अंग 1038

अंग
1038
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਾਮ ਵੇਦੁ ਰਿਗੁ ਜੁਜਰੁ ਅਥਰਬਣੁ ॥
ਬ੍ਰਹਮੇ ਮੁਖਿ ਮਾਇਆ ਹੈ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋ ਤਿਉ ਬੋਲੇ ਜਿਉ ਬੋਲਾਇਦਾ ॥੯॥
ਸੁੰਨਹੁ ਸਪਤ ਪਾਤਾਲ ਉਪਾਏ ॥
ਸੁੰਨਹੁ ਭਵਣ ਰਖੇ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਆਪੇ ਕਾਰਣੁ ਕੀਆ ਅਪਰੰਪਰਿ ਸਭੁ ਤੇਰੋ ਕੀਆ ਕਮਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਰਜ ਤਮ ਸਤ ਕਲ ਤੇਰੀ ਛਾਇਆ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਹਉਮੈ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਹਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਗੁਣਿ ਚਉਥੈ ਮੁਕਤਿ ਕਰਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਸੁੰਨਹੁ ਉਪਜੇ ਦਸ ਅਵਤਾਰਾ ॥
ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਇ ਕੀਆ ਪਾਸਾਰਾ ॥
ਦੇਵ ਦਾਨਵ ਗਣ ਗੰਧਰਬ ਸਾਜੇ ਸਭਿ ਲਿਖਿਆ ਕਰਮ ਕਮਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਮਝੈ ਰੋਗੁ ਨ ਹੋਈ ॥
ਇਹ ਗੁਰ ਕੀ ਪਉੜੀ ਜਾਣੈ ਜਨੁ ਕੋਈ ॥
ਜੁਗਹ ਜੁਗੰਤਰਿ ਮੁਕਤਿ ਪਰਾਇਣ ਸੋ ਮੁਕਤਿ ਭਇਆ ਪਤਿ ਪਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਪੰਚ ਤਤੁ ਸੁੰਨਹੁ ਪਰਗਾਸਾ ॥
ਦੇਹ ਸੰਜੋਗੀ ਕਰਮ ਅਭਿਆਸਾ ॥
ਬੁਰਾ ਭਲਾ ਦੁਇ ਮਸਤਕਿ ਲੀਖੇ ਪਾਪੁ ਪੁੰਨੁ ਬੀਜਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਊਤਮ ਸਤਿਗੁਰ ਪੁਰਖ ਨਿਰਾਲੇ ॥
ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਹਰਿ ਰਸਿ ਮਤਵਾਲੇ ॥
ਰਿਧਿ ਬੁਧਿ ਸਿਧਿ ਗਿਆਨੁ ਗੁਰੂ ਤੇ ਪਾਈਐ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਇਸੁ ਮਨ ਮਾਇਆ ਕਉ ਨੇਹੁ ਘਨੇਰਾ ॥
ਕੋਈ ਬੂਝਹੁ ਗਿਆਨੀ ਕਰਹੁ ਨਿਬੇਰਾ ॥
ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਹਉਮੈ ਸਹਸਾ ਨਰੁ ਲੋਭੀ ਕੂੜੁ ਕਮਾਇਦਾ ॥੧੬॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਪਾਏ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ਸਚੇ ਘਰ ਬਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਨਿਰਮਲ ਨਾਦੁ ਸਬਦ ਧੁਨਿ ਸਚੁ ਰਾਮੈ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੭॥੫॥੧੭॥
साम वेदु रिगु जुजरु अथरबणु ॥
ब्रहमे मुखि माइआ है त्रै गुण ॥
ता की कीमति कहि न सकै को तिउ बोले जिउ बोलाइदा ॥९॥
सुंनहु सपत पाताल उपाए ॥
सुंनहु भवण रखे लिव लाए ॥
आपे कारणु कीआ अपरंपरि सभु तेरो कीआ कमाइदा ॥१०॥
रज तम सत कल तेरी छाइआ ॥
जनम मरण हउमै दुखु पाइआ ॥
जिस नो क्रिपा करे हरि गुरमुखि गुणि चउथै मुकति कराइदा ॥११॥
सुंनहु उपजे दस अवतारा ॥
स्रिसटि उपाइ कीआ पासारा ॥
देव दानव गण गंधरब साजे सभि लिखिआ करम कमाइदा ॥१२॥
गुरमुखि समझै रोगु न होई ॥
इह गुर की पउड़ी जाणै जनु कोई ॥
जुगह जुगंतरि मुकति पराइण सो मुकति भइआ पति पाइदा ॥१३॥
पंच ततु सुंनहु परगासा ॥
देह संजोगी करम अभिआसा ॥
बुरा भला दुइ मसतकि लीखे पापु पुंनु बीजाइदा ॥१४॥
ऊतम सतिगुर पुरख निराले ॥
सबदि रते हरि रसि मतवाले ॥
रिधि बुधि सिधि गिआनु गुरू ते पाईऐ पूरै भागि मिलाइदा ॥१५॥
इसु मन माइआ कउ नेहु घनेरा ॥
कोई बूझहु गिआनी करहु निबेरा ॥
आसा मनसा हउमै सहसा नरु लोभी कूड़ु कमाइदा ॥१६॥
सतिगुर ते पाए वीचारा ॥
सुंन समाधि सचे घर बारा ॥
नानक निरमल नादु सबद धुनि सचु रामै नामि समाइदा ॥१७॥५॥१७॥

हिन्दी अर्थ: ब्रहमा के द्वारा साम। ऋग। यजुर व अर्थव- ये चारों वेद प्रभू ने अपने आप से ही प्रकट किए। माया के तीन गुण भी उसके अपने आप से ही पैदा हुए। कोई जीव उस परमात्मा का मूल्य नहीं आँक सकता। जीव उसी तरह ही बोल सकता है जैसे जीव प्रभू स्वयं प्रेरणा करता है। 9। प्रभू ने निरोल अपने आप से ही सात पाताल (और सात आकाश) पैदा किए। निरोल अपने आप से ही तीनों भवन बना के पूरे ध्यान से उनकी संभाल करता है। उस परमात्मा ने जिससे परे और कुछ भी नहीं है खुद ही जगत रचना का आरम्भ किया। हे प्रभू ! हरेक जीव तेरा ही प्रेरित हुआ कर्म करता है। 10। (माया के तीन गुण) रजो तमो और सतो (हे प्रभू !) तेरी ही ताकत के आसरे बने। जीवों के वास्ते पैदा होना और मरना तूने स्वयं ही बनाए। अहंकार का दुख भी तूने स्वयं ही (जीवों के अंदर) डाल दिया है। परमात्मा जिस जीव पर मेहर करता है उसको गुरू की शरण डाल के (तीनों गुणों से ऊपर) चौथी अवस्था में पहुँचाता है और (माया के मोह से) मुक्ति देता है। 11। प्रभू के निरोल अपने आप से ही (विष्णू के) दस अवतार पैदा हुए। (निरोल अपने आप से ही परमात्मा ने) सृष्टि पैदा करके यह जगत-पसारा फैलाया। देवते। दैत्य। शिव के गण। (देवताओं के रागी) गंधर्व- ये सारे ही निरोल अपने आप से पैदा किए। सब जीव धुर से ही प्रभू के हुकम में ही अपने किए कर्मों के लिखे संस्कारों के अनुसार कर्म कमा रहे हैं। 12। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (परमात्मा की इस बेअंत कला को) समझता है (वह उसकी याद से नहीं टूटता। और) उसको कोई रोग (विकार) पोह नहीं सकता। पर कोई विरला व्यक्ति गुरू की बताई हुई इस (सिमरन की) सीढ़ी (का भेद) समझता है। जुगों जुगों से ही (गुरू की यह सीढ़ी जीवों की) मुक्ति का साधन बनी आ रही है। (जो मनुष्य सिमरन की इस सीढ़ी का आसरा लेता है) वह विकारों से निजात हासिल कर लेता है और प्रभू की दरगाह में इज्जत पाता है। 13। पाँच तत्वों से बना हुआ ये मनुष्य का शरीर निरोल प्रभू के अपने आप से ही प्रकट हुआ। इस शरीर के संयोग के कारण जीव कर्मों में व्यस्त हो जाता है। प्रभू के हुकम अनुसार ही जीव के किए अच्छे और बुरे कर्मों के संस्कार उसके माथे पर लिखे जाते हैं। इस तरह जीव पाप और पुन्य (के बीज) बीजता है (और उनका फल भोगता है)। 14। वह मनुष्य ऊँचे जीवन वाले बन जाते हैं। वे माया के प्रभाव से निर्लिप रहते हैं। जो मनुष्य सतिगुरू पुरख के शबद में रति रहते हैं जो प्रभू के नाम-रस में मस्त रहते हैं। आत्मिक शक्तियाँ ऊँची बुद्धि और परमात्मा के साथ गहरी सांझ (की दाति) गुरू से ही मिलती है। अच्छे भाग्यों से गुरू (शरण आए जीव को प्रभू-चरणों में) जोड़ देता है। 15। हे ज्ञानवान पुरुषो ! इस मन को माया का बहुत मोह चिपका रहता है; (इसके राज़ को) समझो और इस मोह को खत्म करो। जो मनुष्य लोभ के प्रभाव तहत नित्य माया के मोह का धंधा ही करता रहता है उसको (दुनियां की) आशाएं-कामनाएं-अहंकार-सहम (आदि) चिपके रहते हैं। 16। जो मनुष्य गुरू से परमात्मा के गुणों की विचार (की दाति) प्राप्त कर लेता है। वह उस सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू की हजूरी में टिका रहता है। उसके चरणों में सुरति जोड़ के रखता है। हे नानक ! उस मनुष्य के अंदर सदा-स्थिर प्रभू बसा रहता है सिफत-सालाह की रौंअ बनी रहती है जीवन को पवित्र करने वाला राग (जैसा) होता रहता है। वह मनुष्य सदा परमात्मा के नाम में लीन रहता है। 17। 5। 17।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
ਆਇ ਨ ਜਾਈ ਪ੍ਰਭੁ ਕਿਰਪਾਲਾ ॥
ਜੀਆ ਅੰਦਰਿ ਜੁਗਤਿ ਸਮਾਈ ਰਹਿਓ ਨਿਰਾਲਮੁ ਰਾਇਆ ॥੧॥
ਜਗੁ ਤਿਸ ਕੀ ਛਾਇਆ ਜਿਸੁ ਬਾਪੁ ਨ ਮਾਇਆ ॥
ਨਾ ਤਿਸੁ ਭੈਣ ਨ ਭਰਾਉ ਕਮਾਇਆ ॥
ਨਾ ਤਿਸੁ ਓਪਤਿ ਖਪਤਿ ਕੁਲ ਜਾਤੀ ਓਹੁ ਅਜਰਾਵਰੁ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥੨॥
ਤੂ ਅਕਾਲ ਪੁਰਖੁ ਨਾਹੀ ਸਿਰਿ ਕਾਲਾ ॥
ਤੂ ਪੁਰਖੁ ਅਲੇਖ ਅਗੰਮ ਨਿਰਾਲਾ ॥
ਸਤ ਸੰਤੋਖਿ ਸਬਦਿ ਅਤਿ ਸੀਤਲੁ ਸਹਜ ਭਾਇ ਲਿਵ ਲਾਇਆ ॥੩॥
ਤ੍ਰੈ ਵਰਤਾਇ ਚਉਥੈ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ॥
ਕਾਲ ਬਿਕਾਲ ਕੀਏ ਇਕ ਗ੍ਰਾਸਾ ॥
ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ਸਰਬ ਜਗਜੀਵਨੁ ਗੁਰਿ ਅਨਹਦ ਸਬਦਿ ਦਿਖਾਇਆ ॥੪॥
ਊਤਮ ਜਨ ਸੰਤ ਭਲੇ ਹਰਿ ਪਿਆਰੇ ॥
ਹਰਿ ਰਸ ਮਾਤੇ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਰੇਣ ਸੰਤ ਜਨ ਸੰਗਤਿ ਹਰਿ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਾਇਆ ॥੫॥
ਤੂ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਜੀਅ ਸਭਿ ਤੇਰੇ ॥
मारू महला १ ॥
जह देखा तह दीन दइआला ॥
आइ न जाई प्रभु किरपाला ॥
जीआ अंदरि जुगति समाई रहिओ निरालमु राइआ ॥१॥
जगु तिस की छाइआ जिसु बापु न माइआ ॥
ना तिसु भैण न भराउ कमाइआ ॥
ना तिसु ओपति खपति कुल जाती ओहु अजरावरु मनि भाइआ ॥२॥
तू अकाल पुरखु नाही सिरि काला ॥
तू पुरखु अलेख अगंम निराला ॥
सत संतोखि सबदि अति सीतलु सहज भाइ लिव लाइआ ॥३॥
त्रै वरताइ चउथै घरि वासा ॥
काल बिकाल कीए इक ग्रासा ॥
निरमल जोति सरब जगजीवनु गुरि अनहद सबदि दिखाइआ ॥४॥
ऊतम जन संत भले हरि पिआरे ॥
हरि रस माते पारि उतारे ॥
नानक रेण संत जन संगति हरि गुर परसादी पाइआ ॥५॥
तू अंतरजामी जीअ सभि तेरे ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ मैं जिधर देखता हूँ उधर ही मुझे दीनों पर दया करने वाला परमात्मा दिखाई देता है। वह कृपा का श्रोत प्रभू ना पैदा होता है। ना मरता है। सब जीवों के अंदर (उसी की सिखलाई हुई) जीवन-जाच गुप्त रूप में बरत रही है (भाव। हरेक जीव उसी परमात्मा के आसरे जी रहा है। पर) वह पातशाह स्वयं और आसरों से बेमुथाज रहता है। 1। (दरअसल सदा टिकी रहने वाली हस्ती तो परमात्मा स्वयं है) जगत उस परमात्मा की छाया है (जब चाहे अपनी इस परछाई को अपने आप में ही गायब कर लेता है। वह परमात्मा का ना कोई पिता ना माँ। ना कोई बहिन ना भाई ना ही कोई सेवक। ना उसको जनम ना मौत। ना उसकी कोई कुल ना कोई जाति। उसको बुढ़ापा नहीं व्याप सकता। वह महान श्रेष्ठ हस्ती है (जगत के सब जीवों के) मन में वही प्यारा लगता है। 2। हे प्रभू ! तू सब जीवों में व्यापक हो के भी मौत-रहित है। तेरे सिर पर मौत सवार नहीं हो सकती। तू सर्व-व्यापक है। जिस मनुष्य ने सेवा-संतोख (वाले जीवन) में (रह के) गुरू के शबद (में जुड़ के) पूरन अडोल आत्मिक अवस्था में (टिक के) तेरे चरणों में सुरति जोड़ी है उस का हृदय ठंडा-ठार हो जाता है। 3। माया के तीन गुणों का पसारा पसार के प्रभू स्वयं (इसके ऊपर) चौथे घर में टिका रहता है (जहाँ तीन गुणों की पहुँच नहीं हो सकती)। जनम और मरन उसने एक ग्रास कर लिए हुए हैं (उसको ना जनम है ना मौत)। सारे जीवों में परमात्मा की पवित्र ज्योति (प्रकाश कर रही है)। वह जगत की जिंदगी का सहारा है। जिस मनुष्य को गुरू ने एक-रस अपने शबद में जोड़ा है उसको उस (जगजीवन) का दीदार करवा दिया है। 4। जो लोग परमात्मा के प्यारे हैं वे श्रेष्ठ जीवन वाले हैं वह संत हैं वह भले हैं। वह परमात्मा के नाम-रस में मस्त रहते हैं। परमात्मा उन्हें संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। हे नानक ! उन संत-जनों की संगति कर उनके चरणों की धूड़ ले। उन्होंने गुरू की किरपा से परमात्मा को पा लिया है। 5। हे प्रभू ! सारे जीव तेरे (ही पैदा किए हुए) हैं। तू सबके दिल की जानने वाला है।

संदर्भ: यह अंग 1038 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

दिल्ली का summer-shaadi, मंडप के बीच bride-groom, और परिवार की उम्मीदें।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 44 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1038” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1039 →, पीछे का: ← अंग 1037

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।