अंग
1003
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬੇਦੁ ਪੁਕਾਰੈ ਮੁਖ ਤੇ ਪੰਡਤ ਕਾਮਾਮਨ ਕਾ ਮਾਠਾ ॥
ਮੋਨੀ ਹੋਇ ਬੈਠਾ ਇਕਾਂਤੀ ਹਿਰਦੈ ਕਲਪਨ ਗਾਠਾ ॥
ਹੋਇ ਉਦਾਸੀ ਗ੍ਰਿਹੁ ਤਜਿ ਚਲਿਓ ਛੁਟਕੈ ਨਾਹੀ ਨਾਠਾ ॥੧॥
ਜੀਅ ਕੀ ਕੈ ਪਹਿ ਬਾਤ ਕਹਾ ॥
ਆਪਿ ਮੁਕਤੁ ਮੋ ਕਉ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਲੇ ਐਸੋ ਕਹਾ ਲਹਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਪਸੀ ਕਰਿ ਕੈ ਦੇਹੀ ਸਾਧੀ ਮਨੂਆ ਦਹ ਦਿਸ ਧਾਨਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮਚਾਰਿ ਬ੍ਰਹਮਚਜੁ ਕੀਨਾ ਹਿਰਦੈ ਭਇਆ ਗੁਮਾਨਾ ॥
ਸੰਨਿਆਸੀ ਹੋਇ ਕੈ ਤੀਰਥਿ ਭ੍ਰਮਿਓ ਉਸੁ ਮਹਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਬਿਗਾਨਾ ॥੨॥
ਘੂੰਘਰ ਬਾਧਿ ਭਏ ਰਾਮਦਾਸਾ ਰੋਟੀਅਨ ਕੇ ਓਪਾਵਾ ॥
ਬਰਤ ਨੇਮ ਕਰਮ ਖਟ ਕੀਨੇ ਬਾਹਰਿ ਭੇਖ ਦਿਖਾਵਾ ॥
ਗੀਤ ਨਾਦ ਮੁਖਿ ਰਾਗ ਅਲਾਪੇ ਮਨਿ ਨਹੀ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗਾਵਾ ॥੩॥
ਹਰਖ ਸੋਗ ਲੋਭ ਮੋਹ ਰਹਤ ਹਹਿ ਨਿਰਮਲ ਹਰਿ ਕੇ ਸੰਤਾ ॥
ਤਿਨ ਕੀ ਧੂੜਿ ਪਾਏ ਮਨੁ ਮੇਰਾ ਜਾ ਦਇਆ ਕਰੇ ਭਗਵੰਤਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਮਿਲਿਆ ਤਾਂ ਉਤਰੀ ਮਨ ਕੀ ਚਿੰਤਾ ॥੪॥
ਮੇਰਾ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣੈ ਮੇਰੇ ਜੀਅ ਕਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਬਿਸਰਿ ਗਏ ਬਕਬਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੬॥੧੫॥
ਮੋਨੀ ਹੋਇ ਬੈਠਾ ਇਕਾਂਤੀ ਹਿਰਦੈ ਕਲਪਨ ਗਾਠਾ ॥
ਹੋਇ ਉਦਾਸੀ ਗ੍ਰਿਹੁ ਤਜਿ ਚਲਿਓ ਛੁਟਕੈ ਨਾਹੀ ਨਾਠਾ ॥੧॥
ਜੀਅ ਕੀ ਕੈ ਪਹਿ ਬਾਤ ਕਹਾ ॥
ਆਪਿ ਮੁਕਤੁ ਮੋ ਕਉ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਲੇ ਐਸੋ ਕਹਾ ਲਹਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਪਸੀ ਕਰਿ ਕੈ ਦੇਹੀ ਸਾਧੀ ਮਨੂਆ ਦਹ ਦਿਸ ਧਾਨਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮਚਾਰਿ ਬ੍ਰਹਮਚਜੁ ਕੀਨਾ ਹਿਰਦੈ ਭਇਆ ਗੁਮਾਨਾ ॥
ਸੰਨਿਆਸੀ ਹੋਇ ਕੈ ਤੀਰਥਿ ਭ੍ਰਮਿਓ ਉਸੁ ਮਹਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਬਿਗਾਨਾ ॥੨॥
ਘੂੰਘਰ ਬਾਧਿ ਭਏ ਰਾਮਦਾਸਾ ਰੋਟੀਅਨ ਕੇ ਓਪਾਵਾ ॥
ਬਰਤ ਨੇਮ ਕਰਮ ਖਟ ਕੀਨੇ ਬਾਹਰਿ ਭੇਖ ਦਿਖਾਵਾ ॥
ਗੀਤ ਨਾਦ ਮੁਖਿ ਰਾਗ ਅਲਾਪੇ ਮਨਿ ਨਹੀ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗਾਵਾ ॥੩॥
ਹਰਖ ਸੋਗ ਲੋਭ ਮੋਹ ਰਹਤ ਹਹਿ ਨਿਰਮਲ ਹਰਿ ਕੇ ਸੰਤਾ ॥
ਤਿਨ ਕੀ ਧੂੜਿ ਪਾਏ ਮਨੁ ਮੇਰਾ ਜਾ ਦਇਆ ਕਰੇ ਭਗਵੰਤਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਮਿਲਿਆ ਤਾਂ ਉਤਰੀ ਮਨ ਕੀ ਚਿੰਤਾ ॥੪॥
ਮੇਰਾ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣੈ ਮੇਰੇ ਜੀਅ ਕਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਬਿਸਰਿ ਗਏ ਬਕਬਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੬॥੧੫॥
बेदु पुकारै मुख ते पंडत कामामन का माठा ॥
मोनी होइ बैठा इकांती हिरदै कलपन गाठा ॥
होइ उदासी ग्रिहु तजि चलिओ छुटकै नाही नाठा ॥१॥
जीअ की कै पहि बात कहा ॥
आपि मुकतु मो कउ प्रभु मेले ऐसो कहा लहा ॥१॥ रहाउ ॥
तपसी करि कै देही साधी मनूआ दह दिस धाना ॥
ब्रहमचारि ब्रहमचजु कीना हिरदै भइआ गुमाना ॥
संनिआसी होइ कै तीरथि भ्रमिओ उसु महि क्रोधु बिगाना ॥२॥
घूंघर बाधि भए रामदासा रोटीअन के ओपावा ॥
बरत नेम करम खट कीने बाहरि भेख दिखावा ॥
गीत नाद मुखि राग अलापे मनि नही हरि हरि गावा ॥३॥
हरख सोग लोभ मोह रहत हहि निरमल हरि के संता ॥
तिन की धूड़ि पाए मनु मेरा जा दइआ करे भगवंता ॥
कहु नानक गुरु पूरा मिलिआ तां उतरी मन की चिंता ॥४॥
मेरा अंतरजामी हरि राइआ ॥
सभु किछु जाणै मेरे जीअ का प्रीतमु बिसरि गए बकबाइआ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥६॥१५॥
मोनी होइ बैठा इकांती हिरदै कलपन गाठा ॥
होइ उदासी ग्रिहु तजि चलिओ छुटकै नाही नाठा ॥१॥
जीअ की कै पहि बात कहा ॥
आपि मुकतु मो कउ प्रभु मेले ऐसो कहा लहा ॥१॥ रहाउ ॥
तपसी करि कै देही साधी मनूआ दह दिस धाना ॥
ब्रहमचारि ब्रहमचजु कीना हिरदै भइआ गुमाना ॥
संनिआसी होइ कै तीरथि भ्रमिओ उसु महि क्रोधु बिगाना ॥२॥
घूंघर बाधि भए रामदासा रोटीअन के ओपावा ॥
बरत नेम करम खट कीने बाहरि भेख दिखावा ॥
गीत नाद मुखि राग अलापे मनि नही हरि हरि गावा ॥३॥
हरख सोग लोभ मोह रहत हहि निरमल हरि के संता ॥
तिन की धूड़ि पाए मनु मेरा जा दइआ करे भगवंता ॥
कहु नानक गुरु पूरा मिलिआ तां उतरी मन की चिंता ॥४॥
मेरा अंतरजामी हरि राइआ ॥
सभु किछु जाणै मेरे जीअ का प्रीतमु बिसरि गए बकबाइआ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥६॥१५॥
हिन्दी अर्थ: हे पण्डित ! (तेरे जैसा कोई तो) मुँह से वेद ऊँची-ऊँची आवाज़ में पढ़ता है। पर आत्मिक कमाई करने के पक्ष से ढीला है; (कोई) मौन-धारी बन के (किसी गुफा आदि में) अकेला बैठा हुआ है। (पर उसके भी) हृदय में मानसिक दौड़-भाग की गाँठ बनी हुई है; (कोई दुनियाँ से) उपराम हो के गृहस्त छोड़ के चल पड़ा है (पर उसकी भी) भटकना खत्म नहीं हुई। 1। (हे पण्डित !) मैं अपने दिल की बात किस को बताऊँ। मैं ऐसा (गुरमुख) कहाँ से तलाशूँ जो स्वयं (मोह माया से) बचा हुआ हो। और मुझे (भी) परमात्मा मिला दे। । 1। रहाउ। (हे पण्डित !) कोई तपस्वी (तप) करके (निरे) शरीर को कष्ट दे रहा है। मन (उसका भी) दसों दिशाओं में दौड़ रहा है; किसी ब्रहमचारी ने कामवासना रोकने का अभ्यास कर लिया है। (पर उसके) हृदय में (इसी बात का) अहंकार पैदा हो गया है। (कोई) सन्यासी बन के (हरेक) तीर्थ पर भ्रमण कर रहा है; उसके अंदर उसको मूर्ख बना देने वाला क्रोध पैदा हो गया है (बता। हे पण्डित ! मैं ऐसा मनुष्य कहाँ से ढूँढू जो स्वयं मुक्त हो)। 2। ( हे पण्डित ! कई ऐसे हैं जो अपने पैरों से) घुंघरू बाँध के रासधारिए बने हैं। पर वे भी रोटियाँ (कमाने के लिए ही ये) ढंग तरीके बरत रहे हैं; (कई ऐसे हैं जो) व्रत-नेम आदि और छे (निहित धार्मिक) कर्म करते हैं। (पर उन्होंने भी) बाहर (लोगों को ही) धार्मिक पहरावा दिखाया हुआ है; (कई ऐसे हैं जो) मुँह से (तो भजनों के) गीत-राग अलापते हैं। (पर अपने) मन (में उन्होंने कभी भी) परमात्मा की सिफत-सालाह नहीं की। 3। (हे पण्डित ! सिर्फ) हरी के संत जन ही पवित्र जीवन वाले हैं। वे खुशी-ग़मी-लोभ-मोह आदि से बचे रहते हैं। जब भगवान दया करे तब मेरा मन उनके चरणों की धूड़ प्राप्त करता है। हे नानक ! (कह-हे पण्डित !) जब पूरा गुरू मिलता है तब मन की चिंता दूर हो जाती है। 4। (हे पण्डित !) मेरा प्रभू-पातशाह सब के दिल की जानने वाला है (वह बाहरी भेषों। प्रयासों से नहीं पतीजता)। हे पण्डित ! मेरी जीवात्मा का पातशाह सब कुछ जानता है (जिसको वह मिल जाता है। वह सारे) दिखावे के बोल बोलने भूल जाता है। 1। रहाउ दूजा। 6। 15।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕੋਟਿ ਲਾਖ ਸਰਬ ਕੋ ਰਾਜਾ ਜਿਸੁ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ॥
ਜਾ ਕਉ ਨਾਮੁ ਨ ਦੀਆ ਮੇਰੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਸੇ ਮਰਿ ਜਨਮਹਿ ਗਾਵਾਰਾ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਹੀ ਪਤਿ ਰਾਖੁ ॥
ਚੀਤਿ ਆਵਹਿ ਤਬ ਹੀ ਪਤਿ ਪੂਰੀ ਬਿਸਰਤ ਰਲੀਐ ਖਾਕੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰੂਪ ਰੰਗ ਖੁਸੀਆ ਮਨ ਭੋਗਣ ਤੇ ਤੇ ਛਿਦ੍ਰ ਵਿਕਾਰਾ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਕਲਿਆਣਾ ਸੂਖ ਸਹਜੁ ਇਹੁ ਸਾਰਾ ॥੨॥
ਮਾਇਆ ਰੰਗ ਬਿਰੰਗ ਖਿਨੈ ਮਹਿ ਜਿਉ ਬਾਦਰ ਕੀ ਛਾਇਆ ॥
ਸੇ ਲਾਲ ਭਏ ਗੂੜੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਜਿਨ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗਾਇਆ ॥੩॥
ਊਚ ਮੂਚ ਅਪਾਰ ਸੁਆਮੀ ਅਗਮ ਦਰਬਾਰਾ ॥
ਨਾਮੋ ਵਡਿਆਈ ਸੋਭਾ ਨਾਨਕ ਖਸਮੁ ਪਿਆਰਾ ॥੪॥੭॥੧੬॥
ਕੋਟਿ ਲਾਖ ਸਰਬ ਕੋ ਰਾਜਾ ਜਿਸੁ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ॥
ਜਾ ਕਉ ਨਾਮੁ ਨ ਦੀਆ ਮੇਰੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਸੇ ਮਰਿ ਜਨਮਹਿ ਗਾਵਾਰਾ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਹੀ ਪਤਿ ਰਾਖੁ ॥
ਚੀਤਿ ਆਵਹਿ ਤਬ ਹੀ ਪਤਿ ਪੂਰੀ ਬਿਸਰਤ ਰਲੀਐ ਖਾਕੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰੂਪ ਰੰਗ ਖੁਸੀਆ ਮਨ ਭੋਗਣ ਤੇ ਤੇ ਛਿਦ੍ਰ ਵਿਕਾਰਾ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਕਲਿਆਣਾ ਸੂਖ ਸਹਜੁ ਇਹੁ ਸਾਰਾ ॥੨॥
ਮਾਇਆ ਰੰਗ ਬਿਰੰਗ ਖਿਨੈ ਮਹਿ ਜਿਉ ਬਾਦਰ ਕੀ ਛਾਇਆ ॥
ਸੇ ਲਾਲ ਭਏ ਗੂੜੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਜਿਨ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗਾਇਆ ॥੩॥
ਊਚ ਮੂਚ ਅਪਾਰ ਸੁਆਮੀ ਅਗਮ ਦਰਬਾਰਾ ॥
ਨਾਮੋ ਵਡਿਆਈ ਸੋਭਾ ਨਾਨਕ ਖਸਮੁ ਪਿਆਰਾ ॥੪॥੭॥੧੬॥
मारू महला ५ ॥
कोटि लाख सरब को राजा जिसु हिरदै नामु तुमारा ॥
जा कउ नामु न दीआ मेरै सतिगुरि से मरि जनमहि गावारा ॥१॥
मेरे सतिगुर ही पति राखु ॥
चीति आवहि तब ही पति पूरी बिसरत रलीऐ खाकु ॥१॥ रहाउ ॥
रूप रंग खुसीआ मन भोगण ते ते छिद्र विकारा ॥
हरि का नामु निधानु कलिआणा सूख सहजु इहु सारा ॥२॥
माइआ रंग बिरंग खिनै महि जिउ बादर की छाइआ ॥
से लाल भए गूड़ै रंगि राते जिन गुर मिलि हरि हरि गाइआ ॥३॥
ऊच मूच अपार सुआमी अगम दरबारा ॥
नामो वडिआई सोभा नानक खसमु पिआरा ॥४॥७॥१६॥
कोटि लाख सरब को राजा जिसु हिरदै नामु तुमारा ॥
जा कउ नामु न दीआ मेरै सतिगुरि से मरि जनमहि गावारा ॥१॥
मेरे सतिगुर ही पति राखु ॥
चीति आवहि तब ही पति पूरी बिसरत रलीऐ खाकु ॥१॥ रहाउ ॥
रूप रंग खुसीआ मन भोगण ते ते छिद्र विकारा ॥
हरि का नामु निधानु कलिआणा सूख सहजु इहु सारा ॥२॥
माइआ रंग बिरंग खिनै महि जिउ बादर की छाइआ ॥
से लाल भए गूड़ै रंगि राते जिन गुर मिलि हरि हरि गाइआ ॥३॥
ऊच मूच अपार सुआमी अगम दरबारा ॥
नामो वडिआई सोभा नानक खसमु पिआरा ॥४॥७॥१६॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे प्रभू ! जिस मनुष्य के हृदय में तेरा नाम बसता है वह लाखों-करोड़ों (सब) लोगों (के दिल) का राजा बन जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्यों को गुरु ने नाम नहीं दिया वह जनम-मरण के चक्र में पड़े रहते हैं। 1। हे मेरे सतिगुरू ! तू ही (मेरी) इज्जत का रखवाला है। हे प्रभू ! जब से तू (हम जीवों के) चित्त में आ बसा है तब से ही (हमें लोक-परलोक में) पूरी इज्जत मिलती है। (तेरा नाम) भूलने से मिट्टी में मिल जाते हैं। 1। रहाउ। दुनियाई रूप रंग ख़ुशियां। मन की मौजें और विकार (आत्मिक जीवन में) छेद हैं। हे भाई ! परमात्मा का नाम (ही) सारे सुखों सारी खुशियों का खजाना है; ये नाम ही श्रेष्ठ (पदार्थ) है और आत्मिक स्थिरता (का मूल) है। 2। हे भाई ! जैसे बादलों की छाया (छिन-भंगुर है। वैसे) माया के रंग-तमाशे छिन में फीके पड़ जाते हैं; पर। हे भाई ! जिन्होंने गुरू को मिल के परमात्मा की सिफत-सालाह की। वह लाल (रत्न) हो गए। वे गाढ़े प्रेम-रंग में रंगे गए (उनका आत्मिक आनंद फीका नहीं पड़ता)। 3। वह उस मालिक के दरबार में पहुँचे रहते हैं जो सबसे ऊँचा है जो सबसे बड़ा है जो बेअंत है और अपहुँच है। हे नानक ! जिन्हें पति-प्रभू प्यारा लगता है। उनके वास्ते हरी-नाम ही (दुनिया की) महानता है। नाम ही (लोक-परलोक की) शोभा है। 4। 7। 16।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੪
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਓਅੰਕਾਰਿ ਉਤਪਾਤੀ ॥
ਕੀਆ ਦਿਨਸੁ ਸਭ ਰਾਤੀ ॥
ਵਣੁ ਤ੍ਰਿਣੁ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਪਾਣੀ ॥
ਚਾਰਿ ਬੇਦ ਚਾਰੇ ਖਾਣੀ ॥
ਖੰਡ ਦੀਪ ਸਭਿ ਲੋਆ ॥
ਏਕ ਕਵਾਵੈ ਤੇ ਸਭਿ ਹੋਆ ॥੧॥
ਕਰਣੈਹਾਰਾ ਬੂਝਹੁ ਰੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਸੂਝੈ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਕੀਆ ਪਸਾਰਾ ॥
ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਅਵਤਾਰਾ ॥
ਹਉਮੈ ਆਵੈ ਜਾਈ ॥
ਮਨੁ ਟਿਕਣੁ ਨ ਪਾਵੈ ਰਾਈ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਓਅੰਕਾਰਿ ਉਤਪਾਤੀ ॥
ਕੀਆ ਦਿਨਸੁ ਸਭ ਰਾਤੀ ॥
ਵਣੁ ਤ੍ਰਿਣੁ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਪਾਣੀ ॥
ਚਾਰਿ ਬੇਦ ਚਾਰੇ ਖਾਣੀ ॥
ਖੰਡ ਦੀਪ ਸਭਿ ਲੋਆ ॥
ਏਕ ਕਵਾਵੈ ਤੇ ਸਭਿ ਹੋਆ ॥੧॥
ਕਰਣੈਹਾਰਾ ਬੂਝਹੁ ਰੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਸੂਝੈ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਕੀਆ ਪਸਾਰਾ ॥
ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਅਵਤਾਰਾ ॥
ਹਉਮੈ ਆਵੈ ਜਾਈ ॥
ਮਨੁ ਟਿਕਣੁ ਨ ਪਾਵੈ ਰਾਈ ॥
मारू महला ५ घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओअंकारि उतपाती ॥
कीआ दिनसु सभ राती ॥
वणु त्रिणु त्रिभवण पाणी ॥
चारि बेद चारे खाणी ॥
खंड दीप सभि लोआ ॥
एक कवावै ते सभि होआ ॥१॥
करणैहारा बूझहु रे ॥
सतिगुरु मिलै त सूझै रे ॥१॥ रहाउ ॥
त्रै गुण कीआ पसारा ॥
नरक सुरग अवतारा ॥
हउमै आवै जाई ॥
मनु टिकणु न पावै राई ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओअंकारि उतपाती ॥
कीआ दिनसु सभ राती ॥
वणु त्रिणु त्रिभवण पाणी ॥
चारि बेद चारे खाणी ॥
खंड दीप सभि लोआ ॥
एक कवावै ते सभि होआ ॥१॥
करणैहारा बूझहु रे ॥
सतिगुरु मिलै त सूझै रे ॥१॥ रहाउ ॥
त्रै गुण कीआ पसारा ॥
नरक सुरग अवतारा ॥
हउमै आवै जाई ॥
मनु टिकणु न पावै राई ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५ घरु ४ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! सर्व-व्यापक परमात्मा ने जगत की उत्पक्ति की है; दिन भी उसने बनाया; रातें भी उसने बनाई। सब कुछ उसने बनाया है। हे भाई ! जंगल। (जंगल का) घास। तीनों भवन। पानी (आदि सारे तत्व)। चारों वेद। चारों खाणियाँ। सृष्टि के अलग-अलग हिस्से (खण्ड)। द्वीप। सारे लोग -ये सारे परमात्मा के हुकम से ही बने हैं। 1। हे भाई ! सृजनहार प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल। पर। हे भाई ! जब गुरू मिल जाए तब ही ये सूझ पड़ती है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा ने ही त्रैगुणी माया का पसारा रचा है। कोई नर्कों में हैं। कोई स्वर्गों में हैं। अहंकार के कारण जीव भटकता फिरता है। (जीव का) मन रक्ती भर भी नहीं टिकता।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1003 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली मेट्रो की सुबह 7 बजे की rush hour, हर चेहरा अपनी जल्दी में, और मन के अंदर यह विचार।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1003” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1004 →, पीछे का: ← अंग 1002।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।