अंग
1023
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਚੈ ਊਪਰਿ ਅਵਰ ਨ ਦੀਸੈ ਸਾਚੇ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੮॥
ਐਥੈ ਗੋਇਲੜਾ ਦਿਨ ਚਾਰੇ ॥
ਖੇਲੁ ਤਮਾਸਾ ਧੁੰਧੂਕਾਰੇ ॥
ਬਾਜੀ ਖੇਲਿ ਗਏ ਬਾਜੀਗਰ ਜਿਉ ਨਿਸਿ ਸੁਪਨੈ ਭਖਲਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਤਿਨ ਕਉ ਤਖਤਿ ਮਿਲੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਨਿਰਭਉ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਖੰਡੀ ਬ੍ਰਹਮੰਡੀ ਪਾਤਾਲੀ ਪੁਰੀਈ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਸਾਚੀ ਨਗਰੀ ਤਖਤੁ ਸਚਾਵਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਮਿਲੈ ਸੁਖੁ ਪਾਵਾ ॥
ਸਾਚੇ ਸਾਚੈ ਤਖਤਿ ਵਡਾਈ ਹਉਮੈ ਗਣਤ ਗਵਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਗਣਤ ਗਣੀਐ ਸਹਸਾ ਜੀਐ ॥
ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ਦੂਐ ਤੀਐ ॥
ਨਿਰਮਲੁ ਏਕੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਦਾਤਾ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਤਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਵਿਰਲੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ॥
ਸਾਚਾ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਓਟ ਗਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਮਨਿ ਤਨਿ ਮੈਲੁ ਨ ਕਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਜੀਭ ਰਸਾਇਣਿ ਸਾਚੈ ਰਾਤੀ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੰਗੀ ਭਉ ਨ ਭਰਾਤੀ ॥
ਸ੍ਰਵਣ ਸ੍ਰੋਤ ਰਜੇ ਗੁਰਬਾਣੀ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਰਖਿ ਰਖਿ ਪੈਰ ਧਰੇ ਪਉ ਧਰਣਾ ॥
ਜਤ ਕਤ ਦੇਖਉ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾ ॥
ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਦੇਹਿ ਤੂਹੈ ਮਨਿ ਭਾਵਹਿ ਤੁਝ ਹੀ ਸਿਉ ਬਣਿ ਆਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਅੰਤ ਕਾਲਿ ਕੋ ਬੇਲੀ ਨਾਹੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ਤੁਧੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਬੈਰਾਗੀ ਨਿਜ ਘਰਿ ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੩॥
ਐਥੈ ਗੋਇਲੜਾ ਦਿਨ ਚਾਰੇ ॥
ਖੇਲੁ ਤਮਾਸਾ ਧੁੰਧੂਕਾਰੇ ॥
ਬਾਜੀ ਖੇਲਿ ਗਏ ਬਾਜੀਗਰ ਜਿਉ ਨਿਸਿ ਸੁਪਨੈ ਭਖਲਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਤਿਨ ਕਉ ਤਖਤਿ ਮਿਲੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਨਿਰਭਉ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਖੰਡੀ ਬ੍ਰਹਮੰਡੀ ਪਾਤਾਲੀ ਪੁਰੀਈ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਸਾਚੀ ਨਗਰੀ ਤਖਤੁ ਸਚਾਵਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਮਿਲੈ ਸੁਖੁ ਪਾਵਾ ॥
ਸਾਚੇ ਸਾਚੈ ਤਖਤਿ ਵਡਾਈ ਹਉਮੈ ਗਣਤ ਗਵਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਗਣਤ ਗਣੀਐ ਸਹਸਾ ਜੀਐ ॥
ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ਦੂਐ ਤੀਐ ॥
ਨਿਰਮਲੁ ਏਕੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਦਾਤਾ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਤਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਵਿਰਲੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ॥
ਸਾਚਾ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਓਟ ਗਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਮਨਿ ਤਨਿ ਮੈਲੁ ਨ ਕਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਜੀਭ ਰਸਾਇਣਿ ਸਾਚੈ ਰਾਤੀ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੰਗੀ ਭਉ ਨ ਭਰਾਤੀ ॥
ਸ੍ਰਵਣ ਸ੍ਰੋਤ ਰਜੇ ਗੁਰਬਾਣੀ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਰਖਿ ਰਖਿ ਪੈਰ ਧਰੇ ਪਉ ਧਰਣਾ ॥
ਜਤ ਕਤ ਦੇਖਉ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾ ॥
ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਦੇਹਿ ਤੂਹੈ ਮਨਿ ਭਾਵਹਿ ਤੁਝ ਹੀ ਸਿਉ ਬਣਿ ਆਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਅੰਤ ਕਾਲਿ ਕੋ ਬੇਲੀ ਨਾਹੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ਤੁਧੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਬੈਰਾਗੀ ਨਿਜ ਘਰਿ ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੩॥
सचै ऊपरि अवर न दीसै साचे कीमति पाई हे ॥८॥
ऐथै गोइलड़ा दिन चारे ॥
खेलु तमासा धुंधूकारे ॥
बाजी खेलि गए बाजीगर जिउ निसि सुपनै भखलाई हे ॥९॥
तिन कउ तखति मिली वडिआई ॥
निरभउ मनि वसिआ लिव लाई ॥
खंडी ब्रहमंडी पाताली पुरीई त्रिभवण ताड़ी लाई हे ॥१०॥
साची नगरी तखतु सचावा ॥
गुरमुखि साचु मिलै सुखु पावा ॥
साचे साचै तखति वडाई हउमै गणत गवाई हे ॥११॥
गणत गणीऐ सहसा जीऐ ॥
किउ सुखु पावै दूऐ तीऐ ॥
निरमलु एकु निरंजनु दाता गुर पूरे ते पति पाई हे ॥१२॥
जुगि जुगि विरली गुरमुखि जाता ॥
साचा रवि रहिआ मनु राता ॥
तिस की ओट गही सुखु पाइआ मनि तनि मैलु न काई हे ॥१३॥
जीभ रसाइणि साचै राती ॥
हरि प्रभु संगी भउ न भराती ॥
स्रवण स्रोत रजे गुरबाणी जोती जोति मिलाई हे ॥१४॥
रखि रखि पैर धरे पउ धरणा ॥
जत कत देखउ तेरी सरणा ॥
दुखु सुखु देहि तूहै मनि भावहि तुझ ही सिउ बणि आई हे ॥१५॥
अंत कालि को बेली नाही ॥
गुरमुखि जाता तुधु सालाही ॥
नानक नामि रते बैरागी निज घरि ताड़ी लाई हे ॥१६॥३॥
ऐथै गोइलड़ा दिन चारे ॥
खेलु तमासा धुंधूकारे ॥
बाजी खेलि गए बाजीगर जिउ निसि सुपनै भखलाई हे ॥९॥
तिन कउ तखति मिली वडिआई ॥
निरभउ मनि वसिआ लिव लाई ॥
खंडी ब्रहमंडी पाताली पुरीई त्रिभवण ताड़ी लाई हे ॥१०॥
साची नगरी तखतु सचावा ॥
गुरमुखि साचु मिलै सुखु पावा ॥
साचे साचै तखति वडाई हउमै गणत गवाई हे ॥११॥
गणत गणीऐ सहसा जीऐ ॥
किउ सुखु पावै दूऐ तीऐ ॥
निरमलु एकु निरंजनु दाता गुर पूरे ते पति पाई हे ॥१२॥
जुगि जुगि विरली गुरमुखि जाता ॥
साचा रवि रहिआ मनु राता ॥
तिस की ओट गही सुखु पाइआ मनि तनि मैलु न काई हे ॥१३॥
जीभ रसाइणि साचै राती ॥
हरि प्रभु संगी भउ न भराती ॥
स्रवण स्रोत रजे गुरबाणी जोती जोति मिलाई हे ॥१४॥
रखि रखि पैर धरे पउ धरणा ॥
जत कत देखउ तेरी सरणा ॥
दुखु सुखु देहि तूहै मनि भावहि तुझ ही सिउ बणि आई हे ॥१५॥
अंत कालि को बेली नाही ॥
गुरमुखि जाता तुधु सालाही ॥
नानक नामि रते बैरागी निज घरि ताड़ी लाई हे ॥१६॥३॥
हिन्दी अर्थ: उस सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के (सिर) पर और कोई (ताकत) नहीं दिखती जो उस सदा-स्थिर (की समर्था) का मूल्य डाल सके। 8। (जैसे मुश्किल के दिनों में दरियाओं के किनारे पशू-मवेशियों को चराने आए लोगों का वहाँ थोड़े दिनों के लिए ही ठिकाना होता है। वैसे ही) यहाँ जगत में जीवों का चार दिनों का ही बसेरा है। यह जगत एक खेल है। एक तमाशा है। पर (जीव माया के मोह के कारण अज्ञानता के) घोर अंधेरे में फसे पड़े हैं। बाज़ीगरों की तरह जीव (माया की) बाज़ी खेल के चले जाते हैं। (इस खेल में से किसी के हाथ-पल्ले कुछ नहीं पड़ता) जैसे रात के सपने में कोई व्यक्ति (धन पा के) बड़-बड़ाता है (पर सपना टूट जाने पर पल्ले कुछ भी नहीं रहता)। 9। (वह। मानो। आत्मिक मण्डल में बादशाह बन जाते हैं) उनको तख़्त पर बैठने की महिमा मिलती है (वे सदा अपने हृदय-तख़्त पर बैठते हैं)। वह निर्भय प्रभू जिन मनुष्यों के मन में बस जाता है जो मनुष्य उस प्रभू की याद में जुड़ते हैं जो परमात्मा सारे खण्डों-ब्रहमण्डों-पातालों-मण्डलों में तीनों ही भवनों में गुप्त रूप में व्यापक है 10। उसका ये शरीर उसका यह हृदय-तख़्त सदा-स्थिर प्रभू का निवास-स्थान बन जाता है। जिस मनुष्य को गुरू के सन्मुख हो के सदा-स्थिर प्रभू मिल जाता है उसको आत्मिक आनंद प्राप्त हो जाता है। उस मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभू के सदा-स्थिर तख़्त पर (माया की ओर से सदा अडोल रहने वाले हृदय-तख़्त पर बैठने की) वडिआई महिमा मिलती है। वह मनुष्य अहंकार और माया की सोचें दूर कर लेता है। 11। जब तलक माया की सोचें सोचते रहें प्राणों में सहम बना ही रहता है। ना ही प्रभू के बिना किसी अन्य झाक में और ना ही त्रिगुणी माया की लगन में – सुख कहीं नहीं मिलता। जिस मनुष्य ने पूरे गुरू की शरण पड़ कर इज्जत कमा ली (उसको निश्चय हो जाता है कि) सब दातें देने वाला एक परमात्मा ही है जो पवित्र-स्वरूप है और जिस पर माया की कालिख़ का प्रभाव नहीं पड़ता। 12। हरेक युग में (भाव। युग चाहे कोई भी हो) किसी उस विरले ने ही सदा-स्थिर प्रभू के साथ सांझ डाली है जो गुरू की शरण पड़ा है। वह सदा-स्थिर प्रभू हर जगह मौजूद है। (गुरू के माध्यम से जिसका) मन (उस प्रभू के प्रेम-रंग में) रंगा गया है। जिसने उस सदा-स्थिर प्रभू का पल्ला पकड़ा है उसको आत्मिक आनंद मिल गया है। उसके मन में उसके तन में (विकारों की) कोई मैल नहीं रह जाती। 13। जिस मनुष्य की जीभ सब रसों के श्रोत सदा-स्थिर प्रभू के नाम-रंग में रंगी जाती है। हरी परमात्मा उसका (सदा के लिए) साथी बन जाता है। उसको कोई डर नहीं व्यापता। उसको कोई भटकना नहीं रह जाती। सतिगुरू की बाणी सुनने में उसके कान सदा मस्त रहते हैं। उसकी सुरति प्रभू की ज्योति में मिली रहती है। 14। हे प्रभू ! वह मनुष्य धरती पर अपनी जीवन-पथ समाप्त करते हुए बड़े ही ध्यान से पैर रखता है (विकारों की ओर बिल्कुल ही नहीं पड़ता)। मैं जिधर देखता हूँ उधर सब जीव तेरी ही शरण पड़ते हैं। जिस मनुष्य की प्रीति सिर्फ तेरे साथ ही निभ रही है (भाव। जिसने अन्य सारे आसरे छोड़ के सिर्फ एक तेरा ही आसरा पकड़ा है) तू ही उसके मन को प्यारा लगने लगता है। (उसको निश्चय हो जाता है कि) तू ही सुख देता है तू ही दुख देता है। 15। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं वे यह समझ लेते हैं कि जगत में आखिरी वक्त कोई (साक-संबंधी) साथी नहीं बन सकता। (इस वास्ते। हे प्रभू !) वह तेरी ही सिफत-सालाह करते हैं। हे नानक ! वे मनुष्य प्रभू के नाम-रंग में रंगे रहते हैं। वे माया के मोह से उपराम रहते हैं। वे सदा अपने हृदय-गृह में टिक के प्रभू-चरणों में जुड़े रहते हैं। 16। 3।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦੀ ਅਪਰ ਅਪਾਰੇ ॥
ਆਦਿ ਨਿਰੰਜਨ ਖਸਮ ਹਮਾਰੇ ॥
ਸਾਚੇ ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਵੀਚਾਰੀ ਸਾਚੇ ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਕੇਤੜਿਆ ਜੁਗ ਧੁੰਧੂਕਾਰੈ ॥
ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਸਿਰਜਣਹਾਰੈ ॥
ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ਸਾਚੈ ਤਖਤਿ ਵਡਾਈ ਹੇ ॥੨॥
ਸਤਜੁਗਿ ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਸਰੀਰਾ ॥
ਸਤਿ ਸਤਿ ਵਰਤੈ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰਾ ॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਪਰਖੈ ਸਾਚੈ ਹੁਕਮਿ ਚਲਾਈ ਹੇ ॥੩॥
ਸਤ ਸੰਤੋਖੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਮਨੇ ਸੋ ਸੂਰਾ ॥
ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਸਾਚੁ ਨਿਵਾਸਾ ਮਾਨੈ ਹੁਕਮੁ ਰਜਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਸਤਜੁਗਿ ਸਾਚੁ ਕਹੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
ਸਚਿ ਵਰਤੈ ਸਾਚਾ ਸੋਈ ॥
ਮਨਿ ਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਭਰਮ ਭਉ ਭੰਜਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਸਖਾਈ ਹੇ ॥੫॥
ਤ੍ਰੇਤੈ ਧਰਮ ਕਲਾ ਇਕ ਚੂਕੀ ॥
ਤੀਨਿ ਚਰਣ ਇਕ ਦੁਬਿਧਾ ਸੂਕੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਸਾਚੁ ਵਖਾਣੈ ਮਨਮੁਖਿ ਪਚੈ ਅਵਾਈ ਹੇ ॥੬॥
ਮਨਮੁਖਿ ਕਦੇ ਨ ਦਰਗਹ ਸੀਝੈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਕਿਉ ਅੰਤਰੁ ਰੀਝੈ ॥
ਬਾਧੇ ਆਵਹਿ ਬਾਧੇ ਜਾਵਹਿ ਸੋਝੀ ਬੂਝ ਨ ਕਾਈ ਹੇ ॥੭॥
ਦਇਆ ਦੁਆਪੁਰਿ ਅਧੀ ਹੋਈ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦੀ ਅਪਰ ਅਪਾਰੇ ॥
ਆਦਿ ਨਿਰੰਜਨ ਖਸਮ ਹਮਾਰੇ ॥
ਸਾਚੇ ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਵੀਚਾਰੀ ਸਾਚੇ ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਕੇਤੜਿਆ ਜੁਗ ਧੁੰਧੂਕਾਰੈ ॥
ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਸਿਰਜਣਹਾਰੈ ॥
ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ਸਾਚੈ ਤਖਤਿ ਵਡਾਈ ਹੇ ॥੨॥
ਸਤਜੁਗਿ ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਸਰੀਰਾ ॥
ਸਤਿ ਸਤਿ ਵਰਤੈ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰਾ ॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਪਰਖੈ ਸਾਚੈ ਹੁਕਮਿ ਚਲਾਈ ਹੇ ॥੩॥
ਸਤ ਸੰਤੋਖੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਮਨੇ ਸੋ ਸੂਰਾ ॥
ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਸਾਚੁ ਨਿਵਾਸਾ ਮਾਨੈ ਹੁਕਮੁ ਰਜਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਸਤਜੁਗਿ ਸਾਚੁ ਕਹੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
ਸਚਿ ਵਰਤੈ ਸਾਚਾ ਸੋਈ ॥
ਮਨਿ ਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਭਰਮ ਭਉ ਭੰਜਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਸਖਾਈ ਹੇ ॥੫॥
ਤ੍ਰੇਤੈ ਧਰਮ ਕਲਾ ਇਕ ਚੂਕੀ ॥
ਤੀਨਿ ਚਰਣ ਇਕ ਦੁਬਿਧਾ ਸੂਕੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਸਾਚੁ ਵਖਾਣੈ ਮਨਮੁਖਿ ਪਚੈ ਅਵਾਈ ਹੇ ॥੬॥
ਮਨਮੁਖਿ ਕਦੇ ਨ ਦਰਗਹ ਸੀਝੈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਕਿਉ ਅੰਤਰੁ ਰੀਝੈ ॥
ਬਾਧੇ ਆਵਹਿ ਬਾਧੇ ਜਾਵਹਿ ਸੋਝੀ ਬੂਝ ਨ ਕਾਈ ਹੇ ॥੭॥
ਦਇਆ ਦੁਆਪੁਰਿ ਅਧੀ ਹੋਈ ॥
मारू महला १ ॥
आदि जुगादी अपर अपारे ॥
आदि निरंजन खसम हमारे ॥
साचे जोग जुगति वीचारी साचे ताड़ी लाई हे ॥१॥
केतड़िआ जुग धुंधूकारै ॥
ताड़ी लाई सिरजणहारै ॥
सचु नामु सची वडिआई साचै तखति वडाई हे ॥२॥
सतजुगि सतु संतोखु सरीरा ॥
सति सति वरतै गहिर गंभीरा ॥
सचा साहिबु सचु परखै साचै हुकमि चलाई हे ॥३॥
सत संतोखी सतिगुरु पूरा ॥
गुर का सबदु मने सो सूरा ॥
साची दरगह साचु निवासा मानै हुकमु रजाई हे ॥४॥
सतजुगि साचु कहै सभु कोई ॥
सचि वरतै साचा सोई ॥
मनि मुखि साचु भरम भउ भंजनु गुरमुखि साचु सखाई हे ॥५॥
त्रेतै धरम कला इक चूकी ॥
तीनि चरण इक दुबिधा सूकी ॥
गुरमुखि होवै सु साचु वखाणै मनमुखि पचै अवाई हे ॥६॥
मनमुखि कदे न दरगह सीझै ॥
बिनु सबदै किउ अंतरु रीझै ॥
बाधे आवहि बाधे जावहि सोझी बूझ न काई हे ॥७॥
दइआ दुआपुरि अधी होई ॥
आदि जुगादी अपर अपारे ॥
आदि निरंजन खसम हमारे ॥
साचे जोग जुगति वीचारी साचे ताड़ी लाई हे ॥१॥
केतड़िआ जुग धुंधूकारै ॥
ताड़ी लाई सिरजणहारै ॥
सचु नामु सची वडिआई साचै तखति वडाई हे ॥२॥
सतजुगि सतु संतोखु सरीरा ॥
सति सति वरतै गहिर गंभीरा ॥
सचा साहिबु सचु परखै साचै हुकमि चलाई हे ॥३॥
सत संतोखी सतिगुरु पूरा ॥
गुर का सबदु मने सो सूरा ॥
साची दरगह साचु निवासा मानै हुकमु रजाई हे ॥४॥
सतजुगि साचु कहै सभु कोई ॥
सचि वरतै साचा सोई ॥
मनि मुखि साचु भरम भउ भंजनु गुरमुखि साचु सखाई हे ॥५॥
त्रेतै धरम कला इक चूकी ॥
तीनि चरण इक दुबिधा सूकी ॥
गुरमुखि होवै सु साचु वखाणै मनमुखि पचै अवाई हे ॥६॥
मनमुखि कदे न दरगह सीझै ॥
बिनु सबदै किउ अंतरु रीझै ॥
बाधे आवहि बाधे जावहि सोझी बूझ न काई हे ॥७॥
दइआ दुआपुरि अधी होई ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ हे सारी रचना के मूल ! हे जुगों के शुरू से मौजूद प्रभू ! हे अपर और अपार हरी ! हे निरंजन ! हे हमारे खसम ! हे सदा-स्थिर प्रभू ! हे मिलाप की जुगती को विचारने वाले ! (जब तूने संसार की रचना नहीं की थी) तूने अपने आप में समाधि लगाई हुई थी। 1। अनेकों ही युग उस अवस्था में जिसकी बाबत कुछ भी पता नहीं चल सकता (जगत-रचना से पहले) सृजनहार ने समाधि लगाई । उस सृजनहार का नाम सदा-स्थिर रहने वाला है। उसकी वडिआई सदा कायम रहने वाली है। वह वडिआई का मालिक प्रभू सदा टिके रहने वाले तख़्त पर बैठा हुआ है। 2। जिन प्राणियों के अंदर (उस सृजनहार की मेहर के सदका) सत्य और संतोख (वाला जीवन उघड़ता) है। वह। मानो। सतियुग में (बस रहे हैं)। गहरा और बड़े जिगरे वाला प्रभू (हर जगह) व्यापक हो रहा है। (जगत रचना करके) वह सदा-स्थिर रहने वाला। सदा-स्थिर रहने वाला मालिक (सब जीवों की) सही परख करता है। वह सृष्टि की कार को अपने अॅटल हुकम में चला रहा है। 3। पूरा गुरू (भी) सत और संतोख का मालिक है। जो मनुष्य गुरू का शबद मानता है (अपने हृदय में टिकाता है) वह सूरमा (बन जाता) है (विकार उसको जीत नहीं सकते)। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में सदा का निवास प्राप्त कर लेता है। वह उस रजा के मालिक प्रभू का हुकम मानता है। 4। जो जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू का सिमरन करता है वह। मानो। सतियुग में है। वह सदा-स्थिर-प्रभू की याद में टिका हुआ ही जगत की कार करता है। उसको हर जगह सदा-स्थिर प्रभू ही दिखता है। उसके मन में उसके मुँह में सदा-स्थिर-प्रभू उसका सदा साथी बन जाता है। 5। जिस मनुष्य के अंदर से धर्म की एक ताकत समाप्त हो जाती है। जिसके अंदर धर्म के तीन पैर रह जाते हैं और मेर-तेर अपना जोर डाल लेती है। वह मानो। त्रेते युग में बस रहा है। अपने मन के पीछे चलने वाला व्यक्ति (मेर-तेर के) अवैड़ेपन में दुखी होता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह सदा-स्थिर प्रभू का सिमरन करता है (और। वह मानो। सतियुग में है)। 6। अपने मन के पीछे चलने वाला बँदा कभी परमात्मा की हजूरी में आदर नहीं पाता। उसकी अंतरात्मा कभी भी (सिमरन की) उत्साह में नहीं आती। ऐसे व्यक्ति अपने मन की वासना में बँधे हुए जगत में आते हैं और बँधे हुए ही यहाँ से चले जाते हैं। उन्हें (सही जीवन-मार्ग की) कोई सूझ नहीं होती। 7। जिन लोगों के अंदर दया आधी रह गई (दया का गुण कम हो गया) जिनके हृदय में धरती का आसरा धर्म सिर्फ दो पैर टिकाता है (भाव। जिनके अंदर सुरी संपदा और असुरी संपदा एक समान हो गई) वह। मानो। द्वापर में बसते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1023 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Vasant Vihar के market में Sunday सुबह की धीमी-धीमी activity।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 48 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1023” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1024 →, पीछे का: ← अंग 1022।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।