पावक का सहज सुभाउ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ ब्रहमज्ञानी (मनुष्य विकारों की तरफ से) सदा बेदाग (रहते हैं) जैसे पानी में (उगे हुए) कमल फूल (कीचड़ से) साफ होते हैं। ब्रहमज्ञानी (मनुष्य) (सारे पापों को जला देते हैं) पापों से बचे रहते हैं। जैसे सूरज सारे (रसों) को सुखा देता है (वैसे ही) ब्रहमज्ञानी के अंदर (सबकी तरफ) एक जैसी नजर (के साथ देखने का स्वभाव होता) है। जैसे हवा राजे व कंगाल को एक जैसी ही लगती है (वैसे ही) (कोई भला कहे चाहे बुरा पर) ब्रहमज्ञानी मनुष्यों में एक तार हौसला (सदा कायम रहता) है। जैसे धरती को कोई तो खोदता है कोई चंदन से लेप करता है (पर धरती को कोई परवाह नहीं)। ब्रहमज्ञानी मनुष्य का (भी) यही गुण है- हे नानक ! जैसे आग का कुदरती स्वभाव है (हरेक चीज की मैल जला देनी) 1।
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਨਿਰਮਲ ਤੇ ਨਿਰਮਲਾ ॥
ਜੈਸੇ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਗੈ ਜਲਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਮਨਿ ਹੋਇ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥
ਜੈਸੇ ਧਰ ਊਪਰਿ ਆਕਾਸੁ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਮਿਤ੍ਰ ਸਤ੍ਰੁ ਸਮਾਨਿ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਨਾਹੀ ਅਭਿਮਾਨ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਊਚ ਤੇ ਊਚਾ ॥
ਮਨਿ ਅਪਨੈ ਹੈ ਸਭ ਤੇ ਨੀਚਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸੇ ਜਨ ਭਏ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਨ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਿ ਕਰੇਇ ॥੨॥
ब्रहम गिआनी निरमल ते निरमला ॥
जैसे मैलु न लागै जला ॥
ब्रहम गिआनी कै मनि होइ प्रगासु ॥
जैसे धर ऊपरि आकासु ॥
ब्रहम गिआनी कै मित्र सत्रु समानि ॥
ब्रहम गिआनी कै नाही अभिमान ॥
ब्रहम गिआनी ऊच ते ऊचा ॥
मनि अपनै है सभ ते नीचा ॥
ब्रहम गिआनी से जन भए ॥
नानक जिन प्रभु आपि करेइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी मनुष्य (वैसे ही विकारों की मैल से सदा बचा रहके) महा निर्मल है – जैसे पानी को कभी मैल नहीं रह सकती (भाप बन के फिर साफ का साफ। (वैसे ही) ब्रहमानी के मन में (ये) रौशनी हो जाती है (कि प्रभू हर जगह मौजूद है)- जैसे धरती पर आकाश (हर जगह व्यापक है। ब्रहमज्ञानी के लिए सज्जन व वैरी एक जैसा है (क्योंकि) उसके अंदर अहंकार नहीं है (किसी के अच्छे-बुरे सलूक का हर्ष-शोक नहीं)। ब्रहमज्ञानी (आत्मिक अवस्था में) सबसे ऊँचा है। (पर) अपने मन में (अपने आप को) सबसे नीचा (जानता है)। हे नानक ! वही मनुष्य ब्रहमज्ञानी बनते हैं जिन्हें प्रभू खुद बनाता है।2।
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸਗਲ ਕੀ ਰੀਨਾ ॥
ਆਤਮ ਰਸੁ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਚੀਨਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੀ ਸਭ ਊਪਰਿ ਮਇਆ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਤੇ ਕਛੁ ਬੁਰਾ ਨ ਭਇਆ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸਦਾ ਸਮਦਰਸੀ ॥
ब्रहम गिआनी सगल की रीना ॥
आतम रसु ब्रहम गिआनी चीना ॥
ब्रहम गिआनी की सभ ऊपरि मइआ ॥
ब्रहम गिआनी ते कछु बुरा न भइआ ॥
ब्रहम गिआनी सदा समदरसी ॥

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी सारे (बंदों) के पैरों की खाक (हो के रहता) है; ब्रहमज्ञानी ने आत्मिक आनंद को पहिचान लिया है। बंहमज्ञानी की सब पर खुशी रहती है (भाव। ब्रहमज्ञानी सबके साथ हंसते माथे रहता है। ) और वह कोई बुरा काम नहीं करता। ब्रहमज्ञानी सदा सब ओर एक जैसी नजर से देखता है।

संदर्भ: यह अंग 272 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Noida के office-tower की 15वीं मंज़िल से शाम का Delhi-view।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 61 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 272” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 273 →, पीछे का: ← अंग 271

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।