विष्णु सहस्रनाम

॥ श्री विष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
भीष्म-पितामह ने युधिष्ठिर को सुनाई। महर्षि वेद-व्यास के महाभारत में संगृहीत।

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद् भूतभृद् भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥

विश्व-रूप, विष्णु, वषट्कार, भूत-भव्य-भविष्य के प्रभु, भूतों के निर्माता, भूतों के पालक, सबके आत्मा।

विष्णु सहस्रनाम, पहले आठ नाम

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विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र, यानी “भगवान विष्णु के एक हज़ार नाम।”

यह महाभारत के अनुशासन-पर्व का, एक सौ उनचासवें अध्याय का अंश है। कुरुक्षेत्र का संग्राम समाप्त हो चुका था। भीष्म पितामह बाण-शय्या पर पड़े थे, महीनों से, उत्तरायण की प्रतीक्षा में, क्योंकि इच्छा-मृत्यु का वर उन्हें प्राप्त था। युधिष्ठिर का मन इतने संहार के बाद शोक और संदेह से भारी था।

उसी अवसर पर भीष्मजी ने अपने पौत्र को एक हज़ार नामों का यह उपहार दिया, एक ही ईश्वर के। युधिष्ठिर के प्रश्नों का उत्तर एक सूत्र में आता है, कि वसुदेव-नंदन ही सबसे ऊँचे हैं, और उनकी स्तुति ही सबसे बड़ा धर्म है।

आदि शंकराचार्य ने इस पर भाष्य रचा। आज भी यह स्तोत्र घरों और मंदिरों में, प्रातः-संध्या गूँजता है।

नीचे न्यास, ध्यान, फिर एक सौ आठ नाम-श्लोक, और अंत में फलश्रुति तथा उत्तर-पीठिका है। हर श्लोक-समूह से पहले उसका भाव सरल हिन्दी में पिरो दिया है, ताकि नाम केवल पढ़े न जाएँ, अनुभव में उतरें।

पूर्व-पीठिका

युधिष्ठिर का प्रश्न और भीष्म का उत्तर

पाठ का आरंभ मंगल-ध्यान से होता है। सफ़ेद वस्त्र, चाँद-सा वर्ण, चार भुजाएँ, प्रसन्न मुख, ऐसे विष्णु को मन में बसाकर साधक पहले विघ्नों की शांति माँगता है, फिर गणेशजी सहित जिन सैकड़ों पार्षदों के स्वामी विष्वक्सेन हैं उनकी शरण लेता है।

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ 1 ॥
यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परश्शतम् । विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ 2 ॥

इसके बाद वंदना उन महर्षि व्यास की है जिन्होंने यह स्तोत्र महाभारत में संगृहीत किया। वसिष्ठ के पौत्र, शक्ति के पुत्र, पराशर के पुत्र, शुकदेव के पिता, निष्पाप तपोनिधि व्यास को विष्णु का ही रूप मानकर बार-बार नमन किया जाता है, क्योंकि व्यास-रूप और विष्णु-रूप में कोई भेद नहीं।

व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् । पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ 3 ॥
व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ 4 ॥

फिर स्वयं विष्णु का स्वरूप-स्मरण है। विकार-रहित, शुद्ध, नित्य, सदा एकरूप वह परमात्मा जिनके स्मरण-मात्र से जन्म-मृत्यु का बंधन कट जाता है, उन्हीं सर्व-व्यापी, सर्व-विजयी प्रभु को प्रणाम करके भूमिका पूरी होती है।

अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ 5 ॥
यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् । विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ 6 ॥

अब कथा का सूत्र खुलता है। वैशम्पायन बताते हैं कि सारे धर्मों और पवित्र कथाओं को सुन चुकने पर भी युधिष्ठिर का मन शांत नहीं हुआ था, और उन्होंने शांतनु-पुत्र भीष्म से फिर वही मूल प्रश्न पूछे, इस लोक में एक ही देवता कौन है, एक ही परम आश्रय कौन, किसकी स्तुति से मनुष्य श्रेष्ठ फल पाता है, सब धर्मों में श्रेष्ठ धर्म कौन-सा है, और किसका जप जन्म-मरण से छुड़ा देता है।

श्रीवैशम्पायन उवाच । श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः । युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ 7 ॥
युधिष्ठिर उवाच । किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् । स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ 8 ॥
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः । किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ 9 ॥

भीष्म का उत्तर सीधा है। जगत के प्रभु, देवों के देव, अनंत पुरुषोत्तम के सहस्र-नामों की स्तुति करने वाला मनुष्य सदा जाग्रत रहता है। उसी अविनाशी पुरुष की भक्ति-पूर्वक पूजा, ध्यान और नमन करते हुए, अनादि-अनंत विष्णु की नित्य स्तुति करने वाला सब दुखों से पार उतर जाता है।

श्री भीष्म उवाच । जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ 10 ॥
On a bed of arrows, Bhishma teaches the thousand names
भीष्म-युधिष्ठिर संवाद
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायन् स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ 11 ॥
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ 12 ॥

भीष्म उन्हीं की महिमा गिनाते हैं। वे ब्राह्मण-प्रिय हैं, सर्व-धर्म के ज्ञाता, लोकों की कीर्ति बढ़ाने वाले, सब प्राणियों के जन्म-स्थान। यही भीष्म का निश्चय है कि सब धर्मों का सर्वोत्तम धर्म यही है, कि मनुष्य भक्ति से कमल-नयन श्रीहरि की स्तुति-स्तोत्रों से नित्य अर्चना करे।

ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ 13 ॥
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ 14 ॥

फिर वे उस परम तत्त्व की ओर संकेत करते हैं। जो परम तेज है, परम तप, परम ब्रह्म, अंतिम आश्रय; जो पवित्रों का भी पवित्र और मंगलों का भी मंगल है, देवों का भी देवता, सब प्राणियों का अव्यय पिता; जिनसे युग के आरंभ में सब प्राणी जन्म लेते हैं और युग के अंत में जिनमें लौट जाते हैं। उन्हीं जगन्नाथ विष्णु के पाप-भय-नाशक सहस्र-नाम सुनने को भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं।

परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ 15 ॥
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् । दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ 16 ॥
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे । यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ 17 ॥
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते । विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥ 18 ॥

ये नाम कल्पित नहीं हैं। ऋषियों के गाए हुए ये गुण-वाचक नाम हैं, जो विष्णु के किसी-न-किसी गुण या लीला से उपजे हैं। इस सहस्रनाम के ऋषि स्वयं वेदव्यास हैं, छन्द अनुष्टुप् है, और देवता देवकी-पुत्र श्रीकृष्ण। बीज, शक्ति और हृदय-मंत्र निर्दिष्ट करके भीष्म कहते हैं कि यह पाठ मन की शांति के लिए किया जाता है, और अंत में विष्णु, जिष्णु, महाविष्णु, प्रभविष्णु, पुरुषोत्तम को नमन करते हैं।

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः । ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ 19 ॥
ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः । छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥ 20 ॥
अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः । त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते ॥ 21 ॥
विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् । अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् ॥ 22 ॥

न्यास

ऋषि, छन्द और देवता का संकल्प

पाठ से पहले न्यास का संकल्प होता है। साधक ऋषि, छन्द और देवता का स्मरण करता है, और बीज, शक्ति, कीलक, अस्त्र, नेत्र, कवच तथा दिग्बंध के रूप में स्तोत्र के ही कुछ नामों को अपने अंगों पर स्थापित करता है। यह सारा विनियोग श्री महाविष्णु की प्रीति के लिए है।

अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्र महामन्त्रस्य श्री वेदव्यासो भगवानृषिः अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता, अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम्, देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः, उद्भवः क्षोभणो देव इति परमो मन्त्रः, शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम्, शार्‍ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम्, रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति नेत्रम्, त्रिसामा सामगस्सामेति कवचम्, आनन्दं परब्रह्मेति योनिः, ऋतुस्सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः, श्री विश्वरूप इति ध्यानम्, श्रीमहाविष्णु प्रीत्यर्थे सहस्रनाम जपे विनियोगः ॥

ध्यानम्

ध्यान-श्लोक

अब ध्यान का अवसर है, जहाँ शब्द से पहले रूप मन में उतरता है। पहला चित्र क्षीर-सागर का है, रत्न-जड़ी रेती, मोतियों का आसन, ऊपर मेघों से अमृत की वर्षा, और शंख-चक्र-गदा-कमल लिए आनंद-स्वरूप मुकुन्द।

ध्यानम् । क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकते मौक्तिकानां मालाक्लुप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः । शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूषवर्षै- -रानन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदाशङ्खपाणिर्मुकुन्दः ॥ 1 ॥
Vishnu reclining on the serpent Shesha
शेषशायी नारायण

दूसरा ध्यान विश्वरूप का है। जिनके चरण पृथ्वी, नाभि आकाश, श्वास वायु, नेत्र सूर्य-चंद्र, कान दिशाएँ, सिर स्वर्ग और मुख अग्नि है, जिनके भीतर सारा विश्व अपने देव-मनुष्य-नाग-गन्धर्व सहित बसा है, वही त्रिभुवन-शरीर विष्णु ध्यान के विषय बनते हैं।

भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे कर्णावासाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः । अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवनवपुषं विष्णुमीशं नमामि ॥ 2 ॥
All the worlds within one body
विश्वरूप दर्शन

फिर वह सबसे प्रसिद्ध रूप आता है, जो घर-घर में गाया जाता है। शांत-स्वरूप, शेष-शय्या पर लेटे, कमल-नाभि, मेघ-वर्ण, लक्ष्मी के प्रिय, कमल-नयन, योगियों के हृदय में ही अनुभव में आने वाले, भव-भय हरने वाले सर्व-लोक-नाथ विष्णु। आगे के ध्यान-श्लोक उसी रूप को और सजाते हैं, मेघश्याम पीताम्बरधारी, श्रीवत्स और कौस्तुभ से दीप्त, शंख-चक्र-मुकुट-कुंडल से मंडित, और अंत में पारिजात की छाया में रुक्मिणी-सत्यभामा सहित विराजमान कृष्ण-रूप।

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाकारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिहृद्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ 3 ॥
मेघश्यामं पीतकौशेयवासं श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम् । पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम् ॥ 4 ॥
नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते । अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ 5 ॥
सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् । सहारवक्षःस्थलशोभिकौस्तुभं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥ 6 ॥
छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलङ्कृतम् । चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसं रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये ॥ 7 ॥

सहस्रनाम

एक सौ आठ श्लोक · विष्णु के एक हज़ार नाम

अब वह सहस्र-धारा बहती है। पहला ही नाम सब कुछ कह देता है, यह सारा विश्व विष्णु से अभिन्न है, वही भूत-वर्तमान-भविष्य के प्रभु, वही सृष्टि, वही पालन, वही सबकी अंतरात्मा। आगे के नाम इसी एक सत्य को अनेक कोणों से खोलते हैं, पूतात्मा, परमात्मा, मुक्तों की परम गति, अविनाशी, सबके साक्षी, क्षेत्र को जानने वाले अक्षर।

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः । भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ 1॥
Devas and asuras churn the cosmic ocean using Mount Mandara and the serpent Vasuki
समुद्र मन्थन

विश्वम्शंकराचार्य के अनुसार “विश्” धातु से बना यह नाम कहता है कि सारा विश्व जिनसे प्रकट होकर जिनमें ही स्थित है, और प्रलय में जिनमें लौट जाता है, वही विष्णु इस विश्व-रूप से अभिन्न हैं। पहला ही नाम कारण और कार्य की एकता की ओर संकेत करता है, जैसे मिट्टी से बने घड़े का आकार मिट्टी से भिन्न नहीं।

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः । अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ 2॥
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः । नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ 3॥
Neither man nor beast, neither day nor night
नरसिंह

नारायण“नार” का अर्थ है जल अथवा समस्त जीव-समूह, और “अयन” का अर्थ है निवास तथा आश्रय। नारायण वे हैं जो समस्त प्राणियों के अयन हैं, और जिनका अयन भी वे ही जल हैं। प्रलय की एकार्णव-दशा में शेष-शय्या पर शयन करते हुए नारायण का यही रूप दिखाया जाता है।

यहाँ नाम सृष्टि, स्थिति और संहार, तीनों को एक ही हाथ में रख देते हैं। सर्व, शिव, स्थाणु, सम्भव, भर्ता, स्वयम्भू, धाता, विधाता; जो स्वयं प्रकट होते हैं और जिनसे सब रचा जाता है। हृषीकेश इन्द्रियों के स्वामी हैं, पद्मनाभ की नाभि-कमल से सृष्टि उपजती है, और माधव-मधुसूदन लक्ष्मी-पति होकर भी असुर-संहारक हैं।

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः । सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ 4॥
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ 5॥
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ 6॥
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः । प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ 7॥
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ 8॥

अगली लहर पराक्रम और ज्ञान की है। ईश्वर, विक्रमी, धन्वी, मेधावी, अनुत्तम, दुराधर्ष; जिनसे श्रेष्ठ कोई नहीं और जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता। साथ ही कृतज्ञ, जो जीवों के सब कर्मों को जानते हैं, और आत्मवान्, जो अपनी ही महिमा में स्थित हैं। इन्हीं के बीच शरण, शर्म, अच्युत जैसे कोमल नाम भी आते हैं, जो शक्ति के साथ करुणा को जोड़ते हैं।

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः । अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ 9॥

यज्ञ-वाचक नामयज्ञ-कर्ता, यज्ञ-भोक्ता, यज्ञ-अंग, यज्ञ-साधन, यज्ञ-पालक, सहस्रनाम में यज्ञ से जुड़े अनेक नाम बार-बार आते हैं। शंकराचार्य इनका अर्थ यही करते हैं कि यज्ञ का अधिष्ठाता, उसका विधान, उसका फल और स्वयं यज्ञ-स्वरूप, सब विष्णु ही हैं। गीता में भी कहा गया है कि यज्ञ ब्रह्म से उपजा और ब्रह्म में ही प्रतिष्ठित है।

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः । अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ 10॥
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः । वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ 11॥
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः । अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ 12॥

यहाँ काल स्वयं प्रभु के हाथ में घूमता है। ऋतु, सुदर्शन, काल; जो सबकी गणना और संहार करते हैं, पर स्वयं काल से परे हैं। विस्तार, बीजमव्ययम्, महाकोश, महाधन; अविनाशी बीज जिससे सृष्टि उपजती है और अनंत ऐश्वर्य जिसके वे स्वामी हैं।

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः । अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ 13॥

सुदर्शन-चक्रविष्णु के कर में घूमता सुदर्शन-चक्र उनकी संहार-शक्ति का प्रतीक है, और परंपरा इसे काल का स्वरूप मानती है। सहस्रनाम में आगे “ऋतुः सुदर्शनः कालः” आता है, अर्थात् ऋतु, सुदर्शन और काल, ये भी विष्णु के ही नाम हैं। जो काल-चक्र से परे है, वही विष्णु है।

Time itself spinning in the Lord's hand
सुदर्शन चक्र
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ 14॥
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ 15॥
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ 16॥
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः । अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ 17॥
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः । अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ 18॥

फिर “महा” शब्द बार-बार गूँजता है, मानो हर गुण अपनी अंतिम सीमा तक खिंच गया हो। महाबुद्धि, महावीर्य, महाशक्ति, महाद्युति; जिनका रूप “ऐसा है” कहकर बताया नहीं जा सकता, और जो मन्दराचल और गोवर्धन तक उठा लेते हैं। श्रीनिवास, सतां गति, सुरानन्द, गोविन्द; ऐश्वर्य और आश्रय एक ही नाम-माला में पिरोए हुए हैं।

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः । अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ 19॥
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः । अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ 20॥
The cowherd who plays the flute of awakening
गोविन्द

अनादि-निधनजिनका न आदि है न अंत, ऐसे विष्णु को सहस्रनाम बार-बार स्मरण कराता है। न जन्म, न मृत्यु, न क्षय। जो सृष्टि के आरंभ से पूर्व था और प्रलय के पश्चात् भी रहेगा, वही नित्य सत्य है। शंकराचार्य इसे ही ब्रह्म का अव्यय स्वरूप कहते हैं।

यहाँ अवतारों और रूपों की झलकें आती हैं। हंस, सुपर्ण, शेष-रूप भुजगोत्तम, हिरण्यनाभ; अमृत्यु जिनकी मृत्यु नहीं, सिंह जो पापों का संहार करते हैं, गुरु जो ब्रह्मा को भी ज्ञान देते हैं। निमिष और अनिमिष साथ-साथ हैं, योग-निद्रा में मुँदे नेत्र और सदा जागती दृष्टि, एक ही प्रभु के दो भाव।

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ 21॥
अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः । अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ 22॥
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ 23॥
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः । सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ 24॥
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः । अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ 25॥

इस लहर में प्रभु का प्रसन्न और कृपालु मुख दिखता है। सुप्रसाद, प्रसन्नात्मा, साधु, सत्कर्ता; जो अपराधियों पर भी सहज प्रसन्न हो जाते हैं। नारायण और नर यहीं आते हैं, जल और समस्त जीवों के अयन, और सबको परम पद तक ले जाने वाले पुरुष। सिद्धार्थ, सिद्धसंकल्प, सिद्धिद, हर संकल्प जिनका पूर्ण होता है।

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः । सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ 26॥
असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः । सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ 27॥
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः । वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ 28॥

अब तेज और प्रकाश के नाम जगमगाते हैं। महेन्द्र, वसुद, बृहद्रूप, प्रकाशात्मा, प्रतापन; ओज, तेज और द्युति को धारण करने वाले। अमृतांशूद्भव में समुद्र-मंथन की स्मृति है, जिससे अमृत-किरण वाला चंद्र निकला; और जगतः सेतु वह पुल है जो संसार-सागर पार करा देता है।

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ 29॥
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः । ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ 30॥
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः । औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ 31॥

इस धारा में कामना और काल दोनों प्रभु के अधीन हैं। पवन, पावन, कामहा और कामप्रद एक साथ हैं, जो वासना को मिटाते भी हैं और धर्म-संगत कामना पूरी भी करते हैं। युगादिकृत् और युगावर्त युग-चक्र को घुमाते हैं, और अनन्तजित् सर्वत्र, सदा, सबको जीतते हैं।

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः । कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ 32॥
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ 33॥
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ 34॥

नहुषनहुष एक राजा थे जो इन्द्र-पद पर आसीन हुए, किन्तु गर्व से सप्तर्षियों का अपमान कर बैठे, और शाप पाकर सर्प हो गए। पाण्डवों के वनवास-काल में युधिष्ठिर ने धर्म के प्रश्नों का उत्तर देकर उन्हें इस योनि से मुक्त किया। सहस्रनाम में यह नाम विष्णु की उस व्यापकता को कहता है जिससे जीवों को अपनी ओर खींचा जाता है।

यहाँ अवतार-कथाएँ नामों में छिप जाती हैं। वासवानुज वामन-रूप में इन्द्र के अनुज हैं; स्कन्दधर, वरद, वासुदेव, आदिदेव, पुरन्दर; अशोक जो शोक हरते हैं, तारण जो पार उतारते हैं। पद्मनाभ और गरुडध्वज के बीच वही एक प्रभु अपने अनेक रूपों में झलकते रहते हैं।

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ 35॥

अच्युतअच्युत का अर्थ है, जो अपने स्वरूप से कभी च्युत नहीं होता, कभी गिरता नहीं। शंकराचार्य कहते हैं कि विष्णु अपनी सत्ता, सामर्थ्य और स्वभाव से कभी अपकर्ष को प्राप्त नहीं होते। यही नाम भगवद्गीता में भी अर्जुन के मुख से आता है।

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः । वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥ 36॥
The Lord who dwells in all hearts with infinite compassion
वासुदेव
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः । अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ 37॥
पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् । महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ 38॥

अब नाम संग्राम और यज्ञ की ओर मुड़ते हैं। अतुल, भीम, समितिञ्जय; संग्राम में सदा विजयी। दामोदर का नाम यशोदा की रस्सी की याद दिलाता है, और हेतु वह कारण है जिससे सारा जगत बना। उद्भव, क्षोभण, कारण, कर्ता, विकर्ता; जो प्रकृति को क्षुब्ध कर इस विचित्र सृष्टि को रचते हैं।

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः । सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ 39॥
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः । महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ 40॥
Love alone could bind the Lord
दामोदर
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः । करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ 41॥

दामोदर“दाम” अर्थात् रस्सी, “उदर” अर्थात् पेट। माता यशोदा ने बाल-कृष्ण को ऊखल से बाँधना चाहा, पर हर रस्सी छोटी पड़ती गई। अंत में कृष्ण ने स्वयं को बँधने दिया। शंकराचार्य इस नाम का यह भी अर्थ करते हैं कि “दाम” से अर्थात् इन्द्रिय-संयम और दान से जो जाने जाते हैं, वे दामोदर हैं।

इस लहर में स्थिरता और राम-तत्त्व प्रकट होते हैं। व्यवस्थान, संस्थान, ध्रुव; जिन पर सारी सृष्टि-व्यवस्था टिकी है। राम वही हैं जिनमें योगी निरंतर रमते हैं, और विराम समस्त गति का अंतिम विश्राम। वैकुण्ठ, प्रणव, अधोक्षज; इन्द्रियों की पकड़ से परे रहकर भी ॐकार-रूप में नमन के योग्य।

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः । परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ 42॥
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः । वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ 43॥
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः । हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ 44॥
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ 45॥
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् । अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ 46॥

अब यज्ञ-वाचक नामों की एक पूरी लड़ी आती है। धर्मयूप, महामख, यज्ञ, इज्य, महेज्य, क्रतु, सत्र; यज्ञ का अधिष्ठाता, उसका विधान, उसका फल और स्वयं यज्ञ-स्वरूप, सब एक ही प्रभु हैं। साथ में सर्वदर्शी, विमुक्तात्मा, सर्वज्ञ और उत्तम ज्ञान-स्वरूप, जो बताते हैं कि कर्म और ज्ञान दोनों यहीं मिलते हैं।

अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः । नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ 47॥
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः । सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ 48॥

इस धारा में प्रभु का सौम्य और मित्र-रूप मुखर है। सुमुख, सुखद, सुहृत्, मनोहर; वह सच्चा मित्र जो बिना प्रत्युपकार की आशा के उपकार करता है। फिर स्वापन, स्ववश, व्यापी, नैकात्मा; जो माया से जीवों को सुला भी देते हैं और स्वयं सर्वथा स्वतंत्र रहते हैं। वत्सल, वत्सी, रत्नगर्भ; संतान की तरह सबका पालन करने वाले पिता।

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् । मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ 49॥
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् । वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ 50॥

यहाँ धर्म और सत्-असत् का रहस्य खुलता है। धर्मगुप्, धर्मकृत्, धर्मी; जो धर्म की रक्षा भी करते हैं और स्वयं उसका आचरण भी। सत् और असत्, क्षर और अक्षर, दोनों जोड़े एक ही तत्त्व में समाते हैं। आदिदेव, महादेव, देवेश; देवों के भी देव और इन्द्र तक के गुरु।

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् । अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ 51॥
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः । आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ 52॥
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः । शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ 53॥

इस लहर में कृष्ण और मुकुन्द का रूप उभरता है। सोमप, अमृतप, मुकुन्द, अमितविक्रम; जो अपने ही आनंद-अमृत का पान करते हैं और मुक्ति देते हैं। सत्यसन्ध, दाशार्ह, सात्वतां पति; यादव-वंश के स्वामी, सत्य-प्रतिज्ञ। अनन्तात्मा और महोदधिशय, क्षीर-सागर पर शयन करने वाली वह अनंत आत्मा।

सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः । विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वताम्पतिः ॥ 54॥
जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः । अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ 55॥

फिर आनंद और अवतार साथ-साथ आते हैं। आनन्द, नन्दन, नन्द; जो स्वयं आनंद हैं और सबको आनंदित करते हैं। त्रिविक्रम तीन पगों से तीनों लोक नाप लेते हैं; कपिलाचार्य सांख्य के प्रवर्तक हैं; महाशृङ्ग मत्स्य-रूप में वेदों के रक्षक। कृतान्तकृत् काल और मृत्यु का भी अंत कर देते हैं।

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः । आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ 56॥
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः । त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश‍ृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ 57॥

यहाँ वराह और गुह्य-तत्त्व मिलते हैं। महावराह पृथ्वी का उद्धार करते हैं, गोविन्द गौओं और वेद-वाणी के स्वामी हैं, और चक्रगदाधर सुदर्शन तथा कौमोदकी धारण करते हैं। गुह्य, गभीर, गहन, गुप्त; उपनिषदों में छिपा वह रहस्य जिसमें प्रवेश दुष्कर है। वेधा, अजित, कृष्ण, सङ्कर्षण; प्रलय में सबको अपने में खींच लेने वाले अच्युत।

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी । गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ 58॥
The boar rescues Bhudevi from the cosmic waters
वराह अवतार

त्रिविक्रमदानवीर बलि से वामन-रूपी विष्णु ने तीन पग भूमि माँगी। बलि के स्वीकार करते ही वामन ने विराट रूप धारण किया। एक पग में पृथ्वी नापी, दूसरे में द्युलोक, और तीसरे पग के लिए बलि ने अपना मस्तक प्रस्तुत कर दिया। तीन पगों से तीनों लोक नापने के कारण वे त्रिविक्रम कहलाते हैं।

The dwarf asks for three paces and spans the worlds
त्रिविक्रम · वामन
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः । वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ 59॥

महा-वराहहिरण्याक्ष ने पृथ्वी को रसातल में डुबो दिया था। विष्णु ने वराह का रूप धारण किया, अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठाकर जल के ऊपर पुनः प्रतिष्ठित किया, और हिरण्याक्ष का संहार किया। यज्ञ-वराह के रूप में यह अवतार पृथ्वी के उद्धार का प्रतीक है।

Matsya, Vishnu's fish avatar, guides a boat carrying sages and the Vedas through the deluge
मत्स्य अवतार

इस धारा में “भगवान्” शब्द अपने पूरे अर्थ में आता है, ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य, इन छह भगों से युक्त। वनमाली, हलायुध, आदित्य; बलराम का हल और सूर्य की ज्योति एक ही माला में। सुधन्वा शार्ङ्ग धारण करते हैं, खण्डपरशु परशुराम-रूप हैं, और अयोनिज बिना किसी योनि के स्वयं प्रकट होते हैं।

भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः । आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ 60॥

कृष्णशंकराचार्य “कृष्ण” नाम का अर्थ सत्-चित्-आनंद-स्वरूप करते हैं, क्योंकि “कृष्” सत्ता को और “ण” आनंद को कहता है। एक अन्य व्युत्पत्ति में कृष्ण वे हैं जो भूमि को कर्षण कर समस्त भोग प्रदान करते हैं। श्याम-वर्ण कृष्ण का वही रूप ध्यान में प्रसिद्ध है।

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः । दिवस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ 61॥

अब शांति और औषधि के नाम आते हैं। साम-वेद का गान, निर्वाण, भेषज, भिषक्; गीता का उपदेश देकर संसार-रोग हरने वाला वैद्य। संन्यासकृत्, शम, शान्त, निष्ठा, शान्ति, परायणम्; मन की शांति से लेकर परम विश्राम तक की पूरी सीढ़ी एक ही श्लोक में रखी है। शुभाङ्ग, शान्तिद, गोपति, गोप्ता; जो भक्तों को शांति देते और जगत की रक्षा करते हैं।

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् । संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ 62॥
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः । गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ 63॥

यहाँ श्री और लक्ष्मी का तेज छा जाता है। श्रीवत्सवक्षा, श्रीवास, श्रीपति, श्रीद, श्रीश, श्रीनिवास, श्रीधर; नाम पर नाम लक्ष्मी के नित्य वास की घोषणा करते हैं। साथ में क्षेमकृत् और शिव, जो भक्तों का योग-क्षेम वहन करते हैं और नित्य कल्याण-स्वरूप हैं।

अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः । श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ 64॥
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः । श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ 65॥

इस लहर में सौंदर्य और निर्भयता मिलती है। सुंदर नेत्र, सुगठित अंग, छिन्नसंशय जो भक्तों के संशय काट देते हैं। उदीर्ण, शाश्वतस्थिर, विशोक, शोकनाशन; शोक-रहित होकर दूसरों का शोक हरने वाले। अर्चिष्मान्, विशुद्धात्मा, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न; चतुर्व्यूह के वे रूप जिन्हें कोई शत्रु रोक नहीं सकता।

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः । विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ 66॥
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः । भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ 67॥
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः । अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ 68॥

फिर असुर-संहार और नाम-महिमा साथ आते हैं। कालनेमि और केशी का वध, त्रिलोकात्मा और त्रिलोकेश का विस्तार, हरि जो पाप और संसार-दुख हर लेते हैं। कामदेव, कामपाल, धनञ्जय; धर्म-संगत कामनाओं के पालक और अर्जुन-रूप में विजयी। यहाँ ब्रह्म-वाचक नामों की एक सघन लड़ी आती है, ब्रह्मण्य, ब्रह्मकृत्, ब्रह्म, ब्रह्मविद्, ब्रह्मज्ञ; जो बताती है कि तप, वेद और ब्रह्म, सब इन्हीं में हैं।

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः । त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ 69॥
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः । अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥ 70॥

केशव और केशि-हासहस्रनाम में “केशव” और “केशिहा”, दोनों नाम अलग-अलग आते हैं। शंकराचार्य के अनुसार केशव वे हैं जिनके केश सुंदर हैं, अथवा जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव, इन तीन “क-अ-ईश” रूपों के स्वामी हैं। केशिहा वे हैं जिन्होंने केशी नामक अश्व-रूपी असुर का वध किया, जो कृष्ण-रूप में मथुरा आया था।

The demon horse meets its match
केशव · केशि-हा
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः । ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ 71॥

इस धारा में फिर “महा” गरजता है। महाक्रम, महातेजा, महोरग, महाक्रतु, महायज्ञ, महाहवि; पराक्रम और यज्ञ दोनों अपनी चरम सीमा पर। फिर स्तुति स्वयं नाम बन जाती है, स्तव्य, स्तवप्रिय, स्तोत्र, स्तुति, स्तोता; स्तुति करने वाला, स्तुति का विषय और स्तुति की क्रिया, सब वही। पूर्ण, पुण्य, पुण्यकीर्ति, अनामय; जो स्वयं पूर्ण रहकर सबको पूर्ण करते हैं।

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः । महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ 72॥
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः । पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ 73॥

अब वासुदेव-तत्त्व पर बल आता है। वासुदेव, वसु, भूतावास, सर्वासुनिलय; सब प्राणियों और प्राणों के निवास-स्थान। सद्गति, सत्ता, यदुश्रेष्ठ, सुयामुन; यमुना-तट पर लीला करने वाले यदु-श्रेष्ठ कृष्ण। दर्पहा और दर्पद साथ हैं, जो अहंकार को तोड़ते हैं और धर्म-निष्ठों को उचित गौरव देते हैं।

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः । वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ 74॥
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः । शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ 75॥
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः । दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ 76॥

इस लहर में एक और अनेक का रहस्य खुलता है। विश्वमूर्ति, अनेकमूर्ति, शतमूर्ति, फिर भी अमूर्तिमान्; अनगिनत रूप धारण करके भी जिनका कोई कर्म-जन्य शरीर नहीं। एक, नैक, तत्, यत्, परम पद; जो अद्वितीय एक है पर माया से अनेक दिखता है। लोकबन्धु, लोकनाथ, भक्तवत्सल; सब लोकों का हितैषी बंधु और भक्तों पर वत्सल।

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् । अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ 77॥
एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम् । लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ 78॥

यहाँ रूप और निर्गुण-भाव साथ-साथ आते हैं। सुवर्णवर्ण, हेमाङ्ग, वराङ्ग, चन्दनाङ्गदी; स्वर्ण-कान्ति और चंदन की सुगंध से सजे। फिर विषम, शून्य, अचल और चल; अद्वितीय, निर्गुण, अविचल, और फिर भी वायु-रूप में गतिशील। अमानी, मानद, मान्य; अभिमान-रहित होकर भी सबके पूज्य।

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी । वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ 79॥
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् । सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ 80॥

इस धारा में शस्त्र और चार-रूप उभरते हैं। सर्व-शस्त्र-धारियों में श्रेष्ठ, प्रग्रह और निग्रह; जो लगाम भी हैं और संहार भी। चतुर्मूर्ति, चतुर्बाहु, चतुर्व्यूह, चतुर्गति; जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति-तुरीय की चार अवस्थाएँ और चार व्यूह एक ही पुरुष में। समावर्त, दुर्जय, दुर्लभ, दुर्गम, दुर्ग; जो भक्ति-मात्र से सुलभ हैं पर अहंकार के लिए दुर्गम।

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः । प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश‍ृङ्गो गदाग्रजः ॥ 81॥
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः । चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ 82॥
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः । दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ 83॥

चतुर्-व्यूहपाञ्चरात्र-परंपरा में विष्णु के चार व्यूह माने गए हैं, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध। सृष्टि, स्थिति और संहार के विविध कार्यों के लिए एक ही परमात्मा इन चार रूपों में प्रकट होते हैं। इसी से वे चतुरात्मा और चतुर्व्यूह कहलाते हैं।

अब सृष्टि-तंतु और सौंदर्य की लहर है। सुतन्तु और तन्तुवर्धन इस फैलते संसार-तंतु को बुनते और समेटते हैं। इन्द्रकर्मा, महाकर्मा, कृतकर्मा; जिनका कोई कर्तव्य शेष नहीं। उद्भव, सुन्दर, रत्ननाभ, सुलोचन; परम सौंदर्य और करुणा से युक्त। महाह्रद, महानिधि; परम आनंद का अगाध कुंड जिसमें समस्त भूत निधि-रूप में स्थित हैं।

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः । इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ 84॥
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः । अर्को वाजसनः श‍ृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ 85॥
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः । महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ 86॥

इस धारा में प्रकृति के रूप प्रभु बन जाते हैं। पर्जन्य मेघ-सा ताप शांत करता है, पावन सबको पवित्र करता है, अमृतवपु अमृत-रूप शरीर वाला है। सुलभ और सिद्ध साथ हैं, भक्ति से सहज मिलने वाले नित्य-सिद्ध। न्यग्रोध, उदुम्बर, अश्वत्थ; वट, गूलर और पीपल भी इन्हीं के नाम हैं, और चाणूर का वध करने वाले कृष्ण भी।

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः । अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ 87॥
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः । न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ 88॥

अब अग्नि और सूर्य के सात-सात रूप गूँजते हैं। सहस्रार्चि, सप्तजिह्व, सप्तैधा, सप्तवाहन; सहस्र किरणों और सात अश्वों वाला तेज। भयकृत् और भयनाशन एक साथ हैं, अधर्मियों में भय और सज्जनों का अभय। फिर अणु और बृहत्, कृश और स्थूल, गुणभृत् और निर्गुण; एक ही तत्त्व अपने विरोधी जोड़ों में पूरा दिखता है।

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः । अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ 89॥

न्यग्रोध, उदुम्बर, अश्वत्थवट, गूलर और पीपल, तीनों विष्णु के नाम हैं। शंकराचार्य कहते हैं, न्यग्रोध वे हैं जो ऊपर रहकर सबको माया से आच्छादित करते हैं, उदुम्बर वे हैं जो अंतरिक्ष से भी ऊँचे हैं, और अश्वत्थ वे हैं जो अनित्य संसार-वृक्ष-रूप हैं। गीता का “ऊर्ध्व-मूल, अधः-शाख” अश्वत्थ इसी संसार-वृक्ष को कहता है।

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् । अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ 90॥

इस लहर में योग और विश्राम मिलते हैं। योगी, योगीश, सर्वकामद; समस्त योगियों के स्वामी और सब कामनाओं के दाता। आश्रम वह विश्राम-स्थल है जहाँ संसार-पथ के थके जीव ठहरते हैं। धनुर्धर, दमयिता, दम, अपराजित; राम-रूप में धनुष धारण कर दुष्टों का दमन करने वाले अजेय।

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः । आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ 91॥
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः । अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः ॥ 92॥

यहाँ सत्य और प्रेम की धारा बहती है। सत्त्ववान्, सात्त्विक, सत्य, सत्यधर्मपरायण; बल और सत्य दोनों जिनमें पूर्ण हैं। प्रियकृत् और प्रीतिवर्धन भक्तों का प्रिय करते और उनमें प्रेम बढ़ाते हैं। फिर सूर्य के अनेक नाम, रवि, विरोचन, सूर्य, सविता, रविलोचन; जिनका एक नेत्र ही सूर्य है।

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः । अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ 93॥
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः । रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ 94॥

इस धारा में अनंतता और आश्चर्य प्रकट होते हैं। अनन्त, लोकाधिष्ठान, अद्भुत; सब लोकों का आधार वह आश्चर्यमय स्वरूप। सनातनतम और अव्यय, ब्रह्मा से भी पुरातन और अविनाशी। फिर स्वस्ति-वाचक नामों की लड़ी, स्वस्तिद, स्वस्तिकृत्, स्वस्ति, स्वस्तिभुक्; जो स्वयं कल्याण हैं और सबका कल्याण करते हैं।

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः । अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ 95॥
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः । स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥ 96॥

अब शीतलता और निर्भयता की लहर है। अरौद्र राग-द्वेष से रहित हैं, शिशिर तीनों तापों से जलते जीवों को शीतल करते हैं, शब्दातिग वाणी की पहुँच से परे हैं। अक्रूर, पेशल, दक्ष; क्रूरता-रहित, कोमल और कुशल। वीतभय और पुण्यश्रवणकीर्तन; सर्वथा निर्भय, जिनका श्रवण और कीर्तन ही पवित्र कर देता है।

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः । शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ 97॥

कपिलकपिल मुनि सांख्य-दर्शन के प्रवर्तक माने जाते हैं, और विष्णु के अवतार कहे गए हैं। पाताल में तप करते कपिल के पास सगर-पुत्र अपने यज्ञ-अश्व की खोज में आक्षेप करते पहुँचे, और मुनि की दृष्टि-मात्र से भस्म हो गए। उन्हीं की मुक्ति के लिए भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाए।

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः । विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ 98॥

इस धारा में उद्धार और रक्षा का भाव है। उत्तारण, दुष्कृतिहा, दुःस्वप्ननाशन; जो संसार-सागर से पार उतारते हैं और बुरे स्वप्न तक मिटा देते हैं। रक्षण, सन्त, जीवन, पर्यवस्थित; सर्वत्र व्याप्त होकर जगत की रक्षा करने वाले। अनन्तरूप, अनन्तश्री, जितमन्यु, भयापह; अनंत रूप और ऐश्वर्य वाले, क्रोध-विजयी, भय-नाशक।

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः । वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ 99॥
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः । चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ 100॥

यहाँ आधार और प्राण के नाम घने होते हैं। अनादि, आधारनिलय, अधाता; सब आधारों के भी आधार, जिनका कोई नियामक नहीं। प्राणद, प्रणव, प्रमाण, प्राणनिलय, प्राणभृत्, प्राणजीवन; प्राण-वायुओं से सबको जिलाने वाले। तत्त्व, तत्त्वविद्, एकात्मा, जन्ममृत्युजरातिग; वह एकमात्र आत्मा जो जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे से परे है।

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः । जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ 101॥
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः । ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ 102॥
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः । तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ 103॥

अब समापन के निकट यज्ञ-नामों की सबसे घनी लड़ी आती है। यज्ञ, यज्ञपति, यज्वा, यज्ञाङ्ग, यज्ञवाहन, यज्ञभृत्, यज्ञकृत्, यज्ञभुक्, यज्ञसाधन, यज्ञान्तकृत्, यज्ञगुह्यम्; यज्ञ का स्वामी, साधन, फल और रहस्य, सब वही। अन्न और अन्नाद साथ हैं, जो स्वयं भोग्य भी हैं और भोक्ता भी।

भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः । यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ 104॥
यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः । यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ 105॥

फिर कृष्ण-रूप पर पाठ ठहरता है। आत्मयोनि और स्वयञ्जात, जो अपने ही कारण से प्रकट होते हैं; देवकीनन्दन, स्रष्टा, पापनाशन; देवकी के पुत्र जिनके स्मरण से पाप नष्ट होते हैं। फिर आयुधों की गणना है, शङ्खभृत्, नन्दकी, चक्री, शार्ङ्गधन्वा, गदाधर, रथाङ्गपाणि; शंख, खड्ग, चक्र, धनुष और गदा सब इन्हीं के हाथ में हैं।

आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः । देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ 106॥
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः । रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ 107॥

और अंत में वह संकल्प-श्लोक आता है जिससे सहस्रनाम पूरा होता है। वनमाली, गदी, शार्ङ्गी, शङ्खी, चक्री, नन्दकी; पाँचों आयुध और वैजयन्ती-माला धारण किए श्रीमान् नारायण विष्णु वासुदेव हमारी सब ओर से रक्षा करें। यहीं एक हज़ार नाम अपने मूल आश्रय, वासुदेव, पर लौट आते हैं।

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी । श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ 108॥

फलश्रुति एवं उत्तर-पीठिका

पाठ का फल, समापन-संवाद और राम-नाम की महिमा

Sanatkumara reveals the glory of the thousand names
सहस्रनाम महिमा
॥ उत्तरपीठिका ॥

अब भीष्म स्वयं फल बताते हैं। उन्होंने महात्मा केशव के एक हज़ार दिव्य नाम बिना कुछ छोड़े सुना दिए। जो इसे नित्य सुनता या कीर्तन करता है उसे इस लोक और परलोक में कोई अशुभ नहीं छूता; ब्राह्मण को वेदान्त-ज्ञान, क्षत्रिय को विजय, वैश्य को समृद्धि, शूद्र को सुख मिलता है, और जो जिस पुरुषार्थ का इच्छुक है उसे वही प्राप्त होता है।

श्री भीष्म उवाच । इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः । नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ 1 ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् । नाऽशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ 2 ॥
वेदान्तगो ब्राह्मणस्स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत् । वैश्यो धनसमृद्धस्स्याच्छूद्रस्सुखमवाप्नुयात् ॥ 3 ॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् । कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाः ॥ 4 ॥

फिर नित्य-पाठी की दिनचर्या और उसका फल आता है। जो भक्त सवेरे उठकर, शुद्ध होकर, मन एकाग्र कर वासुदेव के इस सहस्रनाम का पाठ करता है, उसे विशाल यश, श्रेष्ठता, अचल लक्ष्मी और अनुत्तम श्रेय मिलता है। उसे भय नहीं छूता, वह निरोग, तेजस्वी और गुणवान होता है; रोगी रोग से, बंधा बंधन से, भयभीत भय से और आपद-ग्रस्त आपदा से छूट जाता है।

भक्तिमान् यस्सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः । सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ 5 ॥
A devotee seated before a home shrine at dawn, holding mala beads, beginning the daily recitation
प्रातः पाठ
यशः प्राप्नोति विपुलं याति प्राधान्यमेव च । अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ 6 ॥
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति । भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥ 7 ॥
रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् । भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ 8 ॥
Vishnu on Garuda rescuing Gajendra, the elephant king, from the crocodile
गजेन्द्र मोक्ष

यहाँ शरणागति का फल चरम पर पहुँचता है। नित्य भक्ति से पुरुषोत्तम की स्तुति करने वाला सब संकट शीघ्र पार कर जाता है; वासुदेव की शरण में रहने वाला सब पापों से शुद्ध होकर सनातन ब्रह्म को प्राप्त होता है। वासुदेव के भक्तों को न जन्म-मृत्यु का भय सताता है, न उनमें क्रोध, ईर्ष्या या लोभ टिकता है; पाठ करने वाले की आत्मा सुख, क्षमा, श्री, धृति, स्मृति और कीर्ति से भर जाती है।

दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ 9 ॥
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः । सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ 10 ॥
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् । जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ 11 ॥
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । युज्येतात्मा सुखक्षान्ति श्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ 12 ॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभामतिः । भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ 13 ॥

अब स्तोत्र विराट दर्शन की ओर मुड़ता है। सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, अंतरिक्ष, दिशाएँ, पृथ्वी और महासागर, सब वासुदेव के वीर्य से ही धारण किए हुए हैं; देव-दानव-गंधर्व-यक्ष-राक्षस सहित सारा चराचर उन्हीं के तेज से चलता है। इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, बल, धैर्य, यहाँ तक कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ भी वासुदेव-आत्मक हैं। शास्त्रों का आचार, उससे उपजा धर्म, और उस धर्म के प्रभु, सब उन्हीं अच्युत में हैं।

द्यौस्सचन्द्रार्कनक्षत्रं खं दिशो भूर्महोदधिः । वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ 14 ॥
स सुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् । जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ 15 ॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिस्सत्त्वं तेजो बलं धृतिः । वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ 16 ॥
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पितः । आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ 17 ॥

यहाँ सृष्टि का हर अंश नारायण से निकलता है। ऋषि, पितर, देव, महा-भूत, धातु, जंगम-स्थावर, सारा जगत जनार्दन से ही उपजा। योग, ज्ञान, सांख्य, विद्याएँ, शिल्प, वेद, शास्त्र और विज्ञान भी उन्हीं से प्रकट हुए। वह एक ही विष्णु बहुरूप होकर तीनों लोकों में व्याप्त है, और यह सारा विश्व उसी अव्यय का भोग है; इसी विश्वेश्वर अजन्मा को जो भजते हैं उनका कभी पराभव नहीं होता।

ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः । जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ 18 ॥
योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याश्शिल्पादि कर्म च । वेदाश्शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥ 19 ॥
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः । त्रीन्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ 20 ॥
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् । पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥ 21 ॥
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम् । भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ 22 ॥

अब समापन-संवाद में अनेक स्वर एक साथ बोलते हैं। अर्जुन प्रार्थना करते हैं कि कमल-नयन पद्मनाभ अपने भक्तों के त्राता बनें, और भगवान आश्वासन देते हैं कि जो सहस्र-नामों से स्तुति करना चाहता है, वह एक ही श्लोक से भी स्तुति करे तो मैं स्तुत हो जाता हूँ। व्यास “वासुदेव” शब्द की व्युत्पत्ति से कहते हैं कि आप ही तीनों लोकों के निवास हैं, और उन्हें नमन करते हैं।

अर्जुन उवाच । पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम । भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ॥ 23 ॥
श्री भगवानुवाच । यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव । सोऽहमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः ॥ 24 ॥
व्यास उवाच । वासनाद्वासुदेवस्य वासितं ते जगत्त्रयम् । सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ 25 ॥

फिर वह प्रसिद्ध संवाद आता है जो पूरे स्तोत्र का सार एक नाम में बाँध देता है। पार्वती पूछती हैं कि विद्वान किस सरल उपाय से नित्य सहस्रनाम का पाठ करते हैं, और शिवजी उत्तर देते हैं कि वे “राम राम राम” इस मनोरम नाम में ही रमते रहते हैं, क्योंकि एक राम-नाम पूरे सहस्रनाम के तुल्य है। फिर ब्रह्मा अनन्त को नमन करते हैं, और संजय कहते हैं कि जहाँ योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं श्री, विजय और स्थिर नीति है।

पार्वत्युवाच । केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम् । पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ 26 ॥
ईश्वर उवाच । श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ॥ 27 ॥
ब्रह्मोवाच । नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे । सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः ॥ 28 ॥
सञ्जय उवाच । यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ 29 ॥

अंत में स्वयं भगवान की वाणी से आश्वासन और शरणागति का भाव आता है। जो अनन्य भाव से चिंतन और उपासना करते हैं उनके योग-क्षेम का भार वे स्वयं उठाते हैं; साधुओं की रक्षा, दुष्टों के नाश और धर्म की स्थापना के लिए वे हर युग में प्रकट होते हैं। दुखी, भयभीत और रोग-ग्रस्त जन केवल “नारायण” शब्द का कीर्तन कर सब दुखों से मुक्त हो जाते हैं। पाठ में छूटे अक्षर और मात्रा के लिए क्षमा माँगते हुए, साधक शरीर-वाणी-मन से किए सब कर्म नारायण को समर्पित कर देता है, और स्तोत्र पूर्ण होता है।

श्री भगवानुवाच । अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ 30 ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ 31 ॥
Young Krishna lifting Mount Govardhana on one finger, sheltering villagers from the storm
कृष्ण-गोवर्धन
आर्ता विषण्णाश्शिथिलाश्च भीताः घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः । सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखास्सुखिनो भवन्ति ॥ 32 ॥
[अधिक] यदक्षर पदभ्रष्टं मात्राहीनं तु यद्भवेत् । तत्सर्वं क्षम्यतां देव नारायण नमोऽस्तु ते ॥
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेस्स्वभावात् । करोमि यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥
इति श्रीविष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् ॥

परिशिष्ट

रचयिता और भाष्यकार

यह स्तोत्र महाभारत का अंश है, अतः इसके रचयिता महर्षि वेद-व्यास माने जाते हैं। कथा के भीतर इसे भीष्म-पितामह ने बाण-शय्या पर पड़े हुए युधिष्ठिर को सुनाया, और श्रीकृष्ण स्वयं वहाँ उपस्थित थे। आगे चलकर आदि शंकराचार्य ने इस पर भाष्य रचा, जो आज “विष्णुसहस्रनाम-भाष्य” के नाम से प्रसिद्ध है, और जिसके आधार पर यहाँ नामों के अर्थ दिए गए हैं।

शास्त्र में स्थान

इसका मूल स्थान है महाभारत का अनुशासन-पर्व, अध्याय एक सौ उनचास। महाभारत अठारह पर्वों में विभक्त है; अनुशासन-पर्व तेरहवाँ है, जिसमें युद्ध के पश्चात् भीष्म ने युधिष्ठिर को राज-धर्म, आपद-धर्म और मोक्ष-धर्म का उपदेश दिया। उन्हीं उपदेशों में यह सहस्रनाम आता है। इसके कुछ श्लोक पद्म-पुराण, गरुड़-पुराण और स्कन्द-पुराण में भी मिलते हैं, किन्तु मूल संस्करण महाभारत का ही है।

प्रसंग और परिवेश

कुरुक्षेत्र का संग्राम समाप्त हो चुका था। भीष्म-पितामह अर्जुन के बाणों से आच्छादित बाण-शय्या पर पड़े थे। उत्तरायण आने में कई मास शेष थे, और इच्छा-मृत्यु का वर पाए भीष्म स्वयं अपने देह-त्याग का समय चुन सकते थे। युधिष्ठिर श्रीकृष्ण, व्यास और अन्य ऋषियों के साथ उनके पास बैठे थे। इतने संहार के पश्चात् धर्म क्या है, इसी संदेह से भारी मन लेकर युधिष्ठिर ने प्रश्न किए, और भीष्म के उत्तर में यह सहस्रनाम प्रकट हुआ।

पाठ का फल

फलश्रुति में भीष्मजी स्वयं इसका फल गिनाते हैं, आरोग्य, कीर्ति, बुद्धि, धैर्य, ऐश्वर्य, और अंततः मोक्ष। एक ही ईश्वर को हज़ार नामों से पुकारते हुए साधक का मन उन्हीं गुणों में रमता जाता है। गीता का वचन है कि मनुष्य जिस भाव में रमता है, वही उसे प्राप्त होता है।

पाठ का काल

परंपरा में ब्रह्म-मुहूर्त और संध्या-काल को पाठ के लिए श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उन क्षणों में मन सहज ही एकाग्र होता है। एकादशी, द्वादशी और वैकुण्ठ-एकादशी, तथा जन्माष्टमी और रामनवमी विशेष रूप से शुभ मानी जाती हैं। फिर भी भीष्मजी ने नित्य, प्रतिदिन के पाठ को ही पूर्ण फलदायी कहा है। अनियमित उत्साह से नियमित श्रद्धा श्रेष्ठ है।

राम-नाम की महिमा

उत्तर-पीठिका में पार्वती के प्रश्न पर शिवजी कहते हैं, “श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने॥”अर्थात् एक राम-नाम का उच्चारण पूरे सहस्रनाम के तुल्य है। सहस्रनाम और एक नाम, दोनों एक ही प्रेम की दो सीढ़ियाँ हैं। किसी का मन सहस्र गुणों के सहारे विष्णु के समीप पहुँचता है, किसी के लिए एक नाम ही समस्त ब्रह्म है।

हनुमानजी के लिए राम-नाम ही ब्रह्म था, और उसी नाम के बल पर उन्होंने पर्वत तक उठा लिए। नाम की महिमा उसके उच्चारण-मात्र में नहीं, उस भाव में है जिससे वह हृदय में बसता है।

Hanuman parting his chest to reveal Rama and Sita seated within his heart
हनुमान हृदय

विष्णु के हज़ार नाम एक ही प्रेम के हज़ार रूप हैं। जो भी नाम मन को स्थिर करे, प्रेम जगाए और अहंकार को गला दे, वही साधक के लिए पर्याप्त है।

 

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