अंग 180

अंग
180
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪ੍ਰਾਣੀ ਜਾਣੈ ਇਹੁ ਤਨੁ ਮੇਰਾ ॥
ਬਹੁਰਿ ਬਹੁਰਿ ਉਆਹੂ ਲਪਟੇਰਾ ॥
ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਗਿਰਸਤ ਕਾ ਫਾਸਾ ॥
ਹੋਨੁ ਨ ਪਾਈਐ ਰਾਮ ਕੇ ਦਾਸਾ ॥੧॥
ਕਵਨ ਸੁ ਬਿਧਿ ਜਿਤੁ ਰਾਮ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਕਵਨ ਸੁ ਮਤਿ ਜਿਤੁ ਤਰੈ ਇਹ ਮਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਭਲਾਈ ਸੋ ਬੁਰਾ ਜਾਨੈ ॥
ਸਾਚੁ ਕਹੈ ਸੋ ਬਿਖੈ ਸਮਾਨੈ ॥
ਜਾਣੈ ਨਾਹੀ ਜੀਤ ਅਰੁ ਹਾਰ ॥
ਇਹੁ ਵਲੇਵਾ ਸਾਕਤ ਸੰਸਾਰ ॥੨॥
ਜੋ ਹਲਾਹਲ ਸੋ ਪੀਵੈ ਬਉਰਾ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਜਾਨੈ ਕਰਿ ਕਉਰਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗ ਕੈ ਨਾਹੀ ਨੇਰਿ ॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਭ੍ਰਮਤਾ ਫੇਰਿ ॥੩॥
ਏਕੈ ਜਾਲਿ ਫਹਾਏ ਪੰਖੀ ॥
ਰਸਿ ਰਸਿ ਭੋਗ ਕਰਹਿ ਬਹੁ ਰੰਗੀ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਤਾ ਕੇ ਕਾਟੇ ਜਾਲ ॥੪॥੧੩॥੮੨॥
प्राणी जाणै इहु तनु मेरा ॥
बहुरि बहुरि उआहू लपटेरा ॥
पुत्र कलत्र गिरसत का फासा ॥
होनु न पाईऐ राम के दासा ॥१॥
कवन सु बिधि जितु राम गुण गाइ ॥
कवन सु मति जितु तरै इह माइ ॥१॥ रहाउ ॥
जो भलाई सो बुरा जानै ॥
साचु कहै सो बिखै समानै ॥
जाणै नाही जीत अरु हार ॥
इहु वलेवा साकत संसार ॥२॥
जो हलाहल सो पीवै बउरा ॥
अंम्रितु नामु जानै करि कउरा ॥
साधसंग कै नाही नेरि ॥
लख चउरासीह भ्रमता फेरि ॥३॥
एकै जालि फहाए पंखी ॥
रसि रसि भोग करहि बहु रंगी ॥
कहु नानक जिसु भए क्रिपाल ॥ गुरि पूरै ता के काटे जाल ॥४॥१३॥८२॥

हिन्दी अर्थ: (माया के मोह में फंसा) मनुष्य समझता है कि ये शरीर (सदा) मेरा (अपना ही रहना) है~ मुड़ मुड़ इस शरीर के साथ ही चिपकता है। जब तक पुत्र-स्त्री गृहस्त के (मोह का) फंदा (गले में पड़ा रहता) है~ परमात्मा के सेवक बन नहीं सकते। 1। (हे भाई !) वह कौन सा तरीका है जिससे मनुष्य परमात्मा के गुण गा सकता है? वह कौन सा शिक्षा मति है जिससे मनुष्य इस माया (के प्रभाव) से पार लांघ सकता है?। 1। रहाउ। जो काम इसकी भलाई (का) है उसे बुरा समझता है। जो कोई इसे सच कहे~ वह इसे जहर जैसा लगता है। ये नहीं समझता कि कौन सा काम जीवन-बाजी की जीत के लिए है और कौन सा हार के वास्ते। माया के आँगन में संसार का ये बरतण व्यवहार है । 2। जो जहर है उसे माया ग्रसित मनुष्य (खुशी से) पीता है। परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला है~ इसे मनुष्य कड़वा जानता है। (माया ग्रसित मनुष्य) साध-संगति के नजदीक नहीं फटकता~ (इस तरह) चौरासी लाख जोनियों के चक्कर में भटकता फिरता है। 3। जीव-पंछी इस माया के जाल में ही (परमात्मा ने) बसाए हुए हैं। स्वाद लगा लगा के ये अनेकों रंगों के भोग भोगते रहते हैं। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य पर परमात्मा कृपालु होता है~ पूरे गुरू ने उस मनुष्य के (माया के मोह के) बंधन काट दिए हैं। 4। 13। 82।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤਉ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਮਾਰਗੁ ਪਾਈਐ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਬੰਧਨ ਛੁਟੈ ॥
ਤਉ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹਉਮੈ ਤੁਟੈ ॥੧॥
ਤੁਮ ਲਾਵਹੁ ਤਉ ਲਾਗਹ ਸੇਵ ॥
ਹਮ ਤੇ ਕਛੂ ਨ ਹੋਵੈ ਦੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਗਾਵਾ ਬਾਣੀ ॥
ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਸਚੁ ਵਖਾਣੀ ॥
ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਸਤਿਗੁਰ ਮਇਆ ॥
ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ਦਇਆ ॥੨॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਨਿਰਮਲ ਕਰਮਾ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਸਚੁ ਧਰਮਾ ॥
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਗੁਣ ਤੁਮ ਹੀ ਪਾਸਿ ॥
ਤੂੰ ਸਾਹਿਬੁ ਸੇਵਕ ਅਰਦਾਸਿ ॥੩॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ॥
ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਪਾਵਉ ਸਤਸੰਗਿ ॥
ਨਾਮਿ ਤੇਰੈ ਰਹੈ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ॥
ਇਹੁ ਕਲਿਆਣੁ ਨਾਨਕ ਕਰਿ ਜਾਤਾ ॥੪॥੧੪॥੮੩॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
तउ किरपा ते मारगु पाईऐ ॥
प्रभ किरपा ते नामु धिआईऐ ॥
प्रभ किरपा ते बंधन छुटै ॥
तउ किरपा ते हउमै तुटै ॥१॥
तुम लावहु तउ लागह सेव ॥
हम ते कछू न होवै देव ॥१॥ रहाउ ॥
तुधु भावै ता गावा बाणी ॥
तुधु भावै ता सचु वखाणी ॥
तुधु भावै ता सतिगुर मइआ ॥
सरब सुखा प्रभ तेरी दइआ ॥२॥
जो तुधु भावै सो निरमल करमा ॥
जो तुधु भावै सो सचु धरमा ॥
सरब निधान गुण तुम ही पासि ॥
तूं साहिबु सेवक अरदासि ॥३॥
मनु तनु निरमलु होइ हरि रंगि ॥
सरब सुखा पावउ सतसंगि ॥
नामि तेरै रहै मनु राता ॥
इहु कलिआणु नानक करि जाता ॥४॥१४॥८३॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ (हे प्रभू !) तेरी कृपा से (जीवन का सही) रास्ता मिलता है। (हे भाई !) प्रभू की कृपा से (प्रभू का) नाम सिमरा जा सकता है। (इस तरह) प्रभू की कृपा से माया के बंधनों का जाल टूट जाता है। हे प्रभू ! तेरी कृपा से (हम जीवों का) अहंकार दूर हो जाता है। 1। तूं (खुद ही हमें) सेवा भक्ति में लगाए तो हम लग सकते हैं। हे प्रकाश-रूप प्रभू ! हमसे (जीवों से हमारे अपने प्रयासों से तेरी सेवा भक्ति) कुछ भी नहीं हो सकती। रहाउ। (हे प्रभू !) अगर तुझे ठीक लगे तो मैं तेरी सिफत सालाह की बाणी गा सकता हूँ। तुझे पसंद आए तो मैं तेरा सदा स्थिर रहने वाला नाम उच्चार सकता हूँ। (हे प्रभू !) अगर तुझे ठीक लगे तो (जीवों पर) गुरू की कृपा होती है। हे प्रभू ! सारे सुख तेरी मेहर में ही हैं। 2। हे प्रभू ! जो काम तुझे ठीक लग जाएं वही पवित्र हैं। जो जीवन मर्यादा तुझे पसंद आ जाए वही अटॅल मर्यादा है। हे प्रभू ! सारे गुण सारे खजाने तेरे ही वश में हैं। तू ही मेरा मालिक है~ मुझ सेवक की (तेरे आगे ही) प्रार्थना है। 3। (हे प्रभू !) परमात्मा के प्यार में (टिके रहने से) मन पवित्र हो जाता है~ शरीर पवित्र हो जाता है। साध-संगति में टिके रहने से (मुझे ऐसे प्रतीत होता है कि) मैं सारे सुख तलाश लेता हूँ। हे नानक ! (कह, हे प्रभू ! जिस मनुष्य का) मन तेरे नाम में रंगा जाता है वह इसी को ही श्रेष्ठ आनंद करके समझता है। 4। 14। 83।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਨ ਰਸਾ ਜੇਤੇ ਤੈ ਚਾਖੇ ॥
ਨਿਮਖ ਨ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਤੇਰੀ ਲਾਥੇ ॥
ਹਰਿ ਰਸ ਕਾ ਤੂੰ ਚਾਖਹਿ ਸਾਦੁ ॥
ਚਾਖਤ ਹੋਇ ਰਹਹਿ ਬਿਸਮਾਦੁ ॥੧॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਰਸਨਾ ਪੀਉ ਪਿਆਰੀ ॥
ਇਹ ਰਸ ਰਾਤੀ ਹੋਇ ਤ੍ਰਿਪਤਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹੇ ਜਿਹਵੇ ਤੂੰ ਰਾਮ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥
ਨਿਮਖ ਨਿਮਖ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਧਿਆਉ ॥
ਆਨ ਨ ਸੁਨੀਐ ਕਤਹੂੰ ਜਾਈਐ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਵਡਭਾਗੀ ਪਾਈਐ ॥੨॥
ਆਠ ਪਹਰ ਜਿਹਵੇ ਆਰਾਧਿ ॥ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਠਾਕੁਰ ਆਗਾਧਿ ॥
ਈਹਾ ਊਹਾ ਸਦਾ ਸੁਹੇਲੀ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਤ ਰਸਨ ਅਮੋਲੀ ॥੩॥
ਬਨਸਪਤਿ ਮਉਲੀ ਫਲ ਫੁਲ ਪੇਡੇ ॥
ਇਹ ਰਸ ਰਾਤੀ ਬਹੁਰਿ ਨ ਛੋਡੇ ॥
ਆਨ ਨ ਰਸ ਕਸ ਲਵੈ ਨ ਲਾਈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਭਏ ਹੈ ਸਹਾਈ ॥੪॥੧੫॥੮੪॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
आन रसा जेते तै चाखे ॥
निमख न त्रिसना तेरी लाथे ॥
हरि रस का तूं चाखहि सादु ॥
चाखत होइ रहहि बिसमादु ॥१॥
अंम्रितु रसना पीउ पिआरी ॥
इह रस राती होइ त्रिपतारी ॥१॥ रहाउ ॥
हे जिहवे तूं राम गुण गाउ ॥
निमख निमख हरि हरि हरि धिआउ ॥
आन न सुनीऐ कतहूं जाईऐ ॥
साधसंगति वडभागी पाईऐ ॥२॥
आठ पहर जिहवे आराधि ॥ पारब्रहम ठाकुर आगाधि ॥
ईहा ऊहा सदा सुहेली ॥
हरि गुण गावत रसन अमोली ॥३॥
बनसपति मउली फल फुल पेडे ॥
इह रस राती बहुरि न छोडे ॥
आन न रस कस लवै न लाई ॥
कहु नानक गुर भए है सहाई ॥४॥१५॥८४॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ (हे मेरी जीभ ! परमात्मा के नाम-रस के बिना) और जितने भी रस तू चखती रहती है (उनसे) तेरी तृष्णा एक निमख मात्र भी दूर नहीं होती। अगर तू परमात्मा के नाम-रस का स्वाद चखे~ चखते ही तू मस्त हो जाएगी। 1। हे (मेरी) प्यारी जीभ ! तू आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पी। जो जीभ इस नाम रस में मस्त हो जाती है~ वह (अन्य रसों की तरफ से) संतुष्ट हो जाती है। 1। रहाउ। हे (मेरी) जीभ ! तू परमात्मा के गुण गा। पल पल हर वक्त परमात्मा का नाम सिमर। (अगर दुनिया के रसों की तरफ से संतुष्ट होना है~ तो परमातमा की सिफत सालाह के बिना) अन्य (फीके बोल) नहीं सुनने चाहिए~ (साध-संगति के बिना) और कहीं (विकार पैदा करने वाली जगहों पे) नहीं जाना चाहिए। (पर) साध-संगति बड़े भाग्यों से ही मिलती है। 2। हे (मेरी) जीभ ! आठों पहर आराधना कर (सिमरन कर)- अथाह (गुणों वाले) ठाकुर परमात्मा का (सिमरन करने वाली की जिंदगी) इस लोक में व परलोक में सदा सुखी हो जाती है परमात्मा के गुण गाते हुए जीभ बड़ी कीमती बन जाती है। 3। (ये ठीक है कि परमात्मा की कुदरति में सारी) बनस्पति खिली रहती है~ वृक्ष-पौधों को फूल-फल लगे होते हैं~ पर जिस मनुष्य की जीभ नाम-रस में मस्त है वह (बाहर दिखाई देती सुंदरता को देख के नाम-रस को) कभी नहीं छोड़ता। अन्य किस्म किस्म के रस (परमात्मा के नाम-रस की) बराबरी नहीं कर सकते। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य का सहायक सत्गुरू बनता है~ 4। 15। 84।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਨੁ ਮੰਦਰੁ ਤਨੁ ਸਾਜੀ ਬਾਰਿ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
मनु मंदरु तनु साजी बारि ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ (परमात्मा शाहूकार ने अपने रहने के लिए मनुष्य के) मन को सुंदर घर बनाया हुआ है और मनुष्य के शरीर को (भाव~ ज्ञानेंद्रियों को~ उस घर की रक्षा के लिए) वाड़ बनाया है।

संदर्भ: यह अंग 180 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

New Friends Colony के पाँच-मंज़िला flat की terrace पर रात की हवा।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 56 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 180” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 181 →, पीछे का: ← अंग 179

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।