अंग 1009

अंग
1009
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਰਿ ਪੜੀਐ ਹਰਿ ਬੁਝੀਐ ਗੁਰਮਤੀ ਨਾਮਿ ਉਧਾਰਾ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਪੂਰੀ ਮਤਿ ਹੈ ਪੂਰੈ ਸਬਦਿ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਅਠਸਠਿ ਤੀਰਥ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹੈ ਕਿਲਵਿਖ ਕਾਟਣਹਾਰਾ ॥੨॥
ਜਲੁ ਬਿਲੋਵੈ ਜਲੁ ਮਥੈ ਤਤੁ ਲੋੜੈ ਅੰਧੁ ਅਗਿਆਨਾ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਦਧਿ ਮਥੀਐ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪਾਈਐ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨਾ ॥
ਮਨਮੁਖ ਤਤੁ ਨ ਜਾਣਨੀ ਪਸੂ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨਾ ॥੩॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਮਰੀ ਮਰੁ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਜੇ ਮਰੈ ਫਿਰਿ ਮਰੈ ਨ ਦੂਜੀ ਵਾਰ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਜਗਜੀਵਨੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਭਿ ਕੁਲ ਉਧਾਰਣਹਾਰ ॥੪॥
ਸਚਾ ਵਖਰੁ ਨਾਮੁ ਹੈ ਸਚਾ ਵਾਪਾਰਾ ॥
ਲਾਹਾ ਨਾਮੁ ਸੰਸਾਰਿ ਹੈ ਗੁਰਮਤੀ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਕਾਰ ਕਮਾਵਣੀ ਨਿਤ ਤੋਟਾ ਸੈਸਾਰਾ ॥੫॥
ਸਾਚੀ ਸੰਗਤਿ ਥਾਨੁ ਸਚੁ ਸਚੇ ਘਰ ਬਾਰਾ ॥ ਸਚਾ ਭੋਜਨੁ ਭਾਉ ਸਚੁ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰਾ ॥
ਸਚੀ ਬਾਣੀ ਸੰਤੋਖਿਆ ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਾ ॥੬॥
ਰਸ ਭੋਗਣ ਪਾਤਿਸਾਹੀਆ ਦੁਖ ਸੁਖ ਸੰਘਾਰਾ ॥
ਮੋਟਾ ਨਾਉ ਧਰਾਈਐ ਗਲਿ ਅਉਗਣ ਭਾਰਾ ॥
ਮਾਣਸ ਦਾਤਿ ਨ ਹੋਵਈ ਤੂ ਦਾਤਾ ਸਾਰਾ ॥੭॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਤੂ ਧਣੀ ਅਵਿਗਤੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਦਰੁ ਜੋਈਐ ਮੁਕਤੇ ਭੰਡਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਮੇਲੁ ਨ ਚੂਕਈ ਸਾਚੇ ਵਾਪਾਰਾ ॥੮॥੧॥
हरि पड़ीऐ हरि बुझीऐ गुरमती नामि उधारा ॥
गुरि पूरै पूरी मति है पूरै सबदि बीचारा ॥
अठसठि तीरथ हरि नामु है किलविख काटणहारा ॥२॥
जलु बिलोवै जलु मथै ततु लोड़ै अंधु अगिआना ॥
गुरमती दधि मथीऐ अंम्रितु पाईऐ नामु निधाना ॥
मनमुख ततु न जाणनी पसू माहि समाना ॥३॥
हउमै मेरा मरी मरु मरि जंमै वारो वार ॥
गुर कै सबदे जे मरै फिरि मरै न दूजी वार ॥
गुरमती जगजीवनु मनि वसै सभि कुल उधारणहार ॥४॥
सचा वखरु नामु है सचा वापारा ॥
लाहा नामु संसारि है गुरमती वीचारा ॥
दूजै भाइ कार कमावणी नित तोटा सैसारा ॥५॥
साची संगति थानु सचु सचे घर बारा ॥ सचा भोजनु भाउ सचु सचु नामु अधारा ॥
सची बाणी संतोखिआ सचा सबदु वीचारा ॥६॥
रस भोगण पातिसाहीआ दुख सुख संघारा ॥
मोटा नाउ धराईऐ गलि अउगण भारा ॥
माणस दाति न होवई तू दाता सारा ॥७॥
अगम अगोचरु तू धणी अविगतु अपारा ॥
गुर सबदी दरु जोईऐ मुकते भंडारा ॥
नानक मेलु न चूकई साचे वापारा ॥८॥१॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) परमात्मा का नाम (ही) पढ़ना चाहिए नाम ही समझना चाहिए। गुरू की शिक्षा ले के प्रभू के नाम से ही (पापों से) बचाव होता है। यह पूरी मति और श्रेष्ठ विचार पूरे गुरू के द्वारा पूरे गुरू के शबद में जुड़ने से ही मिलता है कि परमात्मा का नाम अढ़सठ तीर्थों का स्नान है। और सारे पाप नाश करने के समर्थ है। 2। जो मनुष्य पानी मथता है। (सदा) पानी (ही) मथता है पर मक्खन हासिल करना चाहता है। वह (अक्ल से) अंधा है वह अज्ञानी है। अगर दही मथें तो मक्खन मिलता है (इसी तरह) अगर गुरू की मति लें तो प्रभू का नाम मिलता है जो (सारे सुखों का) खजाना है। पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य इस भेद को नहीं समझते। वे पशू-बिरती में टिके रहते हैं। 3। अहंकार और ममता निरी आत्मिक मौत है। इस आत्मिक मौत मर के जीव बार-बार पैदा होता मरता है। जो मनुष्य गुरू के शबद से (इस अहंकार और ममता की ओर से) सदा के लिए तर्क कर ले तो वह दोबारा कभी आत्मिक मौत नहीं सहेड़ता। गुरू की शिक्षा की बरकति से जिस मनुष्य के मन में जगत का जीवन परमात्मा बस जाता है (खुद तो पार होता ही है) अपनी सारी कुलों को भी आत्मिक मौत से बचा लेता है। 4। (जीव-वणजारा जगत-हाट में व्यापार करने आया है) सदा कायम रहने वाला (कभी नाश ना होने वाला) सौदा परमात्मा का नाम (ही) है। यही ऐसा व्यापार है जो सदा-स्थिर रहता है। जिस मनुष्य को गुरू की मति ले के ये सूझ आ जाती है वह जगत (-हाट) में नाम (की) कमाई कमाता है। पर अगर माया के प्यार में ही (सदा) किरत-कार की जाए। तो संसार में (आत्मिक जीवन की पूँजी को) घाटा ही घाटा पड़ता है। 5। जो मनुष्य सदा-स्थिर बाणी से (माया की तृष्णा से) संतोषी हो जाता है। जो गुरू के शबद को अपने सोच-मण्डल में टिकाए रखता है। परमात्मा का सदा-स्थिर नाम परमात्मा का सदा-स्थिर प्रेम उस (की जिंदगी) का आसरा बन जाता है उसके आत्मिक जीवन की चिर-स्थाई खुराक बन जाता है। उसकी संगति पवित्र। उसकी रिहायशी जगह पवित्र। उसका घर-बार पवित्र हैं। 6। पर दुनियां के रस भोगने से। दुनियावी बादशाहियों से (मनुष्य को) दुख-सुख व्यापते रहते हैं। अगर (दुनिया के बड़प्पन के कारण अपना) बड़ा नाम भी रखा लें। तो भी बल्कि गले में अवगुणों का भार बंध जाता है (जिसके कारण मनुष्य संसार-समुंद्र में डूबता ही है)। हे प्रभू ! तू बड़ा दाता है (सब दातें देता है)। पर तेरी (मायावी) दातों से मनुष्यों की (माया से) तृप्ति नहीं होती। 7। हे प्रभू ! तू अगम है। ज्ञानेन्द्रियों की तेरे तक पहुँच नहीं हो सकती। तू सब पदार्थों का मालिक है। तू अदृष्ट है। तू बेअंत है। अगर गुरू के शबद में जुड़ के तेरा दरवाजा तलाशें तो (तेरे दर से नाम का वह) खजाना मिलता है जो (माया के मोह से) मुक्ति देता है। हे नानक ! (नाम का व्यापार) सदा-स्थिर रहने वाला व्यापार है (इस व्यापार की बरकति से जीव-वणजारे का परमात्मा-शाह से कभी) मिलाप समाप्त नहीं होता। 8। 2।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਬਿਖੁ ਬੋਹਿਥਾ ਲਾਦਿਆ ਦੀਆ ਸਮੁੰਦ ਮੰਝਾਰਿ ॥
ਕੰਧੀ ਦਿਸਿ ਨ ਆਵਈ ਨਾ ਉਰਵਾਰੁ ਨ ਪਾਰੁ ॥
ਵੰਝੀ ਹਾਥਿ ਨ ਖੇਵਟੂ ਜਲੁ ਸਾਗਰੁ ਅਸਰਾਲੁ ॥੧॥
ਬਾਬਾ ਜਗੁ ਫਾਥਾ ਮਹਾ ਜਾਲਿ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਉਬਰੇ ਸਚਾ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਹੈ ਬੋਹਿਥਾ ਸਬਦਿ ਲੰਘਾਵਣਹਾਰੁ ॥
ਤਿਥੈ ਪਵਣੁ ਨ ਪਾਵਕੋ ਨਾ ਜਲੁ ਨਾ ਆਕਾਰੁ ॥
ਤਿਥੈ ਸਚਾ ਸਚਿ ਨਾਇ ਭਵਜਲ ਤਾਰਣਹਾਰੁ ॥੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਲੰਘੇ ਸੇ ਪਾਰਿ ਪਏ ਸਚੇ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਆਵਾ ਗਉਣੁ ਨਿਵਾਰਿਆ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਸਹਜੁ ਊਪਜੈ ਸਚੇ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੩॥
ਸਪੁ ਪਿੜਾਈ ਪਾਈਐ ਬਿਖੁ ਅੰਤਰਿ ਮਨਿ ਰੋਸੁ ॥
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਪਾਈਐ ਕਿਸ ਨੋ ਦੀਜੈ ਦੋਸੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਾਰੜੁ ਜੇ ਸੁਣੇ ਮੰਨੇ ਨਾਉ ਸੰਤੋਸੁ ॥੪॥
ਮਾਗਰਮਛੁ ਫਹਾਈਐ ਕੁੰਡੀ ਜਾਲੁ ਵਤਾਇ ॥
ਦੁਰਮਤਿ ਫਾਥਾ ਫਾਹੀਐ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਪਛੋਤਾਇ ॥
ਜੰਮਣ ਮਰਣੁ ਨ ਸੁਝਈ ਕਿਰਤੁ ਨ ਮੇਟਿਆ ਜਾਇ ॥੫॥
ਹਉਮੈ ਬਿਖੁ ਪਾਇ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ਸਬਦੁ ਵਸੈ ਬਿਖੁ ਜਾਇ ॥
ਜਰਾ ਜੋਹਿ ਨ ਸਕਈ ਸਚਿ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਜੀਵਨ ਮੁਕਤੁ ਸੋ ਆਖੀਐ ਜਿਸੁ ਵਿਚਹੁ ਹਉਮੈ ਜਾਇ ॥੬॥
मारू महला १ ॥
बिखु बोहिथा लादिआ दीआ समुंद मंझारि ॥
कंधी दिसि न आवई ना उरवारु न पारु ॥
वंझी हाथि न खेवटू जलु सागरु असरालु ॥१॥
बाबा जगु फाथा महा जालि ॥
गुर परसादी उबरे सचा नामु समालि ॥१॥ रहाउ ॥
सतिगुरू है बोहिथा सबदि लंघावणहारु ॥
तिथै पवणु न पावको ना जलु ना आकारु ॥
तिथै सचा सचि नाइ भवजल तारणहारु ॥२॥
गुरमुखि लंघे से पारि पए सचे सिउ लिव लाइ ॥
आवा गउणु निवारिआ जोती जोति मिलाइ ॥
गुरमती सहजु ऊपजै सचे रहै समाइ ॥३॥
सपु पिड़ाई पाईऐ बिखु अंतरि मनि रोसु ॥
पूरबि लिखिआ पाईऐ किस नो दीजै दोसु ॥
गुरमुखि गारड़ु जे सुणे मंने नाउ संतोसु ॥४॥
मागरमछु फहाईऐ कुंडी जालु वताइ ॥
दुरमति फाथा फाहीऐ फिरि फिरि पछोताइ ॥
जंमण मरणु न सुझई किरतु न मेटिआ जाइ ॥५॥
हउमै बिखु पाइ जगतु उपाइआ सबदु वसै बिखु जाइ ॥
जरा जोहि न सकई सचि रहै लिव लाइ ॥
जीवन मुकतु सो आखीऐ जिसु विचहु हउमै जाइ ॥६॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ जगत ने अपनी जिंदगी का बेड़ा माया के जहर से लादा हुआ है। और इसको संसार-समुंद्र में ठेल दिया हुआ है। (संसार का) किनारा दिखाई नहीं देता। ना इस पार का ना उस पार का। ना ही (मुसाफिर के) हाथ में वंझ है। ना (बेड़े को चलाने वाला कोई) मल्लाह है। (जिस समुंद्र में से जहाज गुजर रहा है वह) समुंद्र भयानक है (उस का ठाठा मारता) पानी डरावना है। 1। हे भाई ! जगत (माया मोह के) बहुत बड़े जाल में फंसा हुआ है। (इस जाल में) जीवित वे निकलते हैं जो गुरू की मेहर से सदा-स्थिर प्रभू का नाम संभालते हैं। 1। रहाउ। गुरू जहाज है। गुरू अपने शबद के द्वारा (जीव मुसाफिर को संसार-समुंद्र में से) पार लंघाने के समर्थ है। (गुरू जिस जगह जिस आत्मिक अवस्था में पहुँचा देता है) वहाँ ना हवा ना आग ना पानी ना ये सब कुछ जो दिखाई दे रहा है (कोई प्रभाव नहीं डाल सकता)। उस अवस्था में पहुँचा हुआ जीव सदा-स्थिर प्रभू के नाम में लीन होता है जो जीव। संसार-समुंद्र से पार लंघाने की ताकत रखता है। 2। जो लोग गुरू की शरण पड़ कर (इस समुंद्र में से) गुजरते हैं। वे सदा-स्थिर परमात्मा (के चरणों) में सुरति जोड़ के उस पार किनारे पर जा पहुँचते हैं। (गुरू) उनकी ज्योति प्रभू की ज्योति में मिल के उनका जनम-मरण का चक्कर समाप्त कर देता है। गुरू की शिक्षा ले के जिस मनुष्य के अंदर अडोल आत्मिक अवस्था पैदा होती है वह सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 3। अगर साँप को पिटारी में डाल दें तो उसका जहर उसके अंदर ही टिका रहता है (दूसरों को डंक मारने के लिए) गुस्सा भी उसके मन में मौजूद रहता है (मनुष्य का मन। जैसे। साँप है। किसी धार्मिक भेष से मन का बुरा स्वभाव बदल नहीं सकता)। पिछले किए कर्मों के संस्कारों के संग्रह का फल भोगना ही पड़ता है। किसी जीव को (उसके द्वारा किसी की बुराई के बारे में) दोष नहीं दिया जा सकता। अगर मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (मन रूपी साँप को वश में करने वाला) गरुड़ मंत्र (गुरू से) सुन ले। परमात्मा का नाम सुनने की आदत डाल ले तो उसके अंदर शांति पैदा हो जाती है। 4। (दरिआ में) जाल डाल के कुंढी से मगरमछ फसा लेते हैं। वैसे ही बुरी मति में फंसा हुआ जीव माया के मोह में काबू आ जाता है (विकार करता है और) बार-बार पछताता (भी) है। उसको ये सूझता ही नहीं कि (इन विकारों के कारण) जनम-मरण का चक्कर व्यापेगा। (पर उसके भी क्या वश। ) पिछले किए कर्मों के संस्कारों का समूह (जो जीव के मन में मौजूद रहता है) मिटाया नहीं जा सकता। 5। ईश्वर ने जीवों के अंदर अहंकार का जहर डाल के जगत पैदा कर दिया है। जिस जीव के हृदय में गुरू का शबद बस जाता है उसका यह जहर दूर हो जाता है। (वह एक ऐसी आत्मिक अवस्था में पहुँचता है जिसको) बुढ़ापा छू नहीं सकता। वह सदा कायम रहने वाले परमात्मा में सुरति जोड़े रखता है। जिस मनुष्य के अंदर से अहंकार दूर हो जाए उसकी बाबत कहा जा सकता है कि वह सांसारिक जीवन जीते हुए ही माया के बँधनों से आजाद है। 6।

संदर्भ: यह अंग 1009 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Mehrauli के पुराने पत्थरों के पास, 800 साल का इतिहास और एक 600 साल पुरानी पंक्ति।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1009” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1010 →, पीछे का: ← अंग 1008

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।