आधार
परंपरा में उतरने से पहले कुछ नक़्शे, शब्दों के, ढाँचों के, और समय के
आइए, साहब, सीधे गहरे पानी में कूदने से पहले ज़रा किनारे खड़े हों। यहाँ चार नक़्शे रखे हैं और दो चिंतन, जो यह बताते हैं कि यह पूरा कोश है क्या, कैसे बँटा है, और कब का है। एक बार यह खाका मन में बैठ जाए, तो बाक़ी हर पाठ अपनी जगह पहचानने लगता है।
परंपरा में सीधे किसी पाठ से उतरा जा सकता है, पर एक नक़्शा हाथ में हो तो राह आसान रहती है। ये पन्ने वही नक़्शे हैं, शब्दों के, ढाँचों के, और समय के। पहले इन्हें देख लीजिए, फिर बाक़ी पाठ अपनी जगह बैठने लगते हैं।
नींव के चार पन्ने
इन्हीं से जुड़े दो चिंतन
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
इन पन्नों को किस क्रम में पढ़ूँ?
सनातन धर्म और हिन्दू धर्म से शुरू कीजिए, फिर कोश का नक़्शा, और फिर समय में यह कोश। दोनों चिंतन कभी भी पढ़े जा सकते हैं।
क्या इन्हें पढ़े बिना बाक़ी पाठ समझ आएँगे?
हाँ, हर पाठ अपने आप में पूरा है। पर ये नक़्शे यह बता देते हैं कि कोई पाठ किस धारा, किस परत और किस समय का है।
यहाँ का लहजा बाक़ी साइट से अलग क्यों है?
ये पन्ने एक बैठे हुए, क़िस्सागो लहजे में हैं, ताकि सूखे ढाँचे भी कहानी की तरह खुलें। बात वही रहती है, कहने का ढंग थोड़ा गरम।
जो तंत्र में सोचता है, उसके लिए ये चार नक़्शे और दो चिंतन एक ही काम करते हैं, वे हर पाठ के पीछे का ढाँचा सामने रख देते हैं। एक बार ढाँचा दिख जाए, तो हर नया पाठ किसी ख़ाली ख़ाने में नहीं, एक जगह पर आ कर बैठता है।