अंग
261
राग Gauree
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ਓਰੈ ਕਛੂ ਨ ਕਿਨਹੂ ਕੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭੁ ਕਛੁ ਪ੍ਰਭ ਤੇ ਹੂਆ ॥੫੧॥
ਨਾਨਕ ਸਭੁ ਕਛੁ ਪ੍ਰਭ ਤੇ ਹੂਆ ॥੫੧॥
ओरै कछू न किनहू कीआ ॥
नानक सभु कछु प्रभ ते हूआ ॥५१॥
नानक सभु कछु प्रभ ते हूआ ॥५१॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (उस मनुष्य को ये निश्चय हो जाता है कि) परमात्मा से उरे और कोई कुछ भी करने के लायक नहीं। ये सारा जगत-आकार परमात्मा से ही प्रगट हुआ है। 51।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਲੇਖੈ ਕਤਹਿ ਨ ਛੂਟੀਐ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਭੂਲਨਹਾਰ ॥
ਬਖਸਨਹਾਰ ਬਖਸਿ ਲੈ ਨਾਨਕ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰ ॥੧॥
ਲੇਖੈ ਕਤਹਿ ਨ ਛੂਟੀਐ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਭੂਲਨਹਾਰ ॥
ਬਖਸਨਹਾਰ ਬਖਸਿ ਲੈ ਨਾਨਕ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰ ॥੧॥
सलोकु ॥
लेखै कतहि न छूटीऐ खिनु खिनु भूलनहार ॥
बखसनहार बखसि लै नानक पारि उतार ॥१॥
लेखै कतहि न छूटीऐ खिनु खिनु भूलनहार ॥
बखसनहार बखसि लै नानक पारि उतार ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! (कह,) हम जीव छिन छिन भूलें करने वाले हैं। अगर हमारी भूलों का हिसाब किताब हो। तो हम किसी भी तरह इस भार से सुर्खरू नहीं हो सकते। हे बख्शिंद प्रभू ! तू खुद ही हमारी भूलें बख्श। और हमें (विकारों के समुंद्र में डूबतों को) पार लगा। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਲੂਣ ਹਰਾਮੀ ਗੁਨਹਗਾਰ ਬੇਗਾਨਾ ਅਲਪ ਮਤਿ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਜਿਨਿ ਸੁਖ ਦੀਏ ਤਾਹਿ ਨ ਜਾਨਤ ਤਤ ॥
ਲਾਹਾ ਮਾਇਆ ਕਾਰਨੇ ਦਹ ਦਿਸਿ ਢੂਢਨ ਜਾਇ ॥
ਦੇਵਨਹਾਰ ਦਾਤਾਰ ਪ੍ਰਭ ਨਿਮਖ ਨ ਮਨਹਿ ਬਸਾਇ ॥
ਲਾਲਚ ਝੂਠ ਬਿਕਾਰ ਮੋਹ ਇਆ ਸੰਪੈ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਲੰਪਟ ਚੋਰ ਨਿੰਦਕ ਮਹਾ ਤਿਨਹੂ ਸੰਗਿ ਬਿਹਾਇ ॥
ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਬਖਸਿ ਲੈਹਿ ਖੋਟੇ ਸੰਗਿ ਖਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਭਾਵੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਾਹਨ ਨੀਰਿ ਤਰੇ ॥੫੨॥
ਲੂਣ ਹਰਾਮੀ ਗੁਨਹਗਾਰ ਬੇਗਾਨਾ ਅਲਪ ਮਤਿ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਜਿਨਿ ਸੁਖ ਦੀਏ ਤਾਹਿ ਨ ਜਾਨਤ ਤਤ ॥
ਲਾਹਾ ਮਾਇਆ ਕਾਰਨੇ ਦਹ ਦਿਸਿ ਢੂਢਨ ਜਾਇ ॥
ਦੇਵਨਹਾਰ ਦਾਤਾਰ ਪ੍ਰਭ ਨਿਮਖ ਨ ਮਨਹਿ ਬਸਾਇ ॥
ਲਾਲਚ ਝੂਠ ਬਿਕਾਰ ਮੋਹ ਇਆ ਸੰਪੈ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਲੰਪਟ ਚੋਰ ਨਿੰਦਕ ਮਹਾ ਤਿਨਹੂ ਸੰਗਿ ਬਿਹਾਇ ॥
ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਬਖਸਿ ਲੈਹਿ ਖੋਟੇ ਸੰਗਿ ਖਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਭਾਵੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਾਹਨ ਨੀਰਿ ਤਰੇ ॥੫੨॥
पउड़ी ॥
लूण हरामी गुनहगार बेगाना अलप मति ॥
जीउ पिंडु जिनि सुख दीए ताहि न जानत तत ॥
लाहा माइआ कारने दह दिसि ढूढन जाइ ॥
देवनहार दातार प्रभ निमख न मनहि बसाइ ॥
लालच झूठ बिकार मोह इआ संपै मन माहि ॥
लंपट चोर निंदक महा तिनहू संगि बिहाइ ॥
तुधु भावै ता बखसि लैहि खोटे संगि खरे ॥
नानक भावै पारब्रहम पाहन नीरि तरे ॥५२॥
लूण हरामी गुनहगार बेगाना अलप मति ॥
जीउ पिंडु जिनि सुख दीए ताहि न जानत तत ॥
लाहा माइआ कारने दह दिसि ढूढन जाइ ॥
देवनहार दातार प्रभ निमख न मनहि बसाइ ॥
लालच झूठ बिकार मोह इआ संपै मन माहि ॥
लंपट चोर निंदक महा तिनहू संगि बिहाइ ॥
तुधु भावै ता बखसि लैहि खोटे संगि खरे ॥
नानक भावै पारब्रहम पाहन नीरि तरे ॥५२॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मनुष्य ना-शुक्रगुजार है, गुनाहगार है, होछी मति वाला है। परमात्मा से बेगाना हो के रहता है। जिस प्रभू ने ये जिंद और शरीर दिए हैं, उस अस्लियत को पहचानता ही नहीं। माया कमाने की खातिर दसों दिशाओं में (माया) तलाशता फिरता है। पर जो प्रभू दातार सब कुछ देने के काबिल है, उसे आँख झपकने जितने समय के लिए भी मन में नहीं बसाता। लालच-झूठ-विकार और माया का मोह- बस ! यही धन मनुष्य अपने मन में संभाले बैठा है। जो विषयी हैं,चोर हैं, महा निंदक हैं, उनकी संगति में इसकी उम्र बीतती है। (पर। हे प्रभू !) यदि तुझे ठीक लगे तो तू खुद ही खोटों को खरों की संगति में रख के बख्श लेता है। हे नानक ! अगर परमात्मा को ठीक लगे तो वह (विचारों से) पत्थर दिल हो चुके लोगों को नाम-अमृत की दाति दे कर (विकारों की लहरों में डूबने से) बचा लेता है। 52।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਖਾਤ ਪੀਤ ਖੇਲਤ ਹਸਤ ਭਰਮੇ ਜਨਮ ਅਨੇਕ ॥
ਭਵਜਲ ਤੇ ਕਾਢਹੁ ਪ੍ਰਭੂ ਨਾਨਕ ਤੇਰੀ ਟੇਕ ॥੧॥
ਖਾਤ ਪੀਤ ਖੇਲਤ ਹਸਤ ਭਰਮੇ ਜਨਮ ਅਨੇਕ ॥
ਭਵਜਲ ਤੇ ਕਾਢਹੁ ਪ੍ਰਭੂ ਨਾਨਕ ਤੇਰੀ ਟੇਕ ॥੧॥
सलोकु ॥
खात पीत खेलत हसत भरमे जनम अनेक ॥
भवजल ते काढहु प्रभू नानक तेरी टेक ॥१॥
खात पीत खेलत हसत भरमे जनम अनेक ॥
भवजल ते काढहु प्रभू नानक तेरी टेक ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! (कह,) हे प्रभू ! हम जीव मायावी पदार्थ ही खाते-पीते, और माया के रंग तमाशों में हंसते खेलते अनेकों जूनियों में भटकते आ रहे हैं। हमें तू स्वयं ही संसार समुंद्र में से निकाल। हमें तेरा ही आसरा है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਖੇਲਤ ਖੇਲਤ ਆਇਓ ਅਨਿਕ ਜੋਨਿ ਦੁਖ ਪਾਇ ॥
ਖੇਦ ਮਿਟੇ ਸਾਧੂ ਮਿਲਤ ਸਤਿਗੁਰ ਬਚਨ ਸਮਾਇ ॥
ਖਿਮਾ ਗਹੀ ਸਚੁ ਸੰਚਿਓ ਖਾਇਓ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮ ॥
ਖਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਠਾਕੁਰ ਭਈ ਅਨਦ ਸੂਖ ਬਿਸ੍ਰਾਮ ॥
ਖੇਪ ਨਿਬਾਹੀ ਬਹੁਤੁ ਲਾਭ ਘਰਿ ਆਏ ਪਤਿਵੰਤ ॥
ਖਰਾ ਦਿਲਾਸਾ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਆਇ ਮਿਲੇ ਭਗਵੰਤ ॥
ਆਪਨ ਕੀਆ ਕਰਹਿ ਆਪਿ ਆਗੈ ਪਾਛੈ ਆਪਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋਊ ਸਰਾਹੀਐ ਜਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਹਿਆ ਬਿਆਪਿ ॥੫੩॥
ਖੇਲਤ ਖੇਲਤ ਆਇਓ ਅਨਿਕ ਜੋਨਿ ਦੁਖ ਪਾਇ ॥
ਖੇਦ ਮਿਟੇ ਸਾਧੂ ਮਿਲਤ ਸਤਿਗੁਰ ਬਚਨ ਸਮਾਇ ॥
ਖਿਮਾ ਗਹੀ ਸਚੁ ਸੰਚਿਓ ਖਾਇਓ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮ ॥
ਖਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਠਾਕੁਰ ਭਈ ਅਨਦ ਸੂਖ ਬਿਸ੍ਰਾਮ ॥
ਖੇਪ ਨਿਬਾਹੀ ਬਹੁਤੁ ਲਾਭ ਘਰਿ ਆਏ ਪਤਿਵੰਤ ॥
ਖਰਾ ਦਿਲਾਸਾ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਆਇ ਮਿਲੇ ਭਗਵੰਤ ॥
ਆਪਨ ਕੀਆ ਕਰਹਿ ਆਪਿ ਆਗੈ ਪਾਛੈ ਆਪਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋਊ ਸਰਾਹੀਐ ਜਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਹਿਆ ਬਿਆਪਿ ॥੫੩॥
पउड़ी ॥
खेलत खेलत आइओ अनिक जोनि दुख पाइ ॥
खेद मिटे साधू मिलत सतिगुर बचन समाइ ॥
खिमा गही सचु संचिओ खाइओ अंम्रितु नाम ॥
खरी क्रिपा ठाकुर भई अनद सूख बिस्राम ॥
खेप निबाही बहुतु लाभ घरि आए पतिवंत ॥
खरा दिलासा गुरि दीआ आइ मिले भगवंत ॥
आपन कीआ करहि आपि आगै पाछै आपि ॥
नानक सोऊ सराहीऐ जि घटि घटि रहिआ बिआपि ॥५३॥
खेलत खेलत आइओ अनिक जोनि दुख पाइ ॥
खेद मिटे साधू मिलत सतिगुर बचन समाइ ॥
खिमा गही सचु संचिओ खाइओ अंम्रितु नाम ॥
खरी क्रिपा ठाकुर भई अनद सूख बिस्राम ॥
खेप निबाही बहुतु लाभ घरि आए पतिवंत ॥
खरा दिलासा गुरि दीआ आइ मिले भगवंत ॥
आपन कीआ करहि आपि आगै पाछै आपि ॥
नानक सोऊ सराहीऐ जि घटि घटि रहिआ बिआपि ॥५३॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मनुष्य मायावी रंगों में मन परचाता परचाता अनेकों जूनियों में से गुजरता दुख पाता आता है। अगर गुरू मिल जाए। अगर गुरू के बचनों में चिक्त जुड़ जाए। तो सारे दुख कलेश मिट जाते हैं। जिसने (गुरू दर से) क्षमा का स्वभाव ग्रहण कर लिया। नाम-धन इकट्ठा किया। नाम अमृत को अपनी आत्मिक खुराक बनाया उस पर परमात्मा की बड़ी मेहर होती है। वह आत्मिक आनन्द-सुख में टिका रहता है। जिस मनुष्य ने (गुरू से जाच सीख के सिफत सालाह का) वणज-व्यापार (सारी उम्र) भर निभाया। उसने लाभ कमाया। वह (भटकना से बच के) अडोल मन हो जाता है और आदर कमाता है। गुरू ने उसे और अच्छी दिलासा दी। और वह भगवान के चरणों में जुड़ा। (पर ये सब प्रभू की मेहर है)। हे प्रभू ! ये सारा खेल तूने ही किया है। अब भी तू ही सब कुछ कर रहा है। लोक-परलोक में जीवों का रक्षक तू स्वयं ही है। हे नानक ! जो प्रभू हरेक शरीर में मौजूद है। सदा उसी की ही सिफत सालाह करनी चाहिए। 53।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਆਏ ਪ੍ਰਭ ਸਰਨਾਗਤੀ ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਦਇਆਲ ॥
ਏਕ ਅਖਰੁ ਹਰਿ ਮਨਿ ਬਸਤ ਨਾਨਕ ਹੋਤ ਨਿਹਾਲ ॥੧॥
ਆਏ ਪ੍ਰਭ ਸਰਨਾਗਤੀ ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਦਇਆਲ ॥
ਏਕ ਅਖਰੁ ਹਰਿ ਮਨਿ ਬਸਤ ਨਾਨਕ ਹੋਤ ਨਿਹਾਲ ॥੧॥
सलोकु ॥
आए प्रभ सरनागती किरपा निधि दइआल ॥
एक अखरु हरि मनि बसत नानक होत निहाल ॥१॥
आए प्रभ सरनागती किरपा निधि दइआल ॥
एक अखरु हरि मनि बसत नानक होत निहाल ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे प्रभू ! हे कृपा के खजाने ! हे दयाल ! हम तेरी शरण आए हैं। हे नानक ! (कह,) जिनके मन में एक अविनाशी प्रभू बसता रहता है। उनका मन सदा खिला रहता है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਅਖਰ ਮਹਿ ਤ੍ਰਿਭਵਨ ਪ੍ਰਭਿ ਧਾਰੇ ॥
ਅਖਰ ਕਰਿ ਕਰਿ ਬੇਦ ਬੀਚਾਰੇ ॥
ਅਖਰ ਸਾਸਤ੍ਰ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਪੁਰਾਨਾ ॥
ਅਖਰ ਨਾਦ ਕਥਨ ਵਖੵਾਨਾ ॥
ਅਖਰ ਮੁਕਤਿ ਜੁਗਤਿ ਭੈ ਭਰਮਾ ॥
ਅਖਰ ਕਰਮ ਕਿਰਤਿ ਸੁਚ ਧਰਮਾ ॥
ਦ੍ਰਿਸਟਿਮਾਨ ਅਖਰ ਹੈ ਜੇਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਿਰਲੇਪਾ ॥੫੪॥
ਅਖਰ ਮਹਿ ਤ੍ਰਿਭਵਨ ਪ੍ਰਭਿ ਧਾਰੇ ॥
ਅਖਰ ਕਰਿ ਕਰਿ ਬੇਦ ਬੀਚਾਰੇ ॥
ਅਖਰ ਸਾਸਤ੍ਰ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਪੁਰਾਨਾ ॥
ਅਖਰ ਨਾਦ ਕਥਨ ਵਖੵਾਨਾ ॥
ਅਖਰ ਮੁਕਤਿ ਜੁਗਤਿ ਭੈ ਭਰਮਾ ॥
ਅਖਰ ਕਰਮ ਕਿਰਤਿ ਸੁਚ ਧਰਮਾ ॥
ਦ੍ਰਿਸਟਿਮਾਨ ਅਖਰ ਹੈ ਜੇਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਿਰਲੇਪਾ ॥੫੪॥
पउड़ी ॥
अखर महि त्रिभवन प्रभि धारे ॥
अखर करि करि बेद बीचारे ॥
अखर सासत्र सिंम्रिति पुराना ॥
अखर नाद कथन वखॵाना ॥
अखर मुकति जुगति भै भरमा ॥
अखर करम किरति सुच धरमा ॥
द्रिसटिमान अखर है जेता ॥
नानक पारब्रहम निरलेपा ॥५४॥
अखर महि त्रिभवन प्रभि धारे ॥
अखर करि करि बेद बीचारे ॥
अखर सासत्र सिंम्रिति पुराना ॥
अखर नाद कथन वखॵाना ॥
अखर मुकति जुगति भै भरमा ॥
अखर करम किरति सुच धरमा ॥
द्रिसटिमान अखर है जेता ॥
नानक पारब्रहम निरलेपा ॥५४॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- ये तीनों भवन (सारा ही जगत) प्रभू ने अपने हुकम में ही रचे हैं। प्रभू के हुकम के अनुसार ही वेद रचे गए, और विचारे गए। सारे शास्त्र-स्मृतियां और पुराण प्रभू के हुकम का प्रगटावा हैं। इन पुराणों-शास्त्रों और स्मृतियों की कीर्तन कथा और व्याख्या भी प्रभू के हुकम का ही ज़हूर हैं। दुनिया के डरों-भरमों से निजात ढूँढनी भी प्रभू के हुकम का प्रकाश है। (मानस जन्म में) करनेयोग्य कामों की पहिचान करनी आत्मिक पवित्रता के नियमों की तलाश- ये भी प्रभू के हुकम का ही दृश्य है। हे नानक ! जितना भी ये दिखाई दे रहा संसार है। ये सारा ही प्रभू के हुकम का सरगुण स्वरूप है। पर (हुकम का मालिक) प्रभू खुद (इस सारे पसारे के) प्रभाव से परे है। 54।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਹਥਿ ਕਲੰਮ ਅਗੰਮ ਮਸਤਕਿ ਲਿਖਾਵਤੀ ॥
ਉਰਝਿ ਰਹਿਓ ਸਭ ਸੰਗਿ ਅਨੂਪ ਰੂਪਾਵਤੀ ॥
ਉਸਤਤਿ ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ਮੁਖਹੁ ਤੁਹਾਰੀਆ ॥
ਮੋਹੀ ਦੇਖਿ ਦਰਸੁ ਨਾਨਕ ਬਲਿਹਾਰੀਆ ॥੧॥
ਹਥਿ ਕਲੰਮ ਅਗੰਮ ਮਸਤਕਿ ਲਿਖਾਵਤੀ ॥
ਉਰਝਿ ਰਹਿਓ ਸਭ ਸੰਗਿ ਅਨੂਪ ਰੂਪਾਵਤੀ ॥
ਉਸਤਤਿ ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ਮੁਖਹੁ ਤੁਹਾਰੀਆ ॥
ਮੋਹੀ ਦੇਖਿ ਦਰਸੁ ਨਾਨਕ ਬਲਿਹਾਰੀਆ ॥੧॥
सलोकु ॥
हथि कलंम अगंम मसतकि लिखावती ॥
उरझि रहिओ सभ संगि अनूप रूपावती ॥
उसतति कहनु न जाइ मुखहु तुहारीआ ॥
मोही देखि दरसु नानक बलिहारीआ ॥१॥
हथि कलंम अगंम मसतकि लिखावती ॥
उरझि रहिओ सभ संगि अनूप रूपावती ॥
उसतति कहनु न जाइ मुखहु तुहारीआ ॥
मोही देखि दरसु नानक बलिहारीआ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ अपहुँच हरी के हाथ में (हुकम रूप) कलम (पकड़ी हुई) है। (सब जीवों के) माथे पर (अपनी हुकम रूपी कलम से जीवों के किए कर्मों अनुसार लेख) लिखे जा रहा है। वह सुंदर रूप वाला प्रभू सब जीवों के साथ (ताने बाने की तरह) मिला हुआ है (इस वास्ते कोई लेख गलत नहीं लिखा जाता)। हे नानक ! (कह,) हे प्रभू ! मुझसे अपने मुँह से तेरी उपमा बयान नहीं की जा सकती। तेरा दर्शन करके मेरी जिंद मस्त हो रही है। सदके सदके हो रही है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਹੇ ਅਚੁਤ ਹੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਘਨਾਸ ॥
ਹੇ ਪੂਰਨ ਹੇ ਸਰਬ ਮੈ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਗੁਣਤਾਸ ॥
ਹੇ ਸੰਗੀ ਹੇ ਨਿਰੰਕਾਰ ਹੇ ਨਿਰਗੁਣ ਸਭ ਟੇਕ ॥
ਹੇ ਗੋਬਿਦ ਹੇ ਗੁਣ ਨਿਧਾਨ ਜਾ ਕੈ ਸਦਾ ਬਿਬੇਕ ॥
ਹੇ ਅਪਰੰਪਰ ਹਰਿ ਹਰੇ ਹਹਿ ਭੀ ਹੋਵਨਹਾਰ ॥
ਹੇ ਸੰਤਹ ਕੈ ਸਦਾ ਸੰਗਿ ਨਿਧਾਰਾ ਆਧਾਰ ॥
ਹੇ ਠਾਕੁਰ ਹਉ ਦਾਸਰੋ ਮੈ ਨਿਰਗੁਨ ਗੁਨੁ ਨਹੀ ਕੋਇ ॥
ਹੇ ਅਚੁਤ ਹੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਘਨਾਸ ॥
ਹੇ ਪੂਰਨ ਹੇ ਸਰਬ ਮੈ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਗੁਣਤਾਸ ॥
ਹੇ ਸੰਗੀ ਹੇ ਨਿਰੰਕਾਰ ਹੇ ਨਿਰਗੁਣ ਸਭ ਟੇਕ ॥
ਹੇ ਗੋਬਿਦ ਹੇ ਗੁਣ ਨਿਧਾਨ ਜਾ ਕੈ ਸਦਾ ਬਿਬੇਕ ॥
ਹੇ ਅਪਰੰਪਰ ਹਰਿ ਹਰੇ ਹਹਿ ਭੀ ਹੋਵਨਹਾਰ ॥
ਹੇ ਸੰਤਹ ਕੈ ਸਦਾ ਸੰਗਿ ਨਿਧਾਰਾ ਆਧਾਰ ॥
ਹੇ ਠਾਕੁਰ ਹਉ ਦਾਸਰੋ ਮੈ ਨਿਰਗੁਨ ਗੁਨੁ ਨਹੀ ਕੋਇ ॥
पउड़ी ॥
हे अचुत हे पारब्रहम अबिनासी अघनास ॥
हे पूरन हे सरब मै दुख भंजन गुणतास ॥
हे संगी हे निरंकार हे निरगुण सभ टेक ॥
हे गोबिद हे गुण निधान जा कै सदा बिबेक ॥
हे अपरंपर हरि हरे हहि भी होवनहार ॥
हे संतह कै सदा संगि निधारा आधार ॥
हे ठाकुर हउ दासरो मै निरगुन गुनु नही कोइ ॥
हे अचुत हे पारब्रहम अबिनासी अघनास ॥
हे पूरन हे सरब मै दुख भंजन गुणतास ॥
हे संगी हे निरंकार हे निरगुण सभ टेक ॥
हे गोबिद हे गुण निधान जा कै सदा बिबेक ॥
हे अपरंपर हरि हरे हहि भी होवनहार ॥
हे संतह कै सदा संगि निधारा आधार ॥
हे ठाकुर हउ दासरो मै निरगुन गुनु नही कोइ ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- हे नानक ! (अरदास कर और कह,) हे कभी ना डोलने वाले परमात्मा ! हे नाश रहित प्रभू ! हे जीवों के पाप नाश करने वाले ! हे सारे जीवों में व्यापक पूर्ण प्रभू ! हे जीवों के दुख दूर करने वाले ! हे गुणों के खजाने ! हे सब के साथी ! (और फिर भी) आकार-रहित प्रभू ! हे माया के प्रभाव से अलग रहने वाले ! हे सब जीवों के आसरे ! हे सृष्टि की सार लेने वाले ! हे गुणों के खजाने ! जिसके अंदर परख करने की ताकत सदा कायम है ! हे परे से परे प्रभू ! तू अब भी मौजूद है। तू सदा के लिए कायम रहने वाला है। हे संतों के सदा सहाई ! हे निआसरों के आसरे ! हे सृष्टि के पालक ! मैं तेरा छोटा सा दास हूँ। मैं गुण-हीन हूँ। मेरे में कोई गुण नहीं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 261 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Khan Market की किताबों की दुकान में किसी पुरानी कविता-book को उठाते-उठाते।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 51 पंक्तियों का है, 9 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 261” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 262 →, पीछे का: ← अंग 260।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।