राग मारू
मध्याह्न का राग, मरुस्थल-स्वर।
मारू मध्याह्न का राग है, थोड़ा ज़ोरदार। मारवाड़-क्षेत्र (पश्चिमी राजस्थान) से नाम का सम्बन्ध है, मरुस्थल की कठोरता का स्वर।
ग्रंथ में मारू की रचनाएँ अंग नौ-सौ-नवासी के क़रीब से शुरू होती हैं, और गुरु नानक की एक प्रसिद्ध “मारू सोलहे” की रचना यहीं है।
“प्रब के सिमरनि गरभि न बसै ।” मारू M5, सोलहे
इस राग के सब अंग
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