अंग
1018
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਚਰਣ ਤਲੈ ਉਗਾਹਿ ਬੈਸਿਓ ਸ੍ਰਮੁ ਨ ਰਹਿਓ ਸਰੀਰਿ ॥
ਮਹਾ ਸਾਗਰੁ ਨਹ ਵਿਆਪੈ ਖਿਨਹਿ ਉਤਰਿਓ ਤੀਰਿ ॥੨॥
ਚੰਦਨ ਅਗਰ ਕਪੂਰ ਲੇਪਨ ਤਿਸੁ ਸੰਗੇ ਨਹੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
ਬਿਸਟਾ ਮੂਤ੍ਰ ਖੋਦਿ ਤਿਲੁ ਤਿਲੁ ਮਨਿ ਨ ਮਨੀ ਬਿਪਰੀਤਿ ॥੩॥
ਊਚ ਨੀਚ ਬਿਕਾਰ ਸੁਕ੍ਰਿਤ ਸੰਲਗਨ ਸਭ ਸੁਖ ਛਤ੍ਰ ॥
ਮਿਤ੍ਰ ਸਤ੍ਰੁ ਨ ਕਛੂ ਜਾਨੈ ਸਰਬ ਜੀਅ ਸਮਤ ॥੪॥
ਕਰਿ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ਪ੍ਰਚੰਡ ਪ੍ਰਗਟਿਓ ਅੰਧਕਾਰ ਬਿਨਾਸ ॥
ਪਵਿਤ੍ਰ ਅਪਵਿਤ੍ਰਹ ਕਿਰਣ ਲਾਗੇ ਮਨਿ ਨ ਭਇਓ ਬਿਖਾਦੁ ॥੫॥
ਸੀਤ ਮੰਦ ਸੁਗੰਧ ਚਲਿਓ ਸਰਬ ਥਾਨ ਸਮਾਨ ॥
ਜਹਾ ਸਾ ਕਿਛੁ ਤਹਾ ਲਾਗਿਓ ਤਿਲੁ ਨ ਸੰਕਾ ਮਾਨ ॥੬॥
ਸੁਭਾਇ ਅਭਾਇ ਜੁ ਨਿਕਟਿ ਆਵੈ ਸੀਤੁ ਤਾ ਕਾ ਜਾਇ ॥
ਆਪ ਪਰ ਕਾ ਕਛੁ ਨ ਜਾਣੈ ਸਦਾ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੭॥
ਚਰਣ ਸਰਣ ਸਨਾਥ ਇਹੁ ਮਨੁ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਲਾਲ ॥
ਗੋਪਾਲ ਗੁਣ ਨਿਤ ਗਾਉ ਨਾਨਕ ਭਏ ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾਲ ॥੮॥੩॥
ਮਹਾ ਸਾਗਰੁ ਨਹ ਵਿਆਪੈ ਖਿਨਹਿ ਉਤਰਿਓ ਤੀਰਿ ॥੨॥
ਚੰਦਨ ਅਗਰ ਕਪੂਰ ਲੇਪਨ ਤਿਸੁ ਸੰਗੇ ਨਹੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
ਬਿਸਟਾ ਮੂਤ੍ਰ ਖੋਦਿ ਤਿਲੁ ਤਿਲੁ ਮਨਿ ਨ ਮਨੀ ਬਿਪਰੀਤਿ ॥੩॥
ਊਚ ਨੀਚ ਬਿਕਾਰ ਸੁਕ੍ਰਿਤ ਸੰਲਗਨ ਸਭ ਸੁਖ ਛਤ੍ਰ ॥
ਮਿਤ੍ਰ ਸਤ੍ਰੁ ਨ ਕਛੂ ਜਾਨੈ ਸਰਬ ਜੀਅ ਸਮਤ ॥੪॥
ਕਰਿ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ਪ੍ਰਚੰਡ ਪ੍ਰਗਟਿਓ ਅੰਧਕਾਰ ਬਿਨਾਸ ॥
ਪਵਿਤ੍ਰ ਅਪਵਿਤ੍ਰਹ ਕਿਰਣ ਲਾਗੇ ਮਨਿ ਨ ਭਇਓ ਬਿਖਾਦੁ ॥੫॥
ਸੀਤ ਮੰਦ ਸੁਗੰਧ ਚਲਿਓ ਸਰਬ ਥਾਨ ਸਮਾਨ ॥
ਜਹਾ ਸਾ ਕਿਛੁ ਤਹਾ ਲਾਗਿਓ ਤਿਲੁ ਨ ਸੰਕਾ ਮਾਨ ॥੬॥
ਸੁਭਾਇ ਅਭਾਇ ਜੁ ਨਿਕਟਿ ਆਵੈ ਸੀਤੁ ਤਾ ਕਾ ਜਾਇ ॥
ਆਪ ਪਰ ਕਾ ਕਛੁ ਨ ਜਾਣੈ ਸਦਾ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੭॥
ਚਰਣ ਸਰਣ ਸਨਾਥ ਇਹੁ ਮਨੁ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਲਾਲ ॥
ਗੋਪਾਲ ਗੁਣ ਨਿਤ ਗਾਉ ਨਾਨਕ ਭਏ ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾਲ ॥੮॥੩॥
चरण तलै उगाहि बैसिओ स्रमु न रहिओ सरीरि ॥
महा सागरु नह विआपै खिनहि उतरिओ तीरि ॥२॥
चंदन अगर कपूर लेपन तिसु संगे नही प्रीति ॥
बिसटा मूत्र खोदि तिलु तिलु मनि न मनी बिपरीति ॥३॥
ऊच नीच बिकार सुक्रित संलगन सभ सुख छत्र ॥
मित्र सत्रु न कछू जानै सरब जीअ समत ॥४॥
करि प्रगासु प्रचंड प्रगटिओ अंधकार बिनास ॥
पवित्र अपवित्रह किरण लागे मनि न भइओ बिखादु ॥५॥
सीत मंद सुगंध चलिओ सरब थान समान ॥
जहा सा किछु तहा लागिओ तिलु न संका मान ॥६॥
सुभाइ अभाइ जु निकटि आवै सीतु ता का जाइ ॥
आप पर का कछु न जाणै सदा सहजि सुभाइ ॥७॥
चरण सरण सनाथ इहु मनु रंगि राते लाल ॥
गोपाल गुण नित गाउ नानक भए प्रभ किरपाल ॥८॥३॥
महा सागरु नह विआपै खिनहि उतरिओ तीरि ॥२॥
चंदन अगर कपूर लेपन तिसु संगे नही प्रीति ॥
बिसटा मूत्र खोदि तिलु तिलु मनि न मनी बिपरीति ॥३॥
ऊच नीच बिकार सुक्रित संलगन सभ सुख छत्र ॥
मित्र सत्रु न कछू जानै सरब जीअ समत ॥४॥
करि प्रगासु प्रचंड प्रगटिओ अंधकार बिनास ॥
पवित्र अपवित्रह किरण लागे मनि न भइओ बिखादु ॥५॥
सीत मंद सुगंध चलिओ सरब थान समान ॥
जहा सा किछु तहा लागिओ तिलु न संका मान ॥६॥
सुभाइ अभाइ जु निकटि आवै सीतु ता का जाइ ॥
आप पर का कछु न जाणै सदा सहजि सुभाइ ॥७॥
चरण सरण सनाथ इहु मनु रंगि राते लाल ॥
गोपाल गुण नित गाउ नानक भए प्रभ किरपाल ॥८॥३॥
हिन्दी अर्थ: (हे मेरे मन ! जो मनुष्य बेड़ी को) पैरों तले दबा के (उसमें) बैठ गया। (उस मनुष्य के) शरीर में (रास्ते की) थकावट ना रही। भयानक समुंद्र (दरिया भी) उस पर अपना असर नहीं डाल सके। (बेड़ी में बैठ के वह) एक छिन में ही (उस दरिया से) उस पार किनारे पर जा उतरा। 2। (हे मेरे मन ! जो मनुष्य धरती पर) चंदन अगर कपूर का लेपन (करता है। धरती) उस (मनुष्य) के साथ (कोई विशेष) प्यार नहीं करती; और (जो मनुष्य धरती पर) गूह-मूत्र (फेंकता है। धरती को) खोद के रक्ती रक्ती (करता है। उस मनुष्य के विरुद्ध अपने) मन में (धरती) बुरा नहीं मनाती। 3। (हे मेरे मन !) कोई ऊँचा हो अथवा नीचा हो। कोई बुराई करे या कोई भलाई करे (आकाश सबके साथ) एक समान ही लगा रहता है। सबके लिए सुखों का छत्र (बना रहता) है। (आकाश) ना किसी को मित्र समझता है ना किसी को वैरी। (आकाश) सारे जीवों के लिए एक-समान है। 4। (हे मेरे मन ! सूर्य) तेज़ रौशनी करके (आकाश में) प्रकट होता है और अंधकार का नाश करता है। अच्छे-बुरे सब जीवों को उसकी किरणें लगती हैं। (सूर्य के) मन में (इस बात का) दुख नहीं होता। 5। हे मेरे मन ! ठंडी (हवा) सुगंधि भरी (पवन) हल्की-हल्की सब जगहों पर एक जैसी ही चलती है; जहाँ भी कोई चीज़ हो (अच्छी हो चाहे बुरी हो) वहाँ भी (सबको) लगती है। रक्ती भर भी संकोच नहीं करती। 6। (हे मेरे मन !) जो भी मनुष्य सद्-भावना से अथवा दुर्भावना से (आग के) नज़दीक आता है। उसकी लगी ठंडक दूर हो जाती है। (आग) ये बात बिल्कुल नहीं जानती कि यह अपना है यह पराया है। (आग) अडोलता में रहती है अपने स्वभाव में रहती है। 7। (हे मेरे मन ! इसी तरह परमात्मा के संत जन) परमात्मा के चरणों की शरण में रह के खसम वाले बन जाते हैं। वे सोहाने प्रभू में रते रहते हैं। उनका यह मन प्रभू के प्रेम-रंग में (रंगा रहता है)। (हे मेरे मन ! तू भी) गोपाल प्रभू के गुण गाता रहा कर। हे नानक ! (जो गुण गाते हैं उन पर) प्रभू जी दयावान हो जाते हैं। 8। 3।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੪ ਅਸਟਪਦੀਆ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਚਾਦਨਾ ਚਾਦਨੁ ਆਂਗਨਿ ਪ੍ਰਭ ਜੀਉ ਅੰਤਰਿ ਚਾਦਨਾ ॥੧॥
ਆਰਾਧਨਾ ਅਰਾਧਨੁ ਨੀਕਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਰਾਧਨਾ ॥੨॥
ਤਿਆਗਨਾ ਤਿਆਗਨੁ ਨੀਕਾ ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਲੋਭੁ ਤਿਆਗਨਾ ॥੩॥
ਮਾਗਨਾ ਮਾਗਨੁ ਨੀਕਾ ਹਰਿ ਜਸੁ ਗੁਰ ਤੇ ਮਾਗਨਾ ॥੪॥
ਜਾਗਨਾ ਜਾਗਨੁ ਨੀਕਾ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨ ਮਹਿ ਜਾਗਨਾ ॥੫॥
ਲਾਗਨਾ ਲਾਗਨੁ ਨੀਕਾ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਮਨੁ ਲਾਗਨਾ ॥੬॥
ਇਹ ਬਿਧਿ ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤੇ ਜਾ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗਨਾ ॥੭॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਨੀਕਾ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸਰਨਾਗਨਾ ॥੮॥੧॥੪॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਚਾਦਨਾ ਚਾਦਨੁ ਆਂਗਨਿ ਪ੍ਰਭ ਜੀਉ ਅੰਤਰਿ ਚਾਦਨਾ ॥੧॥
ਆਰਾਧਨਾ ਅਰਾਧਨੁ ਨੀਕਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਰਾਧਨਾ ॥੨॥
ਤਿਆਗਨਾ ਤਿਆਗਨੁ ਨੀਕਾ ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਲੋਭੁ ਤਿਆਗਨਾ ॥੩॥
ਮਾਗਨਾ ਮਾਗਨੁ ਨੀਕਾ ਹਰਿ ਜਸੁ ਗੁਰ ਤੇ ਮਾਗਨਾ ॥੪॥
ਜਾਗਨਾ ਜਾਗਨੁ ਨੀਕਾ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨ ਮਹਿ ਜਾਗਨਾ ॥੫॥
ਲਾਗਨਾ ਲਾਗਨੁ ਨੀਕਾ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਮਨੁ ਲਾਗਨਾ ॥੬॥
ਇਹ ਬਿਧਿ ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤੇ ਜਾ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗਨਾ ॥੭॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਨੀਕਾ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸਰਨਾਗਨਾ ॥੮॥੧॥੪॥
मारू महला ५ घरु ४ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चादना चादनु आंगनि प्रभ जीउ अंतरि चादना ॥१॥
आराधना अराधनु नीका हरि हरि नामु अराधना ॥२॥
तिआगना तिआगनु नीका कामु क्रोधु लोभु तिआगना ॥३॥
मागना मागनु नीका हरि जसु गुर ते मागना ॥४॥
जागना जागनु नीका हरि कीरतन महि जागना ॥५॥
लागना लागनु नीका गुर चरणी मनु लागना ॥६॥
इह बिधि तिसहि परापते जा कै मसतकि भागना ॥७॥
कहु नानक तिसु सभु किछु नीका जो प्रभ की सरनागना ॥८॥१॥४॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चादना चादनु आंगनि प्रभ जीउ अंतरि चादना ॥१॥
आराधना अराधनु नीका हरि हरि नामु अराधना ॥२॥
तिआगना तिआगनु नीका कामु क्रोधु लोभु तिआगना ॥३॥
मागना मागनु नीका हरि जसु गुर ते मागना ॥४॥
जागना जागनु नीका हरि कीरतन महि जागना ॥५॥
लागना लागनु नीका गुर चरणी मनु लागना ॥६॥
इह बिधि तिसहि परापते जा कै मसतकि भागना ॥७॥
कहु नानक तिसु सभु किछु नीका जो प्रभ की सरनागना ॥८॥१॥४॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५ घरु ४ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ (हे भाई ! लोग खुशी आदि के मौके पर घरों में दीए आदि जला के रौशनी करते हैं। पर मनुष्य के) हृदय में परमात्मा के नाम की रौशनी हो जाना – ये आँगन में अन्य सभी रौशनियों से उक्तम रौशनी है। 1। हे भाई ! सदा परमात्मा का ही नाम सिमरना- ये अन्य सभी सिमरनों से बढ़िया सिमरन है। 2। (हे भाई ! माया के मोह में से निकलने के लिए लोग गृहस्त त्याग जाते हैं। पर) काम-क्रोध-लोभ (आदि विकारों को हृदय में से) त्याग देना- ये अन्य सारे त्यागों में श्रेष्ठ त्याग है। 3। हे भाई ! गुरू से परमात्मा की सिफत सालाह की खैर माँगना- ये अन्य सभी माँगों से उक्तम माँग है। 4। (हे भाई ! देवी आदि की पूजा के लिए लोग जगराते करते हैं। पर) परमात्मा की सिफत-सालाह महिमा में जागना -यह और सभी जगरातों से श्रेष्ठतम् जगराता है। 5। हे भाई ! गुरू के चरणों में मन का प्यार बन जाना- ये अन्य सभी लगी हुई लगनों में से उच्च दर्जे की लगन है। 6। पर। हे भाई ! ये जुगति उसी ही मनुष्य को प्राप्त होती है। जिसके माथे पर भाग्य जाग उठें। 7। हे नानक ! कह- जो मनुष्य परमात्मा की शरण में आ जाता है। उसको हरेक सद्-गुण प्राप्त हो जाता है। 8। 1। 4।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਉ ਜੀ ਤੂ ਆਉ ਹਮਾਰੈ ਹਰਿ ਜਸੁ ਸ੍ਰਵਨ ਸੁਨਾਵਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੁਧੁ ਆਵਤ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਹਰਿਆ ਹਰਿ ਜਸੁ ਤੁਮ ਸੰਗਿ ਗਾਵਨਾ ॥੧॥
ਸੰਤ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਹਿਰਦੈ ਵਾਸੈ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਮਿਟਾਵਨਾ ॥੨॥
ਭਗਤ ਦਇਆ ਤੇ ਬੁਧਿ ਪਰਗਾਸੈ ਦੁਰਮਤਿ ਦੂਖ ਤਜਾਵਨਾ ॥੩॥
ਦਰਸਨੁ ਭੇਟਤ ਹੋਤ ਪੁਨੀਤਾ ਪੁਨਰਪਿ ਗਰਭਿ ਨ ਪਾਵਨਾ ॥੪॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ਪਾਈ ਜੋ ਤੁਮਰੈ ਮਨਿ ਭਾਵਨਾ ॥੫॥
ਸੰਤ ਬਿਨਾ ਮੈ ਥਾਉ ਨ ਕੋਈ ਅਵਰ ਨ ਸੂਝੈ ਜਾਵਨਾ ॥੬॥
ਮੋਹਿ ਨਿਰਗੁਨ ਕਉ ਕੋਇ ਨ ਰਾਖੈ ਸੰਤਾ ਸੰਗਿ ਸਮਾਵਨਾ ॥੭॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਚਲਤੁ ਦਿਖਾਇਆ ਮਨ ਮਧੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਾਵਨਾ ॥੮॥੨॥੫॥
ਆਉ ਜੀ ਤੂ ਆਉ ਹਮਾਰੈ ਹਰਿ ਜਸੁ ਸ੍ਰਵਨ ਸੁਨਾਵਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੁਧੁ ਆਵਤ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਹਰਿਆ ਹਰਿ ਜਸੁ ਤੁਮ ਸੰਗਿ ਗਾਵਨਾ ॥੧॥
ਸੰਤ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਹਿਰਦੈ ਵਾਸੈ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਮਿਟਾਵਨਾ ॥੨॥
ਭਗਤ ਦਇਆ ਤੇ ਬੁਧਿ ਪਰਗਾਸੈ ਦੁਰਮਤਿ ਦੂਖ ਤਜਾਵਨਾ ॥੩॥
ਦਰਸਨੁ ਭੇਟਤ ਹੋਤ ਪੁਨੀਤਾ ਪੁਨਰਪਿ ਗਰਭਿ ਨ ਪਾਵਨਾ ॥੪॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ਪਾਈ ਜੋ ਤੁਮਰੈ ਮਨਿ ਭਾਵਨਾ ॥੫॥
ਸੰਤ ਬਿਨਾ ਮੈ ਥਾਉ ਨ ਕੋਈ ਅਵਰ ਨ ਸੂਝੈ ਜਾਵਨਾ ॥੬॥
ਮੋਹਿ ਨਿਰਗੁਨ ਕਉ ਕੋਇ ਨ ਰਾਖੈ ਸੰਤਾ ਸੰਗਿ ਸਮਾਵਨਾ ॥੭॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਚਲਤੁ ਦਿਖਾਇਆ ਮਨ ਮਧੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਾਵਨਾ ॥੮॥੨॥੫॥
मारू महला ५ ॥
आउ जी तू आउ हमारै हरि जसु स्रवन सुनावना ॥१॥ रहाउ ॥
तुधु आवत मेरा मनु तनु हरिआ हरि जसु तुम संगि गावना ॥१॥
संत क्रिपा ते हिरदै वासै दूजा भाउ मिटावना ॥२॥
भगत दइआ ते बुधि परगासै दुरमति दूख तजावना ॥३॥
दरसनु भेटत होत पुनीता पुनरपि गरभि न पावना ॥४॥
नउ निधि रिधि सिधि पाई जो तुमरै मनि भावना ॥५॥
संत बिना मै थाउ न कोई अवर न सूझै जावना ॥६॥
मोहि निरगुन कउ कोइ न राखै संता संगि समावना ॥७॥
कहु नानक गुरि चलतु दिखाइआ मन मधे हरि हरि रावना ॥८॥२॥५॥
आउ जी तू आउ हमारै हरि जसु स्रवन सुनावना ॥१॥ रहाउ ॥
तुधु आवत मेरा मनु तनु हरिआ हरि जसु तुम संगि गावना ॥१॥
संत क्रिपा ते हिरदै वासै दूजा भाउ मिटावना ॥२॥
भगत दइआ ते बुधि परगासै दुरमति दूख तजावना ॥३॥
दरसनु भेटत होत पुनीता पुनरपि गरभि न पावना ॥४॥
नउ निधि रिधि सिधि पाई जो तुमरै मनि भावना ॥५॥
संत बिना मै थाउ न कोई अवर न सूझै जावना ॥६॥
मोहि निरगुन कउ कोइ न राखै संता संगि समावना ॥७॥
कहु नानक गुरि चलतु दिखाइआ मन मधे हरि हरि रावना ॥८॥२॥५॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे प्यारे प्रभू ! आ। मेरे हृदय-गृह में आ बस। और। मेरे कानों में परमात्मा की सिफत-सालाह सुना। 1। रहाउ। हे प्यारे गुरू ! तेरे आने से मेरा मन मेरा तन आत्मिक जीवन वाला हो जाता है। हे सतिगुरू ! तेरे चरणों में रह के ही परमात्मा का यश गाया जा सकता है। 1। हे भाई ! गुरू की मेहर से परमात्मा हृदय में आ बसता है। और माया का मोह दूर किया जा सकता है। 2। हे भाई ! परमात्मा के भगत की किरपा से बुद्धि में आत्मिक जीवन का प्रकाश हो जाता है। दुर्मति के सारे विकार त्यागे जाते हैं। 3। हे भाई ! गुरू के दर्शन करने से जीवन पवित्र हो जाता है। बार-बार जूनियों के चक्कर में नहीं पड़ा जाता। 4। हे प्रभू ! जो (भाग्यशाली) मनुष्य तेरे मन को प्यारा लगने लग जाता है। वह। (मानो) दुनिया के सारे ही नौ खजाने और करामाती ताकतें हासिल कर लेता है। 5। हे भाई ! गुरू के बिना मेरा और कोई आसरा नहीं। किसी और जगह जाना मुझे नहीं सूझता। 6। हे भाई ! मेरी गुण-हीन की (गुरू के बिना) और कोई बाँह नहीं पकड़ता। संत जनों की संगति में रह के ही प्रभू-चरणों में लीन हुआ जाता है। 7। हे नानक ! कह- गुरू ने (मुझे) आश्चर्यजनक तमाशा दिखा दिया है। मैं अपने मन में हर वक्त परमात्मा के मिलाप का आनंद ले रहा हूँ। 8। 2। 5।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1018 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Nizamuddin dargah के बाहर qawwali सुनते-सुनते।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 34 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1018” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1019 →, पीछे का: ← अंग 1017।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।