अंग
193
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤੂੰ ਸਮਰਥੁ ਤੂੰਹੈ ਮੇਰਾ ਸੁਆਮੀ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੁਮ ਤੇ ਤੂੰ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥੧॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪੂਰਨ ਜਨ ਓਟ ॥
ਤੇਰੀ ਸਰਣਿ ਉਧਰਹਿ ਜਨ ਕੋਟਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੇਤੇ ਜੀਅ ਤੇਤੇ ਸਭਿ ਤੇਰੇ ॥
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਸੂਖ ਘਨੇਰੇ ॥੨॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਵਰਤੈ ਸਭ ਤੇਰਾ ਭਾਣਾ ॥
ਹੁਕਮੁ ਬੂਝੈ ਸੋ ਸਚਿ ਸਮਾਣਾ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਦੀਜੈ ਪ੍ਰਭ ਦਾਨੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸਿਮਰੈ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ॥੪॥੬੬॥੧੩੫॥
ਤੂੰ ਸਮਰਥੁ ਤੂੰਹੈ ਮੇਰਾ ਸੁਆਮੀ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੁਮ ਤੇ ਤੂੰ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥੧॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪੂਰਨ ਜਨ ਓਟ ॥
ਤੇਰੀ ਸਰਣਿ ਉਧਰਹਿ ਜਨ ਕੋਟਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੇਤੇ ਜੀਅ ਤੇਤੇ ਸਭਿ ਤੇਰੇ ॥
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਸੂਖ ਘਨੇਰੇ ॥੨॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਵਰਤੈ ਸਭ ਤੇਰਾ ਭਾਣਾ ॥
ਹੁਕਮੁ ਬੂਝੈ ਸੋ ਸਚਿ ਸਮਾਣਾ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਦੀਜੈ ਪ੍ਰਭ ਦਾਨੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸਿਮਰੈ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ॥੪॥੬੬॥੧੩੫॥
गउड़ी महला ५ ॥
तूं समरथु तूंहै मेरा सुआमी ॥
सभु किछु तुम ते तूं अंतरजामी ॥१॥
पारब्रहम पूरन जन ओट ॥
तेरी सरणि उधरहि जन कोटि ॥१॥ रहाउ ॥
जेते जीअ तेते सभि तेरे ॥
तुमरी क्रिपा ते सूख घनेरे ॥२॥
जो किछु वरतै सभ तेरा भाणा ॥
हुकमु बूझै सो सचि समाणा ॥३॥
करि किरपा दीजै प्रभ दानु ॥
नानक सिमरै नामु निधानु ॥४॥६६॥१३५॥
तूं समरथु तूंहै मेरा सुआमी ॥
सभु किछु तुम ते तूं अंतरजामी ॥१॥
पारब्रहम पूरन जन ओट ॥
तेरी सरणि उधरहि जन कोटि ॥१॥ रहाउ ॥
जेते जीअ तेते सभि तेरे ॥
तुमरी क्रिपा ते सूख घनेरे ॥२॥
जो किछु वरतै सभ तेरा भाणा ॥
हुकमु बूझै सो सचि समाणा ॥३॥
करि किरपा दीजै प्रभ दानु ॥
नानक सिमरै नामु निधानु ॥४॥६६॥१३५॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे पारब्रह्म !) तू सब ताकतों का मालिक है~ तू ही मेरा मालिक है (मुझे तेरा ही आसरा है)। तू सबके दिल की जानने वाला है। जो कुछ जगत में हो रहा है तेरी प्रेरणा से ही हो रहा है। 1। हे सर्व-व्यापक पारब्रह्म प्रभू ! तेरे सेवकों को तेरा ही आसरा होता है। करोड़ों ही मनुष्य तेरी शरण पड़ कर (संसार समुंद्र से) बच जाते हैं। 1। रहाउ। (हे पारब्रह्म ! जगत में) जितने भी जीव हैं~ सारे तेरे ही पैदा किए हुए हैं। तेरी मेहर से ही (जीवों को) अनेकों सुख मिल रहे हैं। 2। (हे पारब्रहम् ! संसार में) जो कुछ घटित हो रहा है~ वही घटित होता है जो तुझे अच्छा लगता है। जो मनुष्य तेरी रजा को समझ लेता है~ वह तेरे सदा स्थिर रहने वाले नाम में लीन रहता है। 3। हे नानक ! (कह,) हे प्रभू ! मेहर कर के अपने नाम की दाति बख्श~ ता कि तेरा दास नानक तेरा नाम सिमरता रहे (तेरा नाम ही तेरे दास के वास्ते सब सुखों का) खजाना है। 4। 66। 135।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤਾ ਕਾ ਦਰਸੁ ਪਾਈਐ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਜਾ ਕੀ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥੧॥
ਜਾ ਕੈ ਹਰਿ ਵਸਿਆ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਤਾ ਕਉ ਦੁਖੁ ਸੁਪਨੈ ਭੀ ਨਾਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਰਾਖੇ ਜਨ ਮਾਹਿ ॥
ਤਾ ਕੈ ਸੰਗਿ ਕਿਲਵਿਖ ਦੁਖ ਜਾਹਿ ॥੨॥
ਜਨ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਕਥੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਜਨੁ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਬਿਨਉ ਸੁਨੀਜੈ ॥
ਦਾਸ ਕੀ ਧੂਰਿ ਨਾਨਕ ਕਉ ਦੀਜੈ ॥੪॥੬੭॥੧੩੬॥
ਤਾ ਕਾ ਦਰਸੁ ਪਾਈਐ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਜਾ ਕੀ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥੧॥
ਜਾ ਕੈ ਹਰਿ ਵਸਿਆ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਤਾ ਕਉ ਦੁਖੁ ਸੁਪਨੈ ਭੀ ਨਾਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਰਾਖੇ ਜਨ ਮਾਹਿ ॥
ਤਾ ਕੈ ਸੰਗਿ ਕਿਲਵਿਖ ਦੁਖ ਜਾਹਿ ॥੨॥
ਜਨ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਕਥੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਜਨੁ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਬਿਨਉ ਸੁਨੀਜੈ ॥
ਦਾਸ ਕੀ ਧੂਰਿ ਨਾਨਕ ਕਉ ਦੀਜੈ ॥੪॥੬੭॥੧੩੬॥
गउड़ी महला ५ ॥
ता का दरसु पाईऐ वडभागी ॥
जा की राम नामि लिव लागी ॥१॥
जा कै हरि वसिआ मन माही ॥
ता कउ दुखु सुपनै भी नाही ॥१॥ रहाउ ॥
सरब निधान राखे जन माहि ॥
ता कै संगि किलविख दुख जाहि ॥२॥
जन की महिमा कथी न जाइ ॥
पारब्रहमु जनु रहिआ समाइ ॥३॥
करि किरपा प्रभ बिनउ सुनीजै ॥
दास की धूरि नानक कउ दीजै ॥४॥६७॥१३६॥
ता का दरसु पाईऐ वडभागी ॥
जा की राम नामि लिव लागी ॥१॥
जा कै हरि वसिआ मन माही ॥
ता कउ दुखु सुपनै भी नाही ॥१॥ रहाउ ॥
सरब निधान राखे जन माहि ॥
ता कै संगि किलविख दुख जाहि ॥२॥
जन की महिमा कथी न जाइ ॥
पारब्रहमु जनु रहिआ समाइ ॥३॥
करि किरपा प्रभ बिनउ सुनीजै ॥
दास की धूरि नानक कउ दीजै ॥४॥६७॥१३६॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) उसका दर्शन बड़े भाग्यों से मिलता है जिस मनुष्य की लगन परमात्मा के नाम में लगी रहती है। 1। (हे भाई !) जिस मनुष्य के मन में (सदा) परमात्मा (का नाम) बसा रहता है~ उस मनुष्य को कभी सपने में भी (कोई) दुख छू नहीं सकता। 1। रहाउ। (हे भाई ! नाम की लगन वाले) सेवक (के हृदय में) (परमात्मा) सारे (आत्मिक गुणों के) खजाने डाल के रखता है। ऐसे सेवक की संगति में रहने से पाप और दुख दूर हो जाते हैं। 2। (हे भाई ! ऐसे) सेवक की आत्मिक उच्चता बयान नहीं की जा सकती। वह सेवक उस पारब्रहम् का रूप बन जाता है जो सब जीवों में व्यापक है। 3। (हे नानक ! कह,) हे प्रभू ! मेरी विनती सुन। मेहर करके मुझ नानक को अपने ऐसे सेवक के चरणों की धूड़ दे। 4। 67। 136।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਤੇਰੀ ਜਾਇ ਬਲਾਇ ॥
ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥
ਭਜੁ ਮਨ ਮੇਰੇ ਏਕੋ ਨਾਮ ॥
ਜੀਅ ਤੇਰੇ ਕੈ ਆਵੈ ਕਾਮ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਗੁਣ ਗਾਉ ਅਨੰਤਾ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕਾ ਨਿਰਮਲ ਮੰਤਾ ॥੨॥
ਛੋਡਿ ਉਪਾਵ ਏਕ ਟੇਕ ਰਾਖੁ ॥
ਮਹਾ ਪਦਾਰਥੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਚਾਖੁ ॥੩॥
ਬਿਖਮ ਸਾਗਰੁ ਤੇਈ ਜਨ ਤਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ॥੪॥੬੮॥੧੩੭॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਤੇਰੀ ਜਾਇ ਬਲਾਇ ॥
ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥
ਭਜੁ ਮਨ ਮੇਰੇ ਏਕੋ ਨਾਮ ॥
ਜੀਅ ਤੇਰੇ ਕੈ ਆਵੈ ਕਾਮ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਗੁਣ ਗਾਉ ਅਨੰਤਾ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕਾ ਨਿਰਮਲ ਮੰਤਾ ॥੨॥
ਛੋਡਿ ਉਪਾਵ ਏਕ ਟੇਕ ਰਾਖੁ ॥
ਮਹਾ ਪਦਾਰਥੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਚਾਖੁ ॥੩॥
ਬਿਖਮ ਸਾਗਰੁ ਤੇਈ ਜਨ ਤਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ॥੪॥੬੮॥੧੩੭॥
गउड़ी महला ५ ॥
हरि सिमरत तेरी जाइ बलाइ ॥
सरब कलिआण वसै मनि आइ ॥१॥
भजु मन मेरे एको नाम ॥
जीअ तेरे कै आवै काम ॥१॥ रहाउ ॥
रैणि दिनसु गुण गाउ अनंता ॥
गुर पूरे का निरमल मंता ॥२॥
छोडि उपाव एक टेक राखु ॥
महा पदारथु अंम्रित रसु चाखु ॥३॥
बिखम सागरु तेई जन तरे ॥
नानक जा कउ नदरि करे ॥४॥६८॥१३७॥
हरि सिमरत तेरी जाइ बलाइ ॥
सरब कलिआण वसै मनि आइ ॥१॥
भजु मन मेरे एको नाम ॥
जीअ तेरे कै आवै काम ॥१॥ रहाउ ॥
रैणि दिनसु गुण गाउ अनंता ॥
गुर पूरे का निरमल मंता ॥२॥
छोडि उपाव एक टेक राखु ॥
महा पदारथु अंम्रित रसु चाखु ॥३॥
बिखम सागरु तेई जन तरे ॥
नानक जा कउ नदरि करे ॥४॥६८॥१३७॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) परमात्मा का सिमरन करते हुए तेरी वैरन (माया डायन) तुझसे परे हट जाएगी। (अगर परमात्मा का नाम तेरे) मन में आ बसे तो (तेरे अंदर) सारे सुख (आ बसेंगे)। 1। हे मेरे मन ! एक परमात्मा का ही नाम सिमरता रह। ये नाम ही तेरी जीवात्मा के काम आएगा (जिंद के साथ निभेगा)। 1। रहाउ। दिन रात बेअंत परमात्मा के गुण गाया कर। (हे भाई !) पूरे गुरू का(यह) पवित्र उपदेश ले। 2 (हे भाई ! संसार समुंद्र से पार लांघने के लिए) और सारे तरीके छोड़~ और एक परमात्मा (के नाम) का आसरा रख। आत्मिक जीवन देने वाला नाम रस चख – यही है सब पदार्थों से श्रेष्ठ पदार्थ। 3। हे नानक ! वही मनुष्य मुश्किल (संसार) समुंद्र से (आत्मिक पूँजी समेत) पार लांघते हैं~ जिन पे (परमात्मा खुद मेहर की) नजर करता है। 4। 68। 137।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਿਰਦੈ ਚਰਨ ਕਮਲ ਪ੍ਰਭ ਧਾਰੇ ॥
ਪੂਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਿ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥੧॥
ਗੋਵਿੰਦ ਗੁਣ ਗਾਵਹੁ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੁਲਭ ਦੇਹ ਹੋਈ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਆ ਨਾਮ ਨੀਸਾਨੁ ॥੨॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਪੂਰਨ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਭੈ ਭਰਮ ਮਿਟਾਇਆ ॥੩॥
ਜਤ ਕਤ ਦੇਖਉ ਤਤ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਹਰਿ ਕੀ ਸਰਣਾਇ ॥੪॥੬੯॥੧੩੮॥
ਹਿਰਦੈ ਚਰਨ ਕਮਲ ਪ੍ਰਭ ਧਾਰੇ ॥
ਪੂਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਿ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥੧॥
ਗੋਵਿੰਦ ਗੁਣ ਗਾਵਹੁ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੁਲਭ ਦੇਹ ਹੋਈ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਆ ਨਾਮ ਨੀਸਾਨੁ ॥੨॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਪੂਰਨ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਭੈ ਭਰਮ ਮਿਟਾਇਆ ॥੩॥
ਜਤ ਕਤ ਦੇਖਉ ਤਤ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਹਰਿ ਕੀ ਸਰਣਾਇ ॥੪॥੬੯॥੧੩੮॥
गउड़ी महला ५ ॥
हिरदै चरन कमल प्रभ धारे ॥
पूरे सतिगुर मिलि निसतारे ॥१॥
गोविंद गुण गावहु मेरे भाई ॥
मिलि साधू हरि नामु धिआई ॥१॥ रहाउ ॥
दुलभ देह होई परवानु ॥
सतिगुर ते पाइआ नाम नीसानु ॥२॥
हरि सिमरत पूरन पदु पाइआ ॥
साधसंगि भै भरम मिटाइआ ॥३॥
जत कत देखउ तत रहिआ समाइ ॥
नानक दास हरि की सरणाइ ॥४॥६९॥१३८॥
हिरदै चरन कमल प्रभ धारे ॥
पूरे सतिगुर मिलि निसतारे ॥१॥
गोविंद गुण गावहु मेरे भाई ॥
मिलि साधू हरि नामु धिआई ॥१॥ रहाउ ॥
दुलभ देह होई परवानु ॥
सतिगुर ते पाइआ नाम नीसानु ॥२॥
हरि सिमरत पूरन पदु पाइआ ॥
साधसंगि भै भरम मिटाइआ ॥३॥
जत कत देखउ तत रहिआ समाइ ॥
नानक दास हरि की सरणाइ ॥४॥६९॥१३८॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे मेरे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा के चरण अपने हृदय में टिकाते हैं~ पूरे सतगुरू को मिल के वह (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। हे मेरे भाई ! गोबिंद की सिफत सालाह के गीत गाते रहो। गुरू को मिल के परमात्मा का नाम सिमरो। 1। रहाउ। उनका मानस शरीर- बड़ी कठनाई से मिली हुई मनुष्य देह- (परमात्मा की नजरों में) कबूल हो जाती है (हे मेरे भाई ! जिन मनुष्यों ने इस जीवन सफर में) सत्गुरू से परमात्मा के नाम की राहदारी हासिल कर ली है। 2। (हे मेरे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरते हुए वह मनुष्य वह आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है~ जहाँ किसी कमी की संभावना नहीं रह जाती। साध-संगति में रह के मनुष्य सारे डर सारी ही भटकनें मिटा लेता है। हे नानक ! (कह, हे मेरे भाई !गुरू की शरण की बरकति से) मैं जिधर भी देखता हूँ~ उधर ही परमात्मा व्यापक दिखता है। (हे भाई ! प्रभू के) सेवक प्रभू की शरण में ही टिके रहते हैं। 4। 69। 138।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰ ਜੀ ਕੇ ਦਰਸਨ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਜੀਵਾ ਸਤਿਗੁਰ ਨਾਉ ॥੧॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪੂਰਨ ਗੁਰਦੇਵ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਲਾਗਉ ਤੇਰੀ ਸੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਹਿਰਦੈ ਉਰ ਧਾਰੀ ॥
ਮਨ ਤਨ ਧਨ ਗੁਰ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੀ ॥੨॥
ਸਫਲ ਜਨਮੁ ਹੋਵੈ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਗੁਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਨਿਕਟਿ ਕਰਿ ਜਾਣੁ ॥੩॥
ਸੰਤ ਧੂਰਿ ਪਾਈਐ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਭੇਟਤ ਹਰਿ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥੪॥੭੦॥੧੩੯॥
ਗੁਰ ਜੀ ਕੇ ਦਰਸਨ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਜੀਵਾ ਸਤਿਗੁਰ ਨਾਉ ॥੧॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪੂਰਨ ਗੁਰਦੇਵ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਲਾਗਉ ਤੇਰੀ ਸੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਹਿਰਦੈ ਉਰ ਧਾਰੀ ॥
ਮਨ ਤਨ ਧਨ ਗੁਰ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੀ ॥੨॥
ਸਫਲ ਜਨਮੁ ਹੋਵੈ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਗੁਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਨਿਕਟਿ ਕਰਿ ਜਾਣੁ ॥੩॥
ਸੰਤ ਧੂਰਿ ਪਾਈਐ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਭੇਟਤ ਹਰਿ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥੪॥੭੦॥੧੩੯॥
गउड़ी महला ५ ॥
गुर जी के दरसन कउ बलि जाउ ॥
जपि जपि जीवा सतिगुर नाउ ॥१॥
पारब्रहम पूरन गुरदेव ॥
करि किरपा लागउ तेरी सेव ॥१॥ रहाउ ॥
चरन कमल हिरदै उर धारी ॥
मन तन धन गुर प्रान अधारी ॥२॥
सफल जनमु होवै परवाणु ॥
गुरु पारब्रहमु निकटि करि जाणु ॥३॥
संत धूरि पाईऐ वडभागी ॥
नानक गुर भेटत हरि सिउ लिव लागी ॥४॥७०॥१३९॥
गुर जी के दरसन कउ बलि जाउ ॥
जपि जपि जीवा सतिगुर नाउ ॥१॥
पारब्रहम पूरन गुरदेव ॥
करि किरपा लागउ तेरी सेव ॥१॥ रहाउ ॥
चरन कमल हिरदै उर धारी ॥
मन तन धन गुर प्रान अधारी ॥२॥
सफल जनमु होवै परवाणु ॥
गुरु पारब्रहमु निकटि करि जाणु ॥३॥
संत धूरि पाईऐ वडभागी ॥
नानक गुर भेटत हरि सिउ लिव लागी ॥४॥७०॥१३९॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) मैं सत्गुरू जी के दर्शन से सदके जाता हूँ। सतिगुरू जी का नाम याद करके मेरे अंदर उच्च आत्मिक जीवन पैदा होता है। 1। हे पूरन पारब्रहम् ! हे गुरदेव ! कृपा कर~ मैं तेरी सेवा भक्ति में लगा रहूँ। 1। रहाउ। (इस वास्ते~ हे भाई ! गुरू के) सुंदर चरण मैं अपने मन में हृदय में टिकाता हूँ। गुरू के चरण मेरे मन का~ मेरे तन का~ मेरे धन का~ मेरी जीवात्मा का आसरा हैं। 2। (इस तरह तेरा मानस) जनम कामयाब हो जाएगा। तू (परमात्मा की हजूरी में) कबूल हो जाएगा (हे भाई !) गुरू को पारब्रहम् प्रभू को (सदा अपने) नजदीक बसता समझ। । 3। हे नानक ! गुरू संत के चरणों की धूड़ बड़े भाग्यों से मिलती है। गुरू को मिलने से परमात्मा (के चरणों) के साथ लगन लग जाती है। 4। 70। 139।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 193 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली-NCR की office-canteen की 1 बजे की दोपहर।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 55 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 193” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 194 →, पीछे का: ← अंग 192।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।