अंग 1068

अंग
1068
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਤਿਸ ਦੀ ਬੂਝੈ ਜਿ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਕਮਾਏ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਨਿਵਾਰੇ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਸਮਾਇਆ ॥੧੫॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਵਿਰਲੈ ਪਾਈ ॥
ਨਾਨਕੁ ਏਕ ਕਹੈ ਬੇਨੰਤੀ ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇਆ ॥੧੬॥੧॥੨੩॥
तिस दी बूझै जि गुर सबदु कमाए ॥
तनु मनु सीतलु क्रोधु निवारे हउमै मारि समाइआ ॥१५॥
सचा साहिबु सची वडिआई ॥
गुर परसादी विरलै पाई ॥
नानकु एक कहै बेनंती नामे नामि समाइआ ॥१६॥१॥२३॥

हिन्दी अर्थ: ये तृष्णा-अग्नि उस मनुष्य की बुझती है जो गुरू के शबद को हर वक्त हृदय में बसाए रखता है। उसका तन विकारों की आग से बचा रहता है। वह (अपने अंदर से) क्रोध दूर कर लेता है। अहंकार को मार के वह मनुष्य (गुरू-शबद में) लीन रहता है। 15। हे भाई ! नानक ये विनती करता है (कि) मालिक प्रभू सदा कायम रहने वाला है। उसकी महिमा (वडिआई) भी सदा कायम रहने वाली है। किसी विरले मनुष्य ने गुरू की कृपा से (मालिक प्रभू की वडिआई करने की दाति) प्राप्त की है (जिसने प्राप्त की है वह) हर वक्त परमात्मा के नाम में लीन रहता है। 16। 1। 23।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਨਦਰੀ ਭਗਤਾ ਲੈਹੁ ਮਿਲਾਏ ॥
ਭਗਤ ਸਲਾਹਨਿ ਸਦਾ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਤਉ ਸਰਣਾਈ ਉਬਰਹਿ ਕਰਤੇ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥੧॥
ਪੂਰੈ ਸਬਦਿ ਭਗਤਿ ਸੁਹਾਈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸੁਖੁ ਤੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਈ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਸਚੀ ਭਗਤੀ ਰਾਤਾ ਸਚੇ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥੨॥
ਹਉਮੈ ਵਿਚਿ ਸਦ ਜਲੈ ਸਰੀਰਾ ॥
ਕਰਮੁ ਹੋਵੈ ਭੇਟੇ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਅਗਿਆਨੁ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਏ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੩॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅੰਧਾ ਅੰਧੁ ਕਮਾਏ ॥
ਬਹੁ ਸੰਕਟ ਜੋਨੀ ਭਰਮਾਏ ॥
ਜਮ ਕਾ ਜੇਵੜਾ ਕਦੇ ਨ ਕਾਟੈ ਅੰਤੇ ਬਹੁ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥
ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਰਖੈ ਉਰ ਧਾਰੇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਮਨੁ ਮਾਰੇ ਹਉਮੈ ਜਾਇ ਸਮਾਇਆ ॥੫॥
ਆਵਣ ਜਾਣੈ ਪਰਜ ਵਿਗੋਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਥਿਰੁ ਕੋਇ ਨ ਹੋਈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਜੋਤਿ ਸਬਦਿ ਸੁਖੁ ਵਸਿਆ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥੬॥
ਪੰਚ ਦੂਤ ਚਿਤਵਹਿ ਵਿਕਾਰਾ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਕਾ ਏਹੁ ਪਸਾਰਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਤਾ ਮੁਕਤੁ ਹੋਵੈ ਪੰਚ ਦੂਤ ਵਸਿ ਆਇਆ ॥੭॥
ਬਾਝੁ ਗੁਰੂ ਹੈ ਮੋਹੁ ਗੁਬਾਰਾ ॥
ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਡੁਬੈ ਵਾਰੋ ਵਾਰਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਸਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥੮॥
ਸਾਚਾ ਦਰੁ ਸਾਚਾ ਦਰਵਾਰਾ ॥
ਸਚੇ ਸੇਵਹਿ ਸਬਦਿ ਪਿਆਰਾ ॥
ਸਚੀ ਧੁਨਿ ਸਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਸਚੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇਆ ॥੯॥
ਘਰੈ ਅੰਦਰਿ ਕੋ ਘਰੁ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਓਥੈ ਸੋਗੁ ਵਿਜੋਗੁ ਨ ਵਿਆਪੈ ਸਹਜੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਇਆ ॥੧੦॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਦੁਸਟਾ ਕਾ ਵਾਸਾ ॥
ਭਉਦੇ ਫਿਰਹਿ ਬਹੁ ਮੋਹ ਪਿਆਸਾ ॥
ਕੁਸੰਗਤਿ ਬਹਹਿ ਸਦਾ ਦੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਦੁਖੋ ਦੁਖੁ ਕਮਾਇਆ ॥੧੧॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਸੰਗਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੇ ਪਾਰੁ ਨ ਪਾਏ ਕੋਈ ॥
ਸਹਜੇ ਗੁਣ ਰਵਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥੧੨॥
ਕਾਇਆ ਬਿਰਖੁ ਪੰਖੀ ਵਿਚਿ ਵਾਸਾ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਚੁਗਹਿ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਸਾ ॥
ਉਡਹਿ ਨ ਮੂਲੇ ਨ ਆਵਹਿ ਨ ਜਾਹੀ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਪਾਇਆ ॥੧੩॥
ਕਾਇਆ ਸੋਧਹਿ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਹਿ ॥
ਮੋਹ ਠਗਉਰੀ ਭਰਮੁ ਨਿਵਾਰਹਿ ॥
ਆਪੇ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਸੁਖਦਾਤਾ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥੧੪॥
मारू महला ३ ॥
नदरी भगता लैहु मिलाए ॥
भगत सलाहनि सदा लिव लाए ॥
तउ सरणाई उबरहि करते आपे मेलि मिलाइआ ॥१॥
पूरै सबदि भगति सुहाई ॥
अंतरि सुखु तेरै मनि भाई ॥
मनु तनु सची भगती राता सचे सिउ चितु लाइआ ॥२॥
हउमै विचि सद जलै सरीरा ॥
करमु होवै भेटे गुरु पूरा ॥
अंतरि अगिआनु सबदि बुझाए सतिगुर ते सुखु पाइआ ॥३॥
मनमुखु अंधा अंधु कमाए ॥
बहु संकट जोनी भरमाए ॥
जम का जेवड़ा कदे न काटै अंते बहु दुखु पाइआ ॥४॥
आवण जाणा सबदि निवारे ॥
सचु नामु रखै उर धारे ॥
गुर कै सबदि मरै मनु मारे हउमै जाइ समाइआ ॥५॥
आवण जाणै परज विगोई ॥
बिनु सतिगुर थिरु कोइ न होई ॥
अंतरि जोति सबदि सुखु वसिआ जोती जोति मिलाइआ ॥६॥
पंच दूत चितवहि विकारा ॥
माइआ मोह का एहु पसारा ॥
सतिगुरु सेवे ता मुकतु होवै पंच दूत वसि आइआ ॥७॥
बाझु गुरू है मोहु गुबारा ॥
फिरि फिरि डुबै वारो वारा ॥
सतिगुर भेटे सचु द्रिड़ाए सचु नामु मनि भाइआ ॥८॥
साचा दरु साचा दरवारा ॥
सचे सेवहि सबदि पिआरा ॥
सची धुनि सचे गुण गावा सचे माहि समाइआ ॥९॥
घरै अंदरि को घरु पाए ॥
गुर कै सबदे सहजि सुभाए ॥
ओथै सोगु विजोगु न विआपै सहजे सहजि समाइआ ॥१०॥
दूजै भाइ दुसटा का वासा ॥
भउदे फिरहि बहु मोह पिआसा ॥
कुसंगति बहहि सदा दुखु पावहि दुखो दुखु कमाइआ ॥११॥
सतिगुर बाझहु संगति न होई ॥
बिनु सबदे पारु न पाए कोई ॥
सहजे गुण रवहि दिनु राती जोती जोति मिलाइआ ॥१२॥
काइआ बिरखु पंखी विचि वासा ॥
अंम्रितु चुगहि गुर सबदि निवासा ॥
उडहि न मूले न आवहि न जाही निज घरि वासा पाइआ ॥१३॥
काइआ सोधहि सबदु वीचारहि ॥
मोह ठगउरी भरमु निवारहि ॥
आपे क्रिपा करे सुखदाता आपे मेलि मिलाइआ ॥१४॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे करतार ! अपने भक्तों को तू मेहर की निगाह से (अपने चरणों में) जोड़ कर रखता है। (इसलिए) भगत (तेरे चरणों में) सुरति जोड़ के सदा तेरी सिफतसालाह करते रहते हैं। तेरी शरण में रह के वे विकारों से बचे रहते थे। तू खुद ही उनको (गुरू से) मिला के (अपने साथ) जोड़े रखता है। 1। हे करतार ! पूरे (गुरू के) शबद की बरकति से (जिस मनुष्य के अंदर तेरी) भगती निखर आती है। उसके अंदर आत्मिक आनंद बन जाता है। (उस मनुष्य की भगती) तेरे मन को प्यारी लगती है। उस मनुष्य का मन उसका तन तेरी सदा-स्थिर सिफत सालाह में रंगा रहता है। वह तेरे सदा-स्थिर नाम में अपना चिक्त जोड़ के रखता है। 2। हे भाई ! अहंकार (की आग) में (मनुष्य का) शरीर (अंदर-अंदर से) सदा जलता रहता है। (जब प्रभू की) मेहर होती है तो इसको पूरा गुरू मिलता है। वह मनुष्य अपने अंदर बसते अज्ञान को गुरू के शबद से दूर कर लेता है। गुरू से वह आत्मिक आनंद प्राप्त करता है। 3। पर। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (माया के मोह में) अंधा हुआ रहता है। वह सदा अंधों वाला काम ही करता है। (जीवन-यात्रा में सही रास्ते से भटक के) वह अनेकों कष्ट सहता है। और। अनेकों जूनियों में भटकता फिरता है। (वह मनुष्य अपने गले से) आत्मिक मौत के फंदे को कभी नहीं काट सकता। अंत के समय भी वह बहुत दुख पाता है। 4। वह गुरू के शबद की बरकति से जनम-मरण के चक्कर दूर कर लेता है। हे भाई ! जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसाए रखता है। वह मनुष्य गुरू के शबद से स्वै भाव दूर कर लेता है। वह अपने मन को वश में कर लेता है। उसका अहंकार दूर हो जाता है। वह सदा परमात्मा की याद में लीन रहता है। 5। हे भाई ! सृष्टि जनम-मरण के चक्करों में दुखी होती रहती है। गुरू की शरण के बिना (इस चक्कर में से) किसी को भी निजात नहीं मिलती। जिस मनुष्य के अंदर गुरू के शबद से परमात्मा की ज्योति प्रकट हो जाती है। उसके अंदर आत्मिक आनंद आ बसता है। उसकी ज्योति परमात्मा की ज्योति में मिली रहती है। 6। हे भाई ! (कामादिक) पाँच वैरियों के (प्रभाव के) कारण (जीव हर वक्त) विकार चितवते रहते हैं। हर तरफ माया के मोह का प्रभाव बना हुआ है। जब मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। तब (इस मोह के दबाव से) स्वतंत्र होता है। (कामादिक) पाँच वैरी उसके वश में आ जाते हैं। 7। हे भाई ! गुरू के बिना (माया का) मोह (इतना प्रबल रहता) है (कि मनुष्य के जीवन-राह में आत्मिक जीवन की ओर से) घोर अंधकार (बना) रहता है। मनुष्य बार-बार अनेकों वार (मोह के समुंद्र में) डूबता है। जब मनुष्य गुरू को मिल जाता है। तब गुरू सदा-स्थिर हरी-नाम इस के दिल में पक्का कर देता है। (तो फिर) सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम इसको प्यारा लगने लग जाता है। 8। हे भाई ! परमात्मा का दर सदा कायम रहने वाला है। उसका दरबार भी सदा-स्थिर है। जो मनुष्य गुरू के शबद से प्यार करते हैं वह ही उस सदा-स्थिर परमात्मा की सेवा-भक्ति करते हैं। (अगर मेरे पर उसकी मेहर हो तो) मैं (भी) स्थिरता के साथ लगन से उस सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाता रहूँ। (जो मनुष्य गुण गाते हैं वह) सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन रहते हैं। 9। हे भाई ! जो कोई मनुष्य गुरू के शबद की बरकति से अपने हृदय-घर में परमात्मा का ठिकाना पा लेता है। वह आत्मिक अडोलता में प्रेम में टिका रहता है। उस अडोल अवस्था में टिकने से गम जोर नहीं डाल सकता। (प्रभू चरणों से) विछोड़ा जोर नहीं डाल सकता। वह मनुष्य सदा ही आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 10। हे भाई ! कुकर्मी लोग (प्रभू को भुला के) औरों के प्यार में ही मन को जोड़े रखते हैं। बड़े मोह बड़ी तृष्णा के कारण वह भटकते फिरते हैं। (कुकर्मी लोग) सदा बुरी संगति में बैठते हैं और दुख पाते हैं। वे सदा वही कर्म करते हैं जिनमें से सिर्फ दुख ही दुख निकले। 11। हे भाई ! गुरू की शरण के बिना भली संगति नहीं मिल सकती। गुरू के शबद के बिना कोई मनुष्य कुकर्मों (की नदी) का उस पार का किनारा नहीं पा सकता। जो मनुष्य दिन-रात आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। उनकी जिंद परमात्मा की ज्योति में लीन रहती है। 12। हे भाई ! (जैसे रात बसेरे के लिए पक्षी किसी वृक्ष पर आ के टिकते हैं। इसी तरह ये) शरीर (मानो) वृक्ष है। (इस शरीर) में (जीव) पंछी का निवास है। जो जीव-पंछी गुरू के शबद में टिक के आत्मिक जीवन देने वाली नाम की चोग चुगते हैं। वे बिल्कुल बाहर नहीं भटकते। वे जनम-मरण के चक्करों में नहीं पड़ते। वे सदा प्रभू-चरणों में निवास रखते हैं। 13। हे भाई ! जो मनुष्य (अपने) शरीर की पड़ताल करते रहते हैं। गुरू के शबद को हृदय में बसाए रखते हैं। वे मनुष्य मोह की ठग बूटी नहीं खाते। वह मनुष्य (अपने अंदर से) भटकना दूर कर लेते हैं। पर। हे भाई ! (ये) कृपा सुखों को देने वाला परमात्मा स्वयं ही करता है। वह स्वयं ही (उन्हें गुरू से) मिला के (अपने चरणों में) जोड़ता है। 14।

संदर्भ: यह अंग 1068 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Nizamuddin dargah के बाहर qawwali सुनते-सुनते।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 48 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1068” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1069 →, पीछे का: ← अंग 1067

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।