अंग
276
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਈ ਕੋਟਿ ਦੇਵ ਦਾਨਵ ਇੰਦ੍ਰ ਸਿਰਿ ਛਤ੍ਰ ॥
ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਅਪਨੈ ਸੂਤਿ ਧਾਰੈ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਤਿਸੁ ਨਿਸਤਾਰੈ ॥੩॥
ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਅਪਨੈ ਸੂਤਿ ਧਾਰੈ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਤਿਸੁ ਨਿਸਤਾਰੈ ॥੩॥
कई कोटि देव दानव इंद्र सिरि छत्र ॥
सगल समग्री अपनै सूति धारै ॥
नानक जिसु जिसु भावै तिसु तिसु निसतारै ॥३॥
सगल समग्री अपनै सूति धारै ॥
नानक जिसु जिसु भावै तिसु तिसु निसतारै ॥३॥
हिन्दी अर्थ: करोड़ों देवते और इंद्र हैं जिनके सिर पर छत्र हैं। (इन) सारे (जीव-जंतुओं और) पदार्थों को (प्रभू ने) अपने (हुकम के) सूत्र में परोया हुआ है। हे नानक ! जो जो उसे भाता है। उस उसको (प्रभू) तार लेता है। 3।
ਕਈ ਕੋਟਿ ਰਾਜਸ ਤਾਮਸ ਸਾਤਕ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਅਰੁ ਸਾਸਤ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਕੀਏ ਰਤਨ ਸਮੁਦ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਨਾਨਾ ਪ੍ਰਕਾਰ ਜੰਤ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਕੀਏ ਚਿਰ ਜੀਵੇ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਗਿਰੀ ਮੇਰ ਸੁਵਰਨ ਥੀਵੇ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਜਖੵ ਕਿੰਨਰ ਪਿਸਾਚ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਭੂਤ ਪ੍ਰੇਤ ਸੂਕਰ ਮ੍ਰਿਗਾਚ ॥
ਸਭ ਤੇ ਨੇਰੈ ਸਭਹੂ ਤੇ ਦੂਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪਿ ਅਲਿਪਤੁ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥੪॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਅਰੁ ਸਾਸਤ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਕੀਏ ਰਤਨ ਸਮੁਦ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਨਾਨਾ ਪ੍ਰਕਾਰ ਜੰਤ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਕੀਏ ਚਿਰ ਜੀਵੇ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਗਿਰੀ ਮੇਰ ਸੁਵਰਨ ਥੀਵੇ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਜਖੵ ਕਿੰਨਰ ਪਿਸਾਚ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਭੂਤ ਪ੍ਰੇਤ ਸੂਕਰ ਮ੍ਰਿਗਾਚ ॥
ਸਭ ਤੇ ਨੇਰੈ ਸਭਹੂ ਤੇ ਦੂਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪਿ ਅਲਿਪਤੁ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥੪॥
कई कोटि राजस तामस सातक ॥
कई कोटि बेद पुरान सिम्रिति अरु सासत ॥
कई कोटि कीए रतन समुद ॥
कई कोटि नाना प्रकार जंत ॥
कई कोटि कीए चिर जीवे ॥
कई कोटि गिरी मेर सुवरन थीवे ॥
कई कोटि जखॵ किंनर पिसाच ॥
कई कोटि भूत प्रेत सूकर म्रिगाच ॥
सभ ते नेरै सभहू ते दूरि ॥
नानक आपि अलिपतु रहिआ भरपूरि ॥४॥
कई कोटि बेद पुरान सिम्रिति अरु सासत ॥
कई कोटि कीए रतन समुद ॥
कई कोटि नाना प्रकार जंत ॥
कई कोटि कीए चिर जीवे ॥
कई कोटि गिरी मेर सुवरन थीवे ॥
कई कोटि जखॵ किंनर पिसाच ॥
कई कोटि भूत प्रेत सूकर म्रिगाच ॥
सभ ते नेरै सभहू ते दूरि ॥
नानक आपि अलिपतु रहिआ भरपूरि ॥४॥
हिन्दी अर्थ: करोड़ों जीव (माया के तीनों गुणों) रजो तमों और सतो में हैं। करोड़ों (बंदे) वेद पुरान स्मृतियों व शास्त्रों (के पढ़ने वाले) हैं। समुंद्र में करोड़ों रत्न पैदा कर दिए हैं और कई किस्म के जीव जंतु बना दिए हैं। करोड़ों जीव लंबी उम्र (दीर्घायु) वाले पैदा किए हैं। करोड़ों ही सोने के सुमेर पर्वत बन गए हैं। करोड़ों ही यक्ष किन्नर व पिशाच हैं और करोड़ों ही भूत, प्रेत, सूअर व शेर हैं। (प्रभू) इन सबके नजदीक भी है और दूर भी। हे नानक ! प्रभू हर जगह व्यापक भी है और है भी निर्लिप। 4।
ਕਈ ਕੋਟਿ ਪਾਤਾਲ ਕੇ ਵਾਸੀ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਨਿਵਾਸੀ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਜਨਮਹਿ ਜੀਵਹਿ ਮਰਹਿ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਬਹੁ ਜੋਨੀ ਫਿਰਹਿ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਬੈਠਤ ਹੀ ਖਾਹਿ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਘਾਲਹਿ ਥਕਿ ਪਾਹਿ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਕੀਏ ਧਨਵੰਤ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਚਿੰਤ ॥
ਜਹ ਜਹ ਭਾਣਾ ਤਹ ਤਹ ਰਾਖੇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਹਾਥੇ ॥੫॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਨਿਵਾਸੀ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਜਨਮਹਿ ਜੀਵਹਿ ਮਰਹਿ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਬਹੁ ਜੋਨੀ ਫਿਰਹਿ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਬੈਠਤ ਹੀ ਖਾਹਿ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਘਾਲਹਿ ਥਕਿ ਪਾਹਿ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਕੀਏ ਧਨਵੰਤ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਚਿੰਤ ॥
ਜਹ ਜਹ ਭਾਣਾ ਤਹ ਤਹ ਰਾਖੇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਹਾਥੇ ॥੫॥
कई कोटि पाताल के वासी ॥
कई कोटि नरक सुरग निवासी ॥
कई कोटि जनमहि जीवहि मरहि ॥
कई कोटि बहु जोनी फिरहि ॥
कई कोटि बैठत ही खाहि ॥
कई कोटि घालहि थकि पाहि ॥
कई कोटि कीए धनवंत ॥
कई कोटि माइआ महि चिंत ॥
जह जह भाणा तह तह राखे ॥
नानक सभु किछु प्रभ कै हाथे ॥५॥
कई कोटि नरक सुरग निवासी ॥
कई कोटि जनमहि जीवहि मरहि ॥
कई कोटि बहु जोनी फिरहि ॥
कई कोटि बैठत ही खाहि ॥
कई कोटि घालहि थकि पाहि ॥
कई कोटि कीए धनवंत ॥
कई कोटि माइआ महि चिंत ॥
जह जह भाणा तह तह राखे ॥
नानक सभु किछु प्रभ कै हाथे ॥५॥
हिन्दी अर्थ: करोड़ों जीव पाताल में बसने वाले हैं और करोड़ों ही नर्कों व स्वर्गों में बसते हें (भाव। दुखी व सुखी हैं)। करोड़ों जीव पैदा होते हैं मरते है और करोड़ों जीव कई जूनियों में भटक रहे हैं। करोड़ों जीव बैठे ही खाते हैं और करोड़ों (ऐसे हैं जो रोटी की खातिर) मेहनत करते हैं और थक टूट जाते हैं। करोड़ों जीव (प्रभू ने) धन वान बनाए हैं और करोड़ों (ऐसे हैं जिन्हें) माया की चिंता लगी हुई है। जहाँ जहाँ चाहता है जीवों को वहीं वहीं ही रखता है। हे नानक ! हरेक बात प्रभू के अपने हाथ में है। 5।
ਕਈ ਕੋਟਿ ਭਏ ਬੈਰਾਗੀ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਸੰਗਿ ਤਿਨਿ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਖੋਜੰਤੇ ॥
ਆਤਮ ਮਹਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਲਹੰਤੇ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਦਰਸਨ ਪ੍ਰਭ ਪਿਆਸ ॥
ਤਿਨ ਕਉ ਮਿਲਿਓ ਪ੍ਰਭੁ ਅਬਿਨਾਸ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਮਾਗਹਿ ਸਤਸੰਗੁ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਤਿਨ ਲਾਗਾ ਰੰਗੁ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਹੋਏ ਆਪਿ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇ ਜਨ ਸਦਾ ਧਨਿ ਧੰਨਿ ॥੬॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਸੰਗਿ ਤਿਨਿ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਖੋਜੰਤੇ ॥
ਆਤਮ ਮਹਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਲਹੰਤੇ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਦਰਸਨ ਪ੍ਰਭ ਪਿਆਸ ॥
ਤਿਨ ਕਉ ਮਿਲਿਓ ਪ੍ਰਭੁ ਅਬਿਨਾਸ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਮਾਗਹਿ ਸਤਸੰਗੁ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਤਿਨ ਲਾਗਾ ਰੰਗੁ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਹੋਏ ਆਪਿ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇ ਜਨ ਸਦਾ ਧਨਿ ਧੰਨਿ ॥੬॥
कई कोटि भए बैरागी ॥
राम नाम संगि तिनि लिव लागी ॥
कई कोटि प्रभ कउ खोजंते ॥
आतम महि पारब्रहमु लहंते ॥
कई कोटि दरसन प्रभ पिआस ॥
तिन कउ मिलिओ प्रभु अबिनास ॥
कई कोटि मागहि सतसंगु ॥
पारब्रहम तिन लागा रंगु ॥
जिन कउ होए आपि सुप्रसंन ॥
नानक ते जन सदा धनि धंनि ॥६॥
राम नाम संगि तिनि लिव लागी ॥
कई कोटि प्रभ कउ खोजंते ॥
आतम महि पारब्रहमु लहंते ॥
कई कोटि दरसन प्रभ पिआस ॥
तिन कउ मिलिओ प्रभु अबिनास ॥
कई कोटि मागहि सतसंगु ॥
पारब्रहम तिन लागा रंगु ॥
जिन कउ होए आपि सुप्रसंन ॥
नानक ते जन सदा धनि धंनि ॥६॥
हिन्दी अर्थ: (इस रचना में) करोड़ों जीव वैरागी हैं। जिनकी सुरति अकाल-पुरख के नाम के साथ लगी रहती है। करोड़ों लोग प्रभू को खोजते हैं। अपने अंदर अकाल-पुरख को तलाशते हैं। करोड़ों जीवों को प्रभू के दीदार की तमन्ना लगी रहती है। उन्हें अविनाशी प्रभू मिल जाता है। करोड़ों मनुष्य सत्संग मांगते हैं। उन्हें अकाल-पुरख से इश्क रहता है। जिनपे प्रभू स्वयं मेहरवान होता है। हे नानक ! वे मनुष्य सदा भाग्यशाली हैं। 6।
ਕਈ ਕੋਟਿ ਖਾਣੀ ਅਰੁ ਖੰਡ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਅਕਾਸ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਹੋਏ ਅਵਤਾਰ ॥
ਕਈ ਜੁਗਤਿ ਕੀਨੋ ਬਿਸਥਾਰ ॥
ਕਈ ਬਾਰ ਪਸਰਿਓ ਪਾਸਾਰ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਇਕੁ ਏਕੰਕਾਰ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਕੀਨੇ ਬਹੁ ਭਾਤਿ ॥
ਪ੍ਰਭ ਤੇ ਹੋਏ ਪ੍ਰਭ ਮਾਹਿ ਸਮਾਤਿ ॥
ਤਾ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਨੈ ਕੋਇ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੭॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਅਕਾਸ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਹੋਏ ਅਵਤਾਰ ॥
ਕਈ ਜੁਗਤਿ ਕੀਨੋ ਬਿਸਥਾਰ ॥
ਕਈ ਬਾਰ ਪਸਰਿਓ ਪਾਸਾਰ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਇਕੁ ਏਕੰਕਾਰ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਕੀਨੇ ਬਹੁ ਭਾਤਿ ॥
ਪ੍ਰਭ ਤੇ ਹੋਏ ਪ੍ਰਭ ਮਾਹਿ ਸਮਾਤਿ ॥
ਤਾ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਨੈ ਕੋਇ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੭॥
कई कोटि खाणी अरु खंड ॥
कई कोटि अकास ब्रहमंड ॥
कई कोटि होए अवतार ॥
कई जुगति कीनो बिसथार ॥
कई बार पसरिओ पासार ॥
सदा सदा इकु एकंकार ॥
कई कोटि कीने बहु भाति ॥
प्रभ ते होए प्रभ माहि समाति ॥
ता का अंतु न जानै कोइ ॥
आपे आपि नानक प्रभु सोइ ॥७॥
कई कोटि अकास ब्रहमंड ॥
कई कोटि होए अवतार ॥
कई जुगति कीनो बिसथार ॥
कई बार पसरिओ पासार ॥
सदा सदा इकु एकंकार ॥
कई कोटि कीने बहु भाति ॥
प्रभ ते होए प्रभ माहि समाति ॥
ता का अंतु न जानै कोइ ॥
आपे आपि नानक प्रभु सोइ ॥७॥
हिन्दी अर्थ: (धरती के नौ) खण्डों (चारों) खाणियों के द्वारा करोड़ों ही जीव उत्पन्न हुए हैं। सारे आकाशों ब्रहमण्डों में करोड़ों ही जीव हैं। करोड़ों ही प्राणी पैदा हो रहे हैं। कई तरीकों से प्रभू ने जगत की रचना की है। (प्रभू ने) कई बार जगत रचना की है; (दुबारा इसे समेट के) सदा एक स्वयं ही हो जाता है। प्रभू ने कई किस्मों के करोड़ों ही जीव पैदा किए हुए हैं। जो प्रभू से पैदा हो के फिर प्रभू में ही लीन हो जाते हैं। उस प्रभू का अंत कोई भी नहीं जानता; (क्योंकि) हे नानक ! वह प्रभू (अपने जैसा) स्वयं ही है। 7।
ਕਈ ਕੋਟਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੇ ਦਾਸ ॥
ਤਿਨ ਹੋਵਤ ਆਤਮ ਪਰਗਾਸ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਤਤ ਕੇ ਬੇਤੇ ॥
ਸਦਾ ਨਿਹਾਰਹਿ ਏਕੋ ਨੇਤ੍ਰੇ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਨਾਮ ਰਸੁ ਪੀਵਹਿ ॥
ਅਮਰ ਭਏ ਸਦ ਸਦ ਹੀ ਜੀਵਹਿ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਨਾਮ ਗੁਨ ਗਾਵਹਿ ॥
ਆਤਮ ਰਸਿ ਸੁਖਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਹਿ ॥
ਅਪੁਨੇ ਜਨ ਕਉ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਮਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਓਇ ਪਰਮੇਸੁਰ ਕੇ ਪਿਆਰੇ ॥੮॥੧੦॥
ਤਿਨ ਹੋਵਤ ਆਤਮ ਪਰਗਾਸ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਤਤ ਕੇ ਬੇਤੇ ॥
ਸਦਾ ਨਿਹਾਰਹਿ ਏਕੋ ਨੇਤ੍ਰੇ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਨਾਮ ਰਸੁ ਪੀਵਹਿ ॥
ਅਮਰ ਭਏ ਸਦ ਸਦ ਹੀ ਜੀਵਹਿ ॥
ਕਈ ਕੋਟਿ ਨਾਮ ਗੁਨ ਗਾਵਹਿ ॥
ਆਤਮ ਰਸਿ ਸੁਖਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਹਿ ॥
ਅਪੁਨੇ ਜਨ ਕਉ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਮਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਓਇ ਪਰਮੇਸੁਰ ਕੇ ਪਿਆਰੇ ॥੮॥੧੦॥
कई कोटि पारब्रहम के दास ॥
तिन होवत आतम परगास ॥
कई कोटि तत के बेते ॥
सदा निहारहि एको नेत्रे ॥
कई कोटि नाम रसु पीवहि ॥
अमर भए सद सद ही जीवहि ॥
कई कोटि नाम गुन गावहि ॥
आतम रसि सुखि सहजि समावहि ॥
अपुने जन कउ सासि सासि समारे ॥
नानक ओइ परमेसुर के पिआरे ॥८॥१०॥
तिन होवत आतम परगास ॥
कई कोटि तत के बेते ॥
सदा निहारहि एको नेत्रे ॥
कई कोटि नाम रसु पीवहि ॥
अमर भए सद सद ही जीवहि ॥
कई कोटि नाम गुन गावहि ॥
आतम रसि सुखि सहजि समावहि ॥
अपुने जन कउ सासि सासि समारे ॥
नानक ओइ परमेसुर के पिआरे ॥८॥१०॥
हिन्दी अर्थ: (इस जगत रचना में) करोड़ों जीव प्रभू के सेवक (भगत) हैं। उनके आतम में (प्रभू का) प्रकाश हो जाता है। करोड़ों जीव (जगत की) अस्लियत (अकाल-पुरख) के महरम हैं जो सदा एक प्रभू को आँखों से (हर जगह) देखते हैं। करोड़ों लोग प्रभू नाम का आनंद लेते हैं। वे जनम मरन से रहित हो के सदा ही जीते रहते हैं करोड़ों मनुष्य प्रभू नाम के गुण गाते हैं। वे आत्मिक आनंद में सुख में व अडोल अवस्था में टिके रहते हैं। प्रभू अपने भक्तों को हर दम याद रखता है। (क्योंकि) हे नानक ! वह भगत प्रभू के प्यारे होते हैं। 8। 10।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਪ੍ਰਭੁ ਏਕੁ ਹੈ ਦੂਸਰ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਸੋਇ ॥੧॥
ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਪ੍ਰਭੁ ਏਕੁ ਹੈ ਦੂਸਰ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਸੋਇ ॥੧॥
सलोकु ॥
करण कारण प्रभु एकु है दूसर नाही कोइ ॥
नानक तिसु बलिहारणै जलि थलि महीअलि सोइ ॥१॥
करण कारण प्रभु एकु है दूसर नाही कोइ ॥
नानक तिसु बलिहारणै जलि थलि महीअलि सोइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ (इस सारे) जगत का (मूल-) कारण (भाव- बनाने वाला) एक अकाल-पुरख ही है, कोई दूसरा नहीं। हे नानक ! (मैं) उस प्रभू से सदके (हूँ), जो जल में थल में और धरती के तल पर (भाव। आकाश में मौजूद है)। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਕਰਨੈ ਜੋਗੁ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਹੋਗੁ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਨਹਾਰਾ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਕਰਨੈ ਜੋਗੁ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਹੋਗੁ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਨਹਾਰਾ ॥
असटपदी ॥
करन करावन करनै जोगु ॥
जो तिसु भावै सोई होगु ॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
करन करावन करनै जोगु ॥
जो तिसु भावै सोई होगु ॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। प्रभू (सब कुछ) करने की स्मर्था रखता है। और (जीवों को) काम करने के लिए प्रेरित करने के स्मर्थ भी है। वही कुछ होता है जो कुछ उसे अच्छा लगता है। आँख की झपक में जगत को पैदा करके नाश भी करने वाला है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 276 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Chittaranjan Park के Bengali-दुर्गा-puja के बीच पंडाल में किसी quiet pause में।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 60 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 276” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 277 →, पीछे का: ← अंग 275।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।