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अंग 1106

अंग
1106
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Bhagat Ravi Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु मारू बाणी जैदेउ जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चंद सत भेदिआ नाद सत पूरिआ सूर सत खोड़सा दतु कीआ ॥
अबल बलु तोड़िआ अचल चलु थपिआ अघड़ु घड़िआ तहा अपिउ पीआ ॥1॥
मन आदि गुण आदि वखाणिआ ॥
तेरी दुबिधा द्रिसटि संमानिआ ॥1॥ रहाउ ॥
अरधि कउ अरधिआ सरधि कउ सरधिआ सलल कउ सललि संमानि आइआ ॥
बदति जैदेउ जैदेव कउ रंमिआ ब्रहमु निरबाणु लिव लीणु पाइआ ॥2॥1॥
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पंद्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी ‘रविदासी’ परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।

हिन्दी अर्थ: रागु मारू बाणी जैदेउ जीउ की सतिगुर प्रसादि॥ (सिफतसालाह की बरकति से ही) बाई सुर में प्राण चढ़ भी गए हैं। सुखमना में अटकाए भी गए हैं। और दाहिनी सुर के रास्ते सोलह बार ‘ओम’ कह के (उतर) भी आए हैं (भाव। प्राणायाम का सारा उद्यम सिफत सालाह में ही आ गया है। सिफतसालाह के मुकाबले में प्राण चढ़ाने। टिकाने और उतारने वाले साधन प्राणायाम की आवश्यक्ता नहीं रह गई)। (इस सिफतसालाह के सदका) (विकारों में पड़ने के कारण) कमजोर (हुए) मन का (‘दुबिधा द्रिसटि’ वाला) बल टूट गया है। अमोड़ मन का चंचल स्वभाव रुक गया है। ये अल्हड़ मन अब सुंदर घड़ा हुआ (तराशा हुआ) हो गया है। यहाँ पहुँच के इसने नाम-अमृत पी लिया है। 1। हे मन ! जगत के मूल प्रभू की सिफतसालाह करने से आपका भेद-भाव वाला स्वभाव समतल हैं जाएगा। 1। रहाउ। जैदेउ कहता है- अगर आराधने-योग्य प्रभू की आराधना करें। अगर श्रद्धा-योग्य प्रभू में सिदक धरें। तो उसके साथ एक-रूप हुआ जा सकता है। जैसे पानी के साथ पानी। जैदेव-प्रभू का सिमरन करने से वह वासना रहित बेपरवाह प्रभू मिल जाता है। 2। 1।
कबीरु ॥ मारू ॥
रामु सिमरु पछुताहिगा मन ॥
पापी जीअरा लोभु करतु है आजु कालि उठि जाहिगा ॥1॥ रहाउ ॥
लालच लागे जनमु गवाइआ माइआ भरम भुलाहिगा ॥
धन जोबन का गरबु न कीजै कागद जिउ गलि जाहिगा ॥1॥
जउ जमु आइ केस गहि पटकै ता दिन किछु न बसाहिगा ॥
सिमरनु भजनु दइआ नही कीनी तउ मुखि चोटा खाहिगा ॥2॥
धरम राइ जब लेखा मागै किआ मुखु लै कै जाहिगा ॥
कहतु कबीरु सुनहु रे संतहु साधसंगति तरि जांहिगा ॥3॥1॥
रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की।

हिन्दी अर्थ: कबीरु॥ मारू॥ हे मन ! (अब ही वक्त है) प्रभू का सिमरन कर। (नहीं तो समय बीत जाने पर) अफसोस करेगा। विकारों में फसी हुई आपकी कमजोर जीवात्मा (जिंद) (धन पदार्थ का) लोभ कर रही है। पर आप थोड़े ही दिनों में (ये सब कुछ छोड़ के यहाँ से) चला जाएगा। 1। रहाउ। हे मन ! आप लालच में फस के जीवन व्यर्थ गवा रहा है। माया की भटकना में टूटा हुआ फिरता है। ना कर ये मान धन और जवानी का। (मौत आने पर) कागज़ की तरह जल जाएगा। 1। हे मन ! जब जम ने आ कर केसों से पकड़ कर आपको जमीन पर पटका। तब आपकी (उसके आगे) कोई पेश नहीं चलेगी। आप अब प्रभू का सिमरन-भजन नहीं करता। आप दया नहीं पालता। मरने के वक्त दुखी होंगे। 2। हे मन ! जब धर्मराज ने (आपसे जीवन में किए कामों का) हिसाब माँगा। क्या मुँह ले के उसके सामने (आप) होंगे। कबीर कहता है-हे संत जनो ! सुनो। साध-संगति में रह के ही (संसार-समुंद्र से) पार लांघा जा सकता है। 3। 1।
रागु मारू बाणी रविदास जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै ॥
गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै ॥1॥ रहाउ ॥
जा की छोति जगत कउ लागै ता पर तुहंी ढरै ॥
नीचह ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै ॥1॥
नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै ॥
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरि जीउ ते सभै सरै ॥2॥1॥
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पंद्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी ‘रविदासी’ परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।

हिन्दी अर्थ: रागु मारू बाणी रविदास जीउ की सतिगुर प्रसादि॥ हे सुंदर प्रभू ! आपके बिना ऐसी करनी और कौन कर सकता है। (हे भाई !) मेरा प्रभू गरीबों को मान देने वाला है। (गरीब के) सिर पर छत्र झुला देता है। (भाव। गरीब को भी राजा बना देता है)। 1। रहाउ। (जिस मनुष्य को इतना नीच समझा जाता हो) कि उसकी छूत सारे संसार को लग जाए (भाव। जिस मनुष्य के छूने मात्र से और सारे लोग अपने आप अस्वच्छ अपवित्र समझने लग जाएं) उस मनुष्य पर (हे प्रभू !) आप ही कृपा करता है। (हे भाई !) मेरा गोबिंद नीच लोगों को ऊँचा बना देता है। वह किसी से डरता नहीं। 1। (प्रभू की कृपा से ही) नामदेव। कबीर त्रिलोचन। सधना और सैण (आदि भगत संसार-समुंद्र से) पार लांघ गए। रविदास कहता है- हे संत जनो ! सुनो। प्रभू सब कुछ करने के समर्थ है। 2। 1।
मारू ॥
सुख सागर सुरितरु चिंतामनि कामधेन बसि जा के रे ॥
चारि पदारथ असट महा सिधि नव निधि कर तल ता कै ॥1॥
हरि हरि हरि न जपसि रसना ॥
अवर सभ छाडि बचन रचना ॥1॥ रहाउ ॥
नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अछर माही ॥
बिआस बीचारि कहिओ परमारथु राम नाम सरि नाही ॥2॥
सहज समाधि उपाधि रहत होइ बडे भागि लिव लागी ॥
कहि रविदास उदास दास मति जनम मरन भै भागी ॥3॥2॥15॥
रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की।

हिन्दी अर्थ: मारू॥ (हे पंडित !) जो प्रभू सुखों का समुद्र है। जिस प्रभू के वश में स्वर्ग के पाँचों वृक्ष। चिंतामणी और कामधेनु हैं। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों पदार्थ। आठ बड़ी (रिद्धियां-सिद्धियां) और नौ निधियां ये सब कुछ उसी के हाथों की तली पर हैं। 1। (हे पण्डित !) आप जीभ से सदा एक परमात्मा का नाम क्यों नहीं जपता। और सब फोकियाँ बातें त्याग के 1। रहाउ। (हे पण्डित !) पुराणों के अनेकों किस्मों के प्रसंग। वेदों की बताई हुई विधियां। ये सब वाक्या-रचना ही हैं (अनुभवी ज्ञान नहीं है जो प्रभू के चरणों में जुड़ने से हृदय में पैदा होता है)। (हे पंडित ! वेदों के रचयता) व्यास ऋषि ने सोच-विचार के यही परम-तत्व बताया है (कि इन पुस्तकों के पाठ आदिक) परमात्मा के नाम का सिमरन करने की बराबरी नहीं कर सकते। 2। रविदास कहता है- (हे पण्डित !) बड़ी किस्मत से जिस मनुष्य की सुरति प्रभू-चरणों में जुड़ती है। उसका मन आत्मिक अडोलता में टिका रहता है कोई विकार उसमें नहीं उठता उस सेवक की मति (माया की ओर से) निर्मोह रहती है और जनम-मरण (भाव, सारी उम्र) के उसके डर नाश हो जाते हैं।3।2।15।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की, जिसने सामाजिक संरचना को अंदर से चुनौती दी।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु मारू बाणी जैदेउ जीउ की सतिगुर प्रसादि॥ (सिफतसालाह की बरकति से ही) बाई सुर में प्राण चढ़ भी गए हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।