अंग
259
राग Gauree
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ਸਲੋਕ ॥
ਮਤਿ ਪੂਰੀ ਪਰਧਾਨ ਤੇ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਮਨ ਮੰਤ ॥
ਜਿਹ ਜਾਨਿਓ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪੁਨਾ ਨਾਨਕ ਤੇ ਭਗਵੰਤ ॥੧॥
ਮਤਿ ਪੂਰੀ ਪਰਧਾਨ ਤੇ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਮਨ ਮੰਤ ॥
ਜਿਹ ਜਾਨਿਓ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪੁਨਾ ਨਾਨਕ ਤੇ ਭਗਵੰਤ ॥੧॥
सलोक ॥
मति पूरी परधान ते गुर पूरे मन मंत ॥
जिह जानिओ प्रभु आपुना नानक ते भगवंत ॥१॥
मति पूरी परधान ते गुर पूरे मन मंत ॥
जिह जानिओ प्रभु आपुना नानक ते भगवंत ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ जिन मनुष्यों के मन में पूरे गुरू का उपदेश बस जाता है। उनकी अक्ल (जीवन राह की) पूरी (समझ वाली) हो जाती है। वह (औरों को भी शिक्षा देने में) माहिर व माने पहचाने हो जाते हैं। जिन्होंने प्यारे प्रभू के साथ गहरी सांझ बना ली है। वे भाग्यशाली हैं। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਮਮਾ ਜਾਹੂ ਮਰਮੁ ਪਛਾਨਾ ॥ ਭੇਟਤ ਸਾਧਸੰਗ ਪਤੀਆਨਾ ॥
ਦੁਖ ਸੁਖ ਉਆ ਕੈ ਸਮਤ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਰਹਤ ਅਉਤਾਰਾ ॥
ਤਾਹੂ ਸੰਗ ਤਾਹੂ ਨਿਰਲੇਪਾ ॥
ਪੂਰਨ ਘਟ ਘਟ ਪੁਰਖ ਬਿਸੇਖਾ ॥
ਉਆ ਰਸ ਮਹਿ ਉਆਹੂ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਲਿਪਤ ਨਹੀ ਤਿਹ ਮਾਇਆ ॥੪੨॥
ਮਮਾ ਜਾਹੂ ਮਰਮੁ ਪਛਾਨਾ ॥ ਭੇਟਤ ਸਾਧਸੰਗ ਪਤੀਆਨਾ ॥
ਦੁਖ ਸੁਖ ਉਆ ਕੈ ਸਮਤ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਰਹਤ ਅਉਤਾਰਾ ॥
ਤਾਹੂ ਸੰਗ ਤਾਹੂ ਨਿਰਲੇਪਾ ॥
ਪੂਰਨ ਘਟ ਘਟ ਪੁਰਖ ਬਿਸੇਖਾ ॥
ਉਆ ਰਸ ਮਹਿ ਉਆਹੂ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਲਿਪਤ ਨਹੀ ਤਿਹ ਮਾਇਆ ॥੪੨॥
पउड़ी ॥
ममा जाहू मरमु पछाना ॥ भेटत साधसंग पतीआना ॥
दुख सुख उआ कै समत बीचारा ॥
नरक सुरग रहत अउतारा ॥
ताहू संग ताहू निरलेपा ॥
पूरन घट घट पुरख बिसेखा ॥
उआ रस महि उआहू सुखु पाइआ ॥
नानक लिपत नही तिह माइआ ॥४२॥
ममा जाहू मरमु पछाना ॥ भेटत साधसंग पतीआना ॥
दुख सुख उआ कै समत बीचारा ॥
नरक सुरग रहत अउतारा ॥
ताहू संग ताहू निरलेपा ॥
पूरन घट घट पुरख बिसेखा ॥
उआ रस महि उआहू सुखु पाइआ ॥
नानक लिपत नही तिह माइआ ॥४२॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- जिस मनुष्य ने ईश्वर का ये भेद पा लिया (कि वह सदा अंग-संग है) वह साध-संगति में मिल के (इस पाए भेद के बारे में) पूरा यकीन बना लेता है। उसके हृदय में दुख और सुख एक समान प्रतीत होने लग पड़ते हैं (क्योंकि ये उसे अंग-संग बसते प्रभू द्वारा आए दिखते हैं। इस वास्ते) वह दुखों से आई घबराहट और सुखों से आई बहुत खुशी में फंसने से बच जाता है। वह उसके संग भी है और माया के प्रभाव से परे भी। उसे व्यापक प्रभू हरेक हृदय में बसता दिखता है (ईश्वर की सर्व-व्याप्तता के यकीन से पैदा हुए) आत्मिक रस से उसे ऐसा सुख मिलता है कि हे नानक ! माया उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। 42।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਯਾਰ ਮੀਤ ਸੁਨਿ ਸਾਜਨਹੁ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਛੂਟਨੁ ਨਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਬੰਧਨ ਕਟੇ ਗੁਰ ਕੀ ਚਰਨੀ ਪਾਹਿ ॥੧॥
ਯਾਰ ਮੀਤ ਸੁਨਿ ਸਾਜਨਹੁ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਛੂਟਨੁ ਨਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਬੰਧਨ ਕਟੇ ਗੁਰ ਕੀ ਚਰਨੀ ਪਾਹਿ ॥੧॥
सलोकु ॥
यार मीत सुनि साजनहु बिनु हरि छूटनु नाहि ॥
नानक तिह बंधन कटे गुर की चरनी पाहि ॥१॥
यार मीत सुनि साजनहु बिनु हरि छूटनु नाहि ॥
नानक तिह बंधन कटे गुर की चरनी पाहि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे मित्रो ! हे सज्जनो ! सुनो। परमात्मा का नाम जपे बिना माया के बंधनों से छुटकारा नहीं मिलता। हे नानक ! जो लोग गुरू की चरणी पड़ते हैं। उनके (माया के मोह के) बंधन काटे जाते हैं। 1।
ਪਵੜੀ ॥
ਯਯਾ ਜਤਨ ਕਰਤ ਬਹੁ ਬਿਧੀਆ ॥
ਏਕ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਹ ਲਉ ਸਿਧੀਆ ॥
ਯਾਹੂ ਜਤਨ ਕਰਿ ਹੋਤ ਛੁਟਾਰਾ ॥
ਉਆਹੂ ਜਤਨ ਸਾਧ ਸੰਗਾਰਾ ॥
ਯਾ ਉਬਰਨ ਧਾਰੈ ਸਭੁ ਕੋਊ ॥
ਉਆਹਿ ਜਪੇ ਬਿਨੁ ਉਬਰ ਨ ਹੋਊ ॥
ਯਾਹੂ ਤਰਨ ਤਾਰਨ ਸਮਰਾਥਾ ॥
ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਨਿਰਗੁਨ ਨਰਨਾਥਾ ॥
ਮਨ ਬਚ ਕ੍ਰਮ ਜਿਹ ਆਪਿ ਜਨਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਮਤਿ ਪ੍ਰਗਟੀ ਆਈ ॥੪੩॥
ਯਯਾ ਜਤਨ ਕਰਤ ਬਹੁ ਬਿਧੀਆ ॥
ਏਕ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਹ ਲਉ ਸਿਧੀਆ ॥
ਯਾਹੂ ਜਤਨ ਕਰਿ ਹੋਤ ਛੁਟਾਰਾ ॥
ਉਆਹੂ ਜਤਨ ਸਾਧ ਸੰਗਾਰਾ ॥
ਯਾ ਉਬਰਨ ਧਾਰੈ ਸਭੁ ਕੋਊ ॥
ਉਆਹਿ ਜਪੇ ਬਿਨੁ ਉਬਰ ਨ ਹੋਊ ॥
ਯਾਹੂ ਤਰਨ ਤਾਰਨ ਸਮਰਾਥਾ ॥
ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਨਿਰਗੁਨ ਨਰਨਾਥਾ ॥
ਮਨ ਬਚ ਕ੍ਰਮ ਜਿਹ ਆਪਿ ਜਨਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਮਤਿ ਪ੍ਰਗਟੀ ਆਈ ॥੪੩॥
पवड़ी ॥
यया जतन करत बहु बिधीआ ॥
एक नाम बिनु कह लउ सिधीआ ॥
याहू जतन करि होत छुटारा ॥
उआहू जतन साध संगारा ॥
या उबरन धारै सभु कोऊ ॥
उआहि जपे बिनु उबर न होऊ ॥
याहू तरन तारन समराथा ॥
राखि लेहु निरगुन नरनाथा ॥
मन बच क्रम जिह आपि जनाई ॥
नानक तिह मति प्रगटी आई ॥४३॥
यया जतन करत बहु बिधीआ ॥
एक नाम बिनु कह लउ सिधीआ ॥
याहू जतन करि होत छुटारा ॥
उआहू जतन साध संगारा ॥
या उबरन धारै सभु कोऊ ॥
उआहि जपे बिनु उबर न होऊ ॥
याहू तरन तारन समराथा ॥
राखि लेहु निरगुन नरनाथा ॥
मन बच क्रम जिह आपि जनाई ॥
नानक तिह मति प्रगटी आई ॥४३॥
हिन्दी अर्थ: पवड़ी- मनुष्य (माया के मोह के बंधनों से छुटकारा पाने के लिए) कई तरह के यत्न करता है। पर परमात्मा का नाम जपे बिना बिल्कुल कामयाबी नहीं हो सकती। जिन प्रयत्नों से (इन बंधनों से) खलासी हो सकती है। वो प्रयत्न यही हैं कि साध-संगति करो। हर कोई (माया के बंधनों से) बचने के तरीके (अपने मन में) धारता है। पर उस प्रभू का नाम जपे बिना खलासी नहीं हो सकती। तू खुद ही जीवों को (संसार-समुंद्र में से) पार उतारने के लिए जहाज है। तू ही तैराने के समर्थ है। (हे भाई ! प्रभू दर पे प्रार्थना ही करनी चाहिए कि) हे जीवों के नाथ ! हम गुण-हीनों को बचा ले। हे नानक ! जिन लोगों के मन में बचनों में व कर्मों में प्रभू खुद (माया के मोह से बचने वाली) सूझ पैदा करता है। उनकी मति उज्जवल हो जाती है (और वे बंघनों से बच निकलते हैं)। 43।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਰੋਸੁ ਨ ਕਾਹੂ ਸੰਗ ਕਰਹੁ ਆਪਨ ਆਪੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਹੋਇ ਨਿਮਾਨਾ ਜਗਿ ਰਹਹੁ ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਪਾਰਿ ॥੧॥
ਰੋਸੁ ਨ ਕਾਹੂ ਸੰਗ ਕਰਹੁ ਆਪਨ ਆਪੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਹੋਇ ਨਿਮਾਨਾ ਜਗਿ ਰਹਹੁ ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਪਾਰਿ ॥੧॥
सलोकु ॥
रोसु न काहू संग करहु आपन आपु बीचारि ॥
होइ निमाना जगि रहहु नानक नदरी पारि ॥१॥
रोसु न काहू संग करहु आपन आपु बीचारि ॥
होइ निमाना जगि रहहु नानक नदरी पारि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (हे भाई !) किसी और से गुस्सा ना करो। (इसकी जगह) अपने आप को विचारो (आत्मचिंतन करो) (खुद को सुधारो। कि किसी से झगड़ने में अपना क्या-क्या दोष है)। हे नानक ! अगर तू जगत में धैर्य-स्वभाव वाला बन के रहे। तो प्रभू की नजर से इस संसार समुंद्र में से पार लांघ जाएगा (जिसमें क्रोध की बेअंत लहरें बह रही हैं)। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਰਾਰਾ ਰੇਨ ਹੋਤ ਸਭ ਜਾ ਕੀ ॥
ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ਛੁਟੈ ਤੇਰੀ ਬਾਕੀ ॥
ਰਣਿ ਦਰਗਹਿ ਤਉ ਸੀਝਹਿ ਭਾਈ ॥
ਜਉ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਰਹਤ ਰਹਤ ਰਹਿ ਜਾਹਿ ਬਿਕਾਰਾ ॥ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੈ ਸਬਦਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਰਾਤੇ ਰੰਗ ਨਾਮ ਰਸ ਮਾਤੇ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਰ ਕੀਨੀ ਦਾਤੇ ॥੪੪॥
ਰਾਰਾ ਰੇਨ ਹੋਤ ਸਭ ਜਾ ਕੀ ॥
ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ਛੁਟੈ ਤੇਰੀ ਬਾਕੀ ॥
ਰਣਿ ਦਰਗਹਿ ਤਉ ਸੀਝਹਿ ਭਾਈ ॥
ਜਉ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਰਹਤ ਰਹਤ ਰਹਿ ਜਾਹਿ ਬਿਕਾਰਾ ॥ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੈ ਸਬਦਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਰਾਤੇ ਰੰਗ ਨਾਮ ਰਸ ਮਾਤੇ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਰ ਕੀਨੀ ਦਾਤੇ ॥੪੪॥
पउड़ी ॥
रारा रेन होत सभ जा की ॥
तजि अभिमानु छुटै तेरी बाकी ॥
रणि दरगहि तउ सीझहि भाई ॥
जउ गुरमुखि राम नाम लिव लाई ॥
रहत रहत रहि जाहि बिकारा ॥ गुर पूरे कै सबदि अपारा ॥
राते रंग नाम रस माते ॥
नानक हरि गुर कीनी दाते ॥४४॥
रारा रेन होत सभ जा की ॥
तजि अभिमानु छुटै तेरी बाकी ॥
रणि दरगहि तउ सीझहि भाई ॥
जउ गुरमुखि राम नाम लिव लाई ॥
रहत रहत रहि जाहि बिकारा ॥ गुर पूरे कै सबदि अपारा ॥
राते रंग नाम रस माते ॥
नानक हरि गुर कीनी दाते ॥४४॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- सारी दुनिया जिस गुरू की चरण धूड़ होती है। तू भी उसके आगे अपने मन का अहंकार दूर कर। तेरे अंदर से क्रोध के संस्कारों का लेखा समाप्त हो जाए। हे भाई ! इस जगत रण-भूमि में और प्रभू की हजूरी में तभी कामयाब होगा। जब गुरू की शरण पड़ कर प्रभू के नाम में सुरति जोड़ेगा। विकार सहजे सहजे दूर हो जाते हैं- पूरे गुरू के बेअंत शबद में जुड़ने से वे प्रभू के नाम के प्यार में रंगे रहते हैं। हे नानक ! जिन लोगों को गुरू ने हरी नाम की दाति दी है।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਲਾਲਚ ਝੂਠ ਬਿਖੈ ਬਿਆਧਿ ਇਆ ਦੇਹੀ ਮਹਿ ਬਾਸ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪੀਆ ਨਾਨਕ ਸੂਖਿ ਨਿਵਾਸ ॥੧॥
ਲਾਲਚ ਝੂਠ ਬਿਖੈ ਬਿਆਧਿ ਇਆ ਦੇਹੀ ਮਹਿ ਬਾਸ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪੀਆ ਨਾਨਕ ਸੂਖਿ ਨਿਵਾਸ ॥੧॥
सलोकु ॥
लालच झूठ बिखै बिआधि इआ देही महि बास ॥
हरि हरि अंम्रितु गुरमुखि पीआ नानक सूखि निवास ॥१॥
लालच झूठ बिखै बिआधि इआ देही महि बास ॥
हरि हरि अंम्रितु गुरमुखि पीआ नानक सूखि निवास ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (साधारण तौर पर हमारे) इस शरीर में लालच, झूठ विकारों और रोगों का ही जोर रहता है; (पर) हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर आत्मिक जीवन देने वाला हरी नाम रस पी लिया। वह आत्मिक आनंद में टिका रहता है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਲਲਾ ਲਾਵਉ ਅਉਖਧ ਜਾਹੂ ॥
ਦੂਖ ਦਰਦ ਤਿਹ ਮਿਟਹਿ ਖਿਨਾਹੂ ॥
ਨਾਮ ਅਉਖਧੁ ਜਿਹ ਰਿਦੈ ਹਿਤਾਵੈ ॥
ਤਾਹਿ ਰੋਗੁ ਸੁਪਨੈ ਨਹੀ ਆਵੈ ॥
ਹਰਿ ਅਉਖਧੁ ਸਭ ਘਟ ਹੈ ਭਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਬਿਨੁ ਬਿਧਿ ਨ ਬਨਾਈ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਸੰਜਮੁ ਕਰਿ ਦੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਤਉ ਫਿਰਿ ਦੂਖ ਨ ਥੀਆ ॥੪੫॥
ਲਲਾ ਲਾਵਉ ਅਉਖਧ ਜਾਹੂ ॥
ਦੂਖ ਦਰਦ ਤਿਹ ਮਿਟਹਿ ਖਿਨਾਹੂ ॥
ਨਾਮ ਅਉਖਧੁ ਜਿਹ ਰਿਦੈ ਹਿਤਾਵੈ ॥
ਤਾਹਿ ਰੋਗੁ ਸੁਪਨੈ ਨਹੀ ਆਵੈ ॥
ਹਰਿ ਅਉਖਧੁ ਸਭ ਘਟ ਹੈ ਭਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਬਿਨੁ ਬਿਧਿ ਨ ਬਨਾਈ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਸੰਜਮੁ ਕਰਿ ਦੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਤਉ ਫਿਰਿ ਦੂਖ ਨ ਥੀਆ ॥੪੫॥
पउड़ी ॥
लला लावउ अउखध जाहू ॥
दूख दरद तिह मिटहि खिनाहू ॥
नाम अउखधु जिह रिदै हितावै ॥
ताहि रोगु सुपनै नही आवै ॥
हरि अउखधु सभ घट है भाई ॥
गुर पूरे बिनु बिधि न बनाई ॥
गुरि पूरै संजमु करि दीआ ॥
नानक तउ फिरि दूख न थीआ ॥४५॥
लला लावउ अउखध जाहू ॥
दूख दरद तिह मिटहि खिनाहू ॥
नाम अउखधु जिह रिदै हितावै ॥
ताहि रोगु सुपनै नही आवै ॥
हरि अउखधु सभ घट है भाई ॥
गुर पूरे बिनु बिधि न बनाई ॥
गुरि पूरै संजमु करि दीआ ॥
नानक तउ फिरि दूख न थीआ ॥४५॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मुझे यकीन है कि अगर किसी को (प्रभू के नाम की) दवा दी जाए। एक क्षण में ही उसके (आत्मिक) दुख-दर्द मिट जाते हैं। जिस मनुष्य को अपने हृदय में रोग-नाशक प्रभू का नाम प्यारा लगने लग पड़े। सपने में भी कोई (आत्मिक) रोग (विकार) उसके नजदीक नहीं फटकता। हे भाई ! हरी नाम दवा हरेक के हृदय में मौजूद है। पर पूरे गुरू के बिना (इस्तेमाल का) तरीका कामयाब नहीं होता। हे नानक ! पूरे गुरू ने (इस दवाई के इस्तेमाल के लिए) परहेज नीयत कर दिया है। (जो मनुष्य उस परहेज अनुसार दवाई लेता है) उसे मुड़ (कोई विकार) दुख छू नहीं सकता। 45।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਵਾਸੁਦੇਵ ਸਰਬਤ੍ਰ ਮੈ ਊਨ ਨ ਕਤਹੂ ਠਾਇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸੰਗਿ ਹੈ ਨਾਨਕ ਕਾਇ ਦੁਰਾਇ ॥੧॥
ਵਾਸੁਦੇਵ ਸਰਬਤ੍ਰ ਮੈ ਊਨ ਨ ਕਤਹੂ ਠਾਇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸੰਗਿ ਹੈ ਨਾਨਕ ਕਾਇ ਦੁਰਾਇ ॥੧॥
सलोकु ॥
वासुदेव सरबत्र मै ऊन न कतहू ठाइ ॥
अंतरि बाहरि संगि है नानक काइ दुराइ ॥१॥
वासुदेव सरबत्र मै ऊन न कतहू ठाइ ॥
अंतरि बाहरि संगि है नानक काइ दुराइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! परमात्मा सब जगह मौजूद है। किसी भी जगह उसका अस्तित्व ना हो ऐसा नहीं हैं। सब जीवों के अंदर व चारों तरफ प्रभू अंग-संग है। (उससे) कुछ भी छुपा हुआ नहीं हो सकता। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਵਵਾ ਵੈਰੁ ਨ ਕਰੀਐ ਕਾਹੂ ॥
ਘਟ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਬ੍ਰਹਮ ਸਮਾਹੂ ॥
ਵਾਸੁਦੇਵ ਜਲ ਥਲ ਮਹਿ ਰਵਿਆ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਵਿਰਲੈ ਹੀ ਗਵਿਆ ॥
ਵੈਰ ਵਿਰੋਧ ਮਿਟੇ ਤਿਹ ਮਨ ਤੇ ॥
ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋ ਸੁਨਤੇ ॥
ਵਰਨ ਚਿਹਨ ਸਗਲਹ ਤੇ ਰਹਤਾ ॥ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋ ਕਹਤਾ ॥੪੬॥
ਵਵਾ ਵੈਰੁ ਨ ਕਰੀਐ ਕਾਹੂ ॥
ਘਟ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਬ੍ਰਹਮ ਸਮਾਹੂ ॥
ਵਾਸੁਦੇਵ ਜਲ ਥਲ ਮਹਿ ਰਵਿਆ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਵਿਰਲੈ ਹੀ ਗਵਿਆ ॥
ਵੈਰ ਵਿਰੋਧ ਮਿਟੇ ਤਿਹ ਮਨ ਤੇ ॥
ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋ ਸੁਨਤੇ ॥
ਵਰਨ ਚਿਹਨ ਸਗਲਹ ਤੇ ਰਹਤਾ ॥ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋ ਕਹਤਾ ॥੪੬॥
पउड़ी ॥
ववा वैरु न करीऐ काहू ॥
घट घट अंतरि ब्रहम समाहू ॥
वासुदेव जल थल महि रविआ ॥
गुर प्रसादि विरलै ही गविआ ॥
वैर विरोध मिटे तिह मन ते ॥
हरि कीरतनु गुरमुखि जो सुनते ॥
वरन चिहन सगलह ते रहता ॥ नानक हरि हरि गुरमुखि जो कहता ॥४६॥
ववा वैरु न करीऐ काहू ॥
घट घट अंतरि ब्रहम समाहू ॥
वासुदेव जल थल महि रविआ ॥
गुर प्रसादि विरलै ही गविआ ॥
वैर विरोध मिटे तिह मन ते ॥
हरि कीरतनु गुरमुखि जो सुनते ॥
वरन चिहन सगलह ते रहता ॥ नानक हरि हरि गुरमुखि जो कहता ॥४६॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- किसी के साथ भी (कोई) वैर नहीं करना चाहिए। हरेक शरीर में परमात्मा समाया हुआ है परमात्मा पानी में धरती में (जॅरे-जॅरे में) व्यापक है। पर किसी विरले ने ही गुरू की कृपा से (उस प्रभू तक) पहुँच हासिल की है। उनके मन में से वैर-विरोध मिट जाते हैं। 46। जो उसकी सिफत सालाह सुनते हैं। परमात्मा जाति-पाति, रूप रेख से न्यारा है (उसकी कोई जाति पाति कोई रूप रेखा बयान नही की जा सकती)। हे नानक ! गुरमुख मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर उस हरी को सिमरते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 259 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Mehrauli के पुराने पत्थरों के पास, 800 साल का इतिहास और एक 600 साल पुरानी पंक्ति।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 59 पंक्तियों का है, 10 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 259” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 260 →, पीछे का: ← अंग 258।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।