अंग
1032
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਭੂਲੇ ਸਿਖ ਗੁਰੂ ਸਮਝਾਏ ॥
ਉਝੜਿ ਜਾਦੇ ਮਾਰਗਿ ਪਾਏ ॥
ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਸੰਗਿ ਸਖਾਤਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਗੁਰ ਕੀ ਭਗਤਿ ਕਰਹਿ ਕਿਆ ਪ੍ਰਾਣੀ ॥
ਬ੍ਰਹਮੈ ਇੰਦ੍ਰਿ ਮਹੇਸਿ ਨ ਜਾਣੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਅਲਖੁ ਕਹਹੁ ਕਿਉ ਲਖੀਐ ਜਿਸੁ ਬਖਸੇ ਤਿਸਹਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਅੰਤਰਿ ਪ੍ਰੇਮੁ ਪਰਾਪਤਿ ਦਰਸਨੁ ॥
ਗੁਰਬਾਣੀ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸੁ ਪਰਸਨੁ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ਸਬਾਈ ਘਟਿ ਦੀਪਕੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਭੋਜਨ ਗਿਆਨੁ ਮਹਾ ਰਸੁ ਮੀਠਾ ॥
ਜਿਨਿ ਚਾਖਿਆ ਤਿਨਿ ਦਰਸਨੁ ਡੀਠਾ ॥
ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਮਿਲੇ ਬੈਰਾਗੀ ਮਨੁ ਮਨਸਾ ਮਾਰਿ ਸਮਾਤਾ ਹੇ ॥੧੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਪਰਧਾਨਾ ॥
ਤਿਨ ਘਟ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜਸੁ ਹਰਿ ਜਨ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਦੀਜੈ ਜਿਨ ਸਤਿਗੁਰੁ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੭॥੫॥੧੧॥
ਉਝੜਿ ਜਾਦੇ ਮਾਰਗਿ ਪਾਏ ॥
ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਸੰਗਿ ਸਖਾਤਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਗੁਰ ਕੀ ਭਗਤਿ ਕਰਹਿ ਕਿਆ ਪ੍ਰਾਣੀ ॥
ਬ੍ਰਹਮੈ ਇੰਦ੍ਰਿ ਮਹੇਸਿ ਨ ਜਾਣੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਅਲਖੁ ਕਹਹੁ ਕਿਉ ਲਖੀਐ ਜਿਸੁ ਬਖਸੇ ਤਿਸਹਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਅੰਤਰਿ ਪ੍ਰੇਮੁ ਪਰਾਪਤਿ ਦਰਸਨੁ ॥
ਗੁਰਬਾਣੀ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸੁ ਪਰਸਨੁ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ਸਬਾਈ ਘਟਿ ਦੀਪਕੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਭੋਜਨ ਗਿਆਨੁ ਮਹਾ ਰਸੁ ਮੀਠਾ ॥
ਜਿਨਿ ਚਾਖਿਆ ਤਿਨਿ ਦਰਸਨੁ ਡੀਠਾ ॥
ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਮਿਲੇ ਬੈਰਾਗੀ ਮਨੁ ਮਨਸਾ ਮਾਰਿ ਸਮਾਤਾ ਹੇ ॥੧੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਪਰਧਾਨਾ ॥
ਤਿਨ ਘਟ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜਸੁ ਹਰਿ ਜਨ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਦੀਜੈ ਜਿਨ ਸਤਿਗੁਰੁ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੭॥੫॥੧੧॥
भूले सिख गुरू समझाए ॥
उझड़ि जादे मारगि पाए ॥
तिसु गुर सेवि सदा दिनु राती दुख भंजन संगि सखाता हे ॥१३॥
गुर की भगति करहि किआ प्राणी ॥
ब्रहमै इंद्रि महेसि न जाणी ॥
सतिगुरु अलखु कहहु किउ लखीऐ जिसु बखसे तिसहि पछाता हे ॥१४॥
अंतरि प्रेमु परापति दरसनु ॥
गुरबाणी सिउ प्रीति सु परसनु ॥
अहिनिसि निरमल जोति सबाई घटि दीपकु गुरमुखि जाता हे ॥१५॥
भोजन गिआनु महा रसु मीठा ॥
जिनि चाखिआ तिनि दरसनु डीठा ॥
दरसनु देखि मिले बैरागी मनु मनसा मारि समाता हे ॥१६॥
सतिगुरु सेवहि से परधाना ॥
तिन घट घट अंतरि ब्रहमु पछाना ॥
नानक हरि जसु हरि जन की संगति दीजै जिन सतिगुरु हरि प्रभु जाता हे ॥१७॥५॥११॥
उझड़ि जादे मारगि पाए ॥
तिसु गुर सेवि सदा दिनु राती दुख भंजन संगि सखाता हे ॥१३॥
गुर की भगति करहि किआ प्राणी ॥
ब्रहमै इंद्रि महेसि न जाणी ॥
सतिगुरु अलखु कहहु किउ लखीऐ जिसु बखसे तिसहि पछाता हे ॥१४॥
अंतरि प्रेमु परापति दरसनु ॥
गुरबाणी सिउ प्रीति सु परसनु ॥
अहिनिसि निरमल जोति सबाई घटि दीपकु गुरमुखि जाता हे ॥१५॥
भोजन गिआनु महा रसु मीठा ॥
जिनि चाखिआ तिनि दरसनु डीठा ॥
दरसनु देखि मिले बैरागी मनु मनसा मारि समाता हे ॥१६॥
सतिगुरु सेवहि से परधाना ॥
तिन घट घट अंतरि ब्रहमु पछाना ॥
नानक हरि जसु हरि जन की संगति दीजै जिन सतिगुरु हरि प्रभु जाता हे ॥१७॥५॥११॥
हिन्दी अर्थ: भूले हुए लोगों को शिक्षा दे के गुरू (सही जीवन-राह की) समझ बख्शता है। गलत राह पर जाते को (ठीक) राह पर डालता है। (हे भाई ! तू) दिन-रात उस गुरू की बताई हुई कार कर। गुरू दुखों का नाश करने वाले परमात्मा में जोड़ के प्रभू के साथ मित्रता बना देता है। 13। (संसारी जीव) गुरू की भक्ति की क्या कद्र जान सकते हैं। ब्रहमा ने। इन्द्र ने। शिव ने (भी यह कद्र) नहीं समझी। गुरू अलख (-प्रभू का रूप) है। उसको समझा नहीं जा सकता। गुरू जिस पर मेहर करता है वही (गुरू की) पहचान करता है। 14। जिस मनुष्य के हृदय में (गुरू का) प्रेम है उसको (परमात्मा का) दीदार प्राप्त होता है। जिसकी प्रीति गुरू की बाणी के साथ बन गई उसको प्रभू-चरणों की छोह मिल जाती है। उसको सारी ही लोकाई में प्रभू की पवित्र ज्योति व्यापक दिखती है। गुरू की शरण पड़ कर उसको अपने हृदय में दिन-रात (ज्ञान का) दीया (जगमगाता) दिखता है। 15। (गुरू के द्वारा मिला हुआ परमात्मा का) ज्ञान एक ऐसी (आत्मिक) खुराक है जो मीठी है और बहुत ही स्वादिष्ट है। जिसने यह स्वाद चखा है उसने परमात्मा के दीदार कर लिए हैं। जो प्रेमी (गुरू के द्वारा परमात्मा के) दर्शन करके उसके चरणों में जुड़ते हैं। उनका मन (अपनी) कामनाओं को मार के (सदा के लिए परमात्मा की याद में) लीन हो जाता है। 16। जो मनुष्य सतिगुरू की बताई हुई सेवा करते हैं वह हर जगह आदर पाते हैं। वह हरेक शरीर के अंदर परमात्मा को बसता पहचान लेते हैं। (नानक की अरदास है कि) जिन लोगों ने सतिगुरू को परमात्मा का रूप समझ लिया है उन हरी के जनों की संगति नानक को भी मिल जाए (उनकी संगति में ही रह के) परमात्मा की सिफत-सालाह की दाति मिलती है। 17। 5। 11।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸਾਚੇ ਸਾਹਿਬ ਸਿਰਜਣਹਾਰੇ ॥
ਜਿਨਿ ਧਰ ਚਕ੍ਰ ਧਰੇ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਸਾਚਾ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ਹੇ ॥੧॥
ਵੇਕੀ ਵੇਕੀ ਜੰਤ ਉਪਾਏ ॥
ਦੁਇ ਪੰਦੀ ਦੁਇ ਰਾਹ ਚਲਾਏ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਵਿਣੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਲਾਹਾ ਹੇ ॥੨॥
ਪੜਹਿ ਮਨਮੁਖ ਪਰੁ ਬਿਧਿ ਨਹੀ ਜਾਨਾ ॥
ਨਾਮੁ ਨ ਬੂਝਹਿ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਨਾ ॥
ਲੈ ਕੈ ਵਢੀ ਦੇਨਿ ਉਗਾਹੀ ਦੁਰਮਤਿ ਕਾ ਗਲਿ ਫਾਹਾ ਹੇ ॥੩॥
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਪੜਹਿ ਪੁਰਾਣਾ ॥
ਵਾਦੁ ਵਖਾਣਹਿ ਤਤੁ ਨ ਜਾਣਾ ॥
ਵਿਣੁ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤਤੁ ਨ ਪਾਈਐ ਸਚ ਸੂਚੇ ਸਚੁ ਰਾਹਾ ਹੇ ॥੪॥
ਸਭ ਸਾਲਾਹੇ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਆਖੈ ॥
ਆਪੇ ਦਾਨਾ ਸਚੁ ਪਰਾਖੈ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਸਲਾਹਾ ਹੇ ॥੫॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਆਖੈ ਕੇਤੀ ਬਾਣੀ ॥
ਸੁਣਿ ਕਹੀਐ ਕੋ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਣੀ ॥
ਜਾ ਕਉ ਅਲਖੁ ਲਖਾਏ ਆਪੇ ਅਕਥ ਕਥਾ ਬੁਧਿ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੬॥
ਜਨਮੇ ਕਉ ਵਾਜਹਿ ਵਾਧਾਏ ॥
ਸੋਹਿਲੜੇ ਅਗਿਆਨੀ ਗਾਏ ॥
ਜੋ ਜਨਮੈ ਤਿਸੁ ਸਰਪਰ ਮਰਣਾ ਕਿਰਤੁ ਪਇਆ ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਹੇ ॥੭॥
ਸੰਜੋਗੁ ਵਿਜੋਗੁ ਮੇਰੈ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਏ ॥
ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਇ ਦੁਖਾ ਸੁਖ ਦੀਏ ॥
ਦੁਖ ਸੁਖ ਹੀ ਤੇ ਭਏ ਨਿਰਾਲੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੀਲੁ ਸਨਾਹਾ ਹੇ ॥੮॥
ਨੀਕੇ ਸਾਚੇ ਕੇ ਵਾਪਾਰੀ ॥
ਸਚੁ ਸਉਦਾ ਲੈ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਸਚਾ ਵਖਰੁ ਜਿਸੁ ਧਨੁ ਪਲੈ ਸਬਦਿ ਸਚੈ ਓਮਾਹਾ ਹੇ ॥੯॥
ਕਾਚੀ ਸਉਦੀ ਤੋਟਾ ਆਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਣਜੁ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ॥
ਪੂੰਜੀ ਸਾਬਤੁ ਰਾਸਿ ਸਲਾਮਤਿ ਚੂਕਾ ਜਮ ਕਾ ਫਾਹਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਸਾਚੇ ਸਾਹਿਬ ਸਿਰਜਣਹਾਰੇ ॥
ਜਿਨਿ ਧਰ ਚਕ੍ਰ ਧਰੇ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਸਾਚਾ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ਹੇ ॥੧॥
ਵੇਕੀ ਵੇਕੀ ਜੰਤ ਉਪਾਏ ॥
ਦੁਇ ਪੰਦੀ ਦੁਇ ਰਾਹ ਚਲਾਏ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਵਿਣੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਲਾਹਾ ਹੇ ॥੨॥
ਪੜਹਿ ਮਨਮੁਖ ਪਰੁ ਬਿਧਿ ਨਹੀ ਜਾਨਾ ॥
ਨਾਮੁ ਨ ਬੂਝਹਿ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਨਾ ॥
ਲੈ ਕੈ ਵਢੀ ਦੇਨਿ ਉਗਾਹੀ ਦੁਰਮਤਿ ਕਾ ਗਲਿ ਫਾਹਾ ਹੇ ॥੩॥
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਪੜਹਿ ਪੁਰਾਣਾ ॥
ਵਾਦੁ ਵਖਾਣਹਿ ਤਤੁ ਨ ਜਾਣਾ ॥
ਵਿਣੁ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤਤੁ ਨ ਪਾਈਐ ਸਚ ਸੂਚੇ ਸਚੁ ਰਾਹਾ ਹੇ ॥੪॥
ਸਭ ਸਾਲਾਹੇ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਆਖੈ ॥
ਆਪੇ ਦਾਨਾ ਸਚੁ ਪਰਾਖੈ ॥
ਜਿਨ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਸਲਾਹਾ ਹੇ ॥੫॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਆਖੈ ਕੇਤੀ ਬਾਣੀ ॥
ਸੁਣਿ ਕਹੀਐ ਕੋ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਣੀ ॥
ਜਾ ਕਉ ਅਲਖੁ ਲਖਾਏ ਆਪੇ ਅਕਥ ਕਥਾ ਬੁਧਿ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੬॥
ਜਨਮੇ ਕਉ ਵਾਜਹਿ ਵਾਧਾਏ ॥
ਸੋਹਿਲੜੇ ਅਗਿਆਨੀ ਗਾਏ ॥
ਜੋ ਜਨਮੈ ਤਿਸੁ ਸਰਪਰ ਮਰਣਾ ਕਿਰਤੁ ਪਇਆ ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਹੇ ॥੭॥
ਸੰਜੋਗੁ ਵਿਜੋਗੁ ਮੇਰੈ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਏ ॥
ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਇ ਦੁਖਾ ਸੁਖ ਦੀਏ ॥
ਦੁਖ ਸੁਖ ਹੀ ਤੇ ਭਏ ਨਿਰਾਲੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੀਲੁ ਸਨਾਹਾ ਹੇ ॥੮॥
ਨੀਕੇ ਸਾਚੇ ਕੇ ਵਾਪਾਰੀ ॥
ਸਚੁ ਸਉਦਾ ਲੈ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਸਚਾ ਵਖਰੁ ਜਿਸੁ ਧਨੁ ਪਲੈ ਸਬਦਿ ਸਚੈ ਓਮਾਹਾ ਹੇ ॥੯॥
ਕਾਚੀ ਸਉਦੀ ਤੋਟਾ ਆਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਣਜੁ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ॥
ਪੂੰਜੀ ਸਾਬਤੁ ਰਾਸਿ ਸਲਾਮਤਿ ਚੂਕਾ ਜਮ ਕਾ ਫਾਹਾ ਹੇ ॥੧੦॥
मारू महला १ ॥
साचे साहिब सिरजणहारे ॥
जिनि धर चक्र धरे वीचारे ॥
आपे करता करि करि वेखै साचा वेपरवाहा हे ॥१॥
वेकी वेकी जंत उपाए ॥
दुइ पंदी दुइ राह चलाए ॥
गुर पूरे विणु मुकति न होई सचु नामु जपि लाहा हे ॥२॥
पड़हि मनमुख परु बिधि नही जाना ॥
नामु न बूझहि भरमि भुलाना ॥
लै कै वढी देनि उगाही दुरमति का गलि फाहा हे ॥३॥
सिम्रिति सासत्र पड़हि पुराणा ॥
वादु वखाणहि ततु न जाणा ॥
विणु गुर पूरे ततु न पाईऐ सच सूचे सचु राहा हे ॥४॥
सभ सालाहे सुणि सुणि आखै ॥
आपे दाना सचु पराखै ॥
जिन कउ नदरि करे प्रभु अपनी गुरमुखि सबदु सलाहा हे ॥५॥
सुणि सुणि आखै केती बाणी ॥
सुणि कहीऐ को अंतु न जाणी ॥
जा कउ अलखु लखाए आपे अकथ कथा बुधि ताहा हे ॥६॥
जनमे कउ वाजहि वाधाए ॥
सोहिलड़े अगिआनी गाए ॥
जो जनमै तिसु सरपर मरणा किरतु पइआ सिरि साहा हे ॥७॥
संजोगु विजोगु मेरै प्रभि कीए ॥
स्रिसटि उपाइ दुखा सुख दीए ॥
दुख सुख ही ते भए निराले गुरमुखि सीलु सनाहा हे ॥८॥
नीके साचे के वापारी ॥
सचु सउदा लै गुर वीचारी ॥
सचा वखरु जिसु धनु पलै सबदि सचै ओमाहा हे ॥९॥
काची सउदी तोटा आवै ॥
गुरमुखि वणजु करे प्रभ भावै ॥
पूंजी साबतु रासि सलामति चूका जम का फाहा हे ॥१०॥
साचे साहिब सिरजणहारे ॥
जिनि धर चक्र धरे वीचारे ॥
आपे करता करि करि वेखै साचा वेपरवाहा हे ॥१॥
वेकी वेकी जंत उपाए ॥
दुइ पंदी दुइ राह चलाए ॥
गुर पूरे विणु मुकति न होई सचु नामु जपि लाहा हे ॥२॥
पड़हि मनमुख परु बिधि नही जाना ॥
नामु न बूझहि भरमि भुलाना ॥
लै कै वढी देनि उगाही दुरमति का गलि फाहा हे ॥३॥
सिम्रिति सासत्र पड़हि पुराणा ॥
वादु वखाणहि ततु न जाणा ॥
विणु गुर पूरे ततु न पाईऐ सच सूचे सचु राहा हे ॥४॥
सभ सालाहे सुणि सुणि आखै ॥
आपे दाना सचु पराखै ॥
जिन कउ नदरि करे प्रभु अपनी गुरमुखि सबदु सलाहा हे ॥५॥
सुणि सुणि आखै केती बाणी ॥
सुणि कहीऐ को अंतु न जाणी ॥
जा कउ अलखु लखाए आपे अकथ कथा बुधि ताहा हे ॥६॥
जनमे कउ वाजहि वाधाए ॥
सोहिलड़े अगिआनी गाए ॥
जो जनमै तिसु सरपर मरणा किरतु पइआ सिरि साहा हे ॥७॥
संजोगु विजोगु मेरै प्रभि कीए ॥
स्रिसटि उपाइ दुखा सुख दीए ॥
दुख सुख ही ते भए निराले गुरमुखि सीलु सनाहा हे ॥८॥
नीके साचे के वापारी ॥
सचु सउदा लै गुर वीचारी ॥
सचा वखरु जिसु धनु पलै सबदि सचै ओमाहा हे ॥९॥
काची सउदी तोटा आवै ॥
गुरमुखि वणजु करे प्रभ भावै ॥
पूंजी साबतु रासि सलामति चूका जम का फाहा हे ॥१०॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ हे सदा-स्थिर रहने वाले मालिक ! हे जगत के रचनहार ! जिस तू ने धरती के चक्कर बनाए हैं। तूने स्वयं ही सोच-विचार के (अपनी-अपनी जगह) टिकाए हैं ! करतार खुद ही जगत की रच-रच के संभाल करता है। वह सदा कायम रहने वाला है। (जगत का इतना बड़ा पसारा होते हुए भी) वह बेफिक्र है। 1। परमात्मा ने रंग-बिरंगे जीव पैदा कर दिए हैं। कोई गुरमुख बना दिए हैं कोई मनमुख बना दिए हैं। गुरमुखता और मनमुखता- ये दोनों रास्ते चला दिए हैं। पूरे गुरू की शरण पड़े बिना (बुरे रास्ते से) मुक्ति नहीं मिलती। (गुरू के द्वारा) सदा-स्थिर नाम जप के ही (मनुष्य जीवन में आत्मिक) लाभ कमाया जा सकता है। 2। अपने मन के पीछे चलने वाले व्यक्ति (धार्मिक पुस्तकें) पढ़ते हैं। पर वह (उस पढ़े हुए पर अमल करने की) जाच नहीं सीखते। वे परमात्मा के नाम की (कद्र) नहीं समझते। (माया की) भटकना में (पड़ कर) गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं। रिश्वत ले के झूठी गवाहियाँ दे देते हैं। दुर्मति का फंदा उनके गले में पड़ा रहता है। 3। (पण्डित लोग भी) स्मृतियाँ-शास्त्र-पुराण पढ़ते हैं (पर) चर्चा (ही) करते हैं। अस्लियत को नहीं समझते। पूरे गुरू की शरण पड़े बिना अस्लियत मिल ही नहीं सकती। जो लोग सदा-स्थिर (नाम सिमरते हैं) वे पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं। वे सही जीवन-राह को पकड़ लेते हैं। 4। (ज़बानी-ज़बानी तो) सारी दुनिया परमात्मा की सिफत-सालाह करती है (दूसरों से) सुन-सुन के (प्रभू के महातम) बयान करती है। पर सदा-स्थिर प्रभू हरेक के दिल की जानने वाला है (हरेक द्वारा की हुई भक्ति को) वह खुद ही परखता है। जिन पर प्रभू अपनी मेहर की नजर करता है। वह गुरू की शरण पड़ कर शबद को (हृदय में बसाते हैं) सिफत सालाह को (दिल में बसाते हैं)। 5। (दूसरों से) सुन-सुन के बेअंत दुनिया सिफत सालाह की बाणी भी बोलती है। सुन-सुन के प्रभू के गुणों का कथन कर लेते हैं। पर कोई जीव उसके गुणों का अंत नहीं जानता। जिस मनुष्य को वह अदृष्य प्रभू अपना स्वयं दिखाता है। उस मनुष्य को वह बुद्धि मिल जाती है जिससे वह उस अकथ प्रभू की कथा-कहानियाँ करता रहता है। 6। (जब कोई जीव पैदा होता है तो उसके) पैदा होने पर बाजे बजते हैं। वधाईयाँ (शुभ-कामनाएं। मुबारकें) मिलती हैं। ज्ञान से वंचित लोग खुशी के गीत गाते हैं। पर जो जीव पैदा होता है। उसने मरना भी अवश्य है। हरेक जीव के किए कर्मों के अनुसार (मौत का) महूरत उसके माथे पर लिखा जाता है। 7। (पैदा हो के परिवार में) मिलना और (मर कर परिवार से) विछुड़ना – ये खेल परमात्मा ने बना दी है। जगत पैदा करके दुख-सुख भी उसी ने ही दिए हैं। जो लोग गुरू की शरण पड़ कर मीठे स्वभाव वाला संजोअ (कवच) पहनते हैं वे दुख-सुख से निर्लिप रहते हैं। 8। सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम विहाजने वाले लोग अच्छे जीवन वाले होते हैं गुरू की बताई विचार पर चल के यहाँ से सदा-स्थिर रहने वाला सौदा ले के जाते हैं। जिस मनुष्य के पल्ले सदा-स्थिर रहने वाला सौदा है धन है वह सदा-स्थिर प्रभू की सिॅफत-सालाह के शबद द्वारा आत्मिक उत्साह प्राप्त करते हैं। 9। सिर्फ मायावी होछे व्यापार (वणज) करने से (आत्मिक जीवन में) घाटा पड़ता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला व्यक्ति वह (आत्मिक) व्यापार करता है जो प्रभू को पसंद आता है। उसका सरमाया उसकी राशि-पूँजी अमन-अमान रहती है। आत्मिक मौत का फंदा उसके गले से कट जाता है। 10।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1032 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
दिल्ली के winter-fog में सुबह 5 बजे driver को waiting करवाना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1032” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1033 →, पीछे का: ← अंग 1031।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।