विभीषण गीता

विभीषण गीता · धर्म का रथ
श्री रामचरितमानस · लंका काण्ड
लंका की भूमि, युद्ध की पूर्व-संध्या। विभीषण देखते हैं, रावण रथ पर, श्रीराम पैदल। एक क्षण को मन में संशय उठता है। और श्रीराम उत्तर देते हैं, उसी धर्म-रथ के रूपक से, जो आगे चल कर मानस की सबसे प्रिय शिक्षाओं में गिना गया।
॥ सखा धरममय अस रथ जाकें।
जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥
“हे सखा, जिसके पास ऐसा धर्ममय रथ है, उसे संसार में कहीं कोई शत्रु जीत नहीं सकता।” यही श्रीराम के धर्म-रथ-वर्णन की पूर्णता है।
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परिचय

तुलसीदास की रामचरितमानस में एक छोटा-सा प्रसंग है, जो आगे चल कर उनकी सबसे प्रिय शिक्षाओं में गिना गया। इसे “विभीषण गीता” कहा जाता है, यद्यपि नाम में आया “गीता” शब्द कुछ भ्रम पैदा करता है। वस्तुतः यह लंका-काण्ड का एक संक्षिप्त संवाद है, जहाँ श्रीराम विभीषण को धर्म का स्वरूप समझाते हैं।

रावण रत्नजड़ित रथ पर शस्त्रों सहित बैठा है, श्रीराम युद्ध से पहले धरती पर पैदल निरस्त्र खड़े हैं।
रावण रत्नजड़ित रथ पर शस्त्रों सहित बैठा है, श्रीराम युद्ध से पहले धरती पर पैदल निरस्त्र खड़े हैं।

प्रसंग यह है। रावण का राज्य लंका। विभीषण रावण के छोटे भाई, अब श्रीराम के पक्ष में। निर्णायक युद्ध आरम्भ होने को है। रावण रत्नों से जड़े रथ पर बैठा है, सहस्र अश्व, सजे हुए शस्त्र। और श्रीराम धरती पर पैदल खड़े हैं, न रथ, न कवच, न चरणों में पादुका तक।

युद्धभूमि में विभीषण श्रीराम से हाथ जोड़कर प्रश्न पूछते हैं, श्रीराम मुस्कराकर उत्तर देने को तत्पर।
युद्धभूमि में विभीषण श्रीराम से हाथ जोड़कर प्रश्न पूछते हैं, श्रीराम मुस्कराकर उत्तर देने को तत्पर।

विभीषण का मन डगमगाता है। उनका जन्म राक्षस-कुल में हुआ है, हनुमान् या सुग्रीव जैसा नहीं, इसलिए सांसारिक तर्क उन्हें घेर लेता है। वे श्रीराम के समीप आते हैं और बड़े आदर से पूछते हैं, “नाथ, एक बात बताइए। रावण के पास इतना साज-सामान है, और आपके पास कुछ भी नहीं। आप विजय कैसे पाएँगे?”

श्रीराम विभीषण को दिव्य रथ का दर्शन कराते हुए, विभीषण विस्मय से हाथ जोड़े देखते हुए
श्रीराम विभीषण को दिव्य रथ का दर्शन कराते हुए, विभीषण विस्मय से हाथ जोड़े देखते हुए

यह प्रश्न निष्कपट है, भोले मन से उठा। श्रीराम उत्तर देते हैं, रुष्ट हो कर नहीं, मुस्कुरा कर। “सुनो सखा,” वे कहते हैं, “जिससे विजय मिले वह रथ और ही प्रकार का होता है। उसमें धर्म के पहिये हैं, शौर्य और धैर्य की ध्वजा-पताका, बल-विवेक-दम-परहित के चार अश्व।”

श्रीराम का यह धर्म-रथ का रूपक लंका-काण्ड की तेरह चौपाइयों में विस्तार पाता है। रथ का प्रत्येक अङ्ग, प्रत्येक पहिया, प्रत्येक शस्त्र किसी सद्गुण का प्रतीक है। यहाँ धर्म दर्शन की ऊँचाई से अधिक जीवन की भूमि पर उतरता है। शम, दम, क्षमा, सन्तोष, यही सच्चे शस्त्र कहे गए हैं।

“विभीषण गीता” यही प्रसंग है, और इसमें केवल धर्म-रथ का रूपक नहीं। विभीषण के प्रश्न से ले कर श्रीराम के उस प्रसिद्ध वचन “अस सजि सगुन धरम रथ” तक की पूरी बातचीत यहाँ है। संक्षिप्त, किन्तु अपने में पूर्ण, और गहराई में बहुत विस्तृत।

हमने इसे छह खण्डों में बाँटा है। प्रत्येक खण्ड एक भाव पर केन्द्रित है, और प्रत्येक में तुलसीदास की अवधी चौपाइयाँ अपने मूल रूप में, साथ में हिन्दी अर्थ।

छह खण्ड

तुलसीदास की चौपाइयाँ, अर्थ और विवेचन।

खण्ड 1
विभीषण का प्रश्न
रावण का रथ, श्रीराम का पैदल खड़ा होना, और विभीषण का संशय।
खण्ड 2
धर्म-रथ का प्रारम्भ
श्रीराम का पहला उत्तर, और रथ के अङ्गों का वर्णन आरम्भ।
खण्ड 3
पहिये, घोड़े, ध्वज
शौर्य, सत्य, शील, यश, हर अङ्ग में छिपा भाव।
खण्ड 4
कवच और सारथी
कवच, शस्त्र, सारथी, बल, भीतर की रक्षा।
खण्ड 5
रथ की पूर्णता
रथ सज गया। श्रीराम का वचन, ऐसा रथ हर शत्रु को जीत लेता है।
खण्ड 6
विभीषण का समर्पण
विभीषण की भाव-विह्वल प्रतिक्रिया और प्रसंग का विश्राम।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

यह “विभीषण गीता” नाम कहाँ से आया?

यह नाम तुलसीदास का दिया हुआ नहीं, बाद की उपाधि है। उपदेश के पात्र विभीषण हैं, इसी से इसे “विभीषण गीता” कहा गया। किन्तु यह संवाद संक्षिप्त है, गीता जैसा दीर्घ उपदेश नहीं।

यह कितना लम्बा है?

तेरह चौपाइयाँ, दो दोहे और एक श्लोक। रामचरितमानस के लंका-काण्ड में, राम-रावण युद्ध से ठीक पहले। पूरा पढ़ने में पाँच से दस मिनट।

क्या यह केवल “धर्म-रथ” का रूपक है?

मुख्यतः हाँ, किन्तु रूपक के साथ-साथ पूरी बातचीत भी। विभीषण का प्रश्न, श्रीराम का उत्तर, और अन्त में विभीषण का भाव। प्रसंग अपने में पूर्ण है।

क्या यह केवल युद्ध के लिए है, या रोज़ के जीवन के लिए?

जीवन के लिए ही। श्रीराम का यह “रथ” हर मनुष्य के मन में चाहिए। हर कठिनाई एक “युद्ध” है, और हर मनुष्य को अपना धर्म-रथ स्वयं सजाना है।

क्या यह वेदान्त है, या भक्ति?

दोनों से कुछ अलग, यहाँ केन्द्र में धर्म है, आचरण की भूमि, नैतिक बल और भीतर की दृढ़ता। फिर भी अन्त भक्ति के भाव में ही विश्राम पाता है, क्योंकि तुलसीदास की दृष्टि सदा राम-भक्ति की ओर मुड़ी रहती है।

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