अंग 1081

अंग
1081
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਾਇਆ ਪਾਤ੍ਰੁ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰਣੈਹਾਰਾ ॥
ਲਗੀ ਲਾਗਿ ਸੰਤ ਸੰਗਾਰਾ ॥
ਨਿਰਮਲ ਸੋਇ ਬਣੀ ਹਰਿ ਬਾਣੀ ਮਨੁ ਨਾਮਿ ਮਜੀਠੈ ਰੰਗਨਾ ॥੧੫॥
ਸੋਲਹ ਕਲਾ ਸੰਪੂਰਨ ਫਲਿਆ ॥
ਅਨਤ ਕਲਾ ਹੋਇ ਠਾਕੁਰੁ ਚੜਿਆ ॥
ਅਨਦ ਬਿਨੋਦ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸੁਖ ਨਾਨਕ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਹਰਿ ਭੁੰਚਨਾ ॥੧੬॥੨॥੯॥
काइआ पात्रु प्रभु करणैहारा ॥
लगी लागि संत संगारा ॥
निरमल सोइ बणी हरि बाणी मनु नामि मजीठै रंगना ॥१५॥
सोलह कला संपूरन फलिआ ॥
अनत कला होइ ठाकुरु चड़िआ ॥
अनद बिनोद हरि नामि सुख नानक अंम्रित रसु हरि भुंचना ॥१६॥२॥९॥

हिन्दी अर्थ: समर्थ प्रभू उसके शरीर को (नाम की दाति हासिल करने के लिए) योग्य बर्तन बना देता है। हे भाई ! जिस मनुष्य को साध-संगति में छूह लग जाती है। परमात्मा की सिफत-सालाह वाली बाणी के द्वारा उस मनुष्य की अच्छी शोभा बन जाती है। उसका मन मजीठ (के पक्के रंग जैसे) नाम-रंग में रंगा जाता है। 15। उसका जीवन पूरी तौर पर सफल हो जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय-आकाश में बेअंत ताकतों वाला प्रभू-सूर्य चढ़ जाता है (प्रभू प्रकट हो जाता है)। हे नानक ! हरी-नाम की बरकति से उस मनुष्य के अंदर आनंद व खुशियों के सुख बने रहते हैं। वह मनुष्य सदा आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-रस भोगता रहता है। 16। 2। 9।
ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਤੂ ਸਾਹਿਬੁ ਹਉ ਸੇਵਕੁ ਕੀਤਾ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤੇਰਾ ਦੀਤਾ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਸਭੁ ਤੂਹੈ ਤੂਹੈ ਹੈ ਨਾਹੀ ਕਿਛੁ ਅਸਾੜਾ ॥੧॥
ਤੁਮਹਿ ਪਠਾਏ ਤਾ ਜਗ ਮਹਿ ਆਏ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਣਾ ਸੇ ਕਰਮ ਕਮਾਏ ॥
ਤੁਝ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਕਿਛੂ ਨ ਹੋਆ ਤਾ ਭੀ ਨਾਹੀ ਕਿਛੁ ਕਾੜਾ ॥੨॥
ਊਹਾ ਹੁਕਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ਸੁਣੀਐ ॥
ਈਹਾ ਹਰਿ ਜਸੁ ਤੇਰਾ ਭਣੀਐ ॥
ਆਪੇ ਲੇਖ ਅਲੇਖੈ ਆਪੇ ਤੁਮ ਸਿਉ ਨਾਹੀ ਕਿਛੁ ਝਾੜਾ ॥੩॥
ਤੂ ਪਿਤਾ ਸਭਿ ਬਾਰਿਕ ਥਾਰੇ ॥
ਜਿਉ ਖੇਲਾਵਹਿ ਤਿਉ ਖੇਲਣਹਾਰੇ ॥
ਉਝੜ ਮਾਰਗੁ ਸਭੁ ਤੁਮ ਹੀ ਕੀਨਾ ਚਲੈ ਨਾਹੀ ਕੋ ਵੇਪਾੜਾ ॥੪॥
ਇਕਿ ਬੈਸਾਇ ਰਖੇ ਗ੍ਰਿਹ ਅੰਤਰਿ ॥
ਇਕਿ ਪਠਾਏ ਦੇਸ ਦਿਸੰਤਰਿ ॥
ਇਕ ਹੀ ਕਉ ਘਾਸੁ ਇਕ ਹੀ ਕਉ ਰਾਜਾ ਇਨ ਮਹਿ ਕਹੀਐ ਕਿਆ ਕੂੜਾ ॥੫॥
ਕਵਨ ਸੁ ਮੁਕਤੀ ਕਵਨ ਸੁ ਨਰਕਾ ॥
ਕਵਨੁ ਸੈਸਾਰੀ ਕਵਨੁ ਸੁ ਭਗਤਾ ॥
ਕਵਨ ਸੁ ਦਾਨਾ ਕਵਨੁ ਸੁ ਹੋਛਾ ਕਵਨ ਸੁ ਸੁਰਤਾ ਕਵਨੁ ਜੜਾ ॥੬॥
ਹੁਕਮੇ ਮੁਕਤੀ ਹੁਕਮੇ ਨਰਕਾ ॥
ਹੁਕਮਿ ਸੈਸਾਰੀ ਹੁਕਮੇ ਭਗਤਾ ॥
ਹੁਕਮੇ ਹੋਛਾ ਹੁਕਮੇ ਦਾਨਾ ਦੂਜਾ ਨਾਹੀ ਅਵਰੁ ਧੜਾ ॥੭॥
ਸਾਗਰੁ ਕੀਨਾ ਅਤਿ ਤੁਮ ਭਾਰਾ ॥
ਇਕਿ ਖੜੇ ਰਸਾਤਲਿ ਕਰਿ ਮਨਮੁਖ ਗਾਵਾਰਾ ॥
ਇਕਨਾ ਪਾਰਿ ਲੰਘਾਵਹਿ ਆਪੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਜਿਨ ਕਾ ਸਚੁ ਬੇੜਾ ॥੮॥
ਕਉਤਕੁ ਕਾਲੁ ਇਹੁ ਹੁਕਮਿ ਪਠਾਇਆ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਓਪਾਇ ਸਮਾਇਆ ॥
ਵੇਖੈ ਵਿਗਸੈ ਸਭਿ ਰੰਗ ਮਾਣੇ ਰਚਨੁ ਕੀਨਾ ਇਕੁ ਆਖਾੜਾ ॥੯॥
ਵਡਾ ਸਾਹਿਬੁ ਵਡੀ ਨਾਈ ॥
ਵਡ ਦਾਤਾਰੁ ਵਡੀ ਜਿਸੁ ਜਾਈ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਬੇਅੰਤ ਅਤੋਲਾ ਹੈ ਨਾਹੀ ਕਿਛੁ ਆਹਾੜਾ ॥੧੦॥
ਕੀਮਤਿ ਕੋਇ ਨ ਜਾਣੈ ਦੂਜਾ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਨਿਰੰਜਨ ਪੂਜਾ ॥
ਆਪਿ ਸੁ ਗਿਆਨੀ ਆਪਿ ਧਿਆਨੀ ਆਪਿ ਸਤਵੰਤਾ ਅਤਿ ਗਾੜਾ ॥੧੧॥
ਕੇਤੜਿਆ ਦਿਨ ਗੁਪਤੁ ਕਹਾਇਆ ॥
ਕੇਤੜਿਆ ਦਿਨ ਸੁੰਨਿ ਸਮਾਇਆ ॥
ਕੇਤੜਿਆ ਦਿਨ ਧੁੰਧੂਕਾਰਾ ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਪਰਗਟੜਾ ॥੧੨॥
ਆਪੇ ਸਕਤੀ ਸਬਲੁ ਕਹਾਇਆ ॥
मारू सोलहे महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तू साहिबु हउ सेवकु कीता ॥
जीउ पिंडु सभु तेरा दीता ॥
करन करावन सभु तूहै तूहै है नाही किछु असाड़ा ॥१॥
तुमहि पठाए ता जग महि आए ॥
जो तुधु भाणा से करम कमाए ॥
तुझ ते बाहरि किछू न होआ ता भी नाही किछु काड़ा ॥२॥
ऊहा हुकमु तुमारा सुणीऐ ॥
ईहा हरि जसु तेरा भणीऐ ॥
आपे लेख अलेखै आपे तुम सिउ नाही किछु झाड़ा ॥३॥
तू पिता सभि बारिक थारे ॥
जिउ खेलावहि तिउ खेलणहारे ॥
उझड़ मारगु सभु तुम ही कीना चलै नाही को वेपाड़ा ॥४॥
इकि बैसाइ रखे ग्रिह अंतरि ॥
इकि पठाए देस दिसंतरि ॥
इक ही कउ घासु इक ही कउ राजा इन महि कहीऐ किआ कूड़ा ॥५॥
कवन सु मुकती कवन सु नरका ॥
कवनु सैसारी कवनु सु भगता ॥
कवन सु दाना कवनु सु होछा कवन सु सुरता कवनु जड़ा ॥६॥
हुकमे मुकती हुकमे नरका ॥
हुकमि सैसारी हुकमे भगता ॥
हुकमे होछा हुकमे दाना दूजा नाही अवरु धड़ा ॥७॥
सागरु कीना अति तुम भारा ॥
इकि खड़े रसातलि करि मनमुख गावारा ॥
इकना पारि लंघावहि आपे सतिगुरु जिन का सचु बेड़ा ॥८॥
कउतकु कालु इहु हुकमि पठाइआ ॥
जीअ जंत ओपाइ समाइआ ॥
वेखै विगसै सभि रंग माणे रचनु कीना इकु आखाड़ा ॥९॥
वडा साहिबु वडी नाई ॥
वड दातारु वडी जिसु जाई ॥
अगम अगोचरु बेअंत अतोला है नाही किछु आहाड़ा ॥१०॥
कीमति कोइ न जाणै दूजा ॥
आपे आपि निरंजन पूजा ॥
आपि सु गिआनी आपि धिआनी आपि सतवंता अति गाड़ा ॥११॥
केतड़िआ दिन गुपतु कहाइआ ॥
केतड़िआ दिन सुंनि समाइआ ॥
केतड़िआ दिन धुंधूकारा आपे करता परगटड़ा ॥१२॥
आपे सकती सबलु कहाइआ ॥

हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला ५ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे प्रभू ! तू (मेरा) मालिक है। मैं तेरा (पैदा) किया हुआ सेवक हूँ। ये जिंद ये शरीर सब कुछ तेरा ही दिया हुआ है। हे प्रभू ! (जगत में) सब कुछ करने वाला तू ही है (जीवों से) करवाने वाला भी तू ही है। हम जीवों का कोई जोर नहीं चल सकता। 1। हे प्रभू ! तू ही (जीवों को) भेजता है। तो (ये) जगत में आते हैं। जो तुझे अच्छा लगता है। उसी तरह के कर्म जीव करते हैं। हे प्रभू ! तेरे हुकम से बाहर कुछ भी नहीं हो सकता। इतना बड़ा पसारा होते हुए भी तुझे कोई फिक्र नहीं। 2। हे प्रभू ! परलोक में भी तेरा (ही) हुकम (चल रहा) सुना जा रहा है। इस लोक में भी तेरी ही सिफत-सालाह उचारी जा रही है। हे प्रभू ! तू स्वयं ही (जीवों के किए कर्मों के) लेखे (लिखने वाला) है। तू आप ही लेखे से बाहर है। तेरे साथ (जीव) कोई झगड़ा नहीं डाल सकते। 3। हे प्रभू ! तू (सब जीवों का) पिता है। सारे (जीव) तेरे बच्चे हैं। जैसे तू (इन बच्चों को) खेलाता है। वैसे ही ये खेल रहे हैं। हे प्रभू ! गलत रास्ता और ठीक रास्ता सब कुछ तूने स्वयं ही बनाया हुआ है। कोई भी जीव (अपने आप) गलत रास्ते पर चल नहीं सकता। 4। हे प्रभू ! कई जीव ऐसे हैं जिन्हें तूने घर में बैठाया हुआ है। कई ऐसे हैं जिनकों और-और देशों में भेजता है। कई जीवों को तूने घास काटने पर लगा दिया है। कईयों को तूने राजे बना दिया है। तेरे इन कामों में किसी काम को गलत नहीं कहा जा सकता। 5। हे प्रभू ! तेरे हुकम से बाहर ना कोई मुक्ति है ना कोई नर्क है। तेरे हुकम के बिना ना कोई गृहस्ती है ना कोई भक्त बन सकता है। ना कोई बड़े जिगरे वाला है ना कोई होछे स्वभाव वाला है। तेरे हुकम के बिना ना कोई ऊँची सूझ वाला है ना कोई मूर्ख है। 6। हे प्रभू ! तेरे ही हुकम में (किसी को) मूक्ति (मिलती) है। तेरे ही हुकम में (किसी को) नर्क (मिलता) है। तेरे ही हुकम में कोई गृहस्ती है और कोई भगत है। हे प्रभू ! तेरे ही हुकम में कोई जल्दबाज स्वभाव और कोई गंभीर स्वभाव वाला है। तेरे मुकाबले पर और कोई धड़ा है ही नहीं। 7। हे प्रभू ! यह बेअंत बड़ा संसार-समुंद्र तूने स्वयं ही बनाया है। (यहाँ) कई जीवों को मन के मुरीद-मूर्ख बना के तू स्वयं ही नर्क में डालता है। कई जीवों को तूने खुद ही (इस संसार-समुंद्र से) पार लंधा लेता है। जिनके लिए तू गुरू को सदा कायम रहने वाला जहाज बना देता है। 8। हे भाई ! यह काल (मौत। जो प्रभू का बनाया एक) खिलौना (ही है। उसने अपने) हुकम अनुसार (जगत में) भेजा है। (प्रभू आप ही) सारे जीवों को पैदा करके खत्म कर देता है। (प्रभू आप ही इस तमाशे को) देख रहा है (और देख-देख के) खुश हो रहा है। (सब जीवों में व्यापक हो के स्वयं ही) सारे रंग भोग रहा है। इस जगत-रचना को उसने एक अखाड़ा बनाया हुआ है। 9। हे भाई ! वह मालिक प्रभू (बहुत) बड़ा है। उसकी वडिआई (भी बहुत) बड़ी है। वह बहुत बड़ा दाता है। उसकी जगह (जहाँ वह रहता है बहुत) बड़ी है। वह अपहुँच है। ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे हैं। बेअंत है। तोला नहीं जा सकता। उसके तोलने के लिए कोई भी माप-तोल नहीं। 10। हे भाई ! और कोई भी जीव उसका मूल्य नहीं डाल सकता। वह निर्लिप प्रभू अपने बराबर का खुद ही है। वह आप ही अपने आप को जानने वाला है। आप ही अपने आप में समाधि लगाने वाला है। वह बहुत ही उच्च आचरण वाला है। 11। हे भाई ! (अब जगत बनने पर ज्ञानी लोग) कहते हैं कि बेअंत समय वह गुप्त ही रहा। बेअंत समय वह शून्य अवस्था में टिका रहा। बेअंत वक्त तक एक ऐसी अवस्था बनी रही जो जीवों की समझ से परे है। फिर उसने स्वयं ही अपने आप को (जगत के रूप में) प्रकट कर लिया। 12। हे भाई ! बलवान परमात्मा स्वयं ही (अपने आप को) माया कहलवा रहा है।

संदर्भ: यह अंग 1081 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Jor Bagh metro station से Khan Market की 10-मिनट की walk में मन का थमना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1081” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1082 →, पीछे का: ← अंग 1080

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।