अंग
306
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਸ ਨੋ ਦਇਆਲੁ ਹੋਵੈ ਮੇਰਾ ਸੁਆਮੀ ਤਿਸੁ ਗੁਰਸਿਖ ਗੁਰੂ ਉਪਦੇਸੁ ਸੁਣਾਵੈ ॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਧੂੜਿ ਮੰਗੈ ਤਿਸੁ ਗੁਰਸਿਖ ਕੀ ਜੋ ਆਪਿ ਜਪੈ ਅਵਰਹ ਨਾਮੁ ਜਪਾਵੈ ॥੨॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਧੂੜਿ ਮੰਗੈ ਤਿਸੁ ਗੁਰਸਿਖ ਕੀ ਜੋ ਆਪਿ ਜਪੈ ਅਵਰਹ ਨਾਮੁ ਜਪਾਵੈ ॥੨॥
जिस नो दइआलु होवै मेरा सुआमी तिसु गुरसिख गुरू उपदेसु सुणावै ॥
जनु नानकु धूड़ि मंगै तिसु गुरसिख की जो आपि जपै अवरह नामु जपावै ॥२॥
जनु नानकु धूड़ि मंगै तिसु गुरसिख की जो आपि जपै अवरह नामु जपावै ॥२॥
हिन्दी अर्थ: जिस पर प्यारा प्रभू दयाल होता है। उस गुरसिख को सतिगुरू शिक्षा देता है। दास नानक (भी) उस गुरसिख की चरणधूड़ मांगता है जो आप नाम जपता है व औरों को जपाता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਸਚੁ ਧਿਆਇਦੇ ਸੇ ਵਿਰਲੇ ਥੋੜੇ ॥
ਜੋ ਮਨਿ ਚਿਤਿ ਇਕੁ ਅਰਾਧਦੇ ਤਿਨ ਕੀ ਬਰਕਤਿ ਖਾਹਿ ਅਸੰਖ ਕਰੋੜੇ ॥
ਤੁਧੁਨੋ ਸਭ ਧਿਆਇਦੀ ਸੇ ਥਾਇ ਪਏ ਜੋ ਸਾਹਿਬ ਲੋੜੇ ॥
ਜੋ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਖਾਦੇ ਪੈਨਦੇ ਸੇ ਮੁਏ ਮਰਿ ਜੰਮੇ ਕੋੜ੍ਹੇ ॥
ਓਇ ਹਾਜਰੁ ਮਿਠਾ ਬੋਲਦੇ ਬਾਹਰਿ ਵਿਸੁ ਕਢਹਿ ਮੁਖਿ ਘੋਲੇ ॥
ਮਨਿ ਖੋਟੇ ਦਯਿ ਵਿਛੋੜੇ ॥੧੧॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਸਚੁ ਧਿਆਇਦੇ ਸੇ ਵਿਰਲੇ ਥੋੜੇ ॥
ਜੋ ਮਨਿ ਚਿਤਿ ਇਕੁ ਅਰਾਧਦੇ ਤਿਨ ਕੀ ਬਰਕਤਿ ਖਾਹਿ ਅਸੰਖ ਕਰੋੜੇ ॥
ਤੁਧੁਨੋ ਸਭ ਧਿਆਇਦੀ ਸੇ ਥਾਇ ਪਏ ਜੋ ਸਾਹਿਬ ਲੋੜੇ ॥
ਜੋ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਖਾਦੇ ਪੈਨਦੇ ਸੇ ਮੁਏ ਮਰਿ ਜੰਮੇ ਕੋੜ੍ਹੇ ॥
ਓਇ ਹਾਜਰੁ ਮਿਠਾ ਬੋਲਦੇ ਬਾਹਰਿ ਵਿਸੁ ਕਢਹਿ ਮੁਖਿ ਘੋਲੇ ॥
ਮਨਿ ਖੋਟੇ ਦਯਿ ਵਿਛੋੜੇ ॥੧੧॥
पउड़ी ॥
जो तुधु सचु धिआइदे से विरले थोड़े ॥
जो मनि चिति इकु अराधदे तिन की बरकति खाहि असंख करोड़े ॥
तुधुनो सभ धिआइदी से थाइ पए जो साहिब लोड़े ॥
जो बिनु सतिगुर सेवे खादे पैनदे से मुए मरि जंमे कोड़्हे ॥
ओइ हाजरु मिठा बोलदे बाहरि विसु कढहि मुखि घोले ॥
मनि खोटे दयि विछोड़े ॥११॥
जो तुधु सचु धिआइदे से विरले थोड़े ॥
जो मनि चिति इकु अराधदे तिन की बरकति खाहि असंख करोड़े ॥
तुधुनो सभ धिआइदी से थाइ पए जो साहिब लोड़े ॥
जो बिनु सतिगुर सेवे खादे पैनदे से मुए मरि जंमे कोड़्हे ॥
ओइ हाजरु मिठा बोलदे बाहरि विसु कढहि मुखि घोले ॥
मनि खोटे दयि विछोड़े ॥११॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे सच्चे प्रभू ! वह बहुत थोड़े जीव हैं। जो (एकाग्रचिक्त हो के) तेरा नाम सिमरते हैं। पूर्ण एकाग्रता में जो मनुष्य ‘एक’ की आराधना करते हैं। उनकी कमाई बेअंत जीव खाते हैं। हे हरी ! (वैसे तो) सारी सृष्टि तेरा ध्यान धरती है। पर परवान वे होते हैं जिनको तू मालिक पसंद करता है। सतिगुरू की सेवा से वंचित रहके जो मनुष्य खाने-पीने और पहनने के रसों में लगे हुए हैं। वे कोहड़ी बार-बार पैदा होते हैं। ऐसे मनुष्य सामने (तो) मीठी बातें करते हैं (पर) पीछे से मुँह में से विष घोल के निकालते हैं (अर्थात। जी भर के निंदा करते हैं)। ऐसे मन के खोटों को प्रभू पति ने (अपने आप से) विछोड़ दिया है।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਮਲੁ ਜੂਈ ਭਰਿਆ ਨੀਲਾ ਕਾਲਾ ਖਿਧੋਲੜਾ ਤਿਨਿ ਵੇਮੁਖਿ ਵੇਮੁਖੈ ਨੋ ਪਾਇਆ ॥
ਪਾਸਿ ਨ ਦੇਈ ਕੋਈ ਬਹਣਿ ਜਗਤ ਮਹਿ ਗੂਹ ਪੜਿ ਸਗਵੀ ਮਲੁ ਲਾਇ ਮਨਮੁਖੁ ਆਇਆ ॥
ਪਰਾਈ ਜੋ ਨਿੰਦਾ ਚੁਗਲੀ ਨੋ ਵੇਮੁਖੁ ਕਰਿ ਕੈ ਭੇਜਿਆ ਓਥੈ ਭੀ ਮੁਹੁ ਕਾਲਾ ਦੁਹਾ ਵੇਮੁਖਾ ਦਾ ਕਰਾਇਆ ॥
ਤੜ ਸੁਣਿਆ ਸਭਤੁ ਜਗਤ ਵਿਚਿ ਭਾਈ ਵੇਮੁਖੁ ਸਣੈ ਨਫਰੈ ਪਉਲੀ ਪਉਦੀ ਫਾਵਾ ਹੋਇ ਕੈ ਉਠਿ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥
ਅਗੈ ਸੰਗਤੀ ਕੁੜਮੀ ਵੇਮੁਖੁ ਰਲਣਾ ਨ ਮਿਲੈ ਤਾ ਵਹੁਟੀ ਭਤੀਜਂੀ ਫਿਰਿ ਆਣਿ ਘਰਿ ਪਾਇਆ ॥
ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਦੋਵੈ ਗਏ ਨਿਤ ਭੁਖਾ ਕੂਕੇ ਤਿਹਾਇਆ ॥
ਧਨੁ ਧਨੁ ਸੁਆਮੀ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਜਿਨਿ ਨਿਆਉ ਸਚੁ ਬਹਿ ਆਪਿ ਕਰਾਇਆ ॥
ਜੋ ਨਿੰਦਾ ਕਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਸੋ ਸਾਚੈ ਮਾਰਿ ਪਚਾਇਆ ॥
ਏਹੁ ਅਖਰੁ ਤਿਨਿ ਆਖਿਆ ਜਿਨਿ ਜਗਤੁ ਸਭੁ ਉਪਾਇਆ ॥੧॥
ਮਲੁ ਜੂਈ ਭਰਿਆ ਨੀਲਾ ਕਾਲਾ ਖਿਧੋਲੜਾ ਤਿਨਿ ਵੇਮੁਖਿ ਵੇਮੁਖੈ ਨੋ ਪਾਇਆ ॥
ਪਾਸਿ ਨ ਦੇਈ ਕੋਈ ਬਹਣਿ ਜਗਤ ਮਹਿ ਗੂਹ ਪੜਿ ਸਗਵੀ ਮਲੁ ਲਾਇ ਮਨਮੁਖੁ ਆਇਆ ॥
ਪਰਾਈ ਜੋ ਨਿੰਦਾ ਚੁਗਲੀ ਨੋ ਵੇਮੁਖੁ ਕਰਿ ਕੈ ਭੇਜਿਆ ਓਥੈ ਭੀ ਮੁਹੁ ਕਾਲਾ ਦੁਹਾ ਵੇਮੁਖਾ ਦਾ ਕਰਾਇਆ ॥
ਤੜ ਸੁਣਿਆ ਸਭਤੁ ਜਗਤ ਵਿਚਿ ਭਾਈ ਵੇਮੁਖੁ ਸਣੈ ਨਫਰੈ ਪਉਲੀ ਪਉਦੀ ਫਾਵਾ ਹੋਇ ਕੈ ਉਠਿ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥
ਅਗੈ ਸੰਗਤੀ ਕੁੜਮੀ ਵੇਮੁਖੁ ਰਲਣਾ ਨ ਮਿਲੈ ਤਾ ਵਹੁਟੀ ਭਤੀਜਂੀ ਫਿਰਿ ਆਣਿ ਘਰਿ ਪਾਇਆ ॥
ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਦੋਵੈ ਗਏ ਨਿਤ ਭੁਖਾ ਕੂਕੇ ਤਿਹਾਇਆ ॥
ਧਨੁ ਧਨੁ ਸੁਆਮੀ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਜਿਨਿ ਨਿਆਉ ਸਚੁ ਬਹਿ ਆਪਿ ਕਰਾਇਆ ॥
ਜੋ ਨਿੰਦਾ ਕਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਸੋ ਸਾਚੈ ਮਾਰਿ ਪਚਾਇਆ ॥
ਏਹੁ ਅਖਰੁ ਤਿਨਿ ਆਖਿਆ ਜਿਨਿ ਜਗਤੁ ਸਭੁ ਉਪਾਇਆ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
मलु जूई भरिआ नीला काला खिधोलड़ा तिनि वेमुखि वेमुखै नो पाइआ ॥
पासि न देई कोई बहणि जगत महि गूह पड़ि सगवी मलु लाइ मनमुखु आइआ ॥
पराई जो निंदा चुगली नो वेमुखु करि कै भेजिआ ओथै भी मुहु काला दुहा वेमुखा दा कराइआ ॥
तड़ सुणिआ सभतु जगत विचि भाई वेमुखु सणै नफरै पउली पउदी फावा होइ कै उठि घरि आइआ ॥
अगै संगती कुड़मी वेमुखु रलणा न मिलै ता वहुटी भतीजंी फिरि आणि घरि पाइआ ॥
हलतु पलतु दोवै गए नित भुखा कूके तिहाइआ ॥
धनु धनु सुआमी करता पुरखु है जिनि निआउ सचु बहि आपि कराइआ ॥
जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सो साचै मारि पचाइआ ॥
एहु अखरु तिनि आखिआ जिनि जगतु सभु उपाइआ ॥१॥
मलु जूई भरिआ नीला काला खिधोलड़ा तिनि वेमुखि वेमुखै नो पाइआ ॥
पासि न देई कोई बहणि जगत महि गूह पड़ि सगवी मलु लाइ मनमुखु आइआ ॥
पराई जो निंदा चुगली नो वेमुखु करि कै भेजिआ ओथै भी मुहु काला दुहा वेमुखा दा कराइआ ॥
तड़ सुणिआ सभतु जगत विचि भाई वेमुखु सणै नफरै पउली पउदी फावा होइ कै उठि घरि आइआ ॥
अगै संगती कुड़मी वेमुखु रलणा न मिलै ता वहुटी भतीजंी फिरि आणि घरि पाइआ ॥
हलतु पलतु दोवै गए नित भुखा कूके तिहाइआ ॥
धनु धनु सुआमी करता पुरखु है जिनि निआउ सचु बहि आपि कराइआ ॥
जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सो साचै मारि पचाइआ ॥
एहु अखरु तिनि आखिआ जिनि जगतु सभु उपाइआ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ मैल और जूओं से भरा हुआ नीला और काला जुल्ला उस बे-मुख ने बेमुख को डाल दिया। संसार में उसे कोई पास बैठने नहीं देता। गंद पड़ के बल्कि ज्यादा मैल लगा के मनमुख (वापस) आया। जो मनमुख पराई निंदा व चुगली करने के लिए (सलाह) करके भेजा गया था। वहाँ भी दोनों का मुँह काला किया गया। संसार में हर तरफ तुरंत सुना गया है कि हे भाई ! बेमुख को नौकर समेत जूतियां पड़ीं और खासा हल्का हो के घर को आ गया है। आगे संगतों व कुड़मों (भाव। साक-संबधियों) में बेमुख को बैठना ना मिले। तो फिर पत्नी और भतीजों ने ला के घर में ठिकाना दिया। उसके लोक-परलोक दोनों व्यर्थ गए और (अब) भूखा और प्यासा पुकारता है। धन्य सृजनहार मालिक है जिसने खुद ध्यान से सच्चा न्याय कराया है। (कि) जो मनुष्य पूरे सतिगुरू की निंदा करता है। सच्चा प्रभू उस को खुद (आत्मिक मौत) मार के दुखी करता है, (ये) न्याय के वचन उस प्रभू ने खुद कहे हैं जिस ने सारा संसार पैदा किया है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਸਾਹਿਬੁ ਜਿਸ ਕਾ ਨੰਗਾ ਭੁਖਾ ਹੋਵੈ ਤਿਸ ਦਾ ਨਫਰੁ ਕਿਥਹੁ ਰਜਿ ਖਾਏ ॥
ਜਿ ਸਾਹਿਬ ਕੈ ਘਰਿ ਵਥੁ ਹੋਵੈ ਸੁ ਨਫਰੈ ਹਥਿ ਆਵੈ ਅਣਹੋਦੀ ਕਿਥਹੁ ਪਾਏ ॥
ਜਿਸ ਦੀ ਸੇਵਾ ਕੀਤੀ ਫਿਰਿ ਲੇਖਾ ਮੰਗੀਐ ਸਾ ਸੇਵਾ ਅਉਖੀ ਹੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੇਵਾ ਕਰਹੁ ਹਰਿ ਗੁਰ ਸਫਲ ਦਰਸਨ ਕੀ ਫਿਰਿ ਲੇਖਾ ਮੰਗੈ ਨ ਕੋਈ ॥੨॥
ਸਾਹਿਬੁ ਜਿਸ ਕਾ ਨੰਗਾ ਭੁਖਾ ਹੋਵੈ ਤਿਸ ਦਾ ਨਫਰੁ ਕਿਥਹੁ ਰਜਿ ਖਾਏ ॥
ਜਿ ਸਾਹਿਬ ਕੈ ਘਰਿ ਵਥੁ ਹੋਵੈ ਸੁ ਨਫਰੈ ਹਥਿ ਆਵੈ ਅਣਹੋਦੀ ਕਿਥਹੁ ਪਾਏ ॥
ਜਿਸ ਦੀ ਸੇਵਾ ਕੀਤੀ ਫਿਰਿ ਲੇਖਾ ਮੰਗੀਐ ਸਾ ਸੇਵਾ ਅਉਖੀ ਹੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੇਵਾ ਕਰਹੁ ਹਰਿ ਗੁਰ ਸਫਲ ਦਰਸਨ ਕੀ ਫਿਰਿ ਲੇਖਾ ਮੰਗੈ ਨ ਕੋਈ ॥੨॥
मः ४ ॥
साहिबु जिस का नंगा भुखा होवै तिस दा नफरु किथहु रजि खाए ॥
जि साहिब कै घरि वथु होवै सु नफरै हथि आवै अणहोदी किथहु पाए ॥
जिस दी सेवा कीती फिरि लेखा मंगीऐ सा सेवा अउखी होई ॥
नानक सेवा करहु हरि गुर सफल दरसन की फिरि लेखा मंगै न कोई ॥२॥
साहिबु जिस का नंगा भुखा होवै तिस दा नफरु किथहु रजि खाए ॥
जि साहिब कै घरि वथु होवै सु नफरै हथि आवै अणहोदी किथहु पाए ॥
जिस दी सेवा कीती फिरि लेखा मंगीऐ सा सेवा अउखी होई ॥
नानक सेवा करहु हरि गुर सफल दरसन की फिरि लेखा मंगै न कोई ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला ४ ॥ जिस नौकर का मालिक कंगाल हो। उसके नौकर ने कहाँ से पेट भर के खाना हुआ? नौकर को वही वस्तु मिल सकती है जो मलिक के घर में हो। अगर घर में ही ना हो तो उसे कहाँ से मिले जिसकी सेवा करने से फिर भी लेखा मांगा जाना हो। वह सेवा मुश्किल है (भाव-उसके करने का क्या लाभ है?) हे नानक ! जिस हरी और सतिगुरू के दर्शन (मनुष्य के जनम को) सफल करते हैं। उनकी सेवा करो (ता कि) फिर कोई लेखा ना मांगे। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਨਾਨਕ ਵੀਚਾਰਹਿ ਸੰਤ ਜਨ ਚਾਰਿ ਵੇਦ ਕਹੰਦੇ ॥
ਭਗਤ ਮੁਖੈ ਤੇ ਬੋਲਦੇ ਸੇ ਵਚਨ ਹੋਵੰਦੇ ॥
ਪ੍ਰਗਟ ਪਹਾਰਾ ਜਾਪਦਾ ਸਭਿ ਲੋਕ ਸੁਣੰਦੇ ॥
ਸੁਖੁ ਨ ਪਾਇਨਿ ਮੁਗਧ ਨਰ ਸੰਤ ਨਾਲਿ ਖਹੰਦੇ ॥
ਓਇ ਲੋਚਨਿ ਓਨਾ ਗੁਣੈ ਨੋ ਓਇ ਅਹੰਕਾਰਿ ਸੜੰਦੇ ॥
ਓਇ ਵਿਚਾਰੇ ਕਿਆ ਕਰਹਿ ਜਾ ਭਾਗ ਧੁਰਿ ਮੰਦੇ ॥
ਜੋ ਮਾਰੇ ਤਿਨਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਸੇ ਕਿਸੈ ਨ ਸੰਦੇ ॥
ਵੈਰੁ ਕਰਹਿ ਨਿਰਵੈਰ ਨਾਲਿ ਧਰਮ ਨਿਆਇ ਪਚੰਦੇ ॥
ਜੋ ਜੋ ਸੰਤਿ ਸਰਾਪਿਆ ਸੇ ਫਿਰਹਿ ਭਵੰਦੇ ॥
ਪੇਡੁ ਮੁੰਢਾਹੂੰ ਕਟਿਆ ਤਿਸੁ ਡਾਲ ਸੁਕੰਦੇ ॥੧੨॥
ਨਾਨਕ ਵੀਚਾਰਹਿ ਸੰਤ ਜਨ ਚਾਰਿ ਵੇਦ ਕਹੰਦੇ ॥
ਭਗਤ ਮੁਖੈ ਤੇ ਬੋਲਦੇ ਸੇ ਵਚਨ ਹੋਵੰਦੇ ॥
ਪ੍ਰਗਟ ਪਹਾਰਾ ਜਾਪਦਾ ਸਭਿ ਲੋਕ ਸੁਣੰਦੇ ॥
ਸੁਖੁ ਨ ਪਾਇਨਿ ਮੁਗਧ ਨਰ ਸੰਤ ਨਾਲਿ ਖਹੰਦੇ ॥
ਓਇ ਲੋਚਨਿ ਓਨਾ ਗੁਣੈ ਨੋ ਓਇ ਅਹੰਕਾਰਿ ਸੜੰਦੇ ॥
ਓਇ ਵਿਚਾਰੇ ਕਿਆ ਕਰਹਿ ਜਾ ਭਾਗ ਧੁਰਿ ਮੰਦੇ ॥
ਜੋ ਮਾਰੇ ਤਿਨਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਸੇ ਕਿਸੈ ਨ ਸੰਦੇ ॥
ਵੈਰੁ ਕਰਹਿ ਨਿਰਵੈਰ ਨਾਲਿ ਧਰਮ ਨਿਆਇ ਪਚੰਦੇ ॥
ਜੋ ਜੋ ਸੰਤਿ ਸਰਾਪਿਆ ਸੇ ਫਿਰਹਿ ਭਵੰਦੇ ॥
ਪੇਡੁ ਮੁੰਢਾਹੂੰ ਕਟਿਆ ਤਿਸੁ ਡਾਲ ਸੁਕੰਦੇ ॥੧੨॥
पउड़ी ॥
नानक वीचारहि संत जन चारि वेद कहंदे ॥
भगत मुखै ते बोलदे से वचन होवंदे ॥
प्रगट पहारा जापदा सभि लोक सुणंदे ॥
सुखु न पाइनि मुगध नर संत नालि खहंदे ॥
ओइ लोचनि ओना गुणै नो ओइ अहंकारि सड़ंदे ॥
ओइ विचारे किआ करहि जा भाग धुरि मंदे ॥
जो मारे तिनि पारब्रहमि से किसै न संदे ॥
वैरु करहि निरवैर नालि धरम निआइ पचंदे ॥
जो जो संति सरापिआ से फिरहि भवंदे ॥
पेडु मुंढाहूं कटिआ तिसु डाल सुकंदे ॥१२॥
नानक वीचारहि संत जन चारि वेद कहंदे ॥
भगत मुखै ते बोलदे से वचन होवंदे ॥
प्रगट पहारा जापदा सभि लोक सुणंदे ॥
सुखु न पाइनि मुगध नर संत नालि खहंदे ॥
ओइ लोचनि ओना गुणै नो ओइ अहंकारि सड़ंदे ॥
ओइ विचारे किआ करहि जा भाग धुरि मंदे ॥
जो मारे तिनि पारब्रहमि से किसै न संदे ॥
वैरु करहि निरवैर नालि धरम निआइ पचंदे ॥
जो जो संति सरापिआ से फिरहि भवंदे ॥
पेडु मुंढाहूं कटिआ तिसु डाल सुकंदे ॥१२॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे नानक ! संत (अपने) विचार बताते हैं और चारों वेद (भाव-पुरातन धर्म-पुस्तकें भी यही बात) कहते हैं (कि) भक्तजन जो वचन मुँह से बोलते हैं वह सही होते हैं। (भगत) सारे जगत में मशहूर हो जाते हैं। उनकी शोभा सारे लोग सुनते हैं। जो मूर्ख मनुष्य (ऐसे) संतों से वैर करते हैं वह सुख नहीं पाते। (वह दोखी) जलते तो अहंकार में हैं। पर संतजनों के गुणों को तरसते हैं। इन दोखी मनुष्यों के वश में भी क्या है? शुरू से (बुरे कर्म करने के कारण) बुरे संस्कार ही उनका भाग्य है (और इन संस्कारों से प्रेरित हो के गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं)। जो मनुष्य ईश्वर की तरफ से मरे हुए हैं। वह किसी के (सगे) नहीं। निर्वैरों के साथ भी वैर करते हैं और परमात्मा व धर्म-न्याय के अनुसार दुखी होते हैं। जो जो मनुष्य संत (गुरू) की ओर से धिक्कारे हुए हैं (भाव। गुरू के दर से वंचित हैं) वह भटकते फिरते हैं। जो वृक्ष जड़ से उखड़ जाए। उसकी टहनियां भी सूख जाती हैं। 12।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
सलोक मः ४ ॥
हिन्दी अर्थ: सलोक मः ४ ॥
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 306 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
Lodhi Gardens में सुबह की walk, घूमते-घूमते एक पुरानी पंक्ति।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 306” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 307 →, पीछे का: ← अंग 305।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।