अंग
256
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪਉੜੀ ॥
ਠਠਾ ਮਨੂਆ ਠਾਹਹਿ ਨਾਹੀ ॥ ਜੋ ਸਗਲ ਤਿਆਗਿ ਏਕਹਿ ਲਪਟਾਹੀ ॥
ਠਹਕਿ ਠਹਕਿ ਮਾਇਆ ਸੰਗਿ ਮੂਏ ॥
ਉਆ ਕੈ ਕੁਸਲ ਨ ਕਤਹੂ ਹੂਏ ॥
ਠਾਂਢਿ ਪਰੀ ਸੰਤਹ ਸੰਗਿ ਬਸਿਆ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਤਹਾ ਜੀਅ ਰਸਿਆ ॥
ਠਾਕੁਰ ਅਪੁਨੇ ਜੋ ਜਨੁ ਭਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਉਆ ਕਾ ਮਨੁ ਸੀਤਲਾਇਆ ॥੨੮॥
ਠਠਾ ਮਨੂਆ ਠਾਹਹਿ ਨਾਹੀ ॥ ਜੋ ਸਗਲ ਤਿਆਗਿ ਏਕਹਿ ਲਪਟਾਹੀ ॥
ਠਹਕਿ ਠਹਕਿ ਮਾਇਆ ਸੰਗਿ ਮੂਏ ॥
ਉਆ ਕੈ ਕੁਸਲ ਨ ਕਤਹੂ ਹੂਏ ॥
ਠਾਂਢਿ ਪਰੀ ਸੰਤਹ ਸੰਗਿ ਬਸਿਆ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਤਹਾ ਜੀਅ ਰਸਿਆ ॥
ਠਾਕੁਰ ਅਪੁਨੇ ਜੋ ਜਨੁ ਭਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਉਆ ਕਾ ਮਨੁ ਸੀਤਲਾਇਆ ॥੨੮॥
पउड़ी ॥
ठठा मनूआ ठाहहि नाही ॥ जो सगल तिआगि एकहि लपटाही ॥
ठहकि ठहकि माइआ संगि मूए ॥
उआ कै कुसल न कतहू हूए ॥
ठांढि परी संतह संगि बसिआ ॥
अंम्रित नामु तहा जीअ रसिआ ॥
ठाकुर अपुने जो जनु भाइआ ॥
नानक उआ का मनु सीतलाइआ ॥२८॥
ठठा मनूआ ठाहहि नाही ॥ जो सगल तिआगि एकहि लपटाही ॥
ठहकि ठहकि माइआ संगि मूए ॥
उआ कै कुसल न कतहू हूए ॥
ठांढि परी संतह संगि बसिआ ॥
अंम्रित नामु तहा जीअ रसिआ ॥
ठाकुर अपुने जो जनु भाइआ ॥
नानक उआ का मनु सीतलाइआ ॥२८॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- जो मनुष्य (माया के) सारे (मोह) त्याग के सिर्फ प्रभू-चरणों में जुड़े रहते हें। वह (फिर मायावी पदार्थों की खातिर दूसरों से) वैर-विरोध बना बना के आत्मिक मौत सहेड़ते हैं। उनके अंदर कभी आत्मिक आनंद नहीं आ सकता। जो मनुष्य गुरमुखों की संगति में निवास रखता है। उसके मन में शीतलता बनी रहती है। प्रभू का आत्मिक अमरता देने वाला नाम उसकी जिंद में रच जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य प्यारे परमात्मा को अच्छा लगने लग जाता है। उसका मन (माया की तृष्णा रूपी आग में से बच के) सदा शांत रहता है। 28।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਡੰਡਉਤਿ ਬੰਦਨ ਅਨਿਕ ਬਾਰ ਸਰਬ ਕਲਾ ਸਮਰਥ ॥
ਡੋਲਨ ਤੇ ਰਾਖਹੁ ਪ੍ਰਭੂ ਨਾਨਕ ਦੇ ਕਰਿ ਹਥ ॥੧॥
ਡੰਡਉਤਿ ਬੰਦਨ ਅਨਿਕ ਬਾਰ ਸਰਬ ਕਲਾ ਸਮਰਥ ॥
ਡੋਲਨ ਤੇ ਰਾਖਹੁ ਪ੍ਰਭੂ ਨਾਨਕ ਦੇ ਕਰਿ ਹਥ ॥੧॥
सलोकु ॥
डंडउति बंदन अनिक बार सरब कला समरथ ॥
डोलन ते राखहु प्रभू नानक दे करि हथ ॥१॥
डंडउति बंदन अनिक बार सरब कला समरथ ॥
डोलन ते राखहु प्रभू नानक दे करि हथ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! (ऐसे अरदास कर-) हे सारी ताकतें रखने वाले प्रभू ! मैं अनेकों बार तुझे नमस्कार करता हूँ। मुझे माया के मोह में फिसलने से अपना हाथ दे के बचा ले।1।
ਪਉੜੀ ॥
ਡਡਾ ਡੇਰਾ ਇਹੁ ਨਹੀ ਜਹ ਡੇਰਾ ਤਹ ਜਾਨੁ ॥
ਉਆ ਡੇਰਾ ਕਾ ਸੰਜਮੋ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਨੁ ॥
ਇਆ ਡੇਰਾ ਕਉ ਸ੍ਰਮੁ ਕਰਿ ਘਾਲੈ ॥
ਜਾ ਕਾ ਤਸੂ ਨਹੀ ਸੰਗਿ ਚਾਲੈ ॥
ਉਆ ਡੇਰਾ ਕੀ ਸੋ ਮਿਤਿ ਜਾਨੈ ॥
ਜਾ ਕਉ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਪੂਰਨ ਭਗਵਾਨੈ ॥
ਡੇਰਾ ਨਿਹਚਲੁ ਸਚੁ ਸਾਧਸੰਗ ਪਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇ ਜਨ ਨਹ ਡੋਲਾਇਆ ॥੨੯॥
ਡਡਾ ਡੇਰਾ ਇਹੁ ਨਹੀ ਜਹ ਡੇਰਾ ਤਹ ਜਾਨੁ ॥
ਉਆ ਡੇਰਾ ਕਾ ਸੰਜਮੋ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਨੁ ॥
ਇਆ ਡੇਰਾ ਕਉ ਸ੍ਰਮੁ ਕਰਿ ਘਾਲੈ ॥
ਜਾ ਕਾ ਤਸੂ ਨਹੀ ਸੰਗਿ ਚਾਲੈ ॥
ਉਆ ਡੇਰਾ ਕੀ ਸੋ ਮਿਤਿ ਜਾਨੈ ॥
ਜਾ ਕਉ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਪੂਰਨ ਭਗਵਾਨੈ ॥
ਡੇਰਾ ਨਿਹਚਲੁ ਸਚੁ ਸਾਧਸੰਗ ਪਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇ ਜਨ ਨਹ ਡੋਲਾਇਆ ॥੨੯॥
पउड़ी ॥
डडा डेरा इहु नही जह डेरा तह जानु ॥
उआ डेरा का संजमो गुर कै सबदि पछानु ॥
इआ डेरा कउ स्रमु करि घालै ॥
जा का तसू नही संगि चालै ॥
उआ डेरा की सो मिति जानै ॥
जा कउ द्रिसटि पूरन भगवानै ॥
डेरा निहचलु सचु साधसंग पाइआ ॥
नानक ते जन नह डोलाइआ ॥२९॥
डडा डेरा इहु नही जह डेरा तह जानु ॥
उआ डेरा का संजमो गुर कै सबदि पछानु ॥
इआ डेरा कउ स्रमु करि घालै ॥
जा का तसू नही संगि चालै ॥
उआ डेरा की सो मिति जानै ॥
जा कउ द्रिसटि पूरन भगवानै ॥
डेरा निहचलु सचु साधसंग पाइआ ॥
नानक ते जन नह डोलाइआ ॥२९॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) ये संसार तेरे सदा टिके रहने वाली जगह नहीं। उस ठिकाने को पहिचान। जो असल पक्की रिहायश वाला घर है। गुरू के शबद में जुड़ के ये सूझ हासिल कर कि उस घर में सदा टिके रहने की क्या जुगति है। मनुष्य इस दुनियावी डेरे की खातिर बड़ी मेहनत करके कोशिशें करता है। पर (मौत आने पर) इनमें से कुछ भी रक्ती भर भी इसके साथ नहीं जाता। उस सदीवी ठिकाने की रीत-मर्यादा की सिर्फ उस मनुष्य को समझ पड़ती है। जिस पर पूरन प्रभू की मेहर की नजर होती है। हे नानक ! साध-संगति में आ के जो मनुष्य सदीवी अटल आत्मिक आनंद वाला ठिकाना ढूँढ लेते हैं। उनका मन (इस नाशवंत संसार के घरों आदि खातिर) नहीं डोलता।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਢਾਹਨ ਲਾਗੇ ਧਰਮ ਰਾਇ ਕਿਨਹਿ ਨ ਘਾਲਿਓ ਬੰਧ ॥
ਨਾਨਕ ਉਬਰੇ ਜਪਿ ਹਰੀ ਸਾਧਸੰਗਿ ਸਨਬੰਧ ॥੧॥
ਢਾਹਨ ਲਾਗੇ ਧਰਮ ਰਾਇ ਕਿਨਹਿ ਨ ਘਾਲਿਓ ਬੰਧ ॥
ਨਾਨਕ ਉਬਰੇ ਜਪਿ ਹਰੀ ਸਾਧਸੰਗਿ ਸਨਬੰਧ ॥੧॥
सलोकु ॥
ढाहन लागे धरम राइ किनहि न घालिओ बंध ॥
नानक उबरे जपि हरी साधसंगि सनबंध ॥१॥
ढाहन लागे धरम राइ किनहि न घालिओ बंध ॥
नानक उबरे जपि हरी साधसंगि सनबंध ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ उन (के आत्मिक जीवन की इमारत) को विकारों के बाढ़ से नुकसान नहीं होता। कोई भी विकार उनके जीवन राह में रोक नहीं डाल सकता। हे नानक ! जिन लोगों ने साध-संगति में नाता जोड़ा। वह हरी का नाम जप के (विकारों के हड़ में से) बच निकले।1।
ਪਉੜੀ ॥
ਢਢਾ ਢੂਢਤ ਕਹ ਫਿਰਹੁ ਢੂਢਨੁ ਇਆ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਸੰਗਿ ਤੁਹਾਰੈ ਪ੍ਰਭੁ ਬਸੈ ਬਨੁ ਬਨੁ ਕਹਾ ਫਿਰਾਹਿ ॥
ਢੇਰੀ ਢਾਹਹੁ ਸਾਧਸੰਗਿ ਅਹੰਬੁਧਿ ਬਿਕਰਾਲ ॥
ਸੁਖੁ ਪਾਵਹੁ ਸਹਜੇ ਬਸਹੁ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਨਿਹਾਲ ॥
ਢੇਰੀ ਜਾਮੈ ਜਮਿ ਮਰੈ ਗਰਭ ਜੋਨਿ ਦੁਖ ਪਾਇ ॥
ਮੋਹ ਮਗਨ ਲਪਟਤ ਰਹੈ ਹਉ ਹਉ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਢਹਤ ਢਹਤ ਅਬ ਢਹਿ ਪਰੇ ਸਾਧ ਜਨਾ ਸਰਨਾਇ ॥
ਦੁਖ ਕੇ ਫਾਹੇ ਕਾਟਿਆ ਨਾਨਕ ਲੀਏ ਸਮਾਇ ॥੩੦॥
ਢਢਾ ਢੂਢਤ ਕਹ ਫਿਰਹੁ ਢੂਢਨੁ ਇਆ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਸੰਗਿ ਤੁਹਾਰੈ ਪ੍ਰਭੁ ਬਸੈ ਬਨੁ ਬਨੁ ਕਹਾ ਫਿਰਾਹਿ ॥
ਢੇਰੀ ਢਾਹਹੁ ਸਾਧਸੰਗਿ ਅਹੰਬੁਧਿ ਬਿਕਰਾਲ ॥
ਸੁਖੁ ਪਾਵਹੁ ਸਹਜੇ ਬਸਹੁ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਨਿਹਾਲ ॥
ਢੇਰੀ ਜਾਮੈ ਜਮਿ ਮਰੈ ਗਰਭ ਜੋਨਿ ਦੁਖ ਪਾਇ ॥
ਮੋਹ ਮਗਨ ਲਪਟਤ ਰਹੈ ਹਉ ਹਉ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਢਹਤ ਢਹਤ ਅਬ ਢਹਿ ਪਰੇ ਸਾਧ ਜਨਾ ਸਰਨਾਇ ॥
ਦੁਖ ਕੇ ਫਾਹੇ ਕਾਟਿਆ ਨਾਨਕ ਲੀਏ ਸਮਾਇ ॥੩੦॥
पउड़ी ॥
ढढा ढूढत कह फिरहु ढूढनु इआ मन माहि ॥
संगि तुहारै प्रभु बसै बनु बनु कहा फिराहि ॥
ढेरी ढाहहु साधसंगि अहंबुधि बिकराल ॥
सुखु पावहु सहजे बसहु दरसनु देखि निहाल ॥
ढेरी जामै जमि मरै गरभ जोनि दुख पाइ ॥
मोह मगन लपटत रहै हउ हउ आवै जाइ ॥
ढहत ढहत अब ढहि परे साध जना सरनाइ ॥
दुख के फाहे काटिआ नानक लीए समाइ ॥३०॥
ढढा ढूढत कह फिरहु ढूढनु इआ मन माहि ॥
संगि तुहारै प्रभु बसै बनु बनु कहा फिराहि ॥
ढेरी ढाहहु साधसंगि अहंबुधि बिकराल ॥
सुखु पावहु सहजे बसहु दरसनु देखि निहाल ॥
ढेरी जामै जमि मरै गरभ जोनि दुख पाइ ॥
मोह मगन लपटत रहै हउ हउ आवै जाइ ॥
ढहत ढहत अब ढहि परे साध जना सरनाइ ॥
दुख के फाहे काटिआ नानक लीए समाइ ॥३०॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- ओर कहाँ तलाशते फिरते हो? खोज इस मन में ही (करनी है)। (हे भाई !) प्रभू तुम्हारे साथ (हृदय में) बस रहा है। तुम उसे जंगल जंगल कहाँ ढूँढते फिरते हो? साध-संगत में (पहुँच के) भयानक अहंकार वाली मति की बनी हुई ढेरी को गिरा दो (इस तरह अंदर ही प्रभू का दर्शन हो जाएगा। प्रभू का) दर्शन करके आत्मा खिल उठेगी। आत्मिक आनंद मिलेगा। अडोल अवस्था में टिक जाओगे। जब तक अंदर अहंकार का ढेर बना रहता है। आदमी पैदा होता मरता है। जूनियों के चक्कर में दुख भोगता है। मोह में मस्त हो के (माया के साथ) चिपका रहता है। अहं के कारन जनम मरन में पड़ा रहता है। हे नानक ! जो लोग इस जनम में साध जनों की शरण आ पड़ते हैं। उनकी (मोह से उपजी) दुखों की फाहियां (जंजीरें) काटी जाती हैं। उन्हें प्रभू अपने चरणों में जोड़ लेता है। 30।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਜਹ ਸਾਧੂ ਗੋਬਿਦ ਭਜਨੁ ਕੀਰਤਨੁ ਨਾਨਕ ਨੀਤ ॥
ਣਾ ਹਉ ਣਾ ਤੂੰ ਣਹ ਛੁਟਹਿ ਨਿਕਟਿ ਨ ਜਾਈਅਹੁ ਦੂਤ ॥੧॥
ਜਹ ਸਾਧੂ ਗੋਬਿਦ ਭਜਨੁ ਕੀਰਤਨੁ ਨਾਨਕ ਨੀਤ ॥
ਣਾ ਹਉ ਣਾ ਤੂੰ ਣਹ ਛੁਟਹਿ ਨਿਕਟਿ ਨ ਜਾਈਅਹੁ ਦੂਤ ॥੧॥
सलोकु ॥
जह साधू गोबिद भजनु कीरतनु नानक नीत ॥
णा हउ णा तूं णह छुटहि निकटि न जाईअहु दूत ॥१॥
जह साधू गोबिद भजनु कीरतनु नानक नीत ॥
णा हउ णा तूं णह छुटहि निकटि न जाईअहु दूत ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (धर्मराज कहता है,) हे मेरे दूतो ! जहाँ साध जन परमात्मा का भजन कर रहे हों। जहाँ नित्य कीर्तन हो रहा हो। तुम उस जगह के पास ना जाना। (अगर तुम वहां चले गए तो इस खुनामी से) ना मैं बचूँगा। ना तुम बचोगे। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਣਾਣਾ ਰਣ ਤੇ ਸੀਝੀਐ ਆਤਮ ਜੀਤੈ ਕੋਇ ॥
ਹਉਮੈ ਅਨ ਸਿਉ ਲਰਿ ਮਰੈ ਸੋ ਸੋਭਾ ਦੂ ਹੋਇ ॥
ਮਣੀ ਮਿਟਾਇ ਜੀਵਤ ਮਰੈ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਉਪਦੇਸ ॥
ਮਨੂਆ ਜੀਤੈ ਹਰਿ ਮਿਲੈ ਤਿਹ ਸੂਰਤਣ ਵੇਸ ॥
ਣਾ ਕੋ ਜਾਣੈ ਆਪਣੋ ਏਕਹਿ ਟੇਕ ਅਧਾਰ ॥
ਰੈਣਿ ਦਿਣਸੁ ਸਿਮਰਤ ਰਹੈ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਪੁਰਖੁ ਅਪਾਰ ॥
ਰੇਣ ਸਗਲ ਇਆ ਮਨੁ ਕਰੈ ਏਊ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
ਹੁਕਮੈ ਬੂਝੈ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਲਿਖਿਆ ਪਾਇ ॥੩੧॥
ਣਾਣਾ ਰਣ ਤੇ ਸੀਝੀਐ ਆਤਮ ਜੀਤੈ ਕੋਇ ॥
ਹਉਮੈ ਅਨ ਸਿਉ ਲਰਿ ਮਰੈ ਸੋ ਸੋਭਾ ਦੂ ਹੋਇ ॥
ਮਣੀ ਮਿਟਾਇ ਜੀਵਤ ਮਰੈ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਉਪਦੇਸ ॥
ਮਨੂਆ ਜੀਤੈ ਹਰਿ ਮਿਲੈ ਤਿਹ ਸੂਰਤਣ ਵੇਸ ॥
ਣਾ ਕੋ ਜਾਣੈ ਆਪਣੋ ਏਕਹਿ ਟੇਕ ਅਧਾਰ ॥
ਰੈਣਿ ਦਿਣਸੁ ਸਿਮਰਤ ਰਹੈ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਪੁਰਖੁ ਅਪਾਰ ॥
ਰੇਣ ਸਗਲ ਇਆ ਮਨੁ ਕਰੈ ਏਊ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
ਹੁਕਮੈ ਬੂਝੈ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਲਿਖਿਆ ਪਾਇ ॥੩੧॥
पउड़ी ॥
णाणा रण ते सीझीऐ आतम जीतै कोइ ॥
हउमै अन सिउ लरि मरै सो सोभा दू होइ ॥
मणी मिटाइ जीवत मरै गुर पूरे उपदेस ॥
मनूआ जीतै हरि मिलै तिह सूरतण वेस ॥
णा को जाणै आपणो एकहि टेक अधार ॥
रैणि दिणसु सिमरत रहै सो प्रभु पुरखु अपार ॥
रेण सगल इआ मनु करै एऊ करम कमाइ ॥
हुकमै बूझै सदा सुखु नानक लिखिआ पाइ ॥३१॥
णाणा रण ते सीझीऐ आतम जीतै कोइ ॥
हउमै अन सिउ लरि मरै सो सोभा दू होइ ॥
मणी मिटाइ जीवत मरै गुर पूरे उपदेस ॥
मनूआ जीतै हरि मिलै तिह सूरतण वेस ॥
णा को जाणै आपणो एकहि टेक अधार ॥
रैणि दिणसु सिमरत रहै सो प्रभु पुरखु अपार ॥
रेण सगल इआ मनु करै एऊ करम कमाइ ॥
हुकमै बूझै सदा सुखु नानक लिखिआ पाइ ॥३१॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- इस जगत रण-भूमि में अहंकार से हो रही जंग से तभी कामयाब हो सकते हैं। अगर मनुष्य अपने आप को जीत ले। जो मनुष्य अहंकार व द्वैत से मुकाबला करके अहंकार की ओर से मर जाता है। वही बड़ा शूरबीर है। जो मनुष्य गुरू की शिक्षा ले के अहंकार को खत्म कर लेता है। संसारिक वासना से अजेय हो जाता है। अपने मन को अपने वश में कर लेता है। वह मनुष्य परमात्मा को मिल जाता है (संसारिक रणभूमि में) उसी की पोशाक शूरवीरों वाली समझो। हे नानक ! जो मनुष्य एक परमात्मा का ही आसरा-सहारा लेता है। किसी और को अपना आसरा नहीं समझता। सर्व-व्यापक बेअंत प्रभू को दिन रात हर वक्त सिमरता रहता है। अपने इस मन को सभी की चरण-धूड़ बनाता है -जो मनुष्य ये कर्म कमाता है। वह परमात्मा की रजा को समझ लेता है। सदा आत्मिक आनंद पाता है। पिछले किए कर्मों के लेख उसके माथे पर प्रगट हो जाते हैं। 31।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਧਨੁ ਅਰਪਉ ਤਿਸੈ ਪ੍ਰਭੂ ਮਿਲਾਵੈ ਮੋਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਭ੍ਰਮ ਭਉ ਕਾਟੀਐ ਚੂਕੈ ਜਮ ਕੀ ਜੋਹ ॥੧॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਧਨੁ ਅਰਪਉ ਤਿਸੈ ਪ੍ਰਭੂ ਮਿਲਾਵੈ ਮੋਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਭ੍ਰਮ ਭਉ ਕਾਟੀਐ ਚੂਕੈ ਜਮ ਕੀ ਜੋਹ ॥੧॥
सलोकु ॥
तनु मनु धनु अरपउ तिसै प्रभू मिलावै मोहि ॥
नानक भ्रम भउ काटीऐ चूकै जम की जोह ॥१॥
तनु मनु धनु अरपउ तिसै प्रभू मिलावै मोहि ॥
नानक भ्रम भउ काटीऐ चूकै जम की जोह ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! (कह,) जो मनुष्य मुझे ईश्वर से मिला दे। मैं उसके आगे अपना तन-मन-धन सब कुछ भेट कर दूँ। (क्योंकि प्रभू को मिल के) मन की भटकना और सहम दूर हो जाते हैं। जम की नजर भी खत्म हो जाती है। (मौत का सहम भी खत्म हो जाता है)। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਤਤਾ ਤਾ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਗੁਣ ਨਿਧਿ ਗੋਬਿਦ ਰਾਇ ॥
ਫਲ ਪਾਵਹਿ ਮਨ ਬਾਛਤੇ ਤਪਤਿ ਤੁਹਾਰੀ ਜਾਇ ॥
ਤਤਾ ਤਾ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਗੁਣ ਨਿਧਿ ਗੋਬਿਦ ਰਾਇ ॥
ਫਲ ਪਾਵਹਿ ਮਨ ਬਾਛਤੇ ਤਪਤਿ ਤੁਹਾਰੀ ਜਾਇ ॥
पउड़ी ॥
तता ता सिउ प्रीति करि गुण निधि गोबिद राइ ॥
फल पावहि मन बाछते तपति तुहारी जाइ ॥
तता ता सिउ प्रीति करि गुण निधि गोबिद राइ ॥
फल पावहि मन बाछते तपति तुहारी जाइ ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) उस गोबिंद राय के साथ प्यार डाल जो सारे गुणों का खजाना है। मन-इच्छित फल हासिल करेगा। तेरे मन की (तृष्णा की आग) तपश दूर हो जाएगी।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 256 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Lodhi Gardens में सुबह की walk, घूमते-घूमते एक पुरानी पंक्ति।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 50 पंक्तियों का है, 9 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 256” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 257 →, पीछे का: ← अंग 255।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।