अंग
1085
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਦਿ ਅੰਤਿ ਮਧਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਈ ॥
ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਮਿਟਿਆ ਸਾਧਸੰਗ ਤੇ ਦਾਲਿਦ ਨ ਕੋਈ ਘਾਲਕਾ ॥੬॥
ਊਤਮ ਬਾਣੀ ਗਾਉ ਗੋੁਪਾਲਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੀ ਮੰਗਹੁ ਰਵਾਲਾ ॥
ਬਾਸਨ ਮੇਟਿ ਨਿਬਾਸਨ ਹੋਈਐ ਕਲਮਲ ਸਗਲੇ ਜਾਲਕਾ ॥੭॥
ਸੰਤਾ ਕੀ ਇਹ ਰੀਤਿ ਨਿਰਾਲੀ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਕਰਿ ਦੇਖਹਿ ਨਾਲੀ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਆਰਾਧਨਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਿਉ ਸਿਮਰਤ ਕੀਜੈ ਆਲਕਾ ॥੮॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਨਿਮਖ ਨ ਵਿਸਰਹੁ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਸੁਆਮੀ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਜੀਵਹਿ ਤੇਰੇ ਦਾਸਾ ਬਨਿ ਜਲਿ ਪੂਰਨ ਥਾਲਕਾ ॥੯॥
ਤਤੀ ਵਾਉ ਨ ਤਾ ਕਉ ਲਾਗੈ ॥
ਸਿਮਰਤ ਨਾਮੁ ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਗੈ ॥
ਅਨਦ ਬਿਨੋਦ ਕਰੇ ਹਰਿ ਸਿਮਰਨੁ ਤਿਸੁ ਮਾਇਆ ਸੰਗਿ ਨ ਤਾਲਕਾ ॥੧੦॥
ਰੋਗ ਸੋਗ ਦੂਖ ਤਿਸੁ ਨਾਹੀ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਹੀ ॥
ਆਪਣਾ ਨਾਮੁ ਦੇਹਿ ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਣਿ ਬੇਨੰਤੀ ਖਾਲਕਾ ॥੧੧॥
ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਤੇਰਾ ਹੈ ਪਿਆਰੇ ॥
ਰੰਗਿ ਰਤੇ ਤੇਰੈ ਦਾਸ ਅਪਾਰੇ ॥
ਤੇਰੈ ਰੰਗਿ ਰਤੇ ਤੁਧੁ ਜੇਹੇ ਵਿਰਲੇ ਕੇਈ ਭਾਲਕਾ ॥੧੨॥
ਤਿਨ ਕੀ ਧੂੜਿ ਮਾਂਗੈ ਮਨੁ ਮੇਰਾ ॥
ਜਿਨ ਵਿਸਰਹਿ ਨਾਹੀ ਕਾਹੂ ਬੇਰਾ ॥
ਤਿਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਈ ਸਦਾ ਸੰਗੀ ਹਰਿ ਨਾਲਕਾ ॥੧੩॥
ਸਾਜਨੁ ਮੀਤੁ ਪਿਆਰਾ ਸੋਈ ॥
ਏਕੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ਦੁਰਮਤਿ ਖੋਈ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ਤਜਾਏ ਤਿਸੁ ਜਨ ਕਉ ਉਪਦੇਸੁ ਨਿਰਮਾਲਕਾ ॥੧੪॥
ਤੁਧੁ ਵਿਣੁ ਨਾਹੀ ਕੋਈ ਮੇਰਾ ॥
ਗੁਰਿ ਪਕੜਾਏ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਪੈਰਾ ॥
ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ਜਿਨਿ ਖੰਡਿਆ ਭਰਮੁ ਅਨਾਲਕਾ ॥੧੫॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਪ੍ਰਭੁ ਬਿਸਰੈ ਨਾਹੀ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਉ ਧਿਆਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਤੇਰੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਤੂ ਸਮਰਥੁ ਵਡਾਲਕਾ ॥੧੬॥੪॥੧੩॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਈ ॥
ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਮਿਟਿਆ ਸਾਧਸੰਗ ਤੇ ਦਾਲਿਦ ਨ ਕੋਈ ਘਾਲਕਾ ॥੬॥
ਊਤਮ ਬਾਣੀ ਗਾਉ ਗੋੁਪਾਲਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੀ ਮੰਗਹੁ ਰਵਾਲਾ ॥
ਬਾਸਨ ਮੇਟਿ ਨਿਬਾਸਨ ਹੋਈਐ ਕਲਮਲ ਸਗਲੇ ਜਾਲਕਾ ॥੭॥
ਸੰਤਾ ਕੀ ਇਹ ਰੀਤਿ ਨਿਰਾਲੀ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਕਰਿ ਦੇਖਹਿ ਨਾਲੀ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਆਰਾਧਨਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਿਉ ਸਿਮਰਤ ਕੀਜੈ ਆਲਕਾ ॥੮॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਨਿਮਖ ਨ ਵਿਸਰਹੁ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਸੁਆਮੀ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਜੀਵਹਿ ਤੇਰੇ ਦਾਸਾ ਬਨਿ ਜਲਿ ਪੂਰਨ ਥਾਲਕਾ ॥੯॥
ਤਤੀ ਵਾਉ ਨ ਤਾ ਕਉ ਲਾਗੈ ॥
ਸਿਮਰਤ ਨਾਮੁ ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਗੈ ॥
ਅਨਦ ਬਿਨੋਦ ਕਰੇ ਹਰਿ ਸਿਮਰਨੁ ਤਿਸੁ ਮਾਇਆ ਸੰਗਿ ਨ ਤਾਲਕਾ ॥੧੦॥
ਰੋਗ ਸੋਗ ਦੂਖ ਤਿਸੁ ਨਾਹੀ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਹੀ ॥
ਆਪਣਾ ਨਾਮੁ ਦੇਹਿ ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਣਿ ਬੇਨੰਤੀ ਖਾਲਕਾ ॥੧੧॥
ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਤੇਰਾ ਹੈ ਪਿਆਰੇ ॥
ਰੰਗਿ ਰਤੇ ਤੇਰੈ ਦਾਸ ਅਪਾਰੇ ॥
ਤੇਰੈ ਰੰਗਿ ਰਤੇ ਤੁਧੁ ਜੇਹੇ ਵਿਰਲੇ ਕੇਈ ਭਾਲਕਾ ॥੧੨॥
ਤਿਨ ਕੀ ਧੂੜਿ ਮਾਂਗੈ ਮਨੁ ਮੇਰਾ ॥
ਜਿਨ ਵਿਸਰਹਿ ਨਾਹੀ ਕਾਹੂ ਬੇਰਾ ॥
ਤਿਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਈ ਸਦਾ ਸੰਗੀ ਹਰਿ ਨਾਲਕਾ ॥੧੩॥
ਸਾਜਨੁ ਮੀਤੁ ਪਿਆਰਾ ਸੋਈ ॥
ਏਕੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ਦੁਰਮਤਿ ਖੋਈ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ਤਜਾਏ ਤਿਸੁ ਜਨ ਕਉ ਉਪਦੇਸੁ ਨਿਰਮਾਲਕਾ ॥੧੪॥
ਤੁਧੁ ਵਿਣੁ ਨਾਹੀ ਕੋਈ ਮੇਰਾ ॥
ਗੁਰਿ ਪਕੜਾਏ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਪੈਰਾ ॥
ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ਜਿਨਿ ਖੰਡਿਆ ਭਰਮੁ ਅਨਾਲਕਾ ॥੧੫॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਪ੍ਰਭੁ ਬਿਸਰੈ ਨਾਹੀ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਉ ਧਿਆਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਤੇਰੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਤੂ ਸਮਰਥੁ ਵਡਾਲਕਾ ॥੧੬॥੪॥੧੩॥
आदि अंति मधि प्रभु सोई ॥
आपे करता करे सु होई ॥
भ्रमु भउ मिटिआ साधसंग ते दालिद न कोई घालका ॥६॥
ऊतम बाणी गाउ गोुपाला ॥
साधसंगति की मंगहु रवाला ॥
बासन मेटि निबासन होईऐ कलमल सगले जालका ॥७॥
संता की इह रीति निराली ॥
पारब्रहमु करि देखहि नाली ॥
सासि सासि आराधनि हरि हरि किउ सिमरत कीजै आलका ॥८॥
जह देखा तह अंतरजामी ॥
निमख न विसरहु प्रभ मेरे सुआमी ॥
सिमरि सिमरि जीवहि तेरे दासा बनि जलि पूरन थालका ॥९॥
तती वाउ न ता कउ लागै ॥
सिमरत नामु अनदिनु जागै ॥
अनद बिनोद करे हरि सिमरनु तिसु माइआ संगि न तालका ॥१०॥
रोग सोग दूख तिसु नाही ॥
साधसंगि हरि कीरतनु गाही ॥
आपणा नामु देहि प्रभ प्रीतम सुणि बेनंती खालका ॥११॥
नाम रतनु तेरा है पिआरे ॥
रंगि रते तेरै दास अपारे ॥
तेरै रंगि रते तुधु जेहे विरले केई भालका ॥१२॥
तिन की धूड़ि मांगै मनु मेरा ॥
जिन विसरहि नाही काहू बेरा ॥
तिन कै संगि परम पदु पाई सदा संगी हरि नालका ॥१३॥
साजनु मीतु पिआरा सोई ॥
एकु द्रिड़ाए दुरमति खोई ॥
कामु क्रोधु अहंकारु तजाए तिसु जन कउ उपदेसु निरमालका ॥१४॥
तुधु विणु नाही कोई मेरा ॥
गुरि पकड़ाए प्रभ के पैरा ॥
हउ बलिहारी सतिगुर पूरे जिनि खंडिआ भरमु अनालका ॥१५॥
सासि सासि प्रभु बिसरै नाही ॥
आठ पहर हरि हरि कउ धिआई ॥
नानक संत तेरै रंगि राते तू समरथु वडालका ॥१६॥४॥१३॥
आपे करता करे सु होई ॥
भ्रमु भउ मिटिआ साधसंग ते दालिद न कोई घालका ॥६॥
ऊतम बाणी गाउ गोुपाला ॥
साधसंगति की मंगहु रवाला ॥
बासन मेटि निबासन होईऐ कलमल सगले जालका ॥७॥
संता की इह रीति निराली ॥
पारब्रहमु करि देखहि नाली ॥
सासि सासि आराधनि हरि हरि किउ सिमरत कीजै आलका ॥८॥
जह देखा तह अंतरजामी ॥
निमख न विसरहु प्रभ मेरे सुआमी ॥
सिमरि सिमरि जीवहि तेरे दासा बनि जलि पूरन थालका ॥९॥
तती वाउ न ता कउ लागै ॥
सिमरत नामु अनदिनु जागै ॥
अनद बिनोद करे हरि सिमरनु तिसु माइआ संगि न तालका ॥१०॥
रोग सोग दूख तिसु नाही ॥
साधसंगि हरि कीरतनु गाही ॥
आपणा नामु देहि प्रभ प्रीतम सुणि बेनंती खालका ॥११॥
नाम रतनु तेरा है पिआरे ॥
रंगि रते तेरै दास अपारे ॥
तेरै रंगि रते तुधु जेहे विरले केई भालका ॥१२॥
तिन की धूड़ि मांगै मनु मेरा ॥
जिन विसरहि नाही काहू बेरा ॥
तिन कै संगि परम पदु पाई सदा संगी हरि नालका ॥१३॥
साजनु मीतु पिआरा सोई ॥
एकु द्रिड़ाए दुरमति खोई ॥
कामु क्रोधु अहंकारु तजाए तिसु जन कउ उपदेसु निरमालका ॥१४॥
तुधु विणु नाही कोई मेरा ॥
गुरि पकड़ाए प्रभ के पैरा ॥
हउ बलिहारी सतिगुर पूरे जिनि खंडिआ भरमु अनालका ॥१५॥
सासि सासि प्रभु बिसरै नाही ॥
आठ पहर हरि हरि कउ धिआई ॥
नानक संत तेरै रंगि राते तू समरथु वडालका ॥१६॥४॥१३॥
हिन्दी अर्थ: उन्हें (जगत के) आदि में। अब। और आखिर में (कायम रहने वाला) वह परमात्मा ही दिखता है। (उनको निश्चय होता है कि) करतार स्वयं ही जो कुछ करता है वही होता है। हे भाई ! साध-संगत की बरकति से जिन मनुष्यों की हरेक भटकना। जिनका हरेक डर दूर हो जाता है। कोई भी दुख-कलेश उनकी आत्मिक मौत नहीं ला सकते। 6। हे भाई ! जीवन को ऊँचा करने वाली सिफत-सालाह की बाणी गाया करो। (हर वक्त) साध-संगति की चरण-धूड़ माँगा करो। (इस तरह अपने अंदर की) सारी वासनाएं मिटा के वासना-रहित हो जाया जाता है। और अपने सारे पाप जला लिए जाते हैं। 7। हे भाई ! संत जनों की (दुनियां के लोगों से) ये अलग ही जीवन चाह है। कि वह परमात्मा को (सदा अपने) साथ ही बसता देखते हैं। हे भाई ! संत जन हरेक सांस के साथ परमात्मा की आराधना करते रहते हैं (वे जानते हैं कि) परमात्मा का नाम सिमरने से कभी आलस नहीं करना चाहिए। 8। हे हरेक के दिल की जानने वाले ! मैं जिधर देखता हूँ। उधर (मुझे तू ही दिखता है)। हे मेरे मालिक प्रभू ! (मेहर कर। मुझे) आँख झपकनें जितने समय के लिए भी ना बिसर। हे प्रभू ! तेरे दास तुझे सिमर-सिमर के आत्मिक जीवन हासिल करते रहते हैं। हे प्रभू ! तू जंगल में जल में थल में (हर जगह बसता है)। 9। उसको रक्ती भर भी कोई दुख नहीं पोह सकता। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हुए हर वक्त (विकारों के हमलों से) सुचेत रहता है। वह मनुष्य (ज्यों-ज्यों) परमात्मा के नाम का सिमरन करता है (त्यों-त्यों) आत्मिक आनंद पाता है। उसका माया के साथ गहरा संबंध नहीं बनता। 10। हे भाई ! उस उस मनुष्य को कोई रोग-सोग दुख छू नहीं सकते। जो गुरू की संगति में टिक के परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते रहते हैं। हे प्रीतम प्रभू ! हे ख़लकत के पैदा करने वाले ! (मेरी भी) विनती सुन। (मुझे भी) अपना नाम दे। 11। हे प्यारे ! तेरा नाम बहुत ही कीमती पदार्थ है। हे बेअंत प्रभू ! तेरे दास तेरे प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। हे प्रभू जो मनुष्य तेरे प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। वे तेरे जैसे ही हो जाते हैं। पर ऐसे बंदे बहुत विरले मिलते हैं। 12। मेरा मन उनके चरणों की धूल माँगता है। हे प्रभू ! जिन मनुष्यों को तू किसी भी वक्त भूलता नहीं। हे भाई ! (ऐसे) उन मनुष्यों की संगति में मैं भी (उस प्रभू की मेहर से) ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर सकूँगा। और परमात्मा (मेरा) सदा साथी बना रहेगा। 13। हे भाई ! वही मनुष्य मेरा प्यारा सज्जन है। मित्र है। जो मेरी खोटी मति दूर कर के (मेरे हृदय में) एक (परमात्मा की याद) को पक्का कर दे। जो मुझमें से काम क्रोध अहंकार (को) हटा दे। हे भाई ! उस मनुष्य को ऐसा उपदेश (उठता है जो सुनने वालों को) पवित्र कर देता है। 14। हे प्रभू ! तेरे बिना मेरा कोई (सहारा) नहीं। हे भाई ! गुरू ने मुझे प्रभू के पैर पकड़ाए हैं। मैं पूरे गुरू के सदके जाता हूँ जिसने मेरी भटकना नाश की है। जिसने विकारों के तूफान को थाम लिया है। 15। हरेक सांस के साथ (उसको सिमरता रहूँ। मुझे किसी भी वक्त वह) भूले ना। हे भाई ! (अगर प्रभू की मेहर हो तो) मैं आठों पहर प्रभू का ध्यान धरता रहूँ। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) तू सब ताकतों का मालिक है। तू सबसे बड़ा है। तेरे संत तेरे प्रेम-रंग में सदा रंगे रहते हैं। 16। 4। 13।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਹਿਰਦੈ ਨਿਤ ਧਾਰੀ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਨਮਸਕਾਰੀ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਅਰਪਿ ਧਰੀ ਸਭੁ ਆਗੈ ਜਗ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਸੁਹਾਵਣਾ ॥੧॥
ਸੋ ਠਾਕੁਰੁ ਕਿਉ ਮਨਹੁ ਵਿਸਾਰੇ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਦੇ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਸਾਸਿ ਗਰਾਸਿ ਸਮਾਲੇ ਕਰਤਾ ਕੀਤਾ ਅਪਣਾ ਪਾਵਣਾ ॥੨॥
ਜਾ ਤੇ ਬਿਰਥਾ ਕੋਊ ਨਾਹੀ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਹਰਿ ਰਖੁ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਹਿਰਦੈ ਨਿਤ ਧਾਰੀ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਨਮਸਕਾਰੀ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਅਰਪਿ ਧਰੀ ਸਭੁ ਆਗੈ ਜਗ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਸੁਹਾਵਣਾ ॥੧॥
ਸੋ ਠਾਕੁਰੁ ਕਿਉ ਮਨਹੁ ਵਿਸਾਰੇ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਦੇ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਸਾਸਿ ਗਰਾਸਿ ਸਮਾਲੇ ਕਰਤਾ ਕੀਤਾ ਅਪਣਾ ਪਾਵਣਾ ॥੨॥
ਜਾ ਤੇ ਬਿਰਥਾ ਕੋਊ ਨਾਹੀ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਹਰਿ ਰਖੁ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
मारू महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चरन कमल हिरदै नित धारी ॥
गुरु पूरा खिनु खिनु नमसकारी ॥
तनु मनु अरपि धरी सभु आगै जग महि नामु सुहावणा ॥१॥
सो ठाकुरु किउ मनहु विसारे ॥
जीउ पिंडु दे साजि सवारे ॥
सासि गरासि समाले करता कीता अपणा पावणा ॥२॥
जा ते बिरथा कोऊ नाही ॥
आठ पहर हरि रखु मन माही ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चरन कमल हिरदै नित धारी ॥
गुरु पूरा खिनु खिनु नमसकारी ॥
तनु मनु अरपि धरी सभु आगै जग महि नामु सुहावणा ॥१॥
सो ठाकुरु किउ मनहु विसारे ॥
जीउ पिंडु दे साजि सवारे ॥
सासि गरासि समाले करता कीता अपणा पावणा ॥२॥
जा ते बिरथा कोऊ नाही ॥
आठ पहर हरि रखु मन माही ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (अगर प्रभू मेहर करे तो) मैं (गुरू के) सुंदर चरण सदा (अपने) हृदय में टिकाए रखूँ। पूरे गुरू को हरेक छिन नमस्कार करता रहूँ। अपना तन अपना मन सब कुछ (गुरू के) आगे भेटा करके रख दूँ (क्योंकि गुरू से ही परमात्मा का नाम मिलता है। और) नाम ही जगत में (जीव को) सुंदर बनाता है। 1। हे भाई ! तू उस मालिक प्रभू को (अपने) मन से क्यों भुलाता है। जो जिंद दे के शरीर दे के पैदा करके सुंदर बनाता है। हरेक साँस के साथ ग्रास के साथ (खाते हुए साँस लेते हुए) करतार को अपने हृदय में संभाल के रख। अपनी ही की हुई कमाई का फल मिलता है। 2। हे भाई ! जिस (करतार के दर) से कभी कोई ख़ाली नहीं मुड़ता। उसको आठों पहर संभाल के रख।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1085 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Karwa Chauth की रात, चाँद का इंतज़ार, और बीच में हाथों की मेहंदी।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 43 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1085” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1086 →, पीछे का: ← अंग 1084।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।