अंग
290
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੋ ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਜਿਨਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਦੀਆ ॥
ਸੋ ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਜਿ ਜੀਵਨ ਜੀਆ ॥
ਸੋ ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਜਿ ਅਗਨਿ ਮਹਿ ਰਾਖੈ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਕੋ ਬਿਰਲਾ ਲਾਖੈ ॥
ਸੋ ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਜਿ ਬਿਖੁ ਤੇ ਕਾਢੈ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕਾ ਟੂਟਾ ਗਾਢੈ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਤਤੁ ਇਹੈ ਬੁਝਾਇਆ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਨਾਨਕ ਜਨ ਧਿਆਇਆ ॥੪॥
ਸੋ ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਜਿ ਜੀਵਨ ਜੀਆ ॥
ਸੋ ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਜਿ ਅਗਨਿ ਮਹਿ ਰਾਖੈ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਕੋ ਬਿਰਲਾ ਲਾਖੈ ॥
ਸੋ ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਜਿ ਬਿਖੁ ਤੇ ਕਾਢੈ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕਾ ਟੂਟਾ ਗਾਢੈ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਤਤੁ ਇਹੈ ਬੁਝਾਇਆ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਨਾਨਕ ਜਨ ਧਿਆਇਆ ॥੪॥
सो किउ बिसरै जिनि सभु किछु दीआ ॥
सो किउ बिसरै जि जीवन जीआ ॥
सो किउ बिसरै जि अगनि महि राखै ॥
गुर प्रसादि को बिरला लाखै ॥
सो किउ बिसरै जि बिखु ते काढै ॥
जनम जनम का टूटा गाढै ॥
गुरि पूरै ततु इहै बुझाइआ ॥
प्रभु अपना नानक जन धिआइआ ॥४॥
सो किउ बिसरै जि जीवन जीआ ॥
सो किउ बिसरै जि अगनि महि राखै ॥
गुर प्रसादि को बिरला लाखै ॥
सो किउ बिसरै जि बिखु ते काढै ॥
जनम जनम का टूटा गाढै ॥
गुरि पूरै ततु इहै बुझाइआ ॥
प्रभु अपना नानक जन धिआइआ ॥४॥
हिन्दी अर्थ: वह प्रभू क्यों भूल जाए जिसने सब कुछ दिया है। जो जीवों की जिंदगी का आसरा है? वह प्रभू क्यों भूल जाए गर्भ-अग्नि में रक्षा करता है गुरु कृपा से कोई विरला ही इसे समझता है वह अकाल-पुरख क्यूँ बिसर जाए जो (माया-रूप) जहर से बचाता है और कई जनम के बिछुड़े हुए जीव को (अपने साथ) जोड़ लेता है? (जिन सेवकों को) पूरे गुरू ने ये बात समझाई है। हे नानक ! उन्होंने अपने प्रभू को सिमरा है। 4।
ਸਾਜਨ ਸੰਤ ਕਰਹੁ ਇਹੁ ਕਾਮੁ ॥
ਆਨ ਤਿਆਗਿ ਜਪਹੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਖ ਪਾਵਹੁ ॥
ਆਪਿ ਜਪਹੁ ਅਵਰਹ ਨਾਮੁ ਜਪਾਵਹੁ ॥
ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਤਰੀਐ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਬਿਨੁ ਭਗਤੀ ਤਨੁ ਹੋਸੀ ਛਾਰੁ ॥
ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ਸੂਖ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ॥
ਬੂਡਤ ਜਾਤ ਪਾਏ ਬਿਸ੍ਰਾਮੁ ॥
ਸਗਲ ਦੂਖ ਕਾ ਹੋਵਤ ਨਾਸੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਗੁਨਤਾਸੁ ॥੫॥
ਆਨ ਤਿਆਗਿ ਜਪਹੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਖ ਪਾਵਹੁ ॥
ਆਪਿ ਜਪਹੁ ਅਵਰਹ ਨਾਮੁ ਜਪਾਵਹੁ ॥
ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਤਰੀਐ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਬਿਨੁ ਭਗਤੀ ਤਨੁ ਹੋਸੀ ਛਾਰੁ ॥
ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ਸੂਖ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ॥
ਬੂਡਤ ਜਾਤ ਪਾਏ ਬਿਸ੍ਰਾਮੁ ॥
ਸਗਲ ਦੂਖ ਕਾ ਹੋਵਤ ਨਾਸੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਗੁਨਤਾਸੁ ॥੫॥
साजन संत करहु इहु कामु ॥
आन तिआगि जपहु हरि नामु ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुख पावहु ॥
आपि जपहु अवरह नामु जपावहु ॥
भगति भाइ तरीऐ संसारु ॥
बिनु भगती तनु होसी छारु ॥
सरब कलिआण सूख निधि नामु ॥
बूडत जात पाए बिस्रामु ॥
सगल दूख का होवत नासु ॥
नानक नामु जपहु गुनतासु ॥५॥
आन तिआगि जपहु हरि नामु ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुख पावहु ॥
आपि जपहु अवरह नामु जपावहु ॥
भगति भाइ तरीऐ संसारु ॥
बिनु भगती तनु होसी छारु ॥
सरब कलिआण सूख निधि नामु ॥
बूडत जात पाए बिस्रामु ॥
सगल दूख का होवत नासु ॥
नानक नामु जपहु गुनतासु ॥५॥
हिन्दी अर्थ: हे सज्जनों ! हे संत जनों ! ये काम करो। अन्य सभी (प्रयास) छोड़ के प्रभू का नाम जपो। सदा सिमरो और सिमर के सुख हासिल करो। प्रभू का नाम खुद जपो और औरों को भी जपाओ। प्रभू की भगती में नेह लगाने से ये संसार (समुंद्र) तैरते हैं। भगती के बिना ये शरीर किसी काम का नहीं। प्रभू का नाम भले भाग्यों और सारे सुखों का खजाना है। (नाम जपने से विकारों में) डूबते जाते को आसरा ठिकाना मिलता है। (और) सारे दुखों का नाश हो जाता है। (इसलिए) हे नानक ! नाम जपो। (नाम ही) गुणों का खजाना (है)। 5।
ਉਪਜੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪ੍ਰੇਮ ਰਸੁ ਚਾਉ ॥
ਮਨ ਤਨ ਅੰਤਰਿ ਇਹੀ ਸੁਆਉ ॥
ਨੇਤ੍ਰਹੁ ਪੇਖਿ ਦਰਸੁ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਮਨੁ ਬਿਗਸੈ ਸਾਧ ਚਰਨ ਧੋਇ ॥
ਭਗਤ ਜਨਾ ਕੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਰੰਗੁ ॥
ਬਿਰਲਾ ਕੋਊ ਪਾਵੈ ਸੰਗੁ ॥
ਏਕ ਬਸਤੁ ਦੀਜੈ ਕਰਿ ਮਇਆ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਲਇਆ ॥
ਤਾ ਕੀ ਉਪਮਾ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਰਹਿਆ ਸਰਬ ਸਮਾਇ ॥੬॥
ਮਨ ਤਨ ਅੰਤਰਿ ਇਹੀ ਸੁਆਉ ॥
ਨੇਤ੍ਰਹੁ ਪੇਖਿ ਦਰਸੁ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਮਨੁ ਬਿਗਸੈ ਸਾਧ ਚਰਨ ਧੋਇ ॥
ਭਗਤ ਜਨਾ ਕੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਰੰਗੁ ॥
ਬਿਰਲਾ ਕੋਊ ਪਾਵੈ ਸੰਗੁ ॥
ਏਕ ਬਸਤੁ ਦੀਜੈ ਕਰਿ ਮਇਆ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਲਇਆ ॥
ਤਾ ਕੀ ਉਪਮਾ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਰਹਿਆ ਸਰਬ ਸਮਾਇ ॥੬॥
उपजी प्रीति प्रेम रसु चाउ ॥
मन तन अंतरि इही सुआउ ॥
नेत्रहु पेखि दरसु सुखु होइ ॥
मनु बिगसै साध चरन धोइ ॥
भगत जना कै मनि तनि रंगु ॥
बिरला कोऊ पावै संगु ॥
एक बसतु दीजै करि मइआ ॥
गुर प्रसादि नामु जपि लइआ ॥
ता की उपमा कही न जाइ ॥
नानक रहिआ सरब समाइ ॥६॥
मन तन अंतरि इही सुआउ ॥
नेत्रहु पेखि दरसु सुखु होइ ॥
मनु बिगसै साध चरन धोइ ॥
भगत जना कै मनि तनि रंगु ॥
बिरला कोऊ पावै संगु ॥
एक बसतु दीजै करि मइआ ॥
गुर प्रसादि नामु जपि लइआ ॥
ता की उपमा कही न जाइ ॥
नानक रहिआ सरब समाइ ॥६॥
हिन्दी अर्थ: (जिसके अंदर प्रभू की) प्रीति पैदा होती है। प्रभू के प्यार का स्वाद और प्यार पैदा हुआ है। उसके मन में और तन में यही चाहत है (कि नाम की दाति मिले)। आँखों से (गुरू का) दीदार करके उसे सुख होता है। गुरू के चरण धो के उसका मन खिल आता है। भक्तों के मन और शरीर में (प्रभू का) प्यार टिका रहता है। (पर) किसी विरले भाग्यशाली को उनकी संगति नसीब होती है। (हे प्रभू !) मेहर करके एक नाम-वस्तु (हमें) दे। (ता कि) गुरू की कृपा से तेरा नाम जप सकें। उसकी महिमा बयान नहीं की जा सकती। हे नानक ! वह प्रभू सब जगह मौजूद है। 6।
ਪ੍ਰਭ ਬਖਸੰਦ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ॥
ਭਗਤਿ ਵਛਲ ਸਦਾ ਕਿਰਪਾਲ ॥
ਅਨਾਥ ਨਾਥ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਪਾਲ ॥
ਸਰਬ ਘਟਾ ਕਰਤ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਕਾਰਣ ਕਰਤਾਰ ॥
ਭਗਤ ਜਨਾ ਕੇ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰ ॥
ਜੋ ਜੋ ਜਪੈ ਸੁ ਹੋਇ ਪੁਨੀਤ ॥
ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਲਾਵੈ ਮਨ ਹੀਤ ॥
ਹਮ ਨਿਰਗੁਨੀਆਰ ਨੀਚ ਅਜਾਨ ॥
ਨਾਨਕ ਤੁਮਰੀ ਸਰਨਿ ਪੁਰਖ ਭਗਵਾਨ ॥੭॥
ਭਗਤਿ ਵਛਲ ਸਦਾ ਕਿਰਪਾਲ ॥
ਅਨਾਥ ਨਾਥ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਪਾਲ ॥
ਸਰਬ ਘਟਾ ਕਰਤ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਕਾਰਣ ਕਰਤਾਰ ॥
ਭਗਤ ਜਨਾ ਕੇ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰ ॥
ਜੋ ਜੋ ਜਪੈ ਸੁ ਹੋਇ ਪੁਨੀਤ ॥
ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਲਾਵੈ ਮਨ ਹੀਤ ॥
ਹਮ ਨਿਰਗੁਨੀਆਰ ਨੀਚ ਅਜਾਨ ॥
ਨਾਨਕ ਤੁਮਰੀ ਸਰਨਿ ਪੁਰਖ ਭਗਵਾਨ ॥੭॥
प्रभ बखसंद दीन दइआल ॥
भगति वछल सदा किरपाल ॥
अनाथ नाथ गोबिंद गुपाल ॥
सरब घटा करत प्रतिपाल ॥
आदि पुरख कारण करतार ॥
भगत जना के प्रान अधार ॥
जो जो जपै सु होइ पुनीत ॥
भगति भाइ लावै मन हीत ॥
हम निरगुनीआर नीच अजान ॥
नानक तुमरी सरनि पुरख भगवान ॥७॥
भगति वछल सदा किरपाल ॥
अनाथ नाथ गोबिंद गुपाल ॥
सरब घटा करत प्रतिपाल ॥
आदि पुरख कारण करतार ॥
भगत जना के प्रान अधार ॥
जो जो जपै सु होइ पुनीत ॥
भगति भाइ लावै मन हीत ॥
हम निरगुनीआर नीच अजान ॥
नानक तुमरी सरनि पुरख भगवान ॥७॥
हिन्दी अर्थ: हे बख्शनहार प्रभू ! हे गरीबों पे तरस करने वाले ! हे भगती से प्यार करने वाले ! हे सदा दया के घर ! हे अनाथों के नाथ ! हे गोबिंद ! हे गोपाल ! हे सारे शरीरों की पालना करने वाले ! हे सब के आदि और सब में व्यापक प्रभू ! हे (जगत के) मूल ! ळे करतार ! हे भक्तों की जिंदगी के आसरे ! वह पवित्र हो जाता है जो तुझे जपता है और जो मनुष्य भगती भाव से अपने मन में तेरा प्यार टिकाता है हम नीच हैं। अंजान हैं और गुण हीन हैं। हे नानक ! (विनती कर और कह,) हे अकाल-पुरख ! हे भगवान ! हम तेरी शरण आए हैं। 7।
ਸਰਬ ਬੈਕੁੰਠ ਮੁਕਤਿ ਮੋਖ ਪਾਏ ॥
ਏਕ ਨਿਮਖ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਏ ॥
ਅਨਿਕ ਰਾਜ ਭੋਗ ਬਡਿਆਈ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਕੀ ਕਥਾ ਮਨਿ ਭਾਈ ॥
ਬਹੁ ਭੋਜਨ ਕਾਪਰ ਸੰਗੀਤ ॥
ਰਸਨਾ ਜਪਤੀ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨੀਤ ॥
ਭਲੀ ਸੁ ਕਰਨੀ ਸੋਭਾ ਧਨਵੰਤ ॥
ਹਿਰਦੈ ਬਸੇ ਪੂਰਨ ਗੁਰ ਮੰਤ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਪ੍ਰਭ ਦੇਹੁ ਨਿਵਾਸ ॥
ਸਰਬ ਸੂਖ ਨਾਨਕ ਪਰਗਾਸ ॥੮॥੨੦॥
ਏਕ ਨਿਮਖ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਏ ॥
ਅਨਿਕ ਰਾਜ ਭੋਗ ਬਡਿਆਈ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਕੀ ਕਥਾ ਮਨਿ ਭਾਈ ॥
ਬਹੁ ਭੋਜਨ ਕਾਪਰ ਸੰਗੀਤ ॥
ਰਸਨਾ ਜਪਤੀ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨੀਤ ॥
ਭਲੀ ਸੁ ਕਰਨੀ ਸੋਭਾ ਧਨਵੰਤ ॥
ਹਿਰਦੈ ਬਸੇ ਪੂਰਨ ਗੁਰ ਮੰਤ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਪ੍ਰਭ ਦੇਹੁ ਨਿਵਾਸ ॥
ਸਰਬ ਸੂਖ ਨਾਨਕ ਪਰਗਾਸ ॥੮॥੨੦॥
सरब बैकुंठ मुकति मोख पाए ॥
एक निमख हरि के गुन गाए ॥
अनिक राज भोग बडिआई ॥
हरि के नाम की कथा मनि भाई ॥
बहु भोजन कापर संगीत ॥
रसना जपती हरि हरि नीत ॥
भली सु करनी सोभा धनवंत ॥
हिरदै बसे पूरन गुर मंत ॥
साधसंगि प्रभ देहु निवास ॥
सरब सूख नानक परगास ॥८॥२०॥
एक निमख हरि के गुन गाए ॥
अनिक राज भोग बडिआई ॥
हरि के नाम की कथा मनि भाई ॥
बहु भोजन कापर संगीत ॥
रसना जपती हरि हरि नीत ॥
भली सु करनी सोभा धनवंत ॥
हिरदै बसे पूरन गुर मंत ॥
साधसंगि प्रभ देहु निवास ॥
सरब सूख नानक परगास ॥८॥२०॥
हिन्दी अर्थ: उसने (मानो) सारे स्वर्ग और मोक्ष मुक्ति हासिल कर ली है। जिस मनुष्य ने पलक झपकने मात्र समय के लिए भी प्रभू के गुण गाए हैं। उसे (मानो) अनेकों राज-भोग पदार्थ और महिमा मिल गई हैं। जिस मनुष्य के मन को प्रभू के नाम की बातें मीठी लगी हैं। उसे (मानो) कई किस्म के खाने कपड़े और राग रंग हासिल हो गए हैं। जिस मनुष्य की जीभ सदा प्रभू का नाम जपती है। उसी का ही आचरण भला है। उसी को ही शोभा मिलती है। वही धनवान है। जिस मनुष्य के हृदय में पूरे गुरू का उपदेश बसता है। हे प्रभू ! अपने संतों की संगत में जगह दे। हे नानक ! (सत्संग में रहने से) सारे सुखों का प्रकाश हो जाता है। 8। 20।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਸਰਗੁਨ ਨਿਰਗੁਨ ਨਿਰੰਕਾਰ ਸੁੰਨ ਸਮਾਧੀ ਆਪਿ ॥
ਆਪਨ ਕੀਆ ਨਾਨਕਾ ਆਪੇ ਹੀ ਫਿਰਿ ਜਾਪਿ ॥੧॥
ਸਰਗੁਨ ਨਿਰਗੁਨ ਨਿਰੰਕਾਰ ਸੁੰਨ ਸਮਾਧੀ ਆਪਿ ॥
ਆਪਨ ਕੀਆ ਨਾਨਕਾ ਆਪੇ ਹੀ ਫਿਰਿ ਜਾਪਿ ॥੧॥
सलोकु ॥
सरगुन निरगुन निरंकार सुंन समाधी आपि ॥
आपन कीआ नानका आपे ही फिरि जापि ॥१॥
सरगुन निरगुन निरंकार सुंन समाधी आपि ॥
आपन कीआ नानका आपे ही फिरि जापि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ निरंकार (भाव- आकार रहित अकाल पुरख) त्रिगुणी माया का रूप (भाव। जगत रूप) भी खुद ही है और माया के तीनों गुणों से परे भी खुद ही है। निर्विचार अवस्था में टिका हुआ भी स्वयं ही है। हे नानक ! (ये सारा जगत) प्रभू ने खुद ही रचा है (और जगत के जीवों में बैठ के) खुद ही (अपने आप को याद कर रहा है)। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਜਬ ਅਕਾਰੁ ਇਹੁ ਕਛੁ ਨ ਦ੍ਰਿਸਟੇਤਾ ॥
ਪਾਪ ਪੁੰਨ ਤਬ ਕਹ ਤੇ ਹੋਤਾ ॥
ਜਬ ਧਾਰੀ ਆਪਨ ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ॥
ਤਬ ਬੈਰ ਬਿਰੋਧ ਕਿਸੁ ਸੰਗਿ ਕਮਾਤਿ ॥
ਜਬ ਇਸ ਕਾ ਬਰਨੁ ਚਿਹਨੁ ਨ ਜਾਪਤ ॥
ਤਬ ਹਰਖ ਸੋਗ ਕਹੁ ਕਿਸਹਿ ਬਿਆਪਤ ॥
ਜਬ ਆਪਨ ਆਪ ਆਪਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ॥
ਤਬ ਮੋਹ ਕਹਾ ਕਿਸੁ ਹੋਵਤ ਭਰਮ ॥
ਜਬ ਅਕਾਰੁ ਇਹੁ ਕਛੁ ਨ ਦ੍ਰਿਸਟੇਤਾ ॥
ਪਾਪ ਪੁੰਨ ਤਬ ਕਹ ਤੇ ਹੋਤਾ ॥
ਜਬ ਧਾਰੀ ਆਪਨ ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ॥
ਤਬ ਬੈਰ ਬਿਰੋਧ ਕਿਸੁ ਸੰਗਿ ਕਮਾਤਿ ॥
ਜਬ ਇਸ ਕਾ ਬਰਨੁ ਚਿਹਨੁ ਨ ਜਾਪਤ ॥
ਤਬ ਹਰਖ ਸੋਗ ਕਹੁ ਕਿਸਹਿ ਬਿਆਪਤ ॥
ਜਬ ਆਪਨ ਆਪ ਆਪਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ॥
ਤਬ ਮੋਹ ਕਹਾ ਕਿਸੁ ਹੋਵਤ ਭਰਮ ॥
असटपदी ॥
जब अकारु इहु कछु न द्रिसटेता ॥
पाप पुंन तब कह ते होता ॥
जब धारी आपन सुंन समाधि ॥
तब बैर बिरोध किसु संगि कमाति ॥
जब इस का बरनु चिहनु न जापत ॥
तब हरख सोग कहु किसहि बिआपत ॥
जब आपन आप आपि पारब्रहम ॥
तब मोह कहा किसु होवत भरम ॥
जब अकारु इहु कछु न द्रिसटेता ॥
पाप पुंन तब कह ते होता ॥
जब धारी आपन सुंन समाधि ॥
तब बैर बिरोध किसु संगि कमाति ॥
जब इस का बरनु चिहनु न जापत ॥
तब हरख सोग कहु किसहि बिआपत ॥
जब आपन आप आपि पारब्रहम ॥
तब मोह कहा किसु होवत भरम ॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। जब (जगत के जीवों की अभी) कोई शकल नहीं दिखती थी। तब पाप या पुंन किस जीव से हो सकता था? जब (प्रभू ने) खुद शून्य अवस्था में समाधि लगाई हुई थी (भाव जब अपने आप में ही मस्त था) तब (किसने) किसके साथ वैर-विरोध कमाना था? जब इस (जगत) का कोई रंग-रूप ही नहीं था दिखता। तब बताओ खुशी या चिंता किसे छू सकती थी? जब अकाल-पुरख केवल स्वयं ही स्वयं था। तब मोह कहाँ हो सकता था। और भरम-भुलेखे किसको हो सकते थे?
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 290 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
IIT-JEE result का दिन, परिवार phones के पास बैठा।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 60 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 290” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 291 →, पीछे का: ← अंग 289।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।