अंग 212

अंग
212
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਾ ਕਉ ਬਿਸਰੈ ਰਾਮ ਨਾਮ ਤਾਹੂ ਕਉ ਪੀਰ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਰਵਹਿ ਸੇ ਗੁਣੀ ਗਹੀਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕਉ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਿਦੈ ਬੁਧਿ ॥
ਤਾ ਕੈ ਕਰ ਤਲ ਨਵ ਨਿਧਿ ਸਿਧਿ ॥੧॥
ਜੋ ਜਾਨਹਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਧਨੀ ॥
ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ਤਾ ਕੈ ਕਮੀ ॥੨॥
ਕਰਣੈਹਾਰੁ ਪਛਾਨਿਆ ॥
ਸਰਬ ਸੂਖ ਰੰਗ ਮਾਣਿਆ ॥੩॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਜਾ ਕੈ ਗ੍ਰਿਹਿ ਵਸੈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਸੰਗਿ ਦੁਖੁ ਨਸੈ ॥੪॥੯॥੧੪੭॥
गउड़ी महला ५ ॥
जा कउ बिसरै राम नाम ताहू कउ पीर ॥
साधसंगति मिलि हरि रवहि से गुणी गहीर ॥१॥ रहाउ ॥
जा कउ गुरमुखि रिदै बुधि ॥
ता कै कर तल नव निधि सिधि ॥१॥
जो जानहि हरि प्रभ धनी ॥
किछु नाही ता कै कमी ॥२॥
करणैहारु पछानिआ ॥
सरब सूख रंग माणिआ ॥३॥
हरि धनु जा कै ग्रिहि वसै ॥
कहु नानक तिन संगि दुखु नसै ॥४॥९॥१४७॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम भूल जाता है उसे ही दुख आ घेरता है। जो मनुष्य साध-संगति में बैठ के परमात्मा का नाम सिमरते हैं~ वह गुणों के मालिक बन जाते हैं~ वह गहरे जिगरे वाले बन जाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर जिस मनुष्य के हृदय में (सिमरन की) सूझ पैदा हो जाती है~ उस मनुष्य के हाथों की तलियों पर नौ खजाने और सारी सिद्धियां (आ टिकती हैं)। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य (सब खजानों के) मालिक हरी प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं~ उनके घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं रहती। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने सिरजनहार करतार के साथ मेल-जोल बना लिया~ वह आत्मिक सुख और आनंद भोगता है। 3। हे नानक ! कह, जिन मनुष्यों के हृदय-घर में परमात्मा का नाम धन आ बसता है~ उनकी संगति में रहने से हर किस्म के दुख दूर हो जाते हैं। 4। 9। 147।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗਰਬੁ ਬਡੋ ਮੂਲੁ ਇਤਨੋ ॥
ਰਹਨੁ ਨਹੀ ਗਹੁ ਕਿਤਨੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬੇਬਰਜਤ ਬੇਦ ਸੰਤਨਾ ਉਆਹੂ ਸਿਉ ਰੇ ਹਿਤਨੋ ॥
ਹਾਰ ਜੂਆਰ ਜੂਆ ਬਿਧੇ ਇੰਦ੍ਰੀ ਵਸਿ ਲੈ ਜਿਤਨੋ ॥੧॥
ਹਰਨ ਭਰਨ ਸੰਪੂਰਨਾ ਚਰਨ ਕਮਲ ਰੰਗਿ ਰਿਤਨੋ ॥
ਨਾਨਕ ਉਧਰੇ ਸਾਧਸੰਗਿ ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਮੈ ਦਿਤਨੋ ॥੨॥੧੦॥੧੪੮॥
गउड़ी महला ५ ॥
गरबु बडो मूलु इतनो ॥
रहनु नही गहु कितनो ॥१॥ रहाउ ॥
बेबरजत बेद संतना उआहू सिउ रे हितनो ॥
हार जूआर जूआ बिधे इंद्री वसि लै जितनो ॥१॥
हरन भरन संपूरना चरन कमल रंगि रितनो ॥
नानक उधरे साधसंगि किरपा निधि मै दितनो ॥२॥१०॥१४८॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे जीव ! तुझे (अपने आप का) अहंकार तो बहुत है~ पर (इस अहंकार का) मूल (मेरा अपना विक्त) थोड़ा सा ही है। (इस संसार में तेरा सदा के लिए) ठिकाना नहीं है~ पर तेरी माया के वास्ते कशिश बहुत ज्यादा है। 1। रहाउ। हे जीव ! (जिस माया के मोह से) वेद आदिक धार्मिक पुस्तकें विवर्जित (रोकती) करती हैं~ उससे तेरा प्यार बना रहता है। तू जीवन बाजी हार रहा है जैसे जूए में जुआरी हारता है। इंद्रियों (काम वासना आदि) ने अपने वश में ले कर तुझे जीता हुआ है। 1। हे जीव ! सब जीवों के नाश करने वाले और पालने वाले परमात्मा के सुंदर चरणों के प्रेम में (टिकने) से तू वंचित है। हे नानक ! (कह, जो मनुष्य) साध-संगति में (जुड़ते हैं वह माया के मोह से) बच जाते हैं। कृपा के खजाने परमात्मा ने (अपनी कृपा करके) मुझे (नानक को अपने चरणों के प्यार की दाति) दी है। 2। 10। 148।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੋਹਿ ਦਾਸਰੋ ਠਾਕੁਰ ਕੋ ॥
ਧਾਨੁ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਖਾਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਐਸੋ ਹੈ ਰੇ ਖਸਮੁ ਹਮਾਰਾ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰਣਹਾਰਾ ॥੧॥
ਕਾਮੁ ਕਰੀ ਜੇ ਠਾਕੁਰ ਭਾਵਾ ॥
ਗੀਤ ਚਰਿਤ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਵਾ ॥੨॥
ਸਰਣਿ ਪਰਿਓ ਠਾਕੁਰ ਵਜੀਰਾ ॥
ਤਿਨਾ ਦੇਖਿ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਧੀਰਾ ॥੩॥
ਏਕ ਟੇਕ ਏਕੋ ਆਧਾਰਾ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਕੀ ਲਾਗਾ ਕਾਰਾ ॥੪॥੧੧॥੧੪੯॥
गउड़ी महला ५ ॥
मोहि दासरो ठाकुर को ॥
धानु प्रभ का खाना ॥१॥ रहाउ ॥
ऐसो है रे खसमु हमारा ॥
खिन महि साजि सवारणहारा ॥१॥
कामु करी जे ठाकुर भावा ॥
गीत चरित प्रभ के गुन गावा ॥२॥
सरणि परिओ ठाकुर वजीरा ॥
तिना देखि मेरा मनु धीरा ॥३॥
एक टेक एको आधारा ॥
जन नानक हरि की लागा कारा ॥४॥११॥१४९॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ पालनहार प्रभू का मैं एक निमाणा सा सेवक हूँ~ मैं उसी प्रभू का दिया हुआ अन्न ही खाता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! मेरा पति प्रभू ऐसा है कि एक छिन में रचना रच के उसे सुंदर बनाने की स्मर्था रखता है। 1। (हे भाई !मैं ठाकुर प्रभू का दिया हुआ खाता हूँ) अगर उस ठाकुर प्रभू की किरपा मुझ पर हो~ तो मैं (उस का ही) काम करूँ~ उसके गुण गाता रहूँ~ उसी के सिफत सालाह के गीत गुनगुनाता रहूँ। 2। (हे भाई !) मैं उस ठाकुर प्रभू के वजीरों (संत जनों) की शरण आ पड़ा हूँ~ उनका दर्शन करके मेरे मन को भी हौसला बन रहा है (कि मैं उस मालिक की सिफत सालाह कर सकूँगां)। 3। हे दास नानक ! (कह, ठाकुर के वजीरों की शरण पड़ कर) मैंने एक परमात्मा को ही (अपने जीवन का) ओट-आसरा बनाया है~ और परमातमा (की सिफत सालाह) के काम में लगा हुआ हूँ। 4। 11। 149।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹੈ ਕੋਈ ਐਸਾ ਹਉਮੈ ਤੋਰੈ ॥
ਇਸੁ ਮੀਠੀ ਤੇ ਇਹੁ ਮਨੁ ਹੋਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਗਿਆਨੀ ਮਾਨੁਖੁ ਭਇਆ ਜੋ ਨਾਹੀ ਸੋ ਲੋਰੈ ॥
ਰੈਣਿ ਅੰਧਾਰੀ ਕਾਰੀਆ ਕਵਨ ਜੁਗਤਿ ਜਿਤੁ ਭੋਰੈ ॥੧॥
ਭ੍ਰਮਤੋ ਭ੍ਰਮਤੋ ਹਾਰਿਆ ਅਨਿਕ ਬਿਧੀ ਕਰਿ ਟੋਰੈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕਿਰਪਾ ਭਈ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਨਿਧਿ ਮੋਰੈ ॥੨॥੧੨॥੧੫੦॥
गउड़ी महला ५ ॥
है कोई ऐसा हउमै तोरै ॥
इसु मीठी ते इहु मनु होरै ॥१॥ रहाउ ॥
अगिआनी मानुखु भइआ जो नाही सो लोरै ॥
रैणि अंधारी कारीआ कवन जुगति जितु भोरै ॥१॥
भ्रमतो भ्रमतो हारिआ अनिक बिधी करि टोरै ॥
कहु नानक किरपा भई साधसंगति निधि मोरै ॥२॥१२॥१५०॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) कहीं कोई ऐसा मनुष्य भी मिल जाएगा जो (मेरे) इस मन को इस मीठी (लगने वाली माया के मोह) को रोक सके?। 1। (हे भाई !इस मिठाई के असर में) मनुष्य अपनी अक्ल गवा बैठा है (क्योंकि) जो (सदा साथ निभने वाली) नहीं है उसी को तलाशता फिरता है। (मनुष्य के मन में माया के मोह की) काली अंधियारी रात बनी हुई है। (हे भाई !) वह कौन सा तरीका हो सकता है जिससे (इसके अंदर ज्ञान का) दिन चढ़ जाए?। 1। हे नानक ! कह, (मीठी माया के मोह से मन को रोक सकने वाले की) अनेकों ढंग-तरीकों से तलाश करता-करता और भटकता-भटकता मैं थक गया। (तब प्रभू की मुझ पर) मेहर हुई (अब) साध-संगति ही मेरे वास्ते (उनके सारे गुणों का) खजाना है (जिनकी बरकति से मीठी माया के मोह से मन रुक सकता है)। 2। 12। 150।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਚਿੰਤਾਮਣਿ ਕਰੁਣਾ ਮਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ॥
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਣਿ ਸੁਖ ਭਏ ॥੧॥
ਅਕਾਲ ਪੁਰਖ ਅਗਾਧਿ ਬੋਧ ॥
ਸੁਨਤ ਜਸੋ ਕੋਟਿ ਅਘ ਖਏ ॥੨॥
ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਪ੍ਰਭ ਮਇਆ ਧਾਰਿ ॥ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮ ਲਏ ॥੩॥੧੩॥੧੫੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
चिंतामणि करुणा मए ॥१॥ रहाउ ॥
दीन दइआला पारब्रहम ॥
जा कै सिमरणि सुख भए ॥१॥
अकाल पुरख अगाधि बोध ॥
सुनत जसो कोटि अघ खए ॥२॥
किरपा निधि प्रभ मइआ धारि ॥ नानक हरि हरि नाम लए ॥३॥१३॥१५१॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे तरस-रूप प्रभू ! तू ही ऐसा रत्न है जो सब जीवों की चितवी हुई कामनाएं पूरी करने वाला है। 1। रहाउ। हे पारब्रहम प्रभू ! तू गरीबों पर दया करने वाला है (तू ऐसा है) जिसके सिमरन की बरकति से सारे सुख प्राप्त हो जाते हैं। 1। हे अकाल-पुरख ! तेरे स्वरूप की समझ जीवों की अक्ल से परे है~ तेरी सिफत सालाह सुनने से करोड़ों पाप नाश हो जाते हैं। 2। हे नानक ! (अरदास कर और कह,) हे किरपा के खजाने प्रभू ! जिस मनुष्य पर तू तरस करता है~ वह तेरा हरि नाम सिमरता है। 3। 13।
ਗਉੜੀ ਪੂਰਬੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਸਰਣਿ ਪ੍ਰਭੂ ਸੁਖ ਪਾਏ ॥
ਜਾ ਦਿਨਿ ਬਿਸਰੈ ਪ੍ਰਾਨ ਸੁਖਦਾਤਾ ਸੋ ਦਿਨੁ ਜਾਤ ਅਜਾਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਏਕ ਰੈਣ ਕੇ ਪਾਹੁਨ ਤੁਮ ਆਏ ਬਹੁ ਜੁਗ ਆਸ ਬਧਾਏ ॥
ਗ੍ਰਿਹ ਮੰਦਰ ਸੰਪੈ ਜੋ ਦੀਸੈ ਜਿਉ ਤਰਵਰ ਕੀ ਛਾਏ ॥੧॥
ਤਨੁ ਮੇਰਾ ਸੰਪੈ ਸਭ ਮੇਰੀ ਬਾਗ ਮਿਲਖ ਸਭ ਜਾਏ ॥
ਦੇਵਨਹਾਰਾ ਬਿਸਰਿਓ ਠਾਕੁਰੁ ਖਿਨ ਮਹਿ ਹੋਤ ਪਰਾਏ ॥੨॥
गउड़ी पूरबी महला ५ ॥
मेरे मन सरणि प्रभू सुख पाए ॥
जा दिनि बिसरै प्रान सुखदाता सो दिनु जात अजाए ॥१॥ रहाउ ॥
एक रैण के पाहुन तुम आए बहु जुग आस बधाए ॥
ग्रिह मंदर संपै जो दीसै जिउ तरवर की छाए ॥१॥
तनु मेरा संपै सभ मेरी बाग मिलख सभ जाए ॥
देवनहारा बिसरिओ ठाकुरु खिन महि होत पराए ॥२॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे मेरे मन ! जो मनुष्य प्रभू की शरण पड़ता है~ वह आत्मिक आनंद पाता है। जिस दिन जिंद का दाता सुखों का देने वाला (प्रभू) जीव को बिसर जाता है~ (उसका) वह दिन व्यर्थ चला जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) तुम एक रात (कहीं सफर में) गुजारने वाले मेहमान की तरह (जगत में) आए हो पर यहां कई युग जीते रहने की उम्मीदें बाँध रहे हो। (हे भाई !) ये घर-महल~ धन-पदार्थ – जो कुछ दिख रहा है~ ये सभ वृक्ष की छाया की तरह है (सदा साथ नहीं निभाता)। 1। ये शरीर मेरा है~ ये धन-पदार्थ सारा मेरा है~ ये बाग मेरे हैं~ ये जमीनें मेरी हैं~ ये सारे स्थान मेरे हैं, (हे भाई ! इस ममता में फंस के मनुष्य को ये सब कुछ) देने वाला परमात्मा ठाकुर भूल जाता है (और~ ये सारे ही पदार्थ) एक छिन में पराए हो जाते हैं (इस तरह आखिर खाली हाथ चल पड़ता है)। 2।

संदर्भ: यह अंग 212 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Sarojini Nagar की hagling के बीच कोई unexpected calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 50 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 212” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 213 →, पीछे का: ← अंग 211

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।