अंग 1021

अंग
1021
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਪੇ ਕਿਸ ਹੀ ਕਸਿ ਬਖਸੇ ਆਪੇ ਦੇ ਲੈ ਭਾਈ ਹੇ ॥੮॥
ਆਪੇ ਧਨਖੁ ਆਪੇ ਸਰਬਾਣਾ ॥
ਆਪੇ ਸੁਘੜੁ ਸਰੂਪੁ ਸਿਆਣਾ ॥
ਕਹਤਾ ਬਕਤਾ ਸੁਣਤਾ ਸੋਈ ਆਪੇ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਪਉਣੁ ਗੁਰੂ ਪਾਣੀ ਪਿਤ ਜਾਤਾ ॥
ਉਦਰ ਸੰਜੋਗੀ ਧਰਤੀ ਮਾਤਾ ॥
ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਦੁਇ ਦਾਈ ਦਾਇਆ ਜਗੁ ਖੇਲੈ ਖੇਲਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਆਪੇ ਮਛੁਲੀ ਆਪੇ ਜਾਲਾ ॥
ਆਪੇ ਗਊ ਆਪੇ ਰਖਵਾਲਾ ॥
ਸਰਬ ਜੀਆ ਜਗਿ ਜੋਤਿ ਤੁਮਾਰੀ ਜੈਸੀ ਪ੍ਰਭਿ ਫੁਰਮਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਆਪੇ ਜੋਗੀ ਆਪੇ ਭੋਗੀ ॥
ਆਪੇ ਰਸੀਆ ਪਰਮ ਸੰਜੋਗੀ ॥
ਆਪੇ ਵੇਬਾਣੀ ਨਿਰੰਕਾਰੀ ਨਿਰਭਉ ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਖਾਣੀ ਬਾਣੀ ਤੁਝਹਿ ਸਮਾਣੀ ॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸਭ ਆਵਣ ਜਾਣੀ ॥
ਸੇਈ ਸਾਹ ਸਚੇ ਵਾਪਾਰੀ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਸਬਦੁ ਬੁਝਾਏ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
ਸਰਬ ਕਲਾ ਸਾਚੇ ਭਰਪੂਰਾ ॥
ਅਫਰਿਓ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਸਦਾ ਤੂ ਨਾ ਤਿਸੁ ਤਿਲੁ ਨ ਤਮਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਕਾਲੁ ਬਿਕਾਲੁ ਭਏ ਦੇਵਾਨੇ ॥
ਸਬਦੁ ਸਹਜ ਰਸੁ ਅੰਤਰਿ ਮਾਨੇ ॥
ਆਪੇ ਮੁਕਤਿ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਵਰਦਾਤਾ ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਮਨਿ ਭਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪਿ ਨਿਰਾਲਮੁ ਗੁਰ ਗਮ ਗਿਆਨਾ ॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਤੁਝ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨਾ ॥
ਨਾਨਕੁ ਨੀਚੁ ਭਿਖਿਆ ਦਰਿ ਜਾਚੈ ਮੈ ਦੀਜੈ ਨਾਮੁ ਵਡਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੧॥
आपे किस ही कसि बखसे आपे दे लै भाई हे ॥८॥
आपे धनखु आपे सरबाणा ॥
आपे सुघड़ु सरूपु सिआणा ॥
कहता बकता सुणता सोई आपे बणत बणाई हे ॥९॥
पउणु गुरू पाणी पित जाता ॥
उदर संजोगी धरती माता ॥
रैणि दिनसु दुइ दाई दाइआ जगु खेलै खेलाई हे ॥१०॥
आपे मछुली आपे जाला ॥
आपे गऊ आपे रखवाला ॥
सरब जीआ जगि जोति तुमारी जैसी प्रभि फुरमाई हे ॥११॥
आपे जोगी आपे भोगी ॥
आपे रसीआ परम संजोगी ॥
आपे वेबाणी निरंकारी निरभउ ताड़ी लाई हे ॥१२॥
खाणी बाणी तुझहि समाणी ॥
जो दीसै सभ आवण जाणी ॥
सेई साह सचे वापारी सतिगुरि बूझ बुझाई हे ॥१३॥
सबदु बुझाए सतिगुरु पूरा ॥
सरब कला साचे भरपूरा ॥
अफरिओ वेपरवाहु सदा तू ना तिसु तिलु न तमाई हे ॥१४॥
कालु बिकालु भए देवाने ॥
सबदु सहज रसु अंतरि माने ॥
आपे मुकति त्रिपति वरदाता भगति भाइ मनि भाई हे ॥१५॥
आपि निरालमु गुर गम गिआना ॥
जो दीसै तुझ माहि समाना ॥
नानकु नीचु भिखिआ दरि जाचै मै दीजै नामु वडाई हे ॥१६॥१॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू स्वयं ही किसी रत्न-जीव को कसवॅटी पर ला के परवान करता है। और हे भाई ! प्रभू स्वयं ही जगत की वणज-व्यापार की कार चला रहा है (रतन देता है और रतन लेता है)। 8। परमात्मा खुद ही धनुष है (खुद ही तीर है) खुद ही तीर-अंदाज है। खुद ही सुचॅजा-सोहाना और सयाना है। हर जगह बोलने वाला सुनने वाला वही खुद ही है जिसने ये जगत रचना रची है। 9। हवा (जो शरीरों के लिए इस तरह है जैसे) गुरू (जीवों की आत्मा के लिए है) प्रभू स्वयं ही है। पानी (जो सब जीवों का) पिता (है। यह भी) प्रभू स्वयं ही है। धरती (जो इसके लिए जीवों की) माँ कहलवाने-योग्य है ये माँ की तरह सब चीजों को अपने पेट में रखती है और पेट में से पैदा करती है- यह भी परमात्मा स्वयं ही है (क्योंकि सब कुछ परमात्मा ने अपने आप से प्रकट किया है)। दिन और रात (जो जीवों के लिए) दोनों खेल खिलाने वाली और खेल खिलाने वाला है (और इनके प्रभाव में) जगत खेल रहा है। यह भी वह स्वयं ही है। यह सारी खेल वह खुद ही खेल रहा है। 10। हे प्रभू ! तू स्वयं ही मछली है और स्वयं ही (मछली फसाने वाला) जाल है। तू खुद ही गाय है और खुद ही गाईयों का रखवाला है। सारे जीवों में सारे जगत में तेरी ही ज्योति मौजूद है। जगत में वही कुछ हो रहा है जैसे प्रभू ने हुकम किया है (हुकम कर रहा है)। 11। (माया से निर्लिप होने के कारण) प्रभू स्वयं ही जोगी है। (और सारे जीवों में व्यापक होने के कारण) खुद ही (सारे पदार्थों को) भोगने वाला है। सबसे बड़े संयोग (मिलाप) के कारण (सब जीवों में रमा होने के कारण) प्रभू स्वयं ही सारे रस माण रहा है। प्रभू स्वयं ही सारे उजाड़ में रहने वाला है। प्रभू स्वयं ही निराकार है। उसको किसी का डर नहीं। वह स्वयं ही अपने स्वरूप में सुरति जोड़ने वाला है। 12। हे प्रभू ! चारों खाणियों के जीव और उनकी बोलियाँ भी तेरे में ही समा जाती हैं। जगत में जो कुछ दिखाई दे रहा है वह पैदा होने मरने के चक्र में है। जिन लोगों को सतिगुरू ने (सही जीवन की) सूझ दी है वही कभी घाटा ना खाने वाले शाह हैं। व्यापारी हैं। 13। हे प्रभू ! (तेरा रूप) पूरा सतिगुरू (तेरी सिफत-सालाह की) बाणी (तेरे पैदा किए हुए जीवों को) समझाता है। हे सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू ! तू सारी ताकतों का मालिक है। तू (अपनी सारी रचना में) हर जगह मौजूद है। कोई जीव तेरे हुकम को मोड़ नहीं सकता। (इतने बड़े पसारे का मालिक हो के भी) तू सदा बेफिक्र है। (हे भाई ! परमात्मा अपने पैदा किए हुए जीवों के लिए सब कुछ करता है। पर) उस को (अपने लिए) कोई रक्ती भर भी लालच नहीं। 14। जनम और मरण उसके नजदीक नहीं फटकते (उसको देख के पागल हो जाते हैं सहम जाते हैं)। (परमात्मा की कृपा से जो मनुष्य) अपने हृदय में उसकी सिफत-सालाह की बाणी बसाता है और आत्मिक अडोलता का रस लेता है। (प्रभू की बख्शी हुई प्रभू-चरनों की) प्रीति से जिस मनुष्य के मन में प्रभू की भक्ति का प्यार जाग उठता है। उसको प्रभू (स्वयं ही विकारों से) निजात देने वाला है स्वयं ही (माया की तृष्णा से) तृप्ति देने वाला है। और स्वयं ही सब बख्शिशें करने वाला है। 15। हे प्रभू ! (इतना बेअंत जगत रच के) तू स्वयं (इसके मोह से) निर्लिप है। हे प्रभू ! (तेरे रूप) गुरू के द्वारा ही तेरे साथ जान-पहचान हो सकती है। (जगत में) जो कुछ दिखाई दे रहा है वह सब तेरे में ही लीन हो जाता है। गरीब नानक तेरे दर से (नाम की) ख़ैर माँगता है। हे प्रभू ! मुझे अपना नाम दे। यही मेरे वास्ते सबसे ऊँची इज्जत है। 16। 1।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਆਪੇ ਧਰਤੀ ਧਉਲੁ ਅਕਾਸੰ ॥
ਆਪੇ ਸਾਚੇ ਗੁਣ ਪਰਗਾਸੰ ॥
ਜਤੀ ਸਤੀ ਸੰਤੋਖੀ ਆਪੇ ਆਪੇ ਕਾਰ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਜਿਸੁ ਕਰਣਾ ਸੋ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ॥
ਕੋਇ ਨ ਮੇਟੈ ਸਾਚੇ ਲੇਖੈ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ਆਪੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਹੇ ॥੨॥
ਪੰਚ ਚੋਰ ਚੰਚਲ ਚਿਤੁ ਚਾਲਹਿ ॥
ਪਰ ਘਰ ਜੋਹਹਿ ਘਰੁ ਨਹੀ ਭਾਲਹਿ ॥
ਕਾਇਆ ਨਗਰੁ ਢਹੈ ਢਹਿ ਢੇਰੀ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਪਤਿ ਜਾਈ ਹੇ ॥੩॥
ਗੁਰ ਤੇ ਬੂਝੈ ਤ੍ਰਿਭਵਣੁ ਸੂਝੈ ॥
ਮਨਸਾ ਮਾਰਿ ਮਨੈ ਸਿਉ ਲੂਝੈ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਤੁਧ ਹੀ ਜੇਹੇ ਨਿਰਭਉ ਬਾਲ ਸਖਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਆਪੇ ਸੁਰਗੁ ਮਛੁ ਪਇਆਲਾ ॥
ਆਪੇ ਜੋਤਿ ਸਰੂਪੀ ਬਾਲਾ ॥
ਜਟਾ ਬਿਕਟ ਬਿਕਰਾਲ ਸਰੂਪੀ ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ਕਾਈ ਹੇ ॥੫॥
ਬੇਦ ਕਤੇਬੀ ਭੇਦੁ ਨ ਜਾਤਾ ॥
ਨਾ ਤਿਸੁ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੁਤ ਭ੍ਰਾਤਾ ॥
ਸਗਲੇ ਸੈਲ ਉਪਾਇ ਸਮਾਏ ਅਲਖੁ ਨ ਲਖਣਾ ਜਾਈ ਹੇ ॥੬॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਥਾਕੀ ਮੀਤ ਘਨੇਰੇ ॥
ਕੋਇ ਨ ਕਾਟੈ ਅਵਗੁਣ ਮੇਰੇ ॥
ਸੁਰਿ ਨਰ ਨਾਥੁ ਸਾਹਿਬੁ ਸਭਨਾ ਸਿਰਿ ਭਾਇ ਮਿਲੈ ਭਉ ਜਾਈ ਹੇ ॥੭॥
ਭੂਲੇ ਚੂਕੇ ਮਾਰਗਿ ਪਾਵਹਿ ॥
ਆਪਿ ਭੁਲਾਇ ਤੂਹੈ ਸਮਝਾਵਹਿ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਮੈ ਅਵਰੁ ਨ ਦੀਸੈ ਨਾਵਹੁ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੮॥
मारू महला १ ॥
आपे धरती धउलु अकासं ॥
आपे साचे गुण परगासं ॥
जती सती संतोखी आपे आपे कार कमाई हे ॥१॥
जिसु करणा सो करि करि वेखै ॥
कोइ न मेटै साचे लेखै ॥
आपे करे कराए आपे आपे दे वडिआई हे ॥२॥
पंच चोर चंचल चितु चालहि ॥
पर घर जोहहि घरु नही भालहि ॥
काइआ नगरु ढहै ढहि ढेरी बिनु सबदै पति जाई हे ॥३॥
गुर ते बूझै त्रिभवणु सूझै ॥
मनसा मारि मनै सिउ लूझै ॥
जो तुधु सेवहि से तुध ही जेहे निरभउ बाल सखाई हे ॥४॥
आपे सुरगु मछु पइआला ॥
आपे जोति सरूपी बाला ॥
जटा बिकट बिकराल सरूपी रूपु न रेखिआ काई हे ॥५॥
बेद कतेबी भेदु न जाता ॥
ना तिसु मात पिता सुत भ्राता ॥
सगले सैल उपाइ समाए अलखु न लखणा जाई हे ॥६॥
करि करि थाकी मीत घनेरे ॥
कोइ न काटै अवगुण मेरे ॥
सुरि नर नाथु साहिबु सभना सिरि भाइ मिलै भउ जाई हे ॥७॥
भूले चूके मारगि पावहि ॥
आपि भुलाइ तूहै समझावहि ॥
बिनु नावै मै अवरु न दीसै नावहु गति मिति पाई हे ॥८॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ (सारा जगत प्रभू के अपने आप से प्रकट हुआ है। इस वास्ते प्रभू) स्वयं ही धरती है स्वयं धरती का आसरा है। स्वयं ही आकाश है। प्रभू स्वयं ही अपने सदा-स्थिर रहने वाले गुणों का प्रकाश करने वाला है। स्वयं ही जती है। स्वयं ही दानी है। स्वयं ही संतोषी है। स्वयं ही (जीवों में व्यापक हो के जत-सत-संतोख के अभ्यास की) कार कमाने वाला है। 1। जिस करतार का यह रचा हुआ संसार है वह इसको रच-रच के स्वयं ही इसकी संभाल करता है। कोई जीव उस परमात्मा के सदा-स्थिर रहने वाले हुकम की उलंघना नहीं कर सकता। (जीवों में व्यापक हो के) प्रभू स्वयं ही सब कुछ कर रहा है। स्वयं ही जीवों से (अपने हुकम अनुसार काम) करवा रहा है। स्वयं ही (जिनको अपने नाम की दाति देता है उनको) आदर दे रहा है। 2। (प्रभू की अपनी रजा में ही) भरमा देने वाले पाँच कामादिक चोर (जीवों के) मन को मोह लेते हैं। (जिनके मन कामादिक आदि मोह लेते हैं) वे पराए घरों में ताकते हैं। अपने हृदय-घर को नहीं खोजते। (विकारों में फसे हुओं का आखिर) शरीर शहर गिर जाता है। गिर के ढेरी हो जाता है; गुरू के शबद से वंचित रहने के कारण उनकी इज्जत जाती रहती है। 3। (हे प्रभू ! तेरी मेहर से जो मनुष्य) गुरू का ज्ञान हासिल करता है उसको तू तीनों भवनों मेुं व्यापक दिखाई दे जाता है। वे मनुष्य मन के मायावी फुरने मार के मन से मुकाबला करता है (और इसको वश में रखता है)। हे प्रभू ! जो लोग तुझे सिमरते हैं वह तेरे जैसे हो जाते हैं। तू किसी से ना डरने वाला उनका सदा का साथी बन जाता है। 4। (सारी सृष्टि प्रभू के अपने आप से प्रकट होने के कारण) प्रभू स्वयं ही स्वर्ग-लोक है। स्वयं ही मातृ लोक है। स्वयं ही पाताल लोक है। स्वयं ही सिर्फ प्रकाश ही प्रकाश है और सबसे बड़ा है। भयानक और डरावनी जटाएं धारने वाला भी स्वयं ही है। फिर भी उस का ना कोई खास रूप है ना कोई खास चक्र-चिन्ह है। 5। ना ही हिन्दू धर्म की वेद आदिक धर्म पुस्तकों ने ना ही पश्चिमी मतों की कुरान आदि किताबों ने परमात्मा की हस्ती की गहराई को समझा है। उस परमात्मा की ना कोई माँ। ना उसका कोई खास पुत्र ना कोई भाई है। बड़ऋे बड़े पहाड़ आदिक पैदा करके (जब चाहे) सारे ही अपने में लीन कर लेता है। उसका स्वरूप बयान से परे है। बियान नहीं किया जा सकता। 6। (परमात्मा से टूट के) अनेकों (देवी-देवताओं को) मैं अपने मित्र बना-बना के हार गई हूँ। (मेरे अंदर से) कोई (ऐसा मित्र) मेरे अवगुण दूर नहीं कर सका। वह परमात्मा ही सारे देवताओं और मनुष्यों का पति है। वही सब जीवों के सर पर मालिक है। प्यार के द्वारा जिस बंदे को वह मिल जाता है उसका (पापों-विकारों का सारा) सहम दूर हो जाता है। 7। हे प्रभू ! भटके हुए गलत रास्ते पर पड़े हुए बंदों को तू स्वयं ही सही मार्ग पर लगाता है। तू खुद ही गलत रास्ते पर डाल के फिर खुद ही (सीधे राह की) समझ बख्शता है (भटकना से बचने के लिए) तेरे नाम के बिना मुझे और कोई वसीला दिखाई नहीं देता। तेरा नाम सिमरने से ही पता चलता है कि तू कैसा (दयालु) है। कितना बड़ा (बेअंत) है। 8।

संदर्भ: यह अंग 1021 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Dwarka के नए-बसे sector में पहली बार आए परिवार का घर देखना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 50 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1021” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1022 →, पीछे का: ← अंग 1020

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।