अंग
1069
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਦ ਹੀ ਨੇੜੈ ਦੂਰਿ ਨ ਜਾਣਹੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਨਜੀਕਿ ਪਛਾਣਹੁ ॥
ਬਿਗਸੈ ਕਮਲੁ ਕਿਰਣਿ ਪਰਗਾਸੈ ਪਰਗਟੁ ਕਰਿ ਦੇਖਾਇਆ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਸਚਾ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਮਾਰਿ ਜੀਵਾਲੇ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੧੬॥੨॥੨੪॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਨਜੀਕਿ ਪਛਾਣਹੁ ॥
ਬਿਗਸੈ ਕਮਲੁ ਕਿਰਣਿ ਪਰਗਾਸੈ ਪਰਗਟੁ ਕਰਿ ਦੇਖਾਇਆ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਸਚਾ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਮਾਰਿ ਜੀਵਾਲੇ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੧੬॥੨॥੨੪॥
सद ही नेड़ै दूरि न जाणहु ॥
गुर कै सबदि नजीकि पछाणहु ॥
बिगसै कमलु किरणि परगासै परगटु करि देखाइआ ॥१५॥
आपे करता सचा सोई ॥
आपे मारि जीवाले अवरु न कोई ॥
नानक नामु मिलै वडिआई आपु गवाइ सुखु पाइआ ॥१६॥२॥२४॥
गुर कै सबदि नजीकि पछाणहु ॥
बिगसै कमलु किरणि परगासै परगटु करि देखाइआ ॥१५॥
आपे करता सचा सोई ॥
आपे मारि जीवाले अवरु न कोई ॥
नानक नामु मिलै वडिआई आपु गवाइ सुखु पाइआ ॥१६॥२॥२४॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा सदा ही (हमारे) नजदीक रहता है। उसको (कभी भी अपने से) दूर ना समझो। गुरू के शबद में जुड़ के उसको अपने अंग-संग बसता देखो। हे भाई ! (जो मनुष्य परमात्मा को अपने साथ बसता देखता है उसका हृदय-) कमल फूल खिला रहता है। (उसके अंदर ईश्वरीय ज्योति की) किरण (आत्मिक जीवन का) प्रकाश कर देती है। (गुरू उस मनुष्य को परमात्मा) प्रत्यक्ष करके दिखा देता है। 15। हे नानक ! वह करतार स्वयं ही सदा कायम रहने वाला है। वह स्वयं ही मार के जीवित करता है (भाव। मारता भी खुद ही है। पैदा भी करता खुद ही है)। उसके बिना कोई और ऐसी समर्थता वाला है ही नहीं। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम मिल जाता है उसको (लोक-परलोक की) शोभा मिल जाती है। वह मनुष्य (अपने अंदर से) स्वै-भाव दूर कर के आत्मिक आनंद लेता रहता है। 16। 2। 24।
ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ਮਹਲਾ ੪
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਚਾ ਆਪਿ ਸਵਾਰਣਹਾਰਾ ॥
ਅਵਰ ਨ ਸੂਝਸਿ ਬੀਜੀ ਕਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਵਸੈ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਸਹਜੇ ਸਚਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਸਭਨਾ ਸਚੁ ਵਸੈ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਹਜਿ ਸਮਾਹੀ ॥
ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਕਰਤ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਈ ਹੇ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਹੈ ਗਿਆਨੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਹੈ ਪੂਜਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੀ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਨਾਮੁ ਰਤਨ ਧਨੁ ਪਾਇਆ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਭਾਈ ਹੇ ॥੩॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਜੋ ਦੂਜੈ ਲਾਗੇ ॥
ਆਵਹਿ ਜਾਹਿ ਭ੍ਰਮਿ ਮਰਹਿ ਅਭਾਗੇ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਕੀ ਫਿਰਿ ਗਤਿ ਹੋਵੈ ਜਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਹਹਿ ਸਰਣਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਦਾ ਹੈ ਸਾਚੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਮਾਗਉ ਨਾਮੁ ਅਜਾਚੀ ॥
ਹੋਹੁ ਦਇਆਲੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਰਖਿ ਲੇਵਹੁ ਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਹੇ ॥੫॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਚੁਆਇਆ ॥
ਦਸਵੈ ਦੁਆਰਿ ਪ੍ਰਗਟੁ ਹੋਇ ਆਇਆ ॥
ਤਹ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਵਜਹਿ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ਸਹਜੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੬॥
ਜਿਨ ਕਉ ਕਰਤੈ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿ ਪਾਈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਕਰਤ ਵਿਹਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕੋ ਸੀਝੈ ਨਾਹੀ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਈ ਹੇ ॥੭॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਆਪੇ ਦੇਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਲੇਇ ॥
ਆਪੇ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਨਾਮੁ ਦੇਵੈ ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੮॥
ਗਿਆਨ ਰਤਨੁ ਮਨਿ ਪਰਗਟੁ ਭਇਆ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਸਹਜੇ ਲਇਆ ॥
ਏਹ ਵਡਿਆਈ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈ ਸਤਿਗੁਰ ਕਉ ਸਦ ਬਲਿ ਜਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਪ੍ਰਗਟਿਆ ਸੂਰੁ ਨਿਸਿ ਮਿਟਿਆ ਅੰਧਿਆਰਾ ॥
ਅਗਿਆਨੁ ਮਿਟਿਆ ਗੁਰ ਰਤਨਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਰਤਨੁ ਅਤਿ ਭਾਰੀ ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਸੁਖੁ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਗਟੀ ਹੈ ਸੋਇ ॥
ਚਹੁ ਜੁਗਿ ਨਿਰਮਲੁ ਹਛਾ ਲੋਇ ॥
ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਨਾਮਿ ਰਹਿਆ ਲਿਵ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਵੈ ॥
ਸਹਜੇ ਜਾਗੈ ਸਹਜੇ ਸੋਵੈ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਚਾ ਆਪਿ ਸਵਾਰਣਹਾਰਾ ॥
ਅਵਰ ਨ ਸੂਝਸਿ ਬੀਜੀ ਕਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਵਸੈ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਸਹਜੇ ਸਚਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਸਭਨਾ ਸਚੁ ਵਸੈ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਹਜਿ ਸਮਾਹੀ ॥
ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਕਰਤ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਈ ਹੇ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਹੈ ਗਿਆਨੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਹੈ ਪੂਜਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੀ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਨਾਮੁ ਰਤਨ ਧਨੁ ਪਾਇਆ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਭਾਈ ਹੇ ॥੩॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਜੋ ਦੂਜੈ ਲਾਗੇ ॥
ਆਵਹਿ ਜਾਹਿ ਭ੍ਰਮਿ ਮਰਹਿ ਅਭਾਗੇ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਕੀ ਫਿਰਿ ਗਤਿ ਹੋਵੈ ਜਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਹਹਿ ਸਰਣਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਦਾ ਹੈ ਸਾਚੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਮਾਗਉ ਨਾਮੁ ਅਜਾਚੀ ॥
ਹੋਹੁ ਦਇਆਲੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਰਖਿ ਲੇਵਹੁ ਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਹੇ ॥੫॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਚੁਆਇਆ ॥
ਦਸਵੈ ਦੁਆਰਿ ਪ੍ਰਗਟੁ ਹੋਇ ਆਇਆ ॥
ਤਹ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਵਜਹਿ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ਸਹਜੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੬॥
ਜਿਨ ਕਉ ਕਰਤੈ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿ ਪਾਈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਕਰਤ ਵਿਹਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕੋ ਸੀਝੈ ਨਾਹੀ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਈ ਹੇ ॥੭॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਆਪੇ ਦੇਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਲੇਇ ॥
ਆਪੇ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਨਾਮੁ ਦੇਵੈ ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੮॥
ਗਿਆਨ ਰਤਨੁ ਮਨਿ ਪਰਗਟੁ ਭਇਆ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਸਹਜੇ ਲਇਆ ॥
ਏਹ ਵਡਿਆਈ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈ ਸਤਿਗੁਰ ਕਉ ਸਦ ਬਲਿ ਜਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਪ੍ਰਗਟਿਆ ਸੂਰੁ ਨਿਸਿ ਮਿਟਿਆ ਅੰਧਿਆਰਾ ॥
ਅਗਿਆਨੁ ਮਿਟਿਆ ਗੁਰ ਰਤਨਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਰਤਨੁ ਅਤਿ ਭਾਰੀ ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਸੁਖੁ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਗਟੀ ਹੈ ਸੋਇ ॥
ਚਹੁ ਜੁਗਿ ਨਿਰਮਲੁ ਹਛਾ ਲੋਇ ॥
ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਨਾਮਿ ਰਹਿਆ ਲਿਵ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਵੈ ॥
ਸਹਜੇ ਜਾਗੈ ਸਹਜੇ ਸੋਵੈ ॥
मारू सोलहे महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सचा आपि सवारणहारा ॥
अवर न सूझसि बीजी कारा ॥
गुरमुखि सचु वसै घट अंतरि सहजे सचि समाई हे ॥१॥
सभना सचु वसै मन माही ॥
गुर परसादी सहजि समाही ॥
गुरु गुरु करत सदा सुखु पाइआ गुर चरणी चितु लाई हे ॥२॥
सतिगुरु है गिआनु सतिगुरु है पूजा ॥
सतिगुरु सेवी अवरु न दूजा ॥
सतिगुर ते नामु रतन धनु पाइआ सतिगुर की सेवा भाई हे ॥३॥
बिनु सतिगुर जो दूजै लागे ॥
आवहि जाहि भ्रमि मरहि अभागे ॥
नानक तिन की फिरि गति होवै जि गुरमुखि रहहि सरणाई हे ॥४॥
गुरमुखि प्रीति सदा है साची ॥
सतिगुर ते मागउ नामु अजाची ॥
होहु दइआलु क्रिपा करि हरि जीउ रखि लेवहु गुर सरणाई हे ॥५॥
अंम्रित रसु सतिगुरू चुआइआ ॥
दसवै दुआरि प्रगटु होइ आइआ ॥
तह अनहद सबद वजहि धुनि बाणी सहजे सहजि समाई हे ॥६॥
जिन कउ करतै धुरि लिखि पाई ॥
अनदिनु गुरु गुरु करत विहाई ॥
बिनु सतिगुर को सीझै नाही गुर चरणी चितु लाई हे ॥७॥
जिसु भावै तिसु आपे देइ ॥
गुरमुखि नामु पदारथु लेइ ॥
आपे क्रिपा करे नामु देवै नानक नामि समाई हे ॥८॥
गिआन रतनु मनि परगटु भइआ ॥
नामु पदारथु सहजे लइआ ॥
एह वडिआई गुर ते पाई सतिगुर कउ सद बलि जाई हे ॥९॥
प्रगटिआ सूरु निसि मिटिआ अंधिआरा ॥
अगिआनु मिटिआ गुर रतनि अपारा ॥
सतिगुर गिआनु रतनु अति भारी करमि मिलै सुखु पाई हे ॥१०॥
गुरमुखि नामु प्रगटी है सोइ ॥
चहु जुगि निरमलु हछा लोइ ॥
नामे नामि रते सुखु पाइआ नामि रहिआ लिव लाई हे ॥११॥
गुरमुखि नामु परापति होवै ॥
सहजे जागै सहजे सोवै ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सचा आपि सवारणहारा ॥
अवर न सूझसि बीजी कारा ॥
गुरमुखि सचु वसै घट अंतरि सहजे सचि समाई हे ॥१॥
सभना सचु वसै मन माही ॥
गुर परसादी सहजि समाही ॥
गुरु गुरु करत सदा सुखु पाइआ गुर चरणी चितु लाई हे ॥२॥
सतिगुरु है गिआनु सतिगुरु है पूजा ॥
सतिगुरु सेवी अवरु न दूजा ॥
सतिगुर ते नामु रतन धनु पाइआ सतिगुर की सेवा भाई हे ॥३॥
बिनु सतिगुर जो दूजै लागे ॥
आवहि जाहि भ्रमि मरहि अभागे ॥
नानक तिन की फिरि गति होवै जि गुरमुखि रहहि सरणाई हे ॥४॥
गुरमुखि प्रीति सदा है साची ॥
सतिगुर ते मागउ नामु अजाची ॥
होहु दइआलु क्रिपा करि हरि जीउ रखि लेवहु गुर सरणाई हे ॥५॥
अंम्रित रसु सतिगुरू चुआइआ ॥
दसवै दुआरि प्रगटु होइ आइआ ॥
तह अनहद सबद वजहि धुनि बाणी सहजे सहजि समाई हे ॥६॥
जिन कउ करतै धुरि लिखि पाई ॥
अनदिनु गुरु गुरु करत विहाई ॥
बिनु सतिगुर को सीझै नाही गुर चरणी चितु लाई हे ॥७॥
जिसु भावै तिसु आपे देइ ॥
गुरमुखि नामु पदारथु लेइ ॥
आपे क्रिपा करे नामु देवै नानक नामि समाई हे ॥८॥
गिआन रतनु मनि परगटु भइआ ॥
नामु पदारथु सहजे लइआ ॥
एह वडिआई गुर ते पाई सतिगुर कउ सद बलि जाई हे ॥९॥
प्रगटिआ सूरु निसि मिटिआ अंधिआरा ॥
अगिआनु मिटिआ गुर रतनि अपारा ॥
सतिगुर गिआनु रतनु अति भारी करमि मिलै सुखु पाई हे ॥१०॥
गुरमुखि नामु प्रगटी है सोइ ॥
चहु जुगि निरमलु हछा लोइ ॥
नामे नामि रते सुखु पाइआ नामि रहिआ लिव लाई हे ॥११॥
गुरमुखि नामु परापति होवै ॥
सहजे जागै सहजे सोवै ॥
हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला ४ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! सदा कायम रहने वाला परमात्मा स्वयं ही उसका जीवन सुंदर बनाने की समर्थता रखता है। उसको (प्रभू की याद के बिना) कोई और दूसरी कार नहीं सूझती। पर। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसके हृदय में सदा कायम रहने वाला परमात्मा आ बसता है। वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। वह सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 1। हे भाई ! (वैसे तो) सदा-स्थिर प्रभू सब जीवों के मन में बसता है। पर गुरू की कृपा से ही (जीव) आत्मिक अडोलता में (टिक के प्रभू में) लीन होते हैं। गुरू को हर वक्त याद करते हुए मनुष्य आत्मिक आनंद पाता है। गुरू के चरणों में चिक्त जोड़े रखता है। 2। हे भाई ! गुरू आत्मिक जीवन की सूझ (देने वाला) है। गुरू परमात्मा की (भगती (सिखाने वाला) है। मैं तो गुरू की ही शरण पड़ता हूँ। कोई और दूसरा (मैं अपने मन में) नहीं (लाता)। मैंने गुरू से श्रेष्ठ नाम-धन पाया है। मुझे गुरू की (बताई हुई) सेवा अच्छी लगती है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू को छोड़ के और तरफ लगते हैं। वह अभागे व्यक्ति भटकना में पड़ कर आत्मिक मौत सहेड़ते हैं। वे जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। हे नानक ! (कह-) उन मनुष्यों की ही फिर ऊँची आत्मिक अवस्था बनती है जो गुरू की शरण पड़ते हैं। 4। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसकी प्रभू से प्रीति पक्की होती है। (वह हर समय इस प्रकार अरदास करता रहता है-) मैं गुरू से (तेरा) अमूल्य नाम माँगता हूँ। हे हरी ! दयावान हो। कृपा कर। मुझे गुरू की शरण में रख। 5। हे भाई ! गुरू (जिस मनुष्य के हृदय में) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पैदा करता है। (परमात्मा) उसके सोच-मंडल में प्रकट हो जाता है। उस अवस्था में उस मनुष्य के अंदर सिफत सालाह की बाणी से (इस प्रकार) आत्मिक आनंद पैदा होता है (जैसे। मानो वहाँ) पाँच किस्मों के साज़ बज रहे हैं। वह मनुष्य हर वक्त आत्मिक आनंद में लीन रहता है। 6। पर। हे भाई ! (आत्मिक आनंद की यह दाति उन्हें ही मिलती है) जिनके भाग्यों में करतार ने धुर दरगाह से लिख के रख दी है। उनकी उम्र सदा गुरू को याद करते हुए बीतती है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना कोई मनुष्य (जिंदगी में) सफल नहीं होता। तू सदा गुरू के चरणों में अपना चिक्त जोड़े रख। 7। हे भाई ! जो जीव उस परमात्मा को प्यारा लगता है उसको वह स्वयं ही (नाम की दाति) देता है। वह मनुष्य गुरू से यह कीमती नाम हासिल करता है। हे नानक ! (कह-) जिसके ऊपर वह प्रभू कृपा करता है उसको अपना नाम देता है। वह मनुष्य नाम में लीन रहता है। 8। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में आत्मिक जीवन की श्रेष्ठ सूझ उभर आई। उसने आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा का कीमती नाम पा लिया। पर यह वडिआई गुरू से (ही) मिलती है। मैं सदा ही गुरू से सदके जाता हूँ। 9। हे भाई ! (जैसे जब) सूरज चढ़ता है (तब) रात का अंधेरा मिट जाता है। (इसी तरह) गुरू के बेअंत कीमती ज्ञान-रत्न से अज्ञान-अंधेरा दूर हो जाता है। हे भाई ! गुरू का (दिया हुआ) ‘ज्ञान रत्न’ बहुत ही कीमती है। परमात्मा की मेहर से जिसको यह मिलता है। वह आत्मिक आनंद पाता है। 10। हे भाई ! गुरू के द्वारा जिसको हरी-नाम प्राप्त होता है। उसकी शोभा पसर जाती है। वह सदा के लिए पवित्र जीवन वाला हो जाता है। वह सारे जगत में अच्छा माना जाता है। हे भाई ! हर वक्त हरी-नाम में रंगे रहने के कारण वह सुख पाता है। वह हरी-नाम में हर वक्त सुरति जोड़े रखता है। 11। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू के द्वारा हरी-नाम हासिल होता है। वह जागता और सोया हुआ हर समय आत्मिक अडोलता में टिका रहता है (आत्मिक अडोलता में जागता है आत्मिक अडोलता में सोता है)।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1069 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
Rajiv Chowk metro station की platform पर 9 PM की भीड़।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 43 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1069” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1070 →, पीछे का: ← अंग 1068।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।