विष्णु सहस्रनाम

॥ श्री विष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
महाभारत · अनुशासन-पर्व · अध्याय १४९
भीष्म-पितामह द्वारा युधिष्ठिर को उपदिष्ट · व्यासजी द्वारा संकलित

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विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र — यानी “भगवान विष्णु के एक हज़ार नाम।” यह महाभारत के अनुशासन-पर्व (अध्याय १४९) का एक छोटा-सा पर अनमोल अंश है। कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका था। युद्ध-भूमि लहू से भरी थी। भीष्म पितामह बाण-शय्या पर पड़े थे — महीनों से, उत्तरायण की प्रतीक्षा में। युधिष्ठिर का मन अपराध-बोध, शंका और थकान से भारी था।

ऐसे समय में भीष्मजी ने अपने पौत्र को एक उपहार दिया — एक हज़ार नाम, एक ईश्वर के। युधिष्ठिर के छह प्रश्नों का उत्तर एक ही सूत्र में — “वसुदेव-सुत हैं वे सबसे ऊँचे, उनकी स्तुति ही सबसे बड़ा धर्म है।”

आज दो हज़ार से अधिक वर्षों से यह स्तोत्र घरों में, मंदिरों में, सुबह-शाम गूँजता है। आदि शंकराचार्य ने इसका भाष्य लिखा। रामकृष्ण परमहंस ने अन्तिम दिनों में इसी का पाठ सुना। कितनी ही दादियों ने अपने पोतों को यही सिखाया।

नीचे सारे एक सौ आठ नाम-श्लोक हैं, उनसे पहले की उपोद्घात-गाथा, बीच का ध्यान-श्लोक, और अंत का फलश्रुति। हर श्लोक के साथ सरल दिल्ली-हिन्दी में अर्थ। कठिन नामों के साथ छोटी कथा या दृष्टान्त।

पर सबसे बड़ा रहस्य अंत में आता है — खुद कृष्ण कहते हैं, “हे अर्जुन, अगर तुझे एक हज़ार नाम भी याद न हों, तो बस तीन बार ‘राम’ कह लेना। उतना ही फल है।” यह रहस्य इस पूरे स्तोत्र के अंत-सूत्र में छिपा है।

पूर्व-भाग (उपोद्घात)

Purva-peetika — Mangala-charana, Mahabharata context, Bhishma’s reply

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ १ ॥

श्लोक 1: सफ़ेद वस्त्र पहने, चाँद जैसे उज्ज्वल वर्ण वाले, चार भुजाओं वाले, प्रसन्न मुख वाले विष्णु का ध्यान करें, ताकि सारे विघ्न शांत हो जाएँ।

यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परश्शतम् । विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ २ ॥

श्लोक 2: जिनके द्वारपाल गणेशजी सहित सैकड़ों गण सभी विघ्नों को सदा नष्ट कर देते हैं, उन विष्वक्सेन की मैं शरण लेता हूँ।

व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् । पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ ३ ॥

श्लोक 3: वसिष्ठजी के पौत्र, शक्ति के पुत्र, पराशर ऋषि के पुत्र, शुकदेवजी के पिता, निष्पाप तपोनिधि व्यास महर्षि को मैं नमस्कार करता हूँ।

व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ ४ ॥

श्लोक 4: व्यासरूप विष्णु को नमन, विष्णुरूप व्यास को नमन। हे ब्रह्मनिधि, वसिष्ठ-कुल के तिलक, बार-बार नमस्कार।

अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ ५ ॥

श्लोक 5: विकार-रहित, शुद्ध, नित्य, परमात्मा, सदैव एकरूप, सर्व-व्यापी, सर्व-विजयी विष्णु को नमस्कार।

यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् । विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ६ ॥

श्लोक 6: जिनका स्मरण-मात्र ही जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति दिला देता है, ऐसे सर्व-प्रभु विष्णु को बार-बार प्रणाम।

श्रीवैशम्पायन उवाच । श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः । युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ ७ ॥

श्लोक 7: श्री वैशम्पायन जी ने कहा — सारे धर्मों और पवित्र कथाओं को सुनने के बाद, युधिष्ठिर ने शांतनु-पुत्र भीष्म से पुनः प्रश्न किया —

युधिष्ठिर उवाच । किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् । स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ ८ ॥

श्लोक 8: युधिष्ठिर जी ने पूछा — इस लोक में एक ही देवता कौन है? एक ही परम आश्रय कौन है? किसकी स्तुति और पूजा करके मनुष्य श्रेष्ठ फल पा सकते हैं?

को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः । किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ९ ॥

श्लोक 9: सारे धर्मों में सबसे श्रेष्ठ धर्म कौन सा है? किसका जप करके प्राणी जन्म-मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो सकता है?

श्री भीष्म उवाच । जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ १० ॥

श्लोक 10: भीष्म जी ने उत्तर दिया — जगत के प्रभु, देवों के देव, अनंत, पुरुषोत्तम — उनके सहस्र-नामों की स्तुति करने वाला मनुष्य सदा उठा हुआ (जाग्रत) रहता है।

On a bed of arrows, Bhishma teaches the thousand names
भीष्म-युधिष्ठिर संवाद · Bhishma’s Teaching
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायन् स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ ११ ॥

श्लोक 11: उसी अविनाशी पुरुष की भक्ति-पूर्वक नित्य पूजा करते हुए, ध्यान करते हुए, स्तुति करते हुए, नमन करते हुए, उन्हीं के लिए यज्ञ करते हुए —

अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ १२ ॥

श्लोक 12: वह अनादि-अनंत विष्णु, सारे लोकों के महेश्वर, लोकाध्यक्ष — उनकी नित्य स्तुति करने वाला मनुष्य सब दुखों से पार हो जाता है।

ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ १३ ॥

श्लोक 13: वे ब्रह्मण्य हैं (ब्राह्मण-प्रिय), सर्व-धर्म-ज्ञ हैं, लोकों की कीर्ति बढ़ाने वाले, लोक-नाथ, महा-भूत और सारे प्राणियों के जन्म-स्थान हैं।

एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ १४ ॥

श्लोक 14: मेरे मत में सारे धर्मों का सर्वोत्तम धर्म यही है — कि मनुष्य भक्ति-पूर्वक कमल-नयन श्रीहरि की स्तुति स्तोत्रों से सदा करे।

परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ १५ ॥

श्लोक 15: जो परम महा-तेज है, परम महा-तप है, परम महा-ब्रह्म है, परम परायण (अंतिम आश्रय) है,

पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् । दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १६ ॥

श्लोक 16: पवित्रों के भी पवित्र, मंगलों के भी मंगल, देवों के भी देवता, सारे प्राणियों के अव्यय पिता —

यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे । यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ १७ ॥

श्लोक 17: जिनसे सारे प्राणी युग के आरंभ में जन्म लेते हैं, और युग के अंत में जिनमें पुनः लीन हो जाते हैं —

तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते । विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥ १८ ॥

श्लोक 18: हे राजन्, उन जगत-प्रधान, जगन्नाथ विष्णु के सहस्र-नामों को सुनो — जो पाप और भय का नाश करने वाले हैं।

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः । ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १९ ॥

श्लोक 19: महात्मा विष्णु के जो प्रसिद्ध “गौण नाम” (गुण-वाचक नाम) ऋषियों ने गाए हैं, उन्हीं को मैं तुम्हारे कल्याण के लिए सुनाता हूँ।

ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः । छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥ २० ॥

श्लोक 20: सहस्रनाम के ऋषि हैं महामुनि वेदव्यास, छन्द अनुष्टुप्, और देवता हैं देवकी-पुत्र भगवान श्रीकृष्ण।

अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः । त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते ॥ २१ ॥

श्लोक 21: “अमृतांशूद्भवः” बीज-मंत्र है, “देवकीनन्दनः” शक्ति है, “त्रिसामा” हृदय है — यह पाठ शान्ति (मानसिक शांति) के लिए किया जाता है।

विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् । अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् ॥ २२ ॥

श्लोक 22: विष्णु — जिष्णु (विजयशील) — महा-विष्णु — प्रभविष्णु (सर्व-समर्थ) — महेश्वर — अनेक रूप धारण करने वाले — दैत्यों का अंत करने वाले — पुरुषोत्तम — उन्हें मैं नमन करता हूँ।


न्यास

Nyasa — Ritual Declaration of Rishi, Chandas, Devata

अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्र महामन्त्रस्य श्री वेदव्यासो भगवानृषिः अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता, अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम्, देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः, उद्भवः क्षोभणो देव इति परमो मन्त्रः, शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम्, शार्‍ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम्, रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति नेत्रम्, त्रिसामा सामगस्सामेति कवचम्, आनन्दं परब्रह्मेति योनिः, ऋतुस्सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः, श्री विश्वरूप इति ध्यानम्, श्रीमहाविष्णु प्रीत्यर्थे सहस्रनाम जपे विनियोगः ॥

विनियोग: अब श्री विष्णु के दिव्य सहस्रनाम स्तोत्र महामंत्र का विधि-विनियोग: इसके ऋषि — भगवान वेद-व्यास। छन्द — अनुष्टुप्। देवता — श्री महाविष्णु परमात्मा, श्रीमन् नारायण। बीज — “अमृतांशूद्भवो भानुः”। शक्ति — “देवकीनन्दनः स्रष्टा”। मन्त्र — “उद्भवः क्षोभणो देवः”। कीलक — “शङ्खभृन्नन्दकी चक्री”। अस्त्र — “शार्ङ्गधन्वा गदाधरः”। नेत्र — “रथाङ्गपाणि अक्षोभ्यः”। कवच — “त्रिसामा सामगस्साम”। दिग्बन्ध — “ऋतुः सुदर्शनः कालः”। ध्यान — विश्वरूप का। यह पाठ श्री महाविष्णु की प्रीति-प्राप्ति के लिए किया जाता है।


ध्यानम्

Dhyanam — Meditation Verses (including two adhika-shlokas sung by MS Subbalakshmi)

ध्यानम् । क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकते मौक्तिकानां मालाक्लुप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः । शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूषवर्षै- -रानन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदाशङ्खपाणिर्मुकुन्दः ॥ १ ॥

ध्यान 1: क्षीर-सागर के पवित्र तट पर, रत्न-जड़ित चमकती मणियों की रेती पर, मोतियों की माला से बने आसन पर विराजमान — स्फटिक-मणियों-सदृश मोतियों से सारा शरीर सुशोभित — ऊपर शुभ्र, निर्मल, विस्तृत बादलों ने छाया की है — ऐसे शेष-शायी विष्णु का मैं ध्यान करता हूँ।

Vishnu reclining on the serpent Shesha
शेषशायी नारायण · Narayana on the Cosmic Ocean
भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे कर्णावासाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः । अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवनवपुषं विष्णुमीशं नमामि ॥ २ ॥

ध्यान 2: जिनके पैर पृथ्वी हैं, नाभि आकाश है, श्वास वायु है, नेत्र सूर्य-चंद्र हैं, कान दिशाएँ हैं, सिर स्वर्ग है, मुख अग्नि है, उदर समुद्र है — जिनके भीतर सारा विश्व — देव, मनुष्य, पक्षी, पशु, नाग, गन्धर्व और दैत्य — समाया हुआ है, उन विश्वरूप विष्णु का मैं ध्यान करता हूँ।

All the worlds within one body
विश्वरूप दर्शन · The Universal Form
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाकारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिहृद्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ ३ ॥

ध्यान 3: (यह सबसे प्रसिद्ध ध्यान-श्लोक है।) शान्त-स्वरूप, शेषनाग की शय्या पर शयन करने वाले, कमल-नाभि, देवों के ईश्वर; विश्व-आकार, आकाश-सदृश विशाल, मेघ-वर्ण, सुंदर-अंग; लक्ष्मी के प्रिय, कमल-नयन, योगियों के हृदय-ध्यान में अनुभूत होने वाले — भव के भय को हरने वाले, सर्व-लोकों के एकमात्र नाथ, उन विष्णु की मैं वंदना करता हूँ।

मेघश्यामं पीतकौशेयवासं श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम् । पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम् ॥ ४ ॥

ध्यान 4: मेघ जैसे श्यामवर्ण, पीत-वस्त्र पहने, श्रीवत्स-चिह्न युक्त, कौस्तुभ-मणि से प्रकाशित अंग, पुण्य-स्वरूप, कमल-सदृश विशाल नयनों वाले — सर्व-लोकों के एकमात्र स्वामी विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते । अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ५ ॥

ध्यान 5: (अधिक-श्लोक) सारे प्राणियों के आदि-भूत, पृथ्वी को धारण करने वाले, अनेक रूपों में प्रकट होने वाले, सर्व-शक्ति-मान विष्णु को नमस्कार।

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् । सहारवक्षःस्थलशोभिकौस्तुभं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥ ६ ॥

ध्यान 6: शंख-चक्र सहित, मुकुट-कुंडल से मंडित, पीत-वस्त्रधारी, कमल-नयन, हार से सजे वक्ष पर कौस्तुभ मणि से दीप्त — उन चार-भुजाओं वाले विष्णु को मैं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ।

छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलङ्कृतम् । चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसं रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये ॥ ७ ॥

ध्यान 7: (अधिक-श्लोक) पारिजात-वृक्ष की छाया में, सुवर्ण-सिंहासन पर विराजमान, मेघ-श्याम वर्ण, विशाल-आयत नयनों से सुशोभित — चंद्र-सदृश मुख, चार भुजाएँ, वक्ष पर श्रीवत्स चिह्न — रुक्मिणी और सत्यभामा से सुशोभित — उन द्वारका-नाथ कृष्ण-रूप विष्णु का मैं ध्यान करता हूँ।


सहस्रनाम

108 Shlokas · 1000 Names of Vishnu

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः । भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १॥

श्लोक 1: विश्व के रूप में स्वयं विष्णु हैं, जो भूत-वर्तमान-भविष्य के प्रभु हैं। सृष्टि भी वही, पालन भी वही, अंतरात्मा भी वही।

**विश्व** का अर्थ — विश्व शब्द केवल “दुनिया” नहीं है। संस्कृत में “वि-श” का अर्थ है “जो सब तरफ़ फैला है, सब में प्रवेश कर चुका है।” यानी दुनिया अलग नहीं, विष्णु अलग नहीं — दुनिया ही उनका शरीर है, उनका प्रसार है। जैसे घड़े का आकार मिट्टी से अलग नहीं, वैसे सृष्टि ईश्वर से अलग नहीं। यही अद्वैत की पहली चोट है।

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः । अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २॥

श्लोक 2: मन-अतीत, इन्द्रियों से परे, मुक्तों के आश्रय, ज्ञान से ही जाने जाने वाले प्रभु — योगी-युक्त-अयुक्तमनाः।

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः । नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३॥
Neither man nor beast, neither day nor night
नरसिंह · Narasimha at Dusk

श्लोक 3: नारायण — जल पर शयन करने वाले; हृषीकेश — इन्द्रियों के स्वामी; पद्मनाभ — जिनकी नाभि से ब्रह्मकमल उगा।

**नारायण** कौन? — “नारा” पानी को कहते हैं — और “अयन” का मतलब घर, निवास। नारायण यानी “जिसका घर पानी है।” सृष्टि से पहले जब कुछ नहीं था, बस अनादि क्षीर-सागर था, तब विष्णु उसी पर शेष-नाग की शय्या पर विश्राम करते थे। एक कथा कहती है कि प्रलय में जब सब नष्ट हो गया, तब एक नन्हे बालक मुख में अंगूठा लिए पीपल-पत्ते पर तैरते दिखे — वही बाल-मुकुन्द, वही नारायण।

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः । सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४॥

श्लोक 4: महान् गति, सबका आधार, जग के अधिष्ठान — सर्वव्यापी। जगत के कर्ता भी वही, नाश करने वाले भी वही।

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ ५॥

श्लोक 5: विष्णु अचिन्त्य हैं, कर्म-बंधन से परे, यज्ञ-रूप, अंत-में सब कुछ समेटने वाले। उनका एकमात्र स्वरूप सत्य है।

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ ६॥

श्लोक 6: अगम्य शिखर वाले, सूक्ष्म, दिखने में प्रकट, छिपने में अदृश्य — साध्य विधियों से ही साध्य होने वाले।

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः । प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ ७॥

श्लोक 7: अज (अजन्मा), सर्वेश्वर, सिद्धार्थ — सब मनोरथ पूरे करने वाले, वृषाकपि — धर्म के स्वामी, आमानी — आदर के पात्र।

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ ८॥

श्लोक 8: भूर्भुवःस्वः-तरु: तीनों लोकों का कल्पवृक्ष। तार — तारने वाला। सविता — सूर्यवत प्रकाशमान। प्रपितामह — ब्रह्मा के भी पिता।

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः । अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ ९॥

श्लोक 9: यज्ञ-कर्ता, यज्ञ-भोक्ता, यज्ञ-अंग, यज्ञ-साधन, यज्ञ-भृत — सारे यज्ञ उन्हीं के नाम हैं।

**यज्ञ का वास्तविक अर्थ — यज्ञ सिर्फ़ अग्नि में घी डालना नहीं है। गीता में कृष्ण कहते हैं — “भोगी जीव यज्ञ की बर्बादी है।” असली यज्ञ वह है जब हम अपने अहंकार की आहुति देते हैं। दैनिक जीवन में भी — जो खाना हम खाते हैं, जो सेवा करते हैं, जो प्रेम देते हैं — सब यज्ञ है, अगर “मैं” का धुआँ नहीं उठ रहा।

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः । अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ १०॥

श्लोक 10: रत्नाकर — रत्नों की खान, ईशानः — स्वामी, सुप्रसन्नः — सदा प्रसन्न, विश्वधृक् — विश्व को धारण करने वाले।

अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः । वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ ११॥

श्लोक 11: यज्ञ-गूढ़ का रहस्य, अन्न-रूप और अन्न-दाता — जीवन का मूल पोषण भी वही।

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः । अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ १२॥

श्लोक 12: आत्म-योनि: स्वयं के कारण स्वयं; स्वयंजात, वैखान — ऋषियों के लिए प्रकट; साम-गायन — सामवेद गाने वाले।

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः । अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ १३॥

श्लोक 13: शंख-भृत — शंखधारी; नन्दकी — तलवारधारी; चक्री — सुदर्शन-चक्रधारी; शार्ङ्ग-धन्वा — शार्ङ्ग धनुषधारी; गदाधर।

**सुदर्शन-चक्र** की कथा — कृष्ण के हाथ में चक्र अदृश्य गति से घूमता है। परशुराम-कथा में एक बार चक्र ने सागर को दो भागों में बाँट दिया था, राम की लंका-यात्रा मार्ग के लिए। पर चक्र का असली अर्थ — काल-चक्र, समय-चक्र। जो इस चक्र में बंधा नहीं, वही मुक्त।

Time itself spinning in the Lord's hand
सुदर्शन चक्र · Sudarshana Chakra
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ १४॥

श्लोक 14: सर्व-प्रहरण-आयुध — सब शस्त्र उन्हीं के रूप हैं। वनमाली, श्रीमान, नारायण, विष्णु, वासुदेव — यह अंत-सूत्र बार-बार लौटता है।

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ १५॥

श्लोक 15: पुरुषोत्तम — सब पुरुषों में श्रेष्ठ। अविघ्न — जिन पर कोई विघ्न नहीं। शिव — कल्याणकारी। ईशानः — सबके स्वामी।

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ १६॥

श्लोक 16: भूतात्मा, भूतभावन — सब प्राणियों की आत्मा, सबका पालनकर्ता।

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः । अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ १७॥

श्लोक 17: सर्व: — सर्वव्यापी; शर्व: — संहारक; शिव: — कल्याणरूप; स्थाणु: — अचल; भूतादिः — पंचभूतों का मूल; निधिर्-अव्ययः — अक्षय निधि।

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः । अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ १८॥

श्लोक 18: सम्भवः — सब रूपों में प्रकट हो सकते हैं; भावन: — प्राणियों को जिलाने वाले; भर्ता — पोषक; प्रभवः — सृष्टि-उद्गम।

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः । अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ १९॥

श्लोक 19: प्रजापतिः, हिरण्य-गर्भ — ब्रह्माजी के भी रूप में वही हैं। भू-गर्भ — पृथ्वी के गर्भ (पाताल) में भी वही।

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः । अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ २०॥
The cowherd who plays the flute of awakening
गोविन्द · Govinda with the Gopis

श्लोक 20: अनादि-निधन: — न शुरुआत, न अंत; धाता — रचनाकार; विधाता — व्यवस्था देने वाले; कृतः — कारण रूप।

**अ-नादि-निधन:** अनंत का विज्ञान — आज का कॉस्मोलॉजी भी यही कह रहा है — समय की कोई शुरुआत नहीं, कोई अंत नहीं। ऋषि ने तीन हज़ार साल पहले यही बोला — “अनादि-निधन” — न जन्म, न मृत्यु। जो तुम खोजते हो, वह हमेशा से था, हमेशा रहेगा।

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ २१॥

श्लोक 21: पुण्डरी-काक्ष: — कमल-सी आँखों वाले; वृष-कर्मा — धर्म-रूप कर्म करने वाले; वृष-आकृति — धर्म का स्वरूप।

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः । अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ २२॥

श्लोक 22: रुद्र — संहार के समय रुलाने वाले; बहु-शिरा — हज़ार सिर; बभ्रु — धारण करने वाले; विश्वयोनि: — विश्व का गर्भ।

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ २३॥

श्लोक 23: गुरु-गुरु — गुरुओं के भी गुरु; सत्य — सत्य-स्वरूप; सत्य-पराक्रम — जिनका पराक्रम सच्चा है; वाचस्पति — वाणी के स्वामी।

अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः । सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २४॥

श्लोक 24: अग्रणी — सबको आगे ले जाने वाले; श्रीमान् — लक्ष्मी सहित; सहस्रशीर्ष — हज़ार सिर; विश्वात्मा — सबकी आत्मा; सहस्राक्ष — हज़ार नेत्र।

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः । अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ २५॥

श्लोक 25: आवर्त — चक्र-रूप में घूमता ब्रह्माण्ड; नि-वृत्तात्मा — संयमी; संवृतः — गुप्त; अहः संवर्तक — दिन-चक्र के स्वामी; धरणी-धर — पृथ्वी को धारण करने वाले।

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः । सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ २६॥

श्लोक 26: सुप्रसादः — प्रसन्नता देने वाले; प्रसन्नात्मा — शांत अंतःकरण; सत्कर्ता — सच्चे आचरण वाले; साधु-जुषः — सज्जनों के प्रिय; नारायण।

असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः । सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ २७॥

श्लोक 27: असंख्येय — अगणित रूप; अप्रमेय — नाप से परे; सिद्धार्थ — सारे संकल्प सिद्ध; सिद्धि-दः — भक्तों को सिद्धि देने वाले।

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः । वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ २८॥

श्लोक 28: वृषाही — धर्म रूप; वृषभ — श्रेष्ठ; विष्णु — व्यापक; वृषपर्वा — धर्म जिनके पैर हैं; श्रुति-सागर — वेदों का महासागर।

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ २९॥

श्लोक 29: सुभुज — सुंदर भुजाओं वाले; महेन्द्रः — महान इन्द्र; वसुद — सब रत्नों के दाता; बृहद्रूप — विराट रूप; शिपिविष्टः — यज्ञ में व्याप्त।

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः । ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ३०॥

श्लोक 30: ओजः-तेजः-द्युतिधर — ऊर्जा-तेज-प्रभा के धारक; प्रकाशात्मा — प्रकाश-रूप; प्रतापनः — तेजस्वी; ऋद्धः — समृद्ध।

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः । औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ३१॥

श्लोक 31: अमृतांशूद्भव — चंद्रमा जिनसे उत्पन्न; भानु — सूर्य-रूप; शशिबिन्दु — चंद्र-बिंदु; सुरेश्वर — देवों के स्वामी; औषधम् — जगत का औषध; सेतु: — पुल।

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः । कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ३२॥

श्लोक 32: पवन: — हवा; पावन: — पवित्र करने वाले; अनल: — अग्नि; काम-हा — वासनाओं को नष्ट करने वाले; काम-प्रद: — सच्चे मनोरथ पूर्ण करने वाले।

युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ३३॥

श्लोक 33: युगादिकृत् — युगों के आरंभ कर्ता; युगावर्त: — युग-चक्र; नैक-माय: — अनेक माया-रूप; महाशन: — महान भोक्ता; अदृश्य: — अप्रत्यक्ष; व्यक्त-रूप: — प्रकट भी; सहस्रजित् — हज़ारों को जीतने वाले।

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ३४॥

श्लोक 34: इष्ट: — सबको प्रिय; विशिष्ट: — विशेष; शिष्टेष्ट: — सज्जनों के प्रिय; शिखण्डी — मोर-पंख धारी; नहुष: — जो जीवों को आकर्षित करते हैं; वृष: — धर्मरूप; क्रोध-हा — क्रोध को नष्ट करने वाले।

**नहुष** की कथा — नहुष एक राजा थे जो इंद्र बने — पर गर्व से सप्त-ऋषियों पर वार किया। पतित होकर साँप बने। पाण्डवों के वनवास में युधिष्ठिर ने उन्हें पहचाना, धर्म-प्रश्न से मुक्त किया। कथा सिखाती है — बड़ा पद भी आदमी के अंदर के मनुष्य को नहीं बदलता। विनम्रता ही रक्षा।

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ३५॥

श्लोक 35: अच्युत — कभी न गिरने वाले; प्रथित — प्रसिद्ध; प्राण — प्राण-शक्ति; प्राणद: — प्राण-दाता; वासवानुजः — इन्द्र के छोटे भाई (वामन); अपानिनिधिर् — अपान-निधि; अधिष्ठानम् — आधार।

**अच्युत** — न गिरने वाला — अच्युत का अर्थ है “जो कभी नहीं गिरता” — च्युत-त्व से रहित। भक्त जब भी कहे कि “हरि मुझे छोड़ गए,” तो जानना चाहिए कि हरि तो अच्युत हैं, वे कहीं नहीं जाते। भक्त का मन गिरा है। नाम ही भरोसा है।

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः । वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥ ३६॥
The Lord who dwells in all hearts with infinite compassion
वासुदेव · Vasudeva: Compassionate Lord

श्लोक 36: अप्रमत्त: — सदा सावधान; प्रतिष्ठितः — स्थिर; स्कन्द: — शोषक; स्कन्द-धर: — कार्तिकेय के पिता-रूप; धुर्यः — धुरी; वरद: — वर-दाता; वायु-वाहन: — वायु-वाहन वाले।

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः । अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ ३७॥

श्लोक 37: वासुदेव: — वसुदेव के पुत्र; बृहद्-भानु: — महान तेज; आदिदेव: — आदि-देव; पुरन्दर: — पुरों को तोड़ने वाले (इन्द्र-रूप); अशोक: — शोक-रहित; तारण — तारने वाले; तार: — पार लगाने वाले; शूर — वीर; शौरि: — शूर-वंश के; जनेश्वर: — जनों के स्वामी।

पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् । महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ ३८॥

श्लोक 38: अनुकूल: — अनुग्रही; शताव्रत: — सौ व्रतों वाले; पद्मी — कमल-युक्त; पद्म-निभेक्षण: — कमल-नयन; पद्म-नाभ — नाभि-कमल वाले; अरविन्दाक्ष: — कमल-आँख वाले; पद्म-गर्भ: — कमल के गर्भ वाले; शरीरभृत् — शरीर धारण करने वाले।

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः । सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ ३९॥

श्लोक 39: महार्धि: — महान समृद्धि; ऋद्ध: — समृद्ध; वृद्धात्मा — विकसित आत्मा; महाक्ष: — महान नेत्रों वाले; गरुड़-ध्वज: — जिनकी ध्वजा पर गरुड़; अतुल: — अनुपम; शरभ: — पर्वत-फोड़क; भीमः — भयानक; समय-ज्ञ: — समय के ज्ञाता।

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः । महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ ४०॥
Love alone could bind the Lord
दामोदर · Krishna Bound by Love

श्लोक 40: अवरोह: — उतरने वाले (अवतार-रूप); हविर्हरि: — यज्ञ-हवि का हरण करने वाले; सर्व-लक्षण-लक्षण्य: — सब लक्षणों से युक्त; लक्ष्मीवान् — लक्ष्मी सहित; समितिञ्जय: — युद्ध में विजयी।

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः । करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ ४१॥

श्लोक 41: विक्षर: — अक्षर (अविनाशी); रोहित: — लाल; मार्ग: — मार्ग-स्वरूप; हेतु: — कारण; दामोदर: — उदर पर रस्सी बंधे (बाल-कृष्ण); सह: — सह्य; महीधर: — पृथ्वी-धर; महाभाग: — महा-भाग्यशाली।

**दामोदर** की कथा — यशोदा ने बाल-कृष्ण को ऊखल से बाँधा। पर उनकी कमर पर कोई भी रस्सी छोटी पड़ती गई। अंत में जब मैया के आँसू निकले, तब कृष्ण ने स्वयं अपने को बाँधने दिया। यह नाम सिखाता है — प्रेम से बंधे ईश्वर को सारी शक्तियाँ भी नहीं बाँध सकतीं।

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः । परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ ४२॥

श्लोक 42: वेगवान् — वेगवान; अमिताशन: — असीमित भोक्ता; उद्भव: — उत्पत्ति-स्थल; क्षोभण: — सृष्टि-क्षोभक; देव: — तेजस्वी; श्री-गर्भ: — लक्ष्मी के गर्भ-स्थल; परमेश्वर: — परम स्वामी; करणम् — साधन।

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः । वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ ४३॥

श्लोक 43: कारणम् — कारण; कर्ता — करने वाले; विकर्ता — विशेष करने वाले; गहन: — गहन; गुह: — गुप्त; व्यवसाय: — निश्चय; व्यवस्थान: — व्यवस्था; संस्थान: — आधार; स्थानदो — स्थान देने वाले; ध्रुव: — स्थिर।

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः । हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ ४४॥

श्लोक 44: परर्द्धि: — पर-समृद्धि; परम-स्पष्ट: — अति-प्रकाशित; तुष्ट: — संतुष्ट; पुष्ट: — पुष्ट; शुभेक्षण: — शुभ-दृष्टि; राम: — रमते हैं योगी जिनमें; विराम: — विश्राम; विरज: — रज-गुण रहित; मार्ग: — पथ; नेयः — नीयमान; नयः — नीति-स्वरूप; अनयः — नीति से परे।

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ४५॥

श्लोक 45: वीर: — वीर; शक्ति-मतां श्रेष्ठ — शक्तिशालियों में श्रेष्ठ; धर्म: — धर्म-स्वरूप; धर्म-विदुत्तम: — धर्म-ज्ञाताओं में श्रेष्ठ; वैकुण्ठ: — जहाँ कुंठा नहीं; पुरुष: — सार्वभौम सत्ता; प्राण: — जीवन-शक्ति; प्राणद: — जीवन-दाता; प्रणव: — ॐकार।

विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् । अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ४६॥

श्लोक 46: पृथ्वी: — विस्तारवती; हिरण्य-गर्भ: — सुवर्ण-गर्भ; शत्रु-घ्नः — शत्रु-नाशक; व्याप्त: — सर्वत्र फैले; वायु: — वायु-रूप; अधोक्षज: — इन्द्रियों से परे; ऋतु: — ऋतु-स्वरूप; सुदर्शन: — सुंदर दर्शन; काल: — काल; परमेष्ठी — सब पर परम; परिग्रह: — स्वीकार करने वाले।

अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः । नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ ४७॥

श्लोक 47: उग्र — प्रबल; संवत्सर: — वर्ष-स्वरूप; दक्ष: — चतुर; विश्राम: — विश्रामदायक; विश्व-दक्षिण: — विश्व-पालक; विस्तार: — विस्तृत; स्थावर-स्थाणु: — अचल; प्रमाणम् — प्रमाण; बीज — बीज; अव्यय: — अविनाशी।

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः । सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ४८॥

श्लोक 48: अर्थ: — प्रयोजन; अनर्थ: — प्रयोजनहीनता; महाकोश: — महा-कोष; महाभोग: — महा-भोग्य; महाधन: — महा-धनी; अनिर्विण्ण: — जो कभी खिन्न नहीं; स्थविष्ठ — स्थूल; अभूः — न जन्म लेने वाले; धर्म-यूप — धर्म-स्तंभ; महामख: — महा-यज्ञ।

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् । मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ४९॥

श्लोक 49: नक्षत्र-नेमि: — नक्षत्रों के केंद्र; नक्षत्री — नक्षत्रों के धारक; क्षम: — सहिष्णु; क्षाम: — कृशतम से परे; समीहन: — सदैव क्रियाशील; यज्ञ: — यज्ञ-स्वरूप; इज्य: — पूज्य; महेज्य: — महा-पूज्य; क्रतु: — क्रतु-यज्ञ; सत्त्रम् — सत्त्र; सतां गति: — सज्जनों की गति।

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् । वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ५०॥

श्लोक 50: सर्व-दर्शी — सबको देखने वाले; विमुक्तात्मा — मुक्त-आत्मा; सर्व-ज्ञ: — सर्व-ज्ञाता; ज्ञानमुत्तमम् — उत्तम ज्ञान; सुव्रत: — सुंदर व्रती; सुमुख: — सुंदर मुख; सूक्ष्म: — सूक्ष्म; सुघोष: — सुंदर ध्वनि; सुख-दः — सुख-दाता; सुहृत् — सच्चा मित्र।

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् । अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ५१॥

श्लोक 51: मनोहर — मन-हरण करने वाले; जित-क्रोध: — क्रोध को जीतने वाले; वीर-बाहु: — वीर भुजाओं वाले; विदारण: — विदीर्ण करने वाले; स्वापन: — सुलाने वाले; स्व-वश: — स्व-अधीन; व्यापी — व्याप्त; नैक-आत्मा — अनेक रूप; नैक-कर्म-कृत् — अनेक कर्म करने वाले।

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः । आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ ५२॥

श्लोक 52: वत्सर: — वर्ष; वत्सल: — स्नेहमय; वत्सी — बछड़ा रखने वाले; रत्न-गर्भ: — रत्न-गर्भित; धनेश्वर: — धन के स्वामी; धर्म-गुप् — धर्म-रक्षक; धर्म-कृत् — धर्म-कर्ता; धर्मी — धर्म-युक्त; सत् — सत्ता; असत् — असद् का भी आधार; क्षरम् — क्षर; अक्षरम् — अक्षर।

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः । शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ ५३॥

श्लोक 53: अविज्ञाता — अज्ञेय; सहस्रांशु: — हज़ार किरणों वाले; विधाता — विधान-कर्ता; कृत-लक्षण: — लक्षण-युक्त; गभस्ति-नेमि: — किरण-चक्र; सत्त्व-स्थ: — सत्त्व-प्रधान; सिंहः — सिंह-रूप; भूत-महेश्वर: — प्राणियों के महा-स्वामी।

सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः । विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वताम्पतिः ॥ ५४॥

श्लोक 54: आदि-देव: — आदि-देव; महा-देव: — महा-देव; देवेश: — देवों के ईश; देव-भृद् गुरुः — देवों के पालक गुरु; उत्तर: — उत्तम; गोपति: — गोओं के स्वामी; गोप्ता — रक्षक; ज्ञान-गम्यः — ज्ञान से जाने जाने वाले; पुरातन: — अत्यंत प्राचीन।

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः । अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ ५५॥

श्लोक 55: शरीर-भूत-भृत् — शरीरों में प्राण-धारी; भोक्ता — भोगी; कपीन्द्र: — कपिश्रेष्ठ राम (वानर-सेना के स्वामी-रूप); भूरि-दक्षिण: — बहुत दान देने वाले; सोमप: — सोमरस पीने वाले; अमृतप: — अमृत पीने वाले; सोम: — सोम-चंद्र रूप; पुरु-जित् — बहुतों को जीतने वाले; पुरुसत्तम: — उत्तम पुरुष।

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः । आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ ५६॥

श्लोक 56: विनय: — विनय-रूप; जय: — विजय; सत्य-संध: — सत्य-वचनी; दाशार्ह: — दाशार्ह-कुल में जन्म (कृष्ण); सात्वतां पति: — यादवों के स्वामी; जीव: — जीव-स्वरूप; विनयिता-साक्षी — विनय के साक्षी; मुकुन्द: — मुक्ति-दाता; अमित-विक्रम: — असीम पराक्रमी।

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः । त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश‍ृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ५७॥

श्लोक 57: अम्भोनिधि: — समुद्र; अनन्त-आत्मा — अनंत-रूप; महोदधि-शय: — महासागर पर शयन करने वाले; अन्तक: — अंत करने वाले; अज: — अजन्मा; महार्ह: — महा-पूज्य; स्वाभाव्य: — स्वभाव-रूप; जित-आमित्र: — शत्रुओं को जीतने वाले; प्रमोदन: — आनंद-दायक।

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी । गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ५८॥
The boar rescues Bhudevi from the cosmic waters
वराह अवतार · Varaha Lifts the Earth

श्लोक 58: आनंद: — आनंद-स्वरूप; नन्दन: — आनंद देने वाले; नन्द: — आनंद-रूप; सत्य-धर्मा — सत्य-धर्मी; त्रिविक्रम: — त्रिलोक नापने वाले (वामन); महर्षि — महान ऋषि; कपिलाचार्य: — कपिल-मुनि के रूप; कृत-ज्ञ: — कृतज्ञ; मेदिनीपति: — पृथ्वी के स्वामी।

**त्रिविक्रम** — तीन पद — बलि राजा बहुत दान देते थे। वामन-ब्राह्मण बने विष्णु उनसे “तीन पग भूमि” मांगने आए। बलि हंस दिए — “इतना ही?” पर वामन ने विराट रूप लिया। एक पग में पृथ्वी नापी, दूसरे में स्वर्ग, तीसरा कहाँ रखें? बलि ने अपना सिर झुका दिया — “यहाँ।” अहंकार का नाश, भक्त का उत्थान।

The dwarf asks for three paces and spans the worlds
त्रिविक्रम · वामन · Vamana’s Three Strides
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः । वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ ५९॥

श्लोक 59: त्रिपद: — तीन पद वाले (वामन); त्रिदशाध्यक्ष: — तीनों लोकों के अध्यक्ष; महा-शृङ्ग: — महा-शिखर (मत्स्य-अवतार); कृतान्त-कृत् — अंत का अंत; महा-वराह: — वराह-अवतार; गोविन्द: — गौओं के पालक; सुषेण: — सुंदर सेना वाले; कनक-अंगदी — सोने के बाजूबंद धारी।

**महा-वराह** का कथा — हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को सागर में डुबो दिया था। विष्णु ने वराह-रूप लिया, अपने दाँतों से पृथ्वी को उठाया, सागर से बाहर ले आए। आज के इकोलॉजिकल संकट में यही कथा प्रासंगिक है — जब तक कोई वराह जैसा “नीचे झुकने” को तैयार नहीं होता, तब तक पृथ्वी नहीं उठती।

भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः । आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ ६०॥

श्लोक 60: गुह्य: — गुह्य; गभीर: — गंभीर; गहन: — गहरा; गुप्त: — गुप्त; चक्र-गदा-धर: — चक्र और गदा धारी; वेधा: — विधाता; स्वांग: — स्व-शरीरी; अजित: — अजेय; कृष्ण: — श्याम-वर्ण; दृढ़: — स्थिर; संकर्षण — सब खींचने वाले; अच्युतः।

**कृष्ण** — काला क्यों? — “कृष्ण” का अर्थ है “जो सबको अपनी ओर आकर्षित करे।” श्याम वर्ण का गहरा अर्थ — जैसे काली रात में सारे रंग समा जाते हैं, वैसे ही कृष्ण में सब भक्ति, सब ज्ञान, सब कर्म समा जाते हैं। आकर्षण ही प्रेम है, प्रेम ही ईश्वर।

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः । दिवस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ ६१॥

श्लोक 61: वरुणो वारुणो वृक्ष: — जल-पति, उनके पुत्र, वृक्ष-रूप; पुष्कराक्षः — कमल-नयन; महा-मनाः — उदार मन; भगवान् — षड्-ऐश्वर्य-युक्त; भगहा — भाग्य-हर; आनन्दी — आनंद-स्वरूप; वनमाली — वन-माला धारी; हल-आयुध: — हल-शस्त्र (बलराम)।

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् । संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ ६२॥

श्लोक 62: आदित्य: — अदिति-पुत्र; ज्योति-आदित्य: — ज्योति-सूर्य; सहिष्णु: — सहिष्णु; गति-सत्तम: — श्रेष्ठ गति; सुधन्वा — सुंदर धनु; खण्ड-परशु: — खण्डनशील परशु (परशुराम-रूप); दारुण: — भयावह; द्रविण-प्रद: — धन-दाता।

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः । गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ ६३॥

श्लोक 63: दिव-स्पृक् — आकाश-स्पर्श; सर्व-दृग्-व्यास: — सबको देखने वाले व्यास; वाचस्पति: — वाणी के पति; अयोनिज: — अजन्मा; त्रि-साम — त्रिविध साम; सामग: — साम गाने वाले; साम: — साम; निर्वाण: — मोक्ष; भेषजम् — औषध; भिषक् — चिकित्सक।

अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः । श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ ६४॥

श्लोक 64: संन्यास-कृत् — संन्यास-प्रवर्तक; शम: — शांति; शान्त: — शांत; निष्ठा — निष्ठा; शान्ति: — शांति-स्वरूप; परायणम् — परम-स्थान; शुभाङ्ग: — सुंदर-अंग; शान्ति-दः — शांति-दाता; स्रष्टा — सृष्टिकर्ता; कुमुद: — कमल-रूप; कुवलेशय: — पृथ्वी पर विश्राम करने वाले।

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः । श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ ६५॥

श्लोक 65: गो-हित: — गौ-हितैषी; गोपति: — गो-पति; गोप्ता — रक्षक; वृषभ-अक्ष: — वृष-नेत्र; वृष-प्रिय: — वृष-प्रिय; अनिवर्ती — वापस न लौटने वाले (मृत्यु से); निवृत्तात्मा — विरक्त; संक्षेप्ता — समेटने वाले; क्षेम-कृत् — कुशल-कर्ता; शिव: — कल्याण।

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः । विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ ६६॥

श्लोक 66: श्रीवत्स-वक्षा: — श्रीवत्स-चिह्न-वक्ष; श्री-वास: — लक्ष्मी-निवास; श्रीपति: — लक्ष्मीपति; श्रीमतां वर: — श्री-मानों में श्रेष्ठ; श्री-दः — श्री-दाता; श्रीश: — श्री-ईश; श्री-निवास: — श्री-निवासी; श्री-निधि: — श्री-निधि; श्री-विभावन: — श्री-विकासक; श्री-धर: — श्री-धारक।

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः । भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ ६७॥

श्लोक 67: श्री-कर: — श्री-कर्ता; श्रेयः — श्रेय-रूप; श्रीमान् — श्रीयुक्त; लोक-त्रयाश्रय: — त्रिलोक-आश्रय; स्वक्ष: — सुंदर-नेत्र; स्वङ्ग: — सुंदर-अंग; शतानन्द: — सौ-आनंद; नन्दि: — आनंद-स्वरूप; ज्योतिर्-गणेश्वर: — ज्योति-गण-ईश।

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः । अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ ६८॥

श्लोक 68: विजित-आत्मा — आत्म-विजयी; विधेयात्मा — विधेय-आत्मा; सत्-कीर्ति — सच्ची कीर्ति; छिन्न-संशय: — संशय-हंता; उदीर्ण: — उत्थित; सर्वत-चक्षु: — सर्वत्र-नेत्र; अनीश: — जिसका स्वामी नहीं; शाश्वत-स्थिर: — शाश्वत-स्थिर; भूशय: — भूमि पर शय्या (राम के वनवास-स्मरण में)।

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः । त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ ६९॥

श्लोक 69: भूषण: — भूषण-रूप; भूति: — ऐश्वर्य; विशोकः — शोक-रहित; शोक-नाशन: — शोक-नाशक; अर्चिष्मान् — तेजस्वी; अर्चितः — पूजित; कुम्भ: — कुम्भ; विशुद्धात्मा — शुद्ध-आत्मा; विशोधन: — शुद्धि-कर्ता; अनिरुद्ध: — अनिर्रोध्य; अप्रतिरथ: — अप्रतिरोध्य; प्रद्युम्न: — प्रद्युम्न-रूप; अमित-विक्रम: — असीम वीर्य।

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः । अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥ ७०॥

श्लोक 70: काल-नेमि-निहा — काल-नेमि असुर का नाश करने वाले; वीर: — वीर; शौरि — शूरपुत्र; शूर-जनेश्वर: — शूर-जनेश; त्रिलोकात्मा — त्रिलोक की आत्मा; त्रिलोकेश: — त्रिलोक-ईश; केशव: — केशी-हंता; केशिहा — केशी का नाश करने वाले; हरि: — हरण करने वाले।

**केशव** और **केशी-वध** — केशी नाम का घोड़े-रूप में राक्षस मथुरा में आया था। कृष्ण ने उसके मुख में अपना हाथ डाला, मुख के अंदर ही अपनी भुजा बढ़ाकर उसे मार डाला। “केशव” नाम उसी से पड़ा — “केशी जिसने मारा।” पर गूढ़ार्थ — “केश” यानी बाल, “व” धारक — “जिसके सुंदर बाल हैं।” दोनों अर्थ साथ चलते हैं।

The demon horse meets its match
केशव · केशी-हा · Keshava Slays Keshi
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः । ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ ७१॥

श्लोक 71: काम-देव: — काम-रूप; काम-पाल: — काम-पालक; कामी — काम-युक्त; कान्त: — रमणीय; कृतागम: — शास्त्र-प्रवर्तक; अनिर्देश्य-वपु: — अनिर्देश्य शरीर; विष्णु: — व्याप्त; वीर: — वीर; अनन्त: — अनंत; धनंजय: — धन-विजयी।

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः । महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ ७२॥

श्लोक 72: ब्रह्मण्यो ब्रह्म-कृद्-ब्रह्मा — ब्रह्म-रूप, ब्रह्म-कर्ता, स्वयं ब्रह्मा; ब्रह्म — ब्रह्म; ब्रह्म-विवर्धन: — ब्रह्म-बढ़ाने वाले; ब्रह्म-विद् — ब्रह्म-ज्ञाता; ब्राह्मण: — ब्राह्मण; ब्रह्मी — ब्रह्म-स्वरूप; ब्रह्म-ज्ञ: — ब्रह्म-ज्ञ; ब्राह्मण-प्रिय: — ब्राह्मण-प्रिय।

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः । पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ ७३॥

श्लोक 73: महा-क्रम: — महान पदक्षेप; महा-कर्मा — महान कर्ता; महा-तेज: — महान तेज; महोरग: — महा-नाग (शेष-रूप); महा-क्रतु: — महान यज्ञ; महा-यज्वा — महान यज्ञ-कर्ता; महा-यज्ञ: — महा-यज्ञ; महाहवि: — महा-आहुति।

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः । वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ ७४॥

श्लोक 74: स्तव्य: — स्तुत्य; स्तव-प्रिय: — स्तोत्र-प्रिय; स्तोत्रम् — स्तुति-रूप; स्तुति: — स्तोत्र; स्तोता — स्तोता; रण-प्रिय: — युद्ध-प्रिय (धर्म-युद्ध); पूर्ण — पूर्ण; पूरयिता — पूर्ति-कर्ता; पुण्य: — पवित्र; पुण्य-कीर्ति — पुण्य-कीर्ति; अनामय: — रोग-रहित।

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः । शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ ७५॥

श्लोक 75: मनोजव: — मन के वेग से चलने वाले; तीर्थ-कर: — तीर्थ-निर्माता; वसु-रेता — सुवर्ण-बीज; वसु-प्रद: — वसु-दाता; वसु-प्रद: — धन-दाता; वासु-देव: — वसुदेव-पुत्र; वसु: — वसु-देव; वसु-मनाः — उदार मन; हवि: — हवि-स्वरूप।

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः । दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ ७६॥

श्लोक 76: सद्-गति: — सद्-गति; सत्-कृति: — सत्-कर्म; सत्ता — सत्ता-स्वरूप; सद्भूति: — सद्-भाव; सत्-परायण: — सज्जन-आश्रय; शूर-सेन: — शूरों की सेना; यदु-श्रेष्ठ: — यादवों में श्रेष्ठ; सन्निवास: — सब का निवास; सुयामुन: — यमुना-क्षेत्रवास।

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् । अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ ७७॥

श्लोक 77: भूत-आवास: — सब प्राणियों के निवास; वासुदेव: — पुनः कृष्ण-रूप; सर्वासु-निलय: — सारे प्राणों के आश्रय; अनल: — अग्नि-रूप; दर्प-हा — अहंकार-हंता; दर्प-दः — गर्वित को भी गर्व-दाता; दृप्त: — मस्त; दुर्धर: — कठिन-धारणीय; अपराजित: — अजेय।

एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम् । लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ ७८॥

श्लोक 78: विश्व-मूर्ति: — विश्व-आकार; महा-मूर्ति: — महान-मूर्ति; दीप्त-मूर्ति: — तेज-मूर्ति; अमूर्तिमान् — अ-आकार; अनेक-मूर्ति: — अनेक-रूप; अव्यक्त: — अप्रकट; शत-मूर्ति: — सौ-रूप; शताननः — सौ-मुख।

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी । वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ ७९॥

श्लोक 79: एक — एक; नैक — अनेक; सवः — यज्ञ; कः — ब्रह्मा-रूप; किम् — “क्या” (विस्मय-रूप); यत्-तत्-पदम् — “यह-वह” (सारा सत्); अनुत्तमम् — अनुत्तम; लोक-बंधु: — लोकों के बंधु; लोक-नाथ: — लोक-स्वामी; माधव: — लक्ष्मीपति; भक्त-वत्सल: — भक्तों पर प्रेम।

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् । सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ ८०॥

श्लोक 80: सुवर्ण-वर्ण: — सुवर्ण-वर्ण; हेमाङ्ग: — सुवर्ण-अंग; वराङ्ग: — श्रेष्ठ-अंग; चन्दनाङ्गदी — चंदन-बाजूबंद; वीर-हा — वीरों के नाशक; विषम: — विषम; शून्य: — शून्य-रूप; घृताशी — घी-प्रेमी; अचल: — अचल; चल: — चल।

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः । प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश‍ृङ्गो गदाग्रजः ॥ ८१॥

श्लोक 81: अमानी — मान-रहित; मान-दः — मान-दाता; मान्य: — मान्य; लोक-स्वामी — लोक-स्वामी; त्रिलोक-धृक् — त्रिलोक-धारक; सुमेधा — सुमति; मेधज: — यज्ञ से उत्पन्न; धन्य: — भाग्यशाली; सत्य-मेधा: — सत्य-बुद्धि; धरा-धर: — पृथ्वी-धारक।

चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः । चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ८२॥

श्लोक 82: तेज-वृष: — तेज-वर्षक; द्युति-धर: — तेज-धारक; सर्व-शस्त्र-भृतां वर: — सब शस्त्र-धारियों में श्रेष्ठ; प्रग्रह: — नियंत्रक; निग्रह: — दमन-कर्ता; व्यग्र: — चंचल; नैक-शृङ्ग: — अनेक-शिखर; गदाग्रज: — गद के अग्रज (बलराम-कृष्ण के सन्दर्भ में)।

समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः । दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ ८३॥

श्लोक 83: चतुर्-मूर्ति: — चार-मूर्ति (वासुदेव-संकर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध); चतुर्-बाहु: — चार-भुजा; चतुर्-व्यूह: — चार-व्यूह; चतुर्-गति: — चार-गति; चतुर्-आत्मा — चार-आत्मा; चतुर्-भाव: — चार-भाव; चतुर्-वेद-विद् — चारों वेदों का ज्ञाता; एक-पात् — एक-पाद।

**चतुर्-व्यूह** का रहस्य — भगवान के चार रूप हैं — वासुदेव (शुद्ध चेतना), संकर्षण (अहं-अन्तःकरण), प्रद्युम्न (मन-बुद्धि), अनिरुद्ध (अहंकार-शरीर)। यह वैष्णव दर्शन का आधार है। हर मनुष्य भी इन्हीं चार तहों से बना है — इसलिए हर “मैं” में विष्णु ही छिपे हैं।

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः । इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ ८४॥

श्लोक 84: समावर्त: — चक्र-रूप; अनिवृत्तात्मा — अविरक्त; दुर्जय: — दुर्जेय; दुरतिक्रम: — अ-उल्लंघ्य; दुर्लभ: — दुर्लभ; दुर्गम: — दुर्गम; दुर्ग: — किला-स्वरूप; दुरावास: — दुर्वास; दुरारिहा — दुष्ट-शत्रु-हंता।

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः । अर्को वाजसनः श‍ृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ ८५॥

श्लोक 85: शुभाङ्ग: — शुभ-अंग; लोक-सार-अङ्ग: — लोक-सार-अंग; सुतन्तु: — सुंदर-तंतु; तन्तु-वर्धन: — तंतु-वर्धक (संतान-पालक); इन्द्र-कर्मा — इन्द्र के कर्म; महा-कर्मा — महा-कर्म; कृत-कर्मा — कर्म-कर्ता; कृत-आगम: — शास्त्र-प्रवर्तक।

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः । महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ ८६॥

श्लोक 86: उद्भव: — उत्पत्ति-स्थान; सुन्दर: — सुंदर; सुन्दः — जल-प्रिय; रत्न-नाभ: — रत्न-नाभि; सु-लोचन: — सुंदर-नेत्र; अर्क: — सूर्य; वाजसन: — यज्ञ-युक्त; शृङ्गी — शिखरी (मत्स्य-रूप); जयन्त: — विजयी; सर्व-विज्-जयी — सब विजयों को पाने वाले।

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः । अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ ८७॥

श्लोक 87: सुवर्ण-बिन्दु: — सुवर्ण-बिन्दु; अक्षोभ्य: — अविचल; सर्व-वाग्-ईश्वर-ईश्वर: — सब वाणी-स्वामियों के भी स्वामी; महाहृद: — महा-हृदय; महा-गर्त: — महा-गर्त; महा-भूत: — महा-भूत; महानिधि: — महा-निधि।

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः । न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ ८८॥

श्लोक 88: कुमुद: — कुमुद; कुन्दर: — कुंदर; कुन्द: — कुन्द; पर्जन्य: — वर्षा-देव; पावन: — पवित्रकर्ता; अनिल: — अनिल; अमृताश: — अमृत-पीने वाले; अमृतवपु: — अमृत-शरीर; सर्व-ज्ञ: — सर्व-ज्ञ; सर्व-तोमुख: — सब ओर मुख।

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः । अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ ८९॥

श्लोक 89: सुलभ: — सरलता से प्राप्त; सुव्रत: — सुव्रती; सिद्ध: — सिद्ध-पुरुष; शत्रु-जित् — शत्रु-विजयी; शत्रु-तापन: — शत्रु-तप्तक; न्यग्रोधो उदुम्बर: — वट, उदुम्बर; अश्वत्थ: — पीपल; चाणूर-आन्ध्र-निषूदन: — चाणूर और आन्ध्र का नाश करने वाले (कृष्ण-कथा)।

**न्यग्रोध, उदुम्बर, अश्वत्थ** — तीन वृक्ष — वट, गूलर, पीपल — तीनों विष्णु के नाम। गीता कहती है “ऊर्ध्व-मूल, अधः-शाख” — पीपल का पेड़ उल्टा बना है, जड़ें ऊपर, शाखाएँ नीचे। यही संसार का स्वरूप। जड़ ब्रह्म में है, शाख दुनिया में फैली है।

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् । अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ ९०॥

श्लोक 90: सहस्रार्ची: — हज़ार किरणें; सप्त-जिह्व: — सात जीभ (अग्नि-रूप); सप्तैध: — सात ईंधन; सप्त-वाहन: — सात-वाहन; अ-मूर्ति: — अ-आकार; अनघ: — पाप-रहित; अचिन्त्य: — अचिन्त्य; भय-कृत् — भय-कर्ता (अधर्म-ज्ञों को); भय-नाशन: — भय-नाशक (धर्म-ज्ञों को)।

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः । आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ ९१॥

श्लोक 91: अणु: — अणु-जैसा सूक्ष्म; बृहत् — विराट; कृश: — कृश; स्थूल: — स्थूल; गुणभृत् — गुण-धारक; निर्गुण: — गुण-रहित; महान् — महान; अधृत: — न-धृत; स्व-धृत: — स्व-धृत; स्वास्य: — सुंदर-मुख; प्राग्-वंश: — प्राग्-वंशी; वंश-वर्धन: — वंश-वर्धक।

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः । अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः ॥ ९२॥

श्लोक 92: भार-भृत् — भार-धारक; कथित: — कथित; योगी — योगी; योगीश: — योगियों के ईश; सर्व-कामद: — सब-कामना-दाता; आश्रम: — आश्रम-स्वरूप; श्रमण: — श्रमी; क्षाम: — कृश-रूप; सुपर्ण: — सुंदर-पंख वाले; वायु-वाहन: — वायु-वाहन वाले।

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः । अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ ९३॥

श्लोक 93: धनुर्धर: — धनु-धारी; धनुर्-वेद: — धनु-विद्या-स्वामी; दण्ड: — दंड; दमयिता — दमन-कर्ता; दम: — दंड-स्वरूप; अपराजित: — अपराजित; सर्व-सह: — सब सहने वाले; नियन्ता — नियन्ता; अनियम: — नियम-रहित; अयम: — यम-रहित।

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः । रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ ९४॥

श्लोक 94: सत्त्ववान् — सत्त्व-युक्त; सात्विक: — सात्विक; सत्य: — सत्य-रूप; सत्य-धर्म-परायण: — सत्य-धर्म-परायण; अभिप्राय: — अभिलाषा-स्वरूप; प्रिय-अर्ह: — प्रिय-योग्य; अर्ह: — पूज्य; प्रियकृत् — प्रिय-कर्ता; प्रीतिवर्धन: — प्रीति-वर्धक।

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः । अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ ९५॥

श्लोक 95: विहाय-सगति: — आकाश-गति; ज्योति: — ज्योति; सुरुचि: — सुंदर-रुचि; हुतभुक् — हवि-भोक्ता; विभु: — व्यापक; रवि: — सूर्य; विरोचन: — विविध-प्रकाशक; सूर्य: — सूर्य; सविता — सविता; रवि-लोचन: — सूर्य-नेत्र।

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः । स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥ ९६॥

श्लोक 96: अनन्त: — अनंत; हुत-भुक् — हवि-भोक्ता; भोक्ता — भोक्ता; सुखद: — सुख-दाता; नैज: — स्वभाव-रूप; अग्रज: — ज्येष्ठ; अनिर्विण्ण: — अ-खिन्न; सदा-मर्षी — सदा-सहिष्णु; लोकाधिष्ठानम् — लोक-आधार; अद्भुत: — अद्भुत।

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः । शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ ९७॥

श्लोक 97: सनात्-सनातनतम: — आदि-सनातन; कपिल: — कपिल-मुनि (सांख्य-संस्थापक); कपि: — कपि-रूप; अव्यय: — अव्यय; स्वस्ति-दः — स्वस्ति-दाता; स्वस्ति-कृत् — मंगल-कर्ता; स्वस्ति — कल्याण; स्वस्ति-भुक् — कल्याण-भोक्ता; स्वस्ति-दक्षिण: — कल्याण-दाता।

**कपिल-मुनि** और सांख्य — कपिल मुनि ने सांख्य-दर्शन दिया — पुरुष और प्रकृति का विज्ञान। वे विष्णु के अवतार थे। जब उनकी बहन के 60,000 पुत्रों ने उनके तपस्या पर आक्षेप किया, तो क्रोध-नेत्र से सब भस्म हो गए। गंगा-अवतरण की कथा वहीं से शुरू हुई।

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः । विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ ९८॥

श्लोक 98: अ-रौद्र: — अ-रौद्र; कुण्डली — कुंडलधारी; चक्री — चक्रधारी; विक्रमी — विक्रमी; ऊर्जित-शासन: — तेज शासन वाले; शब्दातिग: — शब्दों से परे; शब्द-सह: — शब्द-सह्य; शिशिर: — शिशिर; शर्वरी-कर: — रात्रि-कर्ता।

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः । वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ ९९॥

श्लोक 99: अक्रूर: — अक्रूर; पेशल: — पेशल; दक्ष: — कुशल; दक्षिण: — दक्षिण; क्षमिणां वर: — क्षमाशीलों में श्रेष्ठ; विद्वत्तम: — विद्वानों में श्रेष्ठ; वीत-भय: — भय-रहित; पुण्य-श्रवण-कीर्तन: — पुण्य-कीर्तन-स्वरूप।

अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः । चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ १००॥

श्लोक 100: उत्तारण: — उतारने वाले; दुष्कृति-हा — दुष्-कर्म-नाशक; पुण्य: — पुण्य-रूप; दुः-स्वप्न-नाशन: — बुरे स्वप्न नष्ट करने वाले; वीर-हा — वीरों (अहंकारियों) का नाश करने वाले; रक्षण: — रक्षक; सन्त: — सज्जन-रूप; जीवन: — जीवन-रूप; पर्यवस्थित: — सुस्थित।

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः । जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ १०१॥

श्लोक 101: अनन्त-रूप: — अनंत-रूप; अनन्त-श्री: — अनंत-श्री; जित-मन्यु: — क्रोध-विजयी; भयापह: — भय-हर; चतुरश्र: — सम-वर्गक; गभीरात्मा — गंभीर-आत्मा; विदिश: — दिशा-दायक; व्यादिश: — आदेश-दायक; दिश: — दिशा-रूप।

आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः । ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ १०२॥

श्लोक 102: अनादि: — अनादि; भू-र्भुव: — भू-भुवः; लक्ष्मी: — लक्ष्मी; सुवीर: — सुवीर; रुचिर-अङ्गद: — सुंदर-बाजूबंद; जनन: — जन्म-दाता; जन-जन्म-आदि: — जन्म-आदि; भीम: — भीम; भीम-पराक्रम: — भीम-पराक्रम।

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः । तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ १०३॥

श्लोक 103: आधार-निलय: — आधार-स्थान; अधाता — अ-धाता; पुष्प-हास: — कुसुमित-हास्य; प्रजागर: — जागरणकर्ता; ऊर्ध्वग: — ऊर्ध्वगामी; सत्पथ-आचार: — सत्-पथ-चारी; प्राण-द: — प्राण-दाता; प्रणव: — ॐ-कार; पण: — कर्म-पणी।

भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः । यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ १०४॥

श्लोक 104: प्रमाणम् — प्रमाण; प्राण-निलय: — प्राण-निवास; प्राण-भृत् — प्राण-धारक; प्राण-जीवन: — प्राण से जिलाने वाले; तत्त्वम् — तत्त्व; तत्त्व-विद् — तत्त्व-ज्ञाता; एकात्मा — एक-आत्मा; जन्म-मृत्यु-जरा-अति-ग: — जन्म-मृत्यु-बुढ़ापे से परे।

यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः । यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ १०५॥

श्लोक 105: भू-र्भुवः-स्व:-तरु: — तीन लोकों का कल्पवृक्ष; तार: — पार लगाने वाले; सविता — सविता; प्रपितामह: — पितामह के भी पिता; यज्ञ: — यज्ञ; यज्ञपति: — यज्ञ-पति; यज्वा — यज्वा; यज्ञ-अङ्ग: — यज्ञ-अंग; यज्ञ-वाहन: — यज्ञ-वाहक।

आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः । देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ १०६॥

श्लोक 106: यज्ञ-भृत् — यज्ञ-पालक; यज्ञ-कृत् — यज्ञ-कर्ता; यज्ञी — यज्ञ-युक्त; यज्ञ-भुक् — यज्ञ-भोक्ता; यज्ञ-साधन: — यज्ञ-साधक; यज्ञ-अन्त-कृत् — यज्ञ-समापक; यज्ञ-गुह्यम् — यज्ञ-रहस्य; अन्नम् — अन्न; अन्न-अद: — अन्न-भोक्ता।

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः । रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ १०७॥

श्लोक 107: आत्म-योनि: — स्वयं के कारण स्वयं; स्वयं-जात: — स्वयं-जन्म; वैखान: — ऋषि-रूप; साम-गायन: — साम-गायक; देवकी-नन्दन: — देवकी-पुत्र (कृष्ण); स्रष्टा — सृष्टिकर्ता; क्षितीश: — पृथ्वीपति; पाप-नाशन: — पाप-नाशक।

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी । श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ १०८॥

श्लोक 108: शंख-भृत् — शंख-धारक; नन्दकी — तलवार-धारी; चक्री — सुदर्शन-धारी; शार्ङ्ग-धन्वा — शार्ङ्ग-धनु-धारी; गदा-धर: — गदा-धारी; रथाङ्ग-पाणि — चक्र-पाणि; अक्षोभ्य: — अ-क्षोभ्य; सर्व-प्रहरण-आयुध: — सर्व-अस्त्र-आयुध। ॐ नम इति।


फलश्रुति एवं उत्तर-पीठिका

Phalashruti & Uttara-peetika — Fruits of recitation, concluding dialogues, and the Rama-Nama secret

वनमाली गदी शार्‍ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी । श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ १०८ ॥
Sanatkumara reveals the glory of the thousand names
सहस्रनाम महिमा · The Secret of a Thousand Names

1. वनमाली, गदाधारी, शार्ङ्ग-धनुर्धारी, शंखधारी, चक्र-धारी, नन्दक-तलवार-धारी — उन श्रीमान् नारायण, विष्णु, वासुदेव से हमारी सदा रक्षा हो।

॥ उत्तरपीठिका ॥
श्री भीष्म उवाच । इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः । नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ १ ॥

3. भीष्म जी बोले — इस प्रकार मैंने महात्मा केशव के एक-हज़ार दिव्य नाम बिना कुछ छोड़े तुम्हें पूरी तरह सुना दिए।

य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् । नाऽशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ २ ॥

4. जो मनुष्य इसे प्रतिदिन सुनता है या कीर्तन करता है, उसे इस लोक में भी और परलोक में भी किसी प्रकार का अशुभ नहीं मिलता।

वेदान्तगो ब्राह्मणस्स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत् । वैश्यो धनसमृद्धस्स्याच्छूद्रस्सुखमवाप्नुयात् ॥ ३ ॥

5. ब्राह्मण इससे वेदान्त-ज्ञान पाता है, क्षत्रिय विजय पाता है, वैश्य धन-समृद्धि पाता है, शूद्र सुख पाता है।

धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् । कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाः ॥ ४ ॥

6. धर्म का इच्छुक धर्म पाता है, अर्थ का इच्छुक अर्थ पाता है, काम का इच्छुक अपनी मनोकामना पूरी करता है, और जो पुत्र चाहता है वह पुत्र-पौत्र-लाभ पाता है।

भक्तिमान् यस्सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः । सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ ५ ॥

7. जो भक्त नित्य, सवेरे उठकर, शुद्ध होकर, मन-एकाग्र रखकर, वासुदेव के इस सहस्रनाम का पाठ करता है —

यशः प्राप्नोति विपुलं याति प्राधान्यमेव च । अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ६ ॥

8. उसे विशाल यश मिलता है, श्रेष्ठता प्राप्त होती है, अचला-लक्ष्मी मिलती है, और अनुत्तम श्रेय भी मिलता है।

न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति । भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥ ७ ॥

9. उसे कभी भय नहीं होता, वीर्य और तेज बढ़ता है; वह निरोग, तेजस्वी, बल-सम्पन्न, रूपवान और गुणवान होता है।

रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् । भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ ८ ॥

10. रोगी रोग से मुक्त होता है, बंधन में पड़ा हुआ बंधन से मुक्त होता है, भयभीत भय से मुक्त होता है, आपदा में पड़ा हुआ आपदा से छूट जाता है।

दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ ९ ॥

11. सब प्रकार के दुखों को वह उस पुरुष के प्रसाद से पार करता है, जो बुरे स्वप्नों और दुर्भाग्य से निकालकर सुखी जीवन की ओर ले जाता है।

वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः । सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १० ॥

12. वे हैं पुरुषोत्तम, सब लोकों के अधिपति, जगत के प्रभु, अनन्त, वासुदेव — जिनका सहस्र-नाम स्मरण सब कल्याण का कारण है।

न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् । जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ ११ ॥

13. जो मनुष्य ब्राह्मणों और गौओं के कल्याण, लोक के हित और अपने आत्म-कल्याण के लिए इस स्तोत्र का श्रवण करता है —

इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । युज्येतात्मा सुखक्षान्ति श्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ १२ ॥

14. उसकी सारी मनोकामनाएँ फलित होती हैं; सब प्रकार की सिद्धियाँ और ऐश्वर्य उसे सहज मिल जाते हैं।

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभामतिः । भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३ ॥

15. जो भक्त द्वादशी, एकादशी, पूर्णिमा के दिन, ब्राह्मणों के सामने, गंगा-तट पर या तीर्थ-स्थान पर इसका पाठ करता है, उसे अमित फल मिलता है।

द्यौस्सचन्द्रार्कनक्षत्रं खं दिशो भूर्महोदधिः । वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ १४ ॥

16. सूर्य, चंद्र, नक्षत्र सहित अंतरिक्ष, दिशाएँ, पृथ्वी और महासागर — सब महात्मा वासुदेव के वीर्य से ही धारण किए हुए हैं।

स सुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् । जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १५ ॥

17. देव, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस-सहित सारा चराचर विश्व — वासुदेव के तेज से ही संचालित है।

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिस्सत्त्वं तेजो बलं धृतिः । वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ १६ ॥

18. इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सत्त्व, तेज, बल, धैर्य — ये सब भी वासुदेव-आत्मक हैं; क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (जीव) भी वही हैं।

सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पितः । आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ १७ ॥

19. सारे शास्त्रों के आरंभ में जो “आचार” (पहला अनुष्ठान) कल्पित है, उसी से धर्म निकला। उसी धर्म के प्रभु हैं अच्युत (विष्णु)।

ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः । जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ १८ ॥

20. ऋषि, पितर, देव, महा-भूत, धातु, जंगम-स्थावर — सब जगत जनार्दन (विष्णु) से ही उत्पन्न हुआ है।

योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याश्शिल्पादि कर्म च । वेदाश्शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥ १९ ॥

21. योग, ज्ञान, सांख्य, विद्याएँ, शिल्प-कर्म, वेद, शास्त्र, विज्ञान — यह सब भी जनार्दन से ही प्रकट हुआ है।

एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः । त्रीन्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ २० ॥

22. वह एक ही बहुरूप होकर सब प्राणियों में विचरण करता है; सारे लोकों का नाथ वही महा-विष्णु है, और यह विश्व उसका ही भोग है।

इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् । पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥ २१ ॥

23. जो इस सहस्रनाम स्तोत्र को भक्ति-पूर्वक सुनता है और सुनाता है, वह इस लोक में यश और परलोक में परम-पद पाता है।

विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम् । भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ २२ ॥

24. जो कोई विष्णु की स्तुति करने का इच्छुक हो, वह इसी स्तोत्र का पाठ करे; इसमें सब कुछ समाहित है।

अर्जुन उवाच । पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम । भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ॥ २३ ॥

25. अर्जुन ने कहा — हे कमल-पत्र-समान विशाल-नयनों वाले पद्मनाभ, हे सुर-श्रेष्ठ! अपने अनुरक्त भक्तों की रक्षा करने वाले हे जनार्दन, हमारे त्राता बनिए।

श्री भगवानुवाच । यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव । सोऽहमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः ॥ २४ ॥

26. श्री भगवान् ने कहा — हे पाण्डव, जो कोई मुझे सहस्र-नामों से स्तुति करना चाहता हो, वह केवल एक ही श्लोक से स्तुति करे तो भी मैं स्तुत हो जाता हूँ — इसमें कोई संशय नहीं।

व्यास उवाच । वासनाद्वासुदेवस्य वासितं ते जगत्त्रयम् । सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ २५ ॥

27. व्यास जी ने कहा — वास से “वासुदेव” — आप तीनों लोकों को अपने भीतर बसाए हुए हैं; सब प्राणियों के निवास-स्थान आप ही हैं; हे वासुदेव, आपको नमस्कार।

पार्वत्युवाच । केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम् । पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ २६ ॥

28. पार्वती जी ने पूछा — हे प्रभु, विद्वान लोग विष्णु-सहस्रनाम को नित्य किसी अन्य छोटे (लघु) उपाय से पाठ करते हैं — मैं उस उपाय को सुनना चाहती हूँ।

ईश्वर उवाच । श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ॥ २७ ॥

29. ईश्वर (शिव जी) ने उत्तर दिया — “श्री राम राम रामेति, रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं राम-नाम वरानने।” — हे सुंदरी, “राम-राम-राम” तीन बार कहना ही पूरे सहस्रनाम के समान है।

ब्रह्मोवाच । नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे । सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः ॥ २८ ॥

30. ब्रह्मा जी ने कहा — अनन्त को नमस्कार! सहस्र-मूर्तियों वाले, हज़ार पैरों-नेत्रों-सिरों-भुजाओं वाले, सहस्र-नाम-धारी, शाश्वत, सहस्र-कोटि-युगों को धारण करने वाले पुरुष को नमस्कार।

सञ्जय उवाच । यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ २९ ॥

31. संजय ने कहा — जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं, जहाँ धनुर्धर अर्जुन है — वहीं श्री है, विजय है, समृद्धि है, स्थिर नीति है — यह मेरी बुद्धि कहती है।

श्री भगवानुवाच । अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ ३० ॥

32. श्री भगवान् ने फिर कहा — जो लोग अनन्य भाव से मुझे चिंतन करते हैं, नित्य मेरी उपासना करते हैं — उनके योग-क्षेम का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ३१ ॥

33. साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए, धर्म की स्थापना के लिए — मैं हर युग में प्रकट होता हूँ।

आर्ता विषण्णाश्शिथिलाश्च भीताः घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः । सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखास्सुखिनो भवन्ति ॥ ३२ ॥

34. जो दुखी हैं, विषण्ण हैं, शिथिल हैं, भयभीत हैं, घोर व्याधियों से पीड़ित हैं — वे केवल “नारायण” शब्द का कीर्तन करें और सारे दुखों से मुक्त होकर सुखी हो जाते हैं।

[अधिक] यदक्षर पदभ्रष्टं मात्राहीनं तु यद्भवेत् । तत्सर्वं क्षम्यतां देव नारायण नमोऽस्तु ते ॥

35. (अधिक-श्लोक) यदि पाठ में कोई अक्षर छूट गया हो, कोई मात्रा कम रह गई हो — तो हे नारायण देव, सब क्षमा कीजिए। आपको नमस्कार।

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेस्स्वभावात् । करोमि यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥

36. शरीर से, वाणी से, मन से, इन्द्रियों से, बुद्धि से, या प्रकृति के स्वभाव से — जो कुछ भी मैं करता हूँ, वह सब परमेश्वर नारायण को समर्पित है। ॥ ॐ तत् सत् ॥

इति श्रीविष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् ॥

37. ॥ यहाँ श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र समाप्त होता है ॥

परिशिष्ट: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

१. सहस्रनाम किसने रचा?

यह स्तोत्र महाभारत का अंश है, अतः इसके मूल रचयिता वेदव्यास माने जाते हैं। पर आंतरिक कथा में इसे भीष्म-पितामह ने युधिष्ठिर को सुनाया — बाण-शय्या पर उनके अंतिम दिनों में। कृष्ण स्वयं उनके पास बैठे थे, और वे ही इन नामों के सच्चे “अधिष्ठाता” थे। बाद में आदि शंकराचार्य (आठवीं शताब्दी) ने इस पर विस्तृत भाष्य लिखा, जिसे आज “विष्णुसहस्रनाम-भाष्य” के नाम से जाना जाता है। शंकर के अद्वैत-वेदांत-दर्शन की यह सबसे सुलभ भूमिका है।

२. यह स्तोत्र शास्त्रों में कहाँ आता है?

महाभारत — अनुशासन-पर्व, अध्याय १४९। महाभारत अठारह पर्वों में विभक्त है। अनुशासन-पर्व तेरहवाँ है — “अनुशासन” अर्थात् “शिक्षा, आदेश।” युद्ध के बाद, धर्म-विजय के बाद, भीष्म ने युधिष्ठिर को राज-धर्म, वर्ण-धर्म, आपद-धर्म, मोक्ष-धर्म सिखाए। उन्हीं में से एक यह सहस्रनाम है। इसी स्तोत्र के कुछ श्लोक पद्मपुराण, गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण में भी मिलते हैं, पर “मूल” संस्करण महाभारत का ही है।

३. श्लोकों का मूल संदर्भ और परिवेश क्या है?

कुरुक्षेत्र-युद्ध समाप्त हो चुका था। कौरव-पक्ष के लगभग सारे योद्धा मर चुके थे। युद्ध में भीष्म-पितामह अर्जुन के बाणों से आच्छादित हुए थे और बाणों की शय्या पर पड़े थे। उत्तरायण आने में कई महीने बाकी थे, और भीष्म को इच्छा-मृत्यु का वरदान था — वे स्वयं अपना शरीर-त्याग का समय चुन सकते थे। युधिष्ठिर उनके पास कृष्ण, व्यास, और अन्य ऋषियों के साथ गंगा-तट पर बैठे थे। युधिष्ठिर का मन दुख और संदेह से भरा था — इतनी हत्याओं के बाद “धर्म” क्या है? भीष्म ने उन्हें धीरे-धीरे समझाया, और उनके अंतिम संवाद में यह सहस्रनाम आया।

४. लोग इसे क्यों पढ़ते हैं? इसका क्या फल है?

फलश्रुति (स्तोत्र के अंतिम भाग) में स्वयं भीष्मजी गिनाते हैं — स्वास्थ्य, कीर्ति, बुद्धि, धैर्य, सफलता, और अंततः मोक्ष। पर वास्तविक फल यह है कि जब कोई हज़ार नामों से एक ईश्वर को पुकारता है, तो उसका अपना मन ही हज़ार गुणों से गूँजने लगता है। “विष्णु करुणा हैं” कह कर हम करुणा बनते हैं, “विष्णु सत्य हैं” कह कर सत्य बनते हैं। यह स्तोत्र वास्तव में एक आत्म-अनुकूलन का साधन है, अपने आप को उन नामों के साँचे में ढालने का अभ्यास

आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में — यह एक “cognitive reframing” अभ्यास है। नाम दोहराने से मन उस गुण में रमता है। गीता कहती है — “जिसमें तू रमता है, वही तू होता है।”

५. इसका सबसे उत्तम समय कौन सा है?

परंपरागत रूप से दो समय — ब्रह्म-मुहूर्त (सुबह ४–५ बजे) और संध्या-समय (शाम के धुंधलके में)। इन दोनों समय में प्राकृतिक शांति होती है, मन एकाग्र होता है। पर वास्तविकता यह है कि यह स्तोत्र किसी भी समय पढ़ा जा सकता है — दैनिक पूजा में, यात्रा में, अस्पताल में किसी प्रियजन के पास बैठकर, या सोने से पहले। एकादशी, द्वादशी, और वैकुण्ठ-एकादशी विशेष रूप से शुभ मानी जाती हैं। जन्माष्टमी, रामनवमी पर तो भक्त इसे पाठ करते ही हैं।

पर भीष्मजी ने स्वयं कहा है — “जो भक्त नित्य — प्रतिदिन — पढ़े, उसे ही पूर्ण फल मिलता है।” अनियमित श्रद्धा से नियमित आदत श्रेष्ठ है।

६. यह स्तोत्र एक हज़ार नाम दे रहा है, और फिर अंत में कहता है “सिर्फ राम-राम कह लेना काफ़ी है।” तो एक हज़ार नाम क्यों?

यही इस स्तोत्र का सबसे सुंदर रहस्य है। अंत की उत्तर-भाग में कृष्ण अर्जुन को बताते हैं, और शिव पार्वती को बताते हैं — “श्री राम राम रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने॥” — यानी “राम-राम-राम” तीन बार उच्चारण सहस्रनाम के समान है।

तो भेद क्या? — सहस्रनाम मार्ग है, राम-नाम मंज़िल है। सभी के मन और परिस्थितियाँ अलग हैं। कुछ लोगों को लंबा पाठ करने से स्थिरता मिलती है, उनका मन हज़ार गुणों के माध्यम से विष्णु के करीब जाता है। कुछ लोग सरल हैं — उनके लिए एक नाम ही पूरा ब्रह्माण्ड है।

एक बहुत पुरानी कथा है — हनुमानजी ने राम-राम लिखकर एक पर्वत हिला दिया। रावण ने लंका में शिव-मन्दिर बनवाए पर अंधकार में डूबे रहे। फ़र्क़ क्या? — हनुमान के लिए “राम” नाम ही ब्रह्म था। रावण ने शास्त्र पढ़े पर “मैं” का त्याग नहीं किया।

सहस्रनाम की शिक्षा यह है कि भक्ति की अनेक सीढ़ियाँ हैं। कोई भी सीढ़ी — जो तुम्हारे मन को स्थिर करे, जो प्रेम जगाए, जो अहंकार को पिघलाए — वही सही है। विष्णु के हज़ार नाम एक ही प्रेम के हज़ार रूप हैं।

७. अगर कोई पहली बार पढ़ रहा है, तो कहाँ से शुरू करे?

सलाह — पहले केवल ध्यानम् (मेडिटेशन-श्लोक) और अंत का “राम राम रामेति” श्लोक दस-पंद्रह दिन रोज़ पढ़ें। मन को थोड़ा स्थिर होने दें। फिर पूर्व-भाग पढ़ें — जहाँ भीष्म बताते हैं “सहस्रनाम क्यों।” तीसरे सप्ताह से १०८ नाम-श्लोक धीरे-धीरे जोड़ें। लक्ष्य रखें कि छह महीने में पूरा कण्ठस्थ हो जाए — बिना किसी दबाव के, आनन्द से।