
देवी माहात्म्य · दुर्गा सप्तशती · चण्डी पाठ
मार्कण्डेय-पुराण से, 13 अध्याय, 700 श्लोक
देवी माहात्म्य, समस्त देवी-परम्परा का आदि-शास्त्र। मार्कण्डेय-पुराण के अध्याय 81 से 93 तक, सात सौ श्लोक, इसी से नाम सप्तशती। तीन चरित्र, मधु-कैटभ, महिषासुर, और शुम्भ-निशुम्भ। बीच में दो स्तुतियाँ जो सबके कण्ठ में बसी हैं, “या देवी सर्व-भूतेषु” और “नारायणि नमो ऽस्तु ते।” शरद-नवरात्र में आज भी घर-घर इसी का पाठ होता है।


ग्रंथ का परिचय
देवी माहात्म्य, जिसे दुर्गा सप्तशती और चण्डी पाठ भी कहते हैं, देवी-उपासना का प्रधान शास्त्र है। मार्कण्डेय ऋषि अपने शिष्य क्रौष्टकि से सावर्णि-मनु के प्राकट्य की कथा कहते हैं, और उसी के भीतर एक और कथा खुलती है। एक राज्य से वंचित राजा सुरथ और अपने ही स्वजनों के हाथों घर से निकाला गया वैश्य समाधि, दोनों वन में मेधा ऋषि के पास पहुँचते हैं और पूछते हैं, सब समझते हुए भी मन इस मोह में क्यों बँधा रहता है। ऋषि का उत्तर एक ही शब्द में है, महामाया। फिर ऋषि उस महामाया के तीन चरित्र सुनाते हैं।
तीन चरित्र इस प्रकार हैं:
- प्रथम चरित्र (अध्याय 1): मधु-कैटभ-वध। विष्णु की योग-निद्रा से देवी का प्रबोधन, और दोनों दैत्यों का संहार।
- मध्यम चरित्र (अध्याय 2 से 4): महिषासुर-वध। समस्त देवों के संचित तेज से देवी का आविर्भाव।
- उत्तर चरित्र (अध्याय 5 से 13): शुम्भ-निशुम्भ-वध। पार्वती के कोश से कौशिकी का प्राकट्य, सप्त-मातृका, ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही और ऐन्द्री, रक्तबीज-वध, चामुण्डा का जन्म, और दो प्रसिद्ध स्तुतियाँ, “या देवी” तथा “नारायणी।”
पाठ का क्रम
पाठ क्रम से ही होता है, क्योंकि हर अध्याय पिछले पर टिका है। एक बैठक में एक अध्याय पर्याप्त है, और सम्पूर्ण ग्रंथ तेरह दिनों में पूरा होता है। शरद-नवरात्र, अर्थात आश्विन-शुक्ल पक्ष, में पाठ का संकल्प हो, तो प्रथम नौ दिनों में अध्याय एक से नौ, दशमी पर दसवाँ, और शेष ग्यारह से तेरह अगले तीन दिनों में पढ़े जाते हैं।
नित्य-पाठ में विशेष रूप से जो श्लोक कहे जाते हैं: 1.1 से 1.3 (मार्कण्डेय-वचन); 4.17 (“दुर्गे स्मृता हरसि भीतिम्”); 5.12 से 5.37 (“या देवी”, पच्चीस श्लोक); 11.7 से 11.22 (“नारायणि नमो ऽस्तु ते”, सोलह श्लोक); तथा 11.51 (“इत्थं यदा यदा बाधा”)।
देवी माहात्म्य, 13 अध्याय
अध्याय 1 · मधु-कैटभ वध
श्लोक 1 से 78 · प्रथम चरित्र
राजा सुरथ और वैश्य समाधि की भेंट। दोनों दुख में हैं, फिर भी जिन्होंने छला उन्हीं पर स्नेह बना हुआ है। मेधा ऋषि का उत्तर, महामाया। फिर वही प्राचीन कथा, कल्पांत में विष्णु की योग-निद्रा, उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ का जन्म, ब्रह्मा की देवी-स्तुति, विष्णु का जागना, और दोनों दैत्यों का वध।
अध्याय 2 · देवी की उत्पत्ति, सेना-संहार
श्लोक 1 से 70 · मध्यम चरित्र (1)
महिषासुर ने इन्द्र का स्थान छीन लिया। देवगण विष्णु और शिव की शरण में जाते हैं। सब देवों के तेज एक पुंज में मिल कर देवी का रूप धरते हैं, और हर देव अपना अस्त्र उन्हें समर्पित करता है। फिर महायुद्ध, और चिक्षुर, चामर, उदग्र तथा करल आदि सेनापतियों का वध।
अध्याय 3 · महिषासुर वध
श्लोक 1 से 44 · मध्यम चरित्र (2)
अब स्वयं महिषासुर महिष-रूप में सामने है। रूप पर रूप बदलता है, सिंह, फिर पुरुष, फिर गज, फिर पुनः महिष। देवी पैर से उसका कण्ठ दबाती हैं, शूल से बेधती हैं, और तलवार से उसका सिर अलग कर देती हैं। यहीं से वे महिषासुर-मर्दिनी कहलाईं।
अध्याय 4 · शक्रादि-स्तुति, वरदान
श्लोक 1 से 38 · मध्यम चरित्र (3)
विजय के पश्चात देवों की दीर्घ स्तुति, “दुर्गे स्मृता हरसि भीतिम्।” प्रसन्न होकर देवी ने वर माँगने को कहा। देवों ने यही माँगा, जब-जब वे स्मरण करें, तब-तब देवी प्रकट हों। देवी ने तथास्तु कह कर अन्तर्धान कर लिया।
अध्याय 5 · “या देवी” स्तुति, शुम्भ का दूत
श्लोक 1 से 79 · उत्तर चरित्र (1)
शुम्भ और निशुम्भ ने इन्द्र का स्थान हर लिया। देव हिमालय में जाकर देवी की स्तुति करते हैं, वही प्रसिद्ध “या देवी सर्व-भूतेषु”, पच्चीस बार, हर बार देवी का एक रूप, विष्णु-माया, चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षांति, जाति, लज्जा, शांति, श्रद्धा, कांति, लक्ष्मी, धृति, वृत्ति, स्मृति, दया, तुष्टि, मातृ, भ्रांति, और अन्त में चिति। फिर पार्वती के स्नान से कौशिकी, श्याम-वर्ण कालिका, और शुम्भ का भेजा हुआ दूत।
अध्याय 6 · धूम्र-लोचन वध
श्लोक 1 से 19 · उत्तर चरित्र (2)
शुम्भ ने धूम्र-लोचन को साठ हज़ार सेना के साथ भेजा। देवी ने केवल एक हुंकार से उसे भस्म कर दिया। फिर देवी के सिंह ने सारी सेना का संहार किया।
अध्याय 7 · चण्ड-मुण्ड वध, चामुण्डा का जन्म
श्लोक 1 से 26 · उत्तर चरित्र (3)
चण्ड और मुण्ड चतुरंगिणी सेना लेकर आते हैं। देवी कुपित होती हैं, और उनके ललाट से कराल-वदना काली प्रकट होती हैं। काली पूरी सेना को निगल जाती हैं और चण्ड तथा मुण्ड के कटे सिर देवी को सौंपती हैं। देवी उन्हें नाम देती हैं, चामुण्डा।
अध्याय 8 · रक्त-बीज वध, सप्त-मातृका
श्लोक 1 से 63 · उत्तर चरित्र (4)
शुम्भ ने सम्पूर्ण असुर-सेना उठाई। देवों के शरीर से उनकी शक्तियाँ निकलती हैं, ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐन्द्री, और शिव-दूती। फिर रक्त-बीज, जिसके रक्त की हर बूँद से एक नया असुर खड़ा हो जाता था। काली ने उसका रक्त भूमि पर गिरने से पहले ही पी कर उसका वध किया।
अध्याय 9 · निशुम्भ वध
श्लोक 1 से 40 · उत्तर चरित्र (5)
अब निशुम्भ स्वयं युद्ध में है, दस हज़ार भुजाओं से प्रहार करता हुआ। उसका हर हथियार टूटता जाता है। देवी वेग से शूल उसके हृदय में बेध देती हैं। तब उसके भीतर से एक और निशुम्भ निकलने लगता है, और देवी उसका भी सिर काट देती हैं।
अध्याय 10 · शुम्भ वध
श्लोक 1 से 30 · उत्तर चरित्र (6)
शुम्भ का ताना, कि देवी तो दूसरों के बल पर लड़ रही हैं। देवी समस्त मातृ-शक्तियों को अपने में लीन कर लेती हैं और कहती हैं, मैं अकेली ही हूँ। फिर अद्भुत द्वंद्व, आकाश तक उठता मुष्टि-युद्ध। अन्त में शूल से शुम्भ का वक्ष भिद जाता है और वह गिरता है।
अध्याय 11 · नारायणी स्तुति
श्लोक 1 से 55 · उत्तर चरित्र (7)
देवों की हृदय-स्पर्शी स्तुति, जिसमें हर श्लोक “नारायणि नमो ऽस्तु ते” पर ठहरता है, सोलह बार। फिर देवी का वर, जब-जब बाधा आएगी, तब-तब वे प्रकट होंगी। और भविष्य के अवतारों का संकेत, योगमाया (नन्द-गोप के घर), रक्त-दन्तिका, शाकम्भरी, भीमा, और भ्रामरी।
अध्याय 12 · फल-श्रुति
श्लोक 1 से 41 · उत्तर चरित्र (8)
स्वयं देवी कहती हैं कि जो इस माहात्म्य को पढ़े और सुने, उसे क्या फल मिलता है। अग्नि, जल, शस्त्र, समुद्र की आँधी, सिंह, राजा का कोप, बन्धन, हर संकट में रक्षा। साथ ही वार्षिक शरत्-पूजा का माहात्म्य।
अध्याय 13 · सुरथ और वैश्य को वर
श्लोक 1 से 17 · समापन
राजा सुरथ और वैश्य समाधि तीन वर्ष तप करते हैं। देवी प्रत्यक्ष होकर दोनों को वर देती हैं। सुरथ अगले मन्वन्तर में सावर्णि मनु होंगे, और वैश्य को वही ज्ञान मिलता है जिसकी उसे चाह थी।
पाठक के लिए
देवी माहात्म्य परम्परा से दुर्गा-पूजा का हृदय रहा है। इस संस्करण में हर श्लोक देवनागरी में ज्यों का त्यों दिया गया है, मार्कण्डेय-पुराण के मानक संस्करण से, साथ में रोमन लिप्यन्तरण और सरल भाषा में अर्थ तथा भावार्थ। दोनों प्रसिद्ध स्तुतियाँ, अध्याय 5 की “या देवी” (पच्चीस श्लोक) और अध्याय 11 की “नारायणी” (सोलह श्लोक), पूरी हैं, हर श्लोक अलग।
जिन्हें केवल शुद्ध संस्कृत-व्याख्या अभीष्ट हो, वे स्वामी जगदीश्वरानन्द का “देवी माहात्म्य” (अद्वैत आश्रम) अथवा स्वामी चिन्मयानन्द का संस्करण देख सकते हैं।
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