अंग
215
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਾਨੁ ਅਭਿਮਾਨੁ ਦੋਊ ਸਮਾਨੇ ਮਸਤਕੁ ਡਾਰਿ ਗੁਰ ਪਾਗਿਓ ॥
ਸੰਪਤ ਹਰਖੁ ਨ ਆਪਤ ਦੂਖਾ ਰੰਗੁ ਠਾਕੁਰੈ ਲਾਗਿਓ ॥੧॥
ਬਾਸ ਬਾਸਰੀ ਏਕੈ ਸੁਆਮੀ ਉਦਿਆਨ ਦ੍ਰਿਸਟਾਗਿਓ ॥
ਨਿਰਭਉ ਭਏ ਸੰਤ ਭ੍ਰਮੁ ਡਾਰਿਓ ਪੂਰਨ ਸਰਬਾਗਿਓ ॥੨॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰਤੈ ਕਾਰਣੁ ਕੀਨੋ ਮਨਿ ਬੁਰੋ ਨ ਲਾਗਿਓ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਪਰਸਾਦਿ ਸੰਤਨ ਕੈ ਸੋਇਓ ਮਨੁ ਜਾਗਿਓ ॥੩॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਓੜਿ ਤੁਹਾਰੀ ਪਰਿਓ ਆਇਓ ਸਰਣਾਗਿਓ ॥
ਨਾਮ ਰੰਗ ਸਹਜ ਰਸ ਮਾਣੇ ਫਿਰਿ ਦੂਖੁ ਨ ਲਾਗਿਓ ॥੪॥੨॥੧੬੦॥
ਸੰਪਤ ਹਰਖੁ ਨ ਆਪਤ ਦੂਖਾ ਰੰਗੁ ਠਾਕੁਰੈ ਲਾਗਿਓ ॥੧॥
ਬਾਸ ਬਾਸਰੀ ਏਕੈ ਸੁਆਮੀ ਉਦਿਆਨ ਦ੍ਰਿਸਟਾਗਿਓ ॥
ਨਿਰਭਉ ਭਏ ਸੰਤ ਭ੍ਰਮੁ ਡਾਰਿਓ ਪੂਰਨ ਸਰਬਾਗਿਓ ॥੨॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰਤੈ ਕਾਰਣੁ ਕੀਨੋ ਮਨਿ ਬੁਰੋ ਨ ਲਾਗਿਓ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਪਰਸਾਦਿ ਸੰਤਨ ਕੈ ਸੋਇਓ ਮਨੁ ਜਾਗਿਓ ॥੩॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਓੜਿ ਤੁਹਾਰੀ ਪਰਿਓ ਆਇਓ ਸਰਣਾਗਿਓ ॥
ਨਾਮ ਰੰਗ ਸਹਜ ਰਸ ਮਾਣੇ ਫਿਰਿ ਦੂਖੁ ਨ ਲਾਗਿਓ ॥੪॥੨॥੧੬੦॥
मानु अभिमानु दोऊ समाने मसतकु डारि गुर पागिओ ॥
संपत हरखु न आपत दूखा रंगु ठाकुरै लागिओ ॥१॥
बास बासरी एकै सुआमी उदिआन द्रिसटागिओ ॥
निरभउ भए संत भ्रमु डारिओ पूरन सरबागिओ ॥२॥
जो किछु करतै कारणु कीनो मनि बुरो न लागिओ ॥
साधसंगति परसादि संतन कै सोइओ मनु जागिओ ॥३॥
जन नानक ओड़ि तुहारी परिओ आइओ सरणागिओ ॥
नाम रंग सहज रस माणे फिरि दूखु न लागिओ ॥४॥२॥१६०॥
संपत हरखु न आपत दूखा रंगु ठाकुरै लागिओ ॥१॥
बास बासरी एकै सुआमी उदिआन द्रिसटागिओ ॥
निरभउ भए संत भ्रमु डारिओ पूरन सरबागिओ ॥२॥
जो किछु करतै कारणु कीनो मनि बुरो न लागिओ ॥
साधसंगति परसादि संतन कै सोइओ मनु जागिओ ॥३॥
जन नानक ओड़ि तुहारी परिओ आइओ सरणागिओ ॥
नाम रंग सहज रस माणे फिरि दूखु न लागिओ ॥४॥२॥१६०॥
हिन्दी अर्थ: हे बहिन ! कोई मेरा आदर करे~ कोई मेरे साथ घमण्डियों वाला सलूक करे~ मुझे दोनों एक ही जैसे प्रतीत होते हैं। (क्यूँकि) मैंने अपना माथा (सिर) गुरू के चरणों में रख दिया है। (गुरू की किरपा से मेरे मन में) परमात्मा का प्यार बन चुका है। अब मुझे आए धन की खुशी नहीं होती~ और आई बिपता से दुख प्रतीत नहीं होता। 1। हे बहिन ! अब मुझे सब घरों में एक मालिक प्रभू ही दिखता है~ जंगलों में भी मुझे वही नजर आ रहा है। गुरू संत (की किरपा से) मैंने भटकना समाप्त कर ली है~ अब सबके दिल की जानने वाला प्रभू ही मुझे सर्व-व्यापक दिखता है और मैं निडर हो गया हूँ। 2। (हे बहिन ! जब भी) जो भी सबॅब ईश्वर ने बनाया (अब मुझे अपने) मन में (वह) बुरा नहीं लगता। साध-संगति में आ के संत जनों की किरपा से (माया के मोह में) सोया हुआ (मेरा) मन जाग उठा है। 3। हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !गुरू की कृपा से) मैं तेरी ओट में आ पड़ा हूँ~ मैं तेरी शरण में आ गिरा हूँ। अब मुझे कोई दुख नहीं सताता। मैं तेरे नाम का आनंद ले रहा हूँ मैं आत्मिक अडोलता के सुख माण रहा हूँ। 4। 2। 160।
ਗਉੜੀ ਮਾਲਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪਾਇਆ ਲਾਲੁ ਰਤਨੁ ਮਨਿ ਪਾਇਆ ॥
ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਥੀਆ ਸਤਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਲਾਥੀ ਭੂਖ ਤ੍ਰਿਸਨ ਸਭ ਲਾਥੀ ਚਿੰਤਾ ਸਗਲ ਬਿਸਾਰੀ ॥
ਕਰੁ ਮਸਤਕਿ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਧਰਿਓ ਮਨੁ ਜੀਤੋ ਜਗੁ ਸਾਰੀ ॥੧॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਇ ਰਹੇ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਡੋਲਨ ਤੇ ਅਬ ਚੂਕੇ ॥
ਅਖੁਟੁ ਖਜਾਨਾ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ਤੋਟਿ ਨਹੀ ਰੇ ਮੂਕੇ ॥੨॥
ਅਚਰਜੁ ਏਕੁ ਸੁਨਹੁ ਰੇ ਭਾਈ ਗੁਰਿ ਐਸੀ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥
ਲਾਹਿ ਪਰਦਾ ਠਾਕੁਰੁ ਜਉ ਭੇਟਿਓ ਤਉ ਬਿਸਰੀ ਤਾਤਿ ਪਰਾਈ ॥੩॥
ਕਹਿਓ ਨ ਜਾਈ ਏਹੁ ਅਚੰਭਉ ਸੋ ਜਾਨੈ ਜਿਨਿ ਚਾਖਿਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਚ ਭਏ ਬਿਗਾਸਾ ਗੁਰਿ ਨਿਧਾਨੁ ਰਿਦੈ ਲੈ ਰਾਖਿਆ ॥੪॥੩॥੧੬੧॥
ਪਾਇਆ ਲਾਲੁ ਰਤਨੁ ਮਨਿ ਪਾਇਆ ॥
ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਥੀਆ ਸਤਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਲਾਥੀ ਭੂਖ ਤ੍ਰਿਸਨ ਸਭ ਲਾਥੀ ਚਿੰਤਾ ਸਗਲ ਬਿਸਾਰੀ ॥
ਕਰੁ ਮਸਤਕਿ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਧਰਿਓ ਮਨੁ ਜੀਤੋ ਜਗੁ ਸਾਰੀ ॥੧॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਇ ਰਹੇ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਡੋਲਨ ਤੇ ਅਬ ਚੂਕੇ ॥
ਅਖੁਟੁ ਖਜਾਨਾ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ਤੋਟਿ ਨਹੀ ਰੇ ਮੂਕੇ ॥੨॥
ਅਚਰਜੁ ਏਕੁ ਸੁਨਹੁ ਰੇ ਭਾਈ ਗੁਰਿ ਐਸੀ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥
ਲਾਹਿ ਪਰਦਾ ਠਾਕੁਰੁ ਜਉ ਭੇਟਿਓ ਤਉ ਬਿਸਰੀ ਤਾਤਿ ਪਰਾਈ ॥੩॥
ਕਹਿਓ ਨ ਜਾਈ ਏਹੁ ਅਚੰਭਉ ਸੋ ਜਾਨੈ ਜਿਨਿ ਚਾਖਿਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਚ ਭਏ ਬਿਗਾਸਾ ਗੁਰਿ ਨਿਧਾਨੁ ਰਿਦੈ ਲੈ ਰਾਖਿਆ ॥੪॥੩॥੧੬੧॥
गउड़ी माला महला ५ ॥
पाइआ लालु रतनु मनि पाइआ ॥
तनु सीतलु मनु सीतलु थीआ सतगुर सबदि समाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
लाथी भूख त्रिसन सभ लाथी चिंता सगल बिसारी ॥
करु मसतकि गुरि पूरै धरिओ मनु जीतो जगु सारी ॥१॥
त्रिपति अघाइ रहे रिद अंतरि डोलन ते अब चूके ॥
अखुटु खजाना सतिगुरि दीआ तोटि नही रे मूके ॥२॥
अचरजु एकु सुनहु रे भाई गुरि ऐसी बूझ बुझाई ॥
लाहि परदा ठाकुरु जउ भेटिओ तउ बिसरी ताति पराई ॥३॥
कहिओ न जाई एहु अचंभउ सो जानै जिनि चाखिआ ॥
कहु नानक सच भए बिगासा गुरि निधानु रिदै लै राखिआ ॥४॥३॥१६१॥
पाइआ लालु रतनु मनि पाइआ ॥
तनु सीतलु मनु सीतलु थीआ सतगुर सबदि समाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
लाथी भूख त्रिसन सभ लाथी चिंता सगल बिसारी ॥
करु मसतकि गुरि पूरै धरिओ मनु जीतो जगु सारी ॥१॥
त्रिपति अघाइ रहे रिद अंतरि डोलन ते अब चूके ॥
अखुटु खजाना सतिगुरि दीआ तोटि नही रे मूके ॥२॥
अचरजु एकु सुनहु रे भाई गुरि ऐसी बूझ बुझाई ॥
लाहि परदा ठाकुरु जउ भेटिओ तउ बिसरी ताति पराई ॥३॥
कहिओ न जाई एहु अचंभउ सो जानै जिनि चाखिआ ॥
कहु नानक सच भए बिगासा गुरि निधानु रिदै लै राखिआ ॥४॥३॥१६१॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला ५ ॥ (हे भाई ! मैंने अपने) मन में एक लाल ढूँढ लिया है। मैं गुरू के शबद में लीन हो गया हूँ। मेरा शरीर (हरेक ज्ञानेंद्रियां) शांत हो गई हैं~ मेरा मन ठंडा हो गया है। 1। रहाउ। (मेरी माया की) भूख उतर गई है। मेरी माया की सारी प्यास खत्म हो गई है~ मैंने सारे चिंता-फिक्र भुला दिए हैं। (हे भाई !) पूरे गुरू ने (मेरे) माथे पर (अपना) हाथ रखा है (उसकी बरकति से मैंने अपना) मन काबू में कर लिया है।(मानो) मैंने सारा जगत जीत लिया है 1। (हे भाई ! माया की तरफ से मेरे अंदर की भूख) तृप्त हो गई है~ मैं (माया की ओर से अपने) दिल में अघा चुका हूँ। (अब माया की खातिर) डोलने से मैं हट गया हूँ। हे भाई ! सतिगुरू ने मुझे (प्रभू नाम का एक ऐसा) खजाना दिया है जो कभी खत्म होने वाला नहीं। ना ही उसमें कमी आ सकती है~ ना ही वह खत्म होने वाला है। 2। हे भाई ! एक और अनोखी बात सुनो।गुरू ने मुझे ऐसी समझ बख्श दी है (जिसकी बरकति से) जब से (मेरे अंदर से अहंकार का) परदा उतार के मुझे ठाकुर प्रभू मिला है~ तब से (मेरे दिल में से) पराई ईष्या बिसर गई है। 3। हे भाई ! ये एक ऐसा आश्चर्यजनक आनंद है जो बयान नहीं किया जा सकता। इस रस को वही जानता है जिसने ये चखा है। हे नानक ! कह, गुरू ने (मेरे अंदर परमात्मा के नाम का खजाना ला के रख दिया है~ और मेरे अंदर उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा (के ज्ञान) का प्रकाश हो गया है। 4। 3। 161।
ਗਉੜੀ ਮਾਲਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਉਬਰਤ ਰਾਜਾ ਰਾਮ ਕੀ ਸਰਣੀ ॥
ਸਰਬ ਲੋਕ ਮਾਇਆ ਕੇ ਮੰਡਲ ਗਿਰਿ ਗਿਰਿ ਪਰਤੇ ਧਰਣੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਸਤ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਬੇਦ ਬੀਚਾਰੇ ਮਹਾ ਪੁਰਖਨ ਇਉ ਕਹਿਆ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਨਾਹੀ ਨਿਸਤਾਰਾ ਸੂਖੁ ਨ ਕਿਨਹੂੰ ਲਹਿਆ ॥੧॥
ਤੀਨਿ ਭਵਨ ਕੀ ਲਖਮੀ ਜੋਰੀ ਬੂਝਤ ਨਾਹੀ ਲਹਰੇ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਕਹਾ ਥਿਤਿ ਪਾਵੈ ਫਿਰਤੋ ਪਹਰੇ ਪਹਰੇ ॥੨॥
ਅਨਿਕ ਬਿਲਾਸ ਕਰਤ ਮਨ ਮੋਹਨ ਪੂਰਨ ਹੋਤ ਨ ਕਾਮਾ ॥
ਜਲਤੋ ਜਲਤੋ ਕਬਹੂ ਨ ਬੂਝਤ ਸਗਲ ਬ੍ਰਿਥੇ ਬਿਨੁ ਨਾਮਾ ॥੩॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਮੇਰੇ ਮੀਤਾ ਇਹੈ ਸਾਰ ਸੁਖੁ ਪੂਰਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਜਨਮ ਮਰਣੁ ਨਿਵਾਰੈ ਨਾਨਕ ਜਨ ਕੀ ਧੂਰਾ ॥੪॥੪॥੧੬੨॥
ਉਬਰਤ ਰਾਜਾ ਰਾਮ ਕੀ ਸਰਣੀ ॥
ਸਰਬ ਲੋਕ ਮਾਇਆ ਕੇ ਮੰਡਲ ਗਿਰਿ ਗਿਰਿ ਪਰਤੇ ਧਰਣੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਸਤ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਬੇਦ ਬੀਚਾਰੇ ਮਹਾ ਪੁਰਖਨ ਇਉ ਕਹਿਆ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਨਾਹੀ ਨਿਸਤਾਰਾ ਸੂਖੁ ਨ ਕਿਨਹੂੰ ਲਹਿਆ ॥੧॥
ਤੀਨਿ ਭਵਨ ਕੀ ਲਖਮੀ ਜੋਰੀ ਬੂਝਤ ਨਾਹੀ ਲਹਰੇ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਕਹਾ ਥਿਤਿ ਪਾਵੈ ਫਿਰਤੋ ਪਹਰੇ ਪਹਰੇ ॥੨॥
ਅਨਿਕ ਬਿਲਾਸ ਕਰਤ ਮਨ ਮੋਹਨ ਪੂਰਨ ਹੋਤ ਨ ਕਾਮਾ ॥
ਜਲਤੋ ਜਲਤੋ ਕਬਹੂ ਨ ਬੂਝਤ ਸਗਲ ਬ੍ਰਿਥੇ ਬਿਨੁ ਨਾਮਾ ॥੩॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਮੇਰੇ ਮੀਤਾ ਇਹੈ ਸਾਰ ਸੁਖੁ ਪੂਰਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਜਨਮ ਮਰਣੁ ਨਿਵਾਰੈ ਨਾਨਕ ਜਨ ਕੀ ਧੂਰਾ ॥੪॥੪॥੧੬੨॥
गउड़ी माला महला ५ ॥
उबरत राजा राम की सरणी ॥
सरब लोक माइआ के मंडल गिरि गिरि परते धरणी ॥१॥ रहाउ ॥
सासत सिंम्रिति बेद बीचारे महा पुरखन इउ कहिआ ॥
बिनु हरि भजन नाही निसतारा सूखु न किनहूं लहिआ ॥१॥
तीनि भवन की लखमी जोरी बूझत नाही लहरे ॥
बिनु हरि भगति कहा थिति पावै फिरतो पहरे पहरे ॥२॥
अनिक बिलास करत मन मोहन पूरन होत न कामा ॥
जलतो जलतो कबहू न बूझत सगल ब्रिथे बिनु नामा ॥३॥
हरि का नामु जपहु मेरे मीता इहै सार सुखु पूरा ॥
साधसंगति जनम मरणु निवारै नानक जन की धूरा ॥४॥४॥१६२॥
उबरत राजा राम की सरणी ॥
सरब लोक माइआ के मंडल गिरि गिरि परते धरणी ॥१॥ रहाउ ॥
सासत सिंम्रिति बेद बीचारे महा पुरखन इउ कहिआ ॥
बिनु हरि भजन नाही निसतारा सूखु न किनहूं लहिआ ॥१॥
तीनि भवन की लखमी जोरी बूझत नाही लहरे ॥
बिनु हरि भगति कहा थिति पावै फिरतो पहरे पहरे ॥२॥
अनिक बिलास करत मन मोहन पूरन होत न कामा ॥
जलतो जलतो कबहू न बूझत सगल ब्रिथे बिनु नामा ॥३॥
हरि का नामु जपहु मेरे मीता इहै सार सुखु पूरा ॥
साधसंगति जनम मरणु निवारै नानक जन की धूरा ॥४॥४॥१६२॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला ५ ॥ (हे भाई !) प्रभू-पातशाह के शरन पड़ के ही मनुष्य (माया के प्रभाव से) बच सकता है। मात लोक~ पाताल लोक और आकाश लोक -इन सब लोकों के जीव माया के चक्कर में फंसे पड़े हैं~ (माया के प्रभाव के कारण जीव उच्च आत्मिक मण्डल से) गिर गिर के निम्न आत्मिक दशा में आ पड़ते हैं। 1। (पण्डित लोग तो) शास्त्रों-स्मृतियों-वेद (आदि सारे धर्म पुस्तकों को) विचारते आ रहे हैं। पर महापुरुषों ने तो यही कहा है कि परमात्मा के भजन के बिना (माया के समुंद्र से) पार नहीं हुआ जा सकता~ (सिमरन के बिना) किसी मनुष्य ने भी सुख नहीं पाया। 1। (हे भाई !) अगर मनुष्य सारी सृष्टि की ही माया एकत्र कर ले~ तो भी लोभ की लहरें मिटती नहीं हैं। (इतनी माया जोड़ जोड़ के भी) परमात्मा की भक्ति के बिना मनुष्य कहीं भी मन का टिकाव नहीं ढूँढ सकता~ हर समय ही (माया की खातिर) भटकता फिरता है। 2। (हे भाई !) मनुष्य मन को मोहने वाली अनेकों मौजें भी करता रहे~ (पर~ मन की विकारों वाली) वासना पूरी नहीं होती। मनुष्य तृष्णा की आग में जलता फिरता है~ तृष्णा की आग कभी बुझती नहीं। परमात्मा के नाम के बिना मनुष्य के अन्य सभी उद्यम व्यर्थ चले जाते हैं। 3। हे मेरे मित्र ! परमात्मा का नाम जपा कर~ यही सब से श्रेष्ठ सुख है~ और इस सुख में कोई कमी नहीं रह जाती। जो मनुष्य साध-संगति में आ के अपना जनम मरण (का चक्र) खत्म कर लेता है~ नानक उस मनुष्य के चरणों की धूड़ (मांगता) है। 4। 4। 162।
ਗਉੜੀ ਮਾਲਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੋ ਕਉ ਇਹ ਬਿਧਿ ਕੋ ਸਮਝਾਵੈ ॥
ਕਰਤਾ ਹੋਇ ਜਨਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਜਾਨਤ ਕਿਛੁ ਇਨਹਿ ਕਮਾਨੋ ਜਪ ਤਪ ਕਛੂ ਨ ਸਾਧਾ ॥
ਦਹ ਦਿਸਿ ਲੈ ਇਹੁ ਮਨੁ ਦਉਰਾਇਓ ਕਵਨ ਕਰਮ ਕਰਿ ਬਾਧਾ ॥੧॥
ਮਨ ਤਨ ਧਨ ਭੂਮਿ ਕਾ ਠਾਕੁਰੁ ਹਉ ਇਸ ਕਾ ਇਹੁ ਮੇਰਾ ॥
ਮੋ ਕਉ ਇਹ ਬਿਧਿ ਕੋ ਸਮਝਾਵੈ ॥
ਕਰਤਾ ਹੋਇ ਜਨਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਜਾਨਤ ਕਿਛੁ ਇਨਹਿ ਕਮਾਨੋ ਜਪ ਤਪ ਕਛੂ ਨ ਸਾਧਾ ॥
ਦਹ ਦਿਸਿ ਲੈ ਇਹੁ ਮਨੁ ਦਉਰਾਇਓ ਕਵਨ ਕਰਮ ਕਰਿ ਬਾਧਾ ॥੧॥
ਮਨ ਤਨ ਧਨ ਭੂਮਿ ਕਾ ਠਾਕੁਰੁ ਹਉ ਇਸ ਕਾ ਇਹੁ ਮੇਰਾ ॥
गउड़ी माला महला ५ ॥
मो कउ इह बिधि को समझावै ॥
करता होइ जनावै ॥१॥ रहाउ ॥
अनजानत किछु इनहि कमानो जप तप कछू न साधा ॥
दह दिसि लै इहु मनु दउराइओ कवन करम करि बाधा ॥१॥
मन तन धन भूमि का ठाकुरु हउ इस का इहु मेरा ॥
मो कउ इह बिधि को समझावै ॥
करता होइ जनावै ॥१॥ रहाउ ॥
अनजानत किछु इनहि कमानो जप तप कछू न साधा ॥
दह दिसि लै इहु मनु दउराइओ कवन करम करि बाधा ॥१॥
मन तन धन भूमि का ठाकुरु हउ इस का इहु मेरा ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी माला महला ५ ॥ (हे भाई !) और कौन मुझे इस तरह समझ सकता है? (वही गुरमुख) समझ सकता है (जो) करतार का रूप हो जाए। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू के बिना और कोई नहीं समझ सकता कि) अज्ञानता में फंस के इस जीव ने सिमरन नहीं किया और विकारों को रोकने का प्रयास नहीं किया~ कुछ अन्य ही (कोझे~ बेमतलब काम) किए हैं। ये जीव अपने इस मन को दसों दिशाओं में भगा रहा है। ये कौन से कर्मों के कारण (माया के मोह में) बंधा हुआ है?। 1। (मोह में फस के जीव हर समय यही कहता है,) मैं अपनी जीवात्मा का~ शरीर का~ धन का~ धरती का मालिक हूँ~ मैं इस (धन आदि) का मालिक हूँ~ ये धन आदिक मेरा है। 2।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 215 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Pragati Maidan के पीछे यमुना के किनारे शाम का सूरज।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 215” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 216 →, पीछे का: ← अंग 214।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।