अंग 1002

अंग
1002
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰਿ ਮੰਤ੍ਰੁ ਅਵਖਧੁ ਨਾਮੁ ਦੀਨਾ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸੰਕਟ ਜੋਨਿ ਨ ਪਾਇ ॥੫॥੨॥
ਰੇ ਨਰ ਇਨ ਬਿਧਿ ਪਾਰਿ ਪਰਾਇ ॥
ਧਿਆਇ ਹਰਿ ਜੀਉ ਹੋਇ ਮਿਰਤਕੁ ਤਿਆਗਿ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੨॥੧੧॥
गुरि मंत्रु अवखधु नामु दीना जन नानक संकट जोनि न पाइ ॥५॥२॥
रे नर इन बिधि पारि पराइ ॥
धिआइ हरि जीउ होइ मिरतकु तिआगि दूजा भाउ ॥ रहाउ दूजा ॥२॥११॥

हिन्दी अर्थ: हे दास नानक ! जिस को गुरू ने नाम मंत्र दे दिया। वह मनुष्य (चौरासी लाख) जूनियों के कलेश में नहीं पड़ता। 5। 2। हे भाई ! इस तरह मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। तू भी परमात्मा का ध्यान धरा कर। विकारों से विरक्त (मुर्दा) हो जा। और प्रभू के बिना और और के प्यार को छोड़ दे। रहाउ दूजा। 2। 11।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਾਹਰਿ ਢੂਢਨ ਤੇ ਛੂਟਿ ਪਰੇ ਗੁਰਿ ਘਰ ਹੀ ਮਾਹਿ ਦਿਖਾਇਆ ਥਾ ॥
ਅਨਭਉ ਅਚਰਜ ਰੂਪੁ ਪ੍ਰਭ ਪੇਖਿਆ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਛੋਡਿ ਨ ਕਤਹੂ ਜਾਇਆ ਥਾ ॥੧॥
ਮਾਨਕੁ ਪਾਇਓ ਰੇ ਪਾਇਓ ਹਰਿ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ਥਾ ॥
ਮੋਲਿ ਅਮੋਲੁ ਨ ਪਾਇਆ ਜਾਈ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਗੁਰੂ ਦਿਵਾਇਆ ਥਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਦਿਸਟੁ ਅਗੋਚਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਅਕਥੁ ਕਥਾਇਆ ਥਾ ॥
ਅਨਹਦ ਸਬਦੁ ਦਸਮ ਦੁਆਰਿ ਵਜਿਓ ਤਹ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਚੁਆਇਆ ਥਾ ॥੨॥
ਤੋਟਿ ਨਾਹੀ ਮਨਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੂਝੀ ਅਖੁਟ ਭੰਡਾਰ ਸਮਾਇਆ ਥਾ ॥
ਚਰਣ ਚਰਣ ਚਰਣ ਗੁਰ ਸੇਵੇ ਅਘੜੁ ਘੜਿਓ ਰਸੁ ਪਾਇਆ ਥਾ ॥੩॥
ਸਹਜੇ ਆਵਾ ਸਹਜੇ ਜਾਵਾ ਸਹਜੇ ਮਨੁ ਖੇਲਾਇਆ ਥਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਭਰਮੁ ਗੁਰਿ ਖੋਇਆ ਤਾ ਹਰਿ ਮਹਲੀ ਮਹਲੁ ਪਾਇਆ ਥਾ ॥੪॥੩॥੧੨॥
मारू महला ५ ॥
बाहरि ढूढन ते छूटि परे गुरि घर ही माहि दिखाइआ था ॥
अनभउ अचरज रूपु प्रभ पेखिआ मेरा मनु छोडि न कतहू जाइआ था ॥१॥
मानकु पाइओ रे पाइओ हरि पूरा पाइआ था ॥
मोलि अमोलु न पाइआ जाई करि किरपा गुरू दिवाइआ था ॥१॥ रहाउ ॥
अदिसटु अगोचरु पारब्रहमु मिलि साधू अकथु कथाइआ था ॥
अनहद सबदु दसम दुआरि वजिओ तह अंम्रित नामु चुआइआ था ॥२॥
तोटि नाही मनि त्रिसना बूझी अखुट भंडार समाइआ था ॥
चरण चरण चरण गुर सेवे अघड़ु घड़िओ रसु पाइआ था ॥३॥
सहजे आवा सहजे जावा सहजे मनु खेलाइआ था ॥
कहु नानक भरमु गुरि खोइआ ता हरि महली महलु पाइआ था ॥४॥३॥१२॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ गुरू ने हृदय में ही मुझे परमात्मा का दीदार करवा दिया है। अब मैं परमात्मा की खोज बाहर (जंगलों में) करन से बच गया हूँ। जब परमात्मा के आश्चर्य रूप का हृदय में अनुभव हो गया है। तो अब मेरा मन उसका आसरा छोड़ किसी ओर तरफ़ नहीं भटकता । 1। हे भाई ! मैंने मोती पा लिया है। मैंने पूरन परमात्मा को पा लिया है। है भाई ! यह मोती बहुत अमूल्य है। किसी भी मूल्य पर नहीं मिल सकता। मुझे तो यह मोती गुरू ने दिलवा दिया है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा इन आँखों से नहीं दिखता। हमारी ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है। उसका मुकम्मल स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। हे भाई ! गुरू को मिल के मैंने उसकी सिफत-सालाह करनी शुरू कर दी है। हे भाई ! मेरे दिमाग़ में अब हर वक्त सिफत-सालाह की बाणी प्रभाव डाल रही है; मेरे अंदर अब हर वक्त आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस टपक रहा है। 2। हे भाई ! मेरे मन में कभी ना समाप्त होने वाले नाम-खजाने भर गए हैं। इन खजानों में कभी कमी नहीं आ सकती। मन में (बस रही) तृष्णा (-आग की लाट) बुझ गई है। मैं हर वक्त गुरू के चरणों का आसरा ले रहा हूँ। मैंने नाम-अमृत का स्वाद चख लिया है। और पहले वाला बेढबी घाड़त वाला मन अब सुंदर मनमोहक बन गया है। 3। हे भाई ! नाम-खजाने की बरकति से मेरा मन हर वक्त आत्मिक अडोलता में टिक के कार्य-व्यवहार कर रहा है। मन सदा आत्मिक अडोलता में खेल रहा है। हे नानक ! कह- (जब से) गुरू ने मेरी भटकना दूर कर दी है। तब से मैंने सदा-स्थिर ठिकाने वाले हरी (के चरणों में) ठिकाना पा लिया है। 4। 3। 12।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਿਸਹਿ ਸਾਜਿ ਨਿਵਾਜਿਆ ਤਿਸਹਿ ਸਿਉ ਰੁਚ ਨਾਹਿ ॥
ਆਨ ਰੂਤੀ ਆਨ ਬੋਈਐ ਫਲੁ ਨ ਫੂਲੈ ਤਾਹਿ ॥੧॥
ਰੇ ਮਨ ਵਤ੍ਰ ਬੀਜਣ ਨਾਉ ॥
ਬੋਇ ਖੇਤੀ ਲਾਇ ਮਨੂਆ ਭਲੋ ਸਮਉ ਸੁਆਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਖੋਇ ਖਹੜਾ ਭਰਮੁ ਮਨ ਕਾ ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣੀ ਜਾਇ ॥
ਕਰਮੁ ਜਿਸ ਕਉ ਧੁਰਹੁ ਲਿਖਿਆ ਸੋਈ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ॥੨॥
ਭਾਉ ਲਾਗਾ ਗੋਬਿਦ ਸਿਉ ਘਾਲ ਪਾਈ ਥਾਇ ॥
ਖੇਤਿ ਮੇਰੈ ਜੰਮਿਆ ਨਿਖੁਟਿ ਨ ਕਬਹੂ ਜਾਇ ॥੩॥
ਪਾਇਆ ਅਮੋਲੁ ਪਦਾਰਥੋ ਛੋਡਿ ਨ ਕਤਹੂ ਜਾਇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਰਹੇ ਆਘਾਇ ॥੪॥੪॥੧੩॥
मारू महला ५ ॥
जिसहि साजि निवाजिआ तिसहि सिउ रुच नाहि ॥
आन रूती आन बोईऐ फलु न फूलै ताहि ॥१॥
रे मन वत्र बीजण नाउ ॥
बोइ खेती लाइ मनूआ भलो समउ सुआउ ॥१॥ रहाउ ॥
खोइ खहड़ा भरमु मन का सतिगुर सरणी जाइ ॥
करमु जिस कउ धुरहु लिखिआ सोई कार कमाइ ॥२॥
भाउ लागा गोबिद सिउ घाल पाई थाइ ॥
खेति मेरै जंमिआ निखुटि न कबहू जाइ ॥३॥
पाइआ अमोलु पदारथो छोडि न कतहू जाइ ॥
कहु नानक सुखु पाइआ त्रिपति रहे आघाइ ॥४॥४॥१३॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे भाई ! जिस परमात्मा ने तुझे पैदा करके कई बख्शिशें की हुई हैं। उससे ही तेरा प्यार नहीं। (तू और-और काम-काजों में लगा फिरता है। पर अगर) ऋतु कोई हो। बीज कोई और बो दें। उसे ना फूल लगता है ना फल। 1। हे (मेरे) मन ! (ये मनुष्य जीवन परमात्मा का) नाम-बीजने के लिए सही समय है। हे भाई ! अपना मन लगा के (हृदय की) खेती में (नाम) बीज ले। यही सही मौका है। (इसी में) लाभ है। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने मन की जिद्द अपने मन की भटकना दूर कर। और। गुरू की शरण जा पड़ (और परमात्मा का नाम-बीज बीज ले)। पर ये काम वही मनुष्य करता है जिसके माथे पर प्रभू की हजूरी से ये लेख लिखा हुआ हो। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य का परमात्मा से प्यार बन जाता है। (उसकी नाम-सिमरन की) मेहनत परमात्मा प्रवान कर लेता है। हे भाई ! मेरे हृदय-खेत में भी वह नाम-फसल उग पड़ी है जो कभी समाप्त नहीं होती। 3। हे नानक ! जिन मनुष्यों ने (प्रभू का नाम) अमूल्य पदार्थ पा लिया। वे इसको छोड़ के किसी और तरफ नहीं भटकते; वे आत्मिक आनंद भोगते हैं। वे (माया से) पूरी तरह से संतोखी जीवन वाले हो जाते हैं। 4। 4। 13।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਫੂਟੋ ਆਂਡਾ ਭਰਮ ਕਾ ਮਨਹਿ ਭਇਓ ਪਰਗਾਸੁ ॥
ਕਾਟੀ ਬੇਰੀ ਪਗਹ ਤੇ ਗੁਰਿ ਕੀਨੀ ਬੰਦਿ ਖਲਾਸੁ ॥੧॥
ਆਵਣ ਜਾਣੁ ਰਹਿਓ ॥
ਤਪਤ ਕੜਾਹਾ ਬੁਝਿ ਗਇਆ ਗੁਰਿ ਸੀਤਲ ਨਾਮੁ ਦੀਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਬ ਤੇ ਸਾਧੂ ਸੰਗੁ ਭਇਆ ਤਉ ਛੋਡਿ ਗਏ ਨਿਗਹਾਰ ॥
ਜਿਸ ਕੀ ਅਟਕ ਤਿਸ ਤੇ ਛੁਟੀ ਤਉ ਕਹਾ ਕਰੈ ਕੋਟਵਾਰ ॥੨॥
ਚੂਕਾ ਭਾਰਾ ਕਰਮ ਕਾ ਹੋਏ ਨਿਹਕਰਮਾ ॥
ਸਾਗਰ ਤੇ ਕੰਢੈ ਚੜੇ ਗੁਰਿ ਕੀਨੇ ਧਰਮਾ ॥੩॥
ਸਚੁ ਥਾਨੁ ਸਚੁ ਬੈਠਕਾ ਸਚੁ ਸੁਆਉ ਬਣਾਇਆ ॥
ਸਚੁ ਪੂੰਜੀ ਸਚੁ ਵਖਰੋ ਨਾਨਕ ਘਰਿ ਪਾਇਆ ॥੪॥੫॥੧੪॥
मारू महला ५ ॥
फूटो आंडा भरम का मनहि भइओ परगासु ॥
काटी बेरी पगह ते गुरि कीनी बंदि खलासु ॥१॥
आवण जाणु रहिओ ॥
तपत कड़ाहा बुझि गइआ गुरि सीतल नामु दीओ ॥१॥ रहाउ ॥
जब ते साधू संगु भइआ तउ छोडि गए निगहार ॥
जिस की अटक तिस ते छुटी तउ कहा करै कोटवार ॥२॥
चूका भारा करम का होए निहकरमा ॥
सागर ते कंढै चड़े गुरि कीने धरमा ॥३॥
सचु थानु सचु बैठका सचु सुआउ बणाइआ ॥
सचु पूंजी सचु वखरो नानक घरि पाइआ ॥४॥५॥१४॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे भाई ! उसके मन में आत्मिक जीवन की सूझ पैदा हो गई। उसका भ्रम (भटकना) का अण्डा टूट गया (उसका मन आत्मिक उड़ान लगाने के योग्य हो गया। जैसे अण्डे का कवच टूट जाने के बाद उसके अंदर का पंछी उड़ान भरने के लायक हो जाता है)। गुरू ने जिस मनुष्य के पैरों से (मोह की) बेड़ियाँ काट दीं। जिसको मोह की कैद से आजाद कर दिया। 1। उसकी (माया की खातिर) भटकना समाप्त हो गई। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू ने आत्मिक ठंड देने वाला हरी-नाम दे दिया। उसके अंदर से तृष्णा की आग के शोले बुझ गए।1। रहाउ। हे भाई ! जब (किसी भाग्यशाली मनुष्य को) गुरू का मिलाप हासिल हो जाता है। तब (उसके आत्मिक जीवन पर) निगाह रखने वाले (विकार उसको) छोड़ जाते हैं। जब परमात्मा की ओर से (आत्मिक जीवन की राह में) डाली हुई रुकावट उसकी मेहर से (गुरू के द्वारा) खत्म हो जाती है तब (उन निगाह रखने वालों का सरदार) कोतवाल (मोह) भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 2। उनका अनेकों जन्मों के किए बुरे कर्मों का कर्ज (भाव। विकारों के संस्कारों का संग्रह) खत्म हो गया। वे बुरे कर्मों की कैद में से निकल गए। हे भाई ! जिन मनुष्यों पर गुरू ने उपकार कर दिया। वह (संसार-) समुंद्र (में डूबने) से (बच के) किनारे पर पहुँच गए। 3। हे नानक ! (कह- जिस मनुष्य पर गुरू ने मेहर की। उसने अपने) हृदय-घर में सदा कायम रहने वाला नाम-राशि को पा लिया। सदा कायम रहने वाला नाम-सौदा प्राप्त कर लिया। उसने सदा-स्थिर हरी-नाम को अपनी जिंदगी का मनोरथ बना लिया। सदा-स्थिर हरी-चरण ही उसके लिए (आत्मिक निवास का) स्थल बन गए। बैठक बन गई। 4। 5। 14।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
मारू महला ५ ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥

संदर्भ: यह अंग 1002 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

सीस-गंज साहिब के बाहर Chandni Chowk की भीड़ और अंदर का shrine, दोनों एक साथ।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1002” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1003 →, पीछे का: ← अंग 1001

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।